गीत चतुर्वेदी : कॉलम 18 : प्रेम हमें स्वतंत्र करता है, समय हमारी हत्या




नेथैनियल हॉथोर्न की एक कहानी है- वेकफील्ड। एक आदमी अपनी पत्नी से कहता है कि वह बाहर जा रहा है और एक-दो दिन में लौट आएगा। वह दरवाज़े पर खड़े हो एक ‘मूर्ख मुस्कान’ के साथ अपनी पत्नी से विदा कहता है और घर से निकल जाता है। कुछ क़दम चलने के बाद वह सोचता है कि कहीं दूर क्यों जाया जाए? वह सामने की गली में स्थित एक होटल में एक कमरा ले लेता है और तय करता है कि अगली शाम वह घर लौट जाएगा। अगले रोज़ वह सोचता है कि इतनी जल्दी क्यों लौटा जाए? वह एक दिन और रुक जाता है। वह अपने परिवार, जीवन और तमाम दूसरी चीज़ों के बारे में सोचता है, लेकिन हर रोज़ अपना लौटना स्थगित कर देता है। दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुज़रते जाते हैं। वेकफील्ड नाम का वह आदमी अपने घर नहीं लौटता। भेस बदलकर सड़क पर टहलता है। दूर से अपनी पत्नी को चलता देखता है। पाता है कि वह दिन-ब-दिन बूढ़ी होती जा रही है। वह घर से इतना क़रीब है कि एक पत्थर भी फेंके, तो उससे घर की कोई खिड़की टूट जाए, लेकिन वह घर नहीं जाता। न किसी से बात करता है, न मिलता-जुलता है, बस अकेला रहता है। इस तरह बीस साल गुज़र जाते हैं। एक सुबह वह तय करता है कि आज घर लौटूँगा। उस दिन बहुत अच्छा मौसम था। ठंडी हवा चल रही थी। उसे महसूस होता है कि वह ख़ुद नहीं चल रहा, बल्कि ख़ुद हवा उसे पीछे से धकियाते हुए घर की ओर ले जा रही है। वह कॉलबेल बजाता है। बूढ़ी हो चुकी उसकी पत्नी दरवाज़ा खोलती है। जिस ‘मूर्ख मुस्कान’ के साथ उसने अपनी पत्नी से विदा कहा था, उसी ‘मूर्ख मुस्कान’ के साथ अंदर घुसते हुए वह कहता है, “मैं घर लौट आया।” कहानी ख़त्म हो जाती है।

यह कहानी 1835 में लिखी गई थी। विश्व-साहित्य में कहानी या शॉर्ट-स्टोरी विधा की आरंभिक कहानियों में से एक। तब से अब तक इसकी सैकड़ों व्याख्याएँ हो चुकी हैं। इस कहानी का कोई भी अर्थ पूरा व सटीक नहीं जान पड़ता। हॉथोर्न ने कहीं यह स्पष्ट नहीं किया कि वेकफील्ड ने घर क्यों छोड़ा और किन कारणों से वह इतने बरस घर नहीं लौटा। इसलिए व्याख्याओं की अनंत संभावना है। सबसे प्रचलित व्याख्याओं में से एक यह है-- घर व व्यक्ति दो अलग ध्रुव हैं। कोई व्यक्ति, घर-परिवार में जितना शामिल होता जाता है, वह अपने व्यक्तित्व को उतना ही खोने लगता है। जिस दिन अपने व्यक्तित्व की याद उसके लिए असह्य हो जाती है, वह वेकफील्ड जैसा हो जाता है। समकालीन अंग्रेज़ी लेखक ई. एल. डॉक्टरोव ने 2008 में इस कहानी को इसी शीर्षक से दुबारा लिखा, उसे ज़्यादा आधुनिक बनाते हुए। वेकफील्ड के मानसिक द्वंद्व को अधिक स्थान देते हुए। ‘न्यूयॉर्कर’ में छपी वह कहानी अपने आप में एक व्याख्या है- बेहद अमेरिकी क़िस्म की व्याख्या। 2016 में हॉलीवुड ने इसी नाम से एक औसत-सी फिल्म बनाई, जिसमें घटनाओं की गति कहीं अधिक है।

