Wednesday, June 27, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 17 : आईने ईश्वर द्वारा भेजे गए जासूस हैं




इस बार अपनी नोटबुक से चुने हुए कुछ वाक्य : 


बहुत थे लोग, मैंने उन्हें नहीं देखा
बहुत था दुख, दरिया में बहा न पाया 
बहुत था प्रेम, पूरा नहीं दे पाया
बहुत था जीवन, उसे एक ही क्यों माना?  

इतना पवित्र है तुम्हारा कंठ कि वहाँ प्रार्थनाओं को नहीं, प्रेम के गीतों को रहना चाहिए

प्रेमी से कुछ छिपा ले जाना राजनीति है 
प्रिय कवियों की सूची बनाना राजनीति है
जो प्रेम मैं तुमसे कर चुका हूं, उसे तुम भी अब छीन नहीं सकती 
इस पंक्ति का उच्चारण करना राजनीति है

गल्‍प शक्तिशाली लोगों की सेवा में लगा हुआ, फल-फूल रहा है। कविता सर्द रात में ठिठुर रहीइतनी भली है कि कंबलचोर को कोस भी नहीं पाती

तुमने पूछा- कविता कहाँ से आती है? / काले कोलतार से आती है / क़मीज़ के उस हिस्‍से से जो पतलून के भीतर है / एक पैर की चप्‍पल के अकेलेपन से आती है / लाइब्रेरी के भीतर किताबों के खर्राटों से / सिर की एक अजनबी नस में हुई पीड़ा से / तुम्‍हारे न पढ़ने से / कभी-कभी मेरी