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अम्बर रंजना पांडेय की नई कविताएं

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महानगर में दो नागरिकों के बीच बने पुल की कविताएं 


बृहद जनारण्य को पारकर चार चक्रयान बदलकर
दो नागरिक प्रतिदिन सायंकाल
भग्न मस्जिद को घेरे वन में मिलने आते है

कसे जूते उतार देता है एक नागरिक
दूसरा चमरस निहारता है थोड़ी देर

वह इतने महानगर हो चुके है
कि केवल बचे हुए है मिलने की टूटी पुलिया पर
जैसे चतुष्पंक्तिक विज्ञापन में
बचा रह जाए कोई पूर्णविराम
जिसकी चरितपंजी अब तक हवाईजहाज़ों से
गिरती राख से चिह्नांकित नहीं हुई

इसी पूर्णविराम को आड़ा कर
दो नागरिक प्रतिदिन सायंकाल
एक पुल बना लेते हैं।


वर्ष के अन्त तक, जब अँधेरा जल्दी हो जाता है
दूसरे नागरिक की प्रतीक्षा में पहला नागरिक
इस महानगर में नष्ट होकर यन्त्र हो चुके

एक नागरिक कवि की पुरानी
कविताओं की किताब नहीं पढ़ पाता
चित्रोपम कविताओं की भूमि पर

मोटरवाहनों का शोर, पखेरुओं की पाँत का
सायंकालीन कलरव और ढही हुई गुम्बद में
रहनेवाले नेवले की निशंक नीरवता भर
जाती है

थोड़े रुपयों में से प्रतिदिन यहाँ आने का भाड़ा
इतनी ही बचत है दोनों नागरिकों की
हारीबीमारी में काम आने को।


दूसरे नागरिक के देर से आने का कारण
उसके हाथ…

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 21 : सिल्विया वाले गेरीन की नई फिल्म

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स्मरण : विष्णु खरे

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