इस कहानी से मेरा परिचय 2008 में ‘न्यूयॉर्कर’ के उसी अंक से हुआ था। डॉक्टरोव लिखित वह संस्करण पढ़ने के बाद मैंने खोजकर हॉथोर्न की कहानी पढ़ी थी और उसी क्रम में जाना कि बोर्हेस इस कहानी के बड़े प्रशंसक थे। यह कहानी मुझे बार-बार याद आती है। कई घटनाएँ डालकर डॉक्टरोव ने भले इसे आधुनिक बना दिया हो, लेकिन उन्होंने इसके अर्थ को सीमित करने की चूक भी की है। संरचनागत अनगढ़ताओं के बावजूद मुझे हॉथोर्न वाला संस्करण ज़्यादा सुहाता है।

हमारे जीवन की सामाजिक संरचना ऐसी है कि हम छुट्‌टी लेने के आदी हैं। स्कूल में थे, तो सप्ताह में कम से कम एक दिन छुट्‌टी होती थी। साल में एक या दो बार लंबी छुटिटयाँ भी मिलती थीं। तब हम स्कूल की चिंता बिल्कुल नहीं करते थे। बड़े होने पर काम से छुट्‌टी ली जाती है। क़िस्मत व बजट अच्छे हैं, तो साल में एकाध बार लंबी छुट्‌टी लेकर कहीं घूम आया जाता है। हर काम से छुट्‌टी ली जा सकती है, तो फिर ज़िंदगी से छुट्‌टी क्यों नहीं ली जा सकती? हम जीवन जी रहे हैं, कभी-कभी लगता है कि एक काम की तरह उसे जी रहे हैं, सब-कुछ एक जैसा, हर समय एक-सा तनाव, आनंद के क्षणों में भी जीवन नाम के इस काम का तनाव—क्या कोई ऐसा तरीक़ा होता है, जब न केवल सारे काम, बल्कि इस पूरी ज़िंदगी को छोड़कर कहीं दूर चले जाया जाए? मृत्यु भी एक छुट्‌टी है, एक लंबी छुट्‌टी, लेकिन फिर भी वह छुट्‌टी नहीं है। छुट्‌टी का अर्थ मुक्ति नहीं होता। मुक्ति के बाद लौट आने का भाव नहीं होता, लेकिन छुट्‌टी शब्द का अर्थ ही इस भाव में छिपा है कि मैं कुछ दिन, कुछ समय के बाद, इस काम में वापस लौट आऊँगा। इसलिए मृत्यु को इस कहानी में फिट नहीं कर सकते।

एक ऐसा तरीक़ा, जिसमें मुझ पर मैं होने का कोई दबाव न हो। कुछ दिनों के लिए मैं वेकफील्ड या गीत चतुर्वेदी होने से छुट्‌टी ले लूँ, कुछ और हो जाऊँ, या कुछ भी न होऊँ, बस, एक देह होऊँ, एक अस्तित्व होऊँ और वह पहले जैसा बिलकुल न हो। यह कैसी विडंबना है! अस्तित्व से छुट्‌टी पाने के लिए भी तुम्हें एक अस्तित्व की दरकार होती है। जीवन से छुट्‌टी लेकर जो समय गुज़ारा जाएगा, वह भी जीवन ही होगा। तुम अपना नाम-गाँव छोड़ दोगे, संगी-साथी छोड़ दोगे, पूरी तरह अकेले रहोगे, तब भी, तब भी वह जीवन ही होगा। चूँकि वह छुट्‌टी होगी, इसलिए जिस दिन तुम उसे पूरा मानोगे, तुम घर को लौट जाओगे। ठीक उसी मूर्ख मुस्कान के साथ कि मैं घर लौट आया।

जीवन क्या एक अकेली चीज़ है? हम सब इंडीविज़ुअल हैं, अलग-अलग व्यक्ति हैं, अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, साथ रहकर भी अंतत: हम सब अकेले हैं, लेकिन हमारा जीवन कभी अकेला नहीं हो सकता। जीवन एक सामूहिक परिघटना है। निहायत व्यक्तिवादी व्यक्ति का अकेलेपन में गुज़ारा गया जीवन भी अंतत: अकेला नहीं होता। तुम किसी की जीवनी लिखने की कोशिश करो, उसके लिए सिर्फ़ उसी व्यक्ति का जीवन काफ़ी नहीं होगा, उससे जुड़े कई और लोगों के जीवन को भी उस किताब में लिखना पड़ेगा। 

वेकफील्ड की कहानी पढ़ते हुए मन में एक सवाल सहज ही आता है कि उसकी पत्नी ने क्या अपराध किया था, जो उसे प्रतीक्षा और अनिश्चय का ऐसा दंड झेलना पड़ा? वेकफील्ड के पास एक मूर्ख मुस्कान है, वह कहीं से बुद्ध नहीं है। लेकिन बुद्ध की कहानी पढ़ते समय भी जो सहज सवाल आता है, वह इसी प्रकृति का है : यशोधरा ने क्या अपराध किया था? एक व्यक्ति द्वारा लिया गया निर्णय सिर्फ़ एक ही व्यक्ति को थोड़े प्रभावित करता है।

अस्तित्ववाद में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर गहरा चिंतन है। वह क्यों स्वतंत्र नहीं है? क्योंकि उसका जीवन कई दूसरों के जीवन से बँधा हुआ है। यह बँधाव किन्हीं लोगों को ग़ुलामी की तरह लगता है। वेकफील्ड ने यह ग़ुलामी तोड़ दी और अकारण ही ग़ायब हो गया। अपनी इस नियोजित गुमशुदगी के दिनों में क्या वह स्वतंत्र हो गया था? बिल्कुल नहीं। तब उसके पास एक नई तरह की ग़ुलामी आ गई- ख़ुद अपने ही जीवन की ग़ुलामी। और यह ग़ुलामी उसके पैदा होने के क्षण से उसके पास थी, बस, उसे यह बात कभी महसूस नहीं हुई थी।

वेकफील्ड हम सबके भीतर रहता है। इस कहानी में वह बीस साल अपने घर से दूर ‘एक तरह की छुट्‌टी’ पर रहा, लेकिन तब भी वह घर के आसपास ही रहा, घरवालों के बारे में सोचता रहा और अंत में घर को ही लौटा। जिसे वह ‘ज़िंदगी से छुट्‌टी के बरस’ मानेगा, वह दरअसल उसके ‘घर से छुट्‌टी के बरस’ कहलाएँगे।  हम सभी अपने जीवन में थोड़ी-थोड़ी देर के लिए वेकफील्ड बन जाते हैं। तुम थोड़ी देर के लिए आँख बंद करते हो, जाने किन ख़यालों में जाते हो और भूल जाते हो कि तुम्हारे पास कोई जीवन भी है, कोई परिवार, मित्र, साथी भी हैं। उतनी देर के लिए तुम ग़ायब हो जाते हो। उतनी देर के लिए तुम वेकफील्ड बन जाते हो। सारी ज़िम्मेदारियों से दूर। ज़िंदगी को जीने की विवशता से दूर। दस मिनट, एक घंटा, एक रोज़.... हर वेकफील्ड की अपनी क्षमता है। एक दिन वह लौट आता है। लौटना सबसे बड़ा आकर्षण है। तुम उसे स्थगित कर सकते हो, लेकिन एक न एक दिन लौटते ज़रूर हो। जैसे धरती से पैदा हुई सीता धरती को लौट जाती है। पानी से पैदा हुई सभ्यताएँ पानी में डूब जाती हैं। इथाका से निकला ओडिसिस अपनी सारी यात्रा इथाका लौटने के लिए ही करता है। जैसे सुबह-सुबह पूरब से उगा सूरज चौबीस घंटे मशक़्क़त करता है कि वह वापस पूरब में पहुँच जाए। तुम्हारा लौटना इन सबकी महान लौट जैसा न हो, संभव है कि वह वेकफील्ड जैसा ही हो, मूर्ख मुस्कान के साथ, फिर भी वह लौटना ही होगा। क्योंकि तुमने जीवन को बदलने की अर्जी नहीं दी थी, जीवन से छुट्‌टी की अर्जी दी थी। नौकरी नहीं बदलना चाहते थे, बस, उस नौकरी से छुट्‌टी पर जाना चाहते थे।

हम कितना भी चाह लें, कितने भी दार्शनिक सिद्धान्त विकसित कर लें, जीवन से छुट्‌टी नहीं मिल सकती। नेरूदा की एक कविता याद आती है : 

कोई चीज़ हमें मौत से नहीं बचा सकती,
प्यार कम से कम हमें ज़िंदगी से बचा ले। 

सारी उम्मीद अंतत: प्यार पर आकर टिक जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल जिन-जिन लोगों ने उठाए, उन सबके जीवन को खंगालकर देख लो – उनके जीवन में बहुत सारा प्यार नहीं था। उन सबके भीतर प्यार की प्यास व चाहत थी। जिस तरह वे चाहते थे, वह उस तरह पूरी नहीं हो पाई। उन्होंने जीवन को एक तरह की परतंत्रता के रूप में देखना शुरू कर दिया। सच तो यह है कि उनके जीवन में कुछ रिक्तताएँ ऐसी थीं, जिन्हें प्यार भी नहीं भर सकता था।
वहीं, सूफ़ी हमेशा प्यार में डूबे रहने का अहसास कराते हैं। औरत नहीं मिली, तो आदमी से प्यार कर लिया। आदमी कम पड़ा, तो ख़ुदा से प्यार कर लिया। फूल, पेड़, पत्ते, चिड़िया से प्यार कर लिया। कुछ नहीं, तो अपनी कल्पनाओं से ही प्यार कर लिया। वे बंधनों का उत्सव मनाते हैं और उस बंधन को ही स्वतंत्रता के रूप में परिभाषित करते हैं। जब तक तुम बंधन को नकारते रहोगे, तब तक जीवन में बंधन की उपस्थिति पर मुहर लगाते रहोगे।

बंधन व स्वतंत्रता की परिभाषा सभी के लिए अलग है। हॉथोर्न ने एक अलग कहानी में लिखा था : “ख़ुशी तितली की तरह होती है। तुम उसके पीछे दौड़ोगे, वह तुम्हारे हाथ नहीं आएगी। जब तुम स्थिर होकर एक जगह बैठ जाओगे, संभव है कि वह तुम्हारे सिर के ऊपर मंडराने लगे।” इस वाक्य में ख़ुशी की जगह प्रेम व स्वतंत्रता जैसे शब्दों को भी, कुछ मायनों में, रखा जा सकता है। कहने का अर्थ है, जो चीज़ हमें ज़िंदगी से बचा लेगी, उसे प्यार कहा जा सकता है। ज़िंदगी से बचाकर, ज़िंदगी की सुंदरता के दर्शन करा देना। ज़गाएव्स्की की एक कविता है : “प्रेम हमें स्वतंत्र करता है, समय हमारी हत्या।” यह स्वतंत्रता किससे चाहिए होती है? शायद, ज़िंदगी से ही।

कई बार सोचता हूँ, अगर वेकफील्ड के जीवन में विस्मृति आ गई होती, तब क्या दृश्य बनता? वह सब कुछ भूल जाए, घर, परिवार, पत्नी, यहाँ तक कि अपना जीवन भी भूल जाए। बिल्कुल कोरे काग़ज़ की तरह सड़क पर खड़े हो जाए। तब वह क्या होगा? एक स्वतंत्र वेकफील्ड? एक स्वतंत्र व्यक्ति? अब उसके पास कोई बंधन नहीं है, सारे बंधन स्मृति से पैदा होते हैं, वह स्मृतिहीन है, सो बंधनहीन है, सो स्वतंत्र है। जीवन था, लेकिन उसकी कोई स्मृति नहीं है, यानी जीवन नहीं था। वह जीवन से भी स्वतंत्र है। तब तो यह कहा जा सकता है कि प्रेम नहीं, विस्मृति हमें स्वतंत्र करती है? तब तो वह मृत्यु की तरह होगी, मृत्यु के बाद प्राप्त नये जीवन की तरह होगा। उसमें लौट जाने की संभावना ही नहीं होगी। और अगर लौट जाने की इच्छा, संभावना व प्रक्रिया न हो, तो छुट्‌टी वाला भाव ही नहीं आएगा। तुमने स्व को ही खो दिया, तो स्वतंत्र कहाँ से हुए? स्वतंत्र का अर्थ है किसी और के बजाय अपने स्व से शासित होना। पूर्ण विस्मृति ने स्व को ही छीन लिया, तो स्वतंत्रता का सवाल ही अवैध हो गया।

प्रेम के दो पैर होते हैं। स्मृति व विस्मृति। प्रेम करने का अर्थ है अपने व दूसरे के जीवन के कई पक्षों को बार-बार याद करना। प्रेम करने का अर्थ है अपने व दूसरे के जीवन के कई पक्षों को हमेशा के लिए भूल जाना। बिना याद किए तुम प्रेम नहीं कर सकते। बिना भूले तुम प्रेम नहीं कर सकते। दोनों काम आते हैं। दोनों में संगति ज़रूरी है। ज़ाहिर है, दो पैरों में संगति न हो, तो तुम ढंग से चल भी नहीं पाओगे। प्रेम इसी तरह स्वतंत्र करता है। स्मृति के ज़रिए वह बार-बार तुम्हें, तुम्हारे स्व का ध्यान कराता है, तुम स्वाधीन होते जाते हो। विस्मृति के ज़रिए वह तुम्हें, तुम्हारे स्व से भी अलग कर देता है, तुम हर तरह की अधीनता से दूर हो जाते हो, इस तरह स्वतंत्र होते जाते हो। तुम्हारे स्व का ऐसा तंत्र विकसित होता है, जिसमें ज़रूरत पड़ने पर स्व अनुपस्थित हो जाए। यही प्रेम द्वारा दी गई स्वतंत्रता है।

पूर्ण विस्मृति वेकफील्ड या तुम्हारे किसी काम की नहीं। अनुपस्थित रहकर भी तुम जीवन से छुट्‌टी नहीं पा सकते। कितना अनुपस्थित रहोगे? स्मृति तुम्हें अनुपस्थित रहने देगी? तुम एकांत में रहना चाहते हो। स्मृतियाँ तुम्हारे एकांत को भी खंडित कर देती हैं। वेकफील्ड जीवन से छिप सकता है, लेकिन उससे भाग नहीं सकता। हम हर ओट का इस्तेमाल छिपने के लिए करते हैं। यह देह भी महज़ छिपने की एक जगह है।


 

Comments

Harsha Verma said…
इस लेख की गहराई में डूबते हुए ऐसा लगा जैसे कहीं न कहीं तैरना और उबरना भी सीख रहे हों. इसमें कितनी ही पंक्तियाँ हैं जिन्हें जितनी बार पढ़ा जाए, ऐसा लगता है कि और भी गहराई में जाया जा सकता है, और भी तैरा जा सकता है, कि क्या पता कहीं एक और मोती मिल जाए..

शुक्रिया गीत सर, इस सुन्दर और गहरे लेख के लिए और शुक्रिया एडिटर साहब, सबद पर इतने बढ़िया लेख प्रकाशित करने के लिए..
Preet said…
This article had to be read re-read, and re-re-read. Thank-you Geet Sir
Anita Manda said…
बहुत ही सुंदर लिखा है।
Rahul Tomar said…
🙏🙏 सच में बहुत सुंदर लिखा है।💐💐
Nikhat Ara said…
New ,Poet Sabeer haka (IRAN)
Ko padh ke waqayi me khushi huyi, uski poetry me "Mout or Zindagi" ka dar dono ek saath moujood hai.
जीवन में जितना भी समय है वह हमें बांध देता है जबकि किसी की भी निजी वस्तु उसका अकेलापन है उसका मानसिक अंतर्द्वंद है ..वेकफीलड ने जो किया इसी पशोपेश के चलते किया जो समाज के विरुद्ध हो सकता है लेकिन अपने खिलाफ नहीं ..प्रेम हमें आजाद करता है सही है.. प्रेम की अनिवार्य शर्त सहजता है

बहुत सी गूढ़ बातें है लेख में.. सुन्दर
Anil Tiwari said…
क्या लिखते हो दिल को छू जाता है मौन सा पसर जाता है
'प्रेम करने का अर्थ है अपने व दूसरे के जीवन के कई पक्षों को हमेशा के लिए भूल जाना।'
Geeta Verma said…
Amazing geet ji
Mohammad Aazad said…
ये तो हर एक वस्तु पर लागू होगा
Amarnath Jha said…
Adbhut❤️
Jb bhi likhte h chamatkrit kr dete hain aap ❤️
Vibhavari Jnu said…
Shukriya Geet. aapke columns kitne dwandwon se baahar laane ka ya un par naye sire se sochne ka nukta muhaiya karaate hain.
Purnima Gautam said…
वाह.. बहुत ही सुंदर
Mamta Kalia said…
प्रेम के दो पैर स्तंभ बहुत जानदार और शानदार है।गीत चतुर्वेदी बहुत बढ़िया ढंग से विचार रखते हैं।
It is like truth of creation and destruction .

It is shown in that movie very famous one don't remember though ... because for loss of memory the lady character falls in love again and again with the same person .
क्या खाकर कोई प्रेम करेगा। वो तो बस हो जाता है। आप जैसे विद्वतजन् विश्लेषण करते हैं तो ऐसा लगता है कुछ समझ में आ रहा हो वरना प्रेम तो अबूझ ही लगता है।
Amit Joshi said…
Bahut hi Khoobsurat vyakhya

Apki न्यूनतम मैं jabse Padhi hai bahut acha lagta hai mujhe. Yun hi likhte rahiye
Geet aapka gadya mujhe hamesha se pasand hai....Badhai.....
Nandan Bisht said…
बेमिसाल 👌👌👌
Rajni Vashisth said…
Jivan ka sach aap ki kalam se nikal ta h bhaisab ji
Sapna Bhatt said…
बिन भूले तुम प्रेम नही कर सकते :) 💐💐
Rajneesh Anand said…
आप सच में अद्‌भुत बेमिसाल है गीत जी
Roshni Verma said…
बहुत ही बढ़िया गद्य
Sumita Varma said…
बहुत सुंदर। कुछ अलग तरह से सुंदर।
Veebha Parmar said…
बहुत सुंदर
Vijay Maudgill said…
prem......adhbudt
Amar Singh Amar said…
आपका हर लेख जानदार होता है.

शुक्रिया सर. बहुत सूक्ष्म व्याख्या की है.
Venus Singh said…
दिल की स्मृतियों के साथ सुर ताल मिलाता हुआ आपका लेखन,आपके नाम को कितना सार्थक कर देता है,,,,,,
Unknown said…
Bahot hi khobsurti se likha gaya hai.....
Usha Verma said…
Ek shabd jo psychology me istemaal hota hai..deindividualization.. Wo concept bhi manav man ki ajeeb vyakhya hai. Ek experiment hua tha ispar jispar shayad film bhi bani thi. Standford prison experiment.
Sahi true definition of love...😊
Manisha Sri said…
एक बार एक प्रेमिका ने कहा ....मुझे अल्ज़िमर भी हो जाये तो भी मैं उसे नहीं भूल सकती। प्रेम वो पीड़ा है जो सिमृतियो में रेत के उन कणों की तरह है जिसे अपनी ज़िद्द की झाड़ू से जितना भी साफ़ कर लो कुछ कर्ण रह ही जाते है।
प्रेम की इतनी ख़ूबसूरत व्याख्या शायद पहली बार पढ़ी.. माने के प्रेम पास न होकर भी पास है ...बेहद अद्भुत ❤️👌
मेरे मन में प्रिय कवि तुम्हारे लिखे शव्दों जैसा ही अस्थिर प्रेम है। आज तक इसी भवंर में मैं फंसा रहा कि यह क्यों होता है मेरे साथ... उस प्रेम को बार बार याद करता हूं व भूलना भी रहता हूं। आज समझ गया ... बिना याद किए , बिना भूले प्रेम नहीं कर सकते।
आभार।
Harish Bhatia said…
Thought- provoking....Perhaps,love between two,should become a fulfilling possibility,if the two live life as a duet,sometimes one getting into thelead;sometime,theother,and sometimes both together,and yet,sometime,nether singing-both quiet,a pause....and so on.A Raga-anurag-.Virag!
शुक्रिया गीत, तुम्हारे होने के लिए.. अद्भुत, वास्तव में आलौकिक...
यह देह भी महज़ छिपने की एक जगह है।
बहुत ही सुंदर
Arun Inder Vyas said…
याद रखने व भूलने की भूलभुलैया में ही तो प्रेम लुकाछिपी के खेल से #गीत को रचता है।
Rachana Dubey said…
आप की लेखनी अद्भुत है और सोच की गहराई तो सचमुच ऐसा महसूस कराती है जैसे एक आत्मा जो बहुत से सवालो में उलझी हो उसे अपने सवालो के जवाब मिल गए हो ।
और सवाल भी ऐसे जिसे कभी किसी से पूछने या बताने ही नही जिसके अस्तित्व में होने पर भी शक था ।
हर घर छोड़ने वाला वयक्ति स्वम को बुद्ध जैसा ही समझता होगा हम या आप उसकी मुस्कान को चाहे मूर्खतापूर्ण समझे ।
अपने व्यक्तित्व से भाग कर कुछ और हो जाना सचमुच मे आसान नही ।
Sanjay Jaiswal said…
क्या बात है ।गीत भाई
साधना मिश्र said…
इन आर्टीकल्स की किताब कब आएगी....?

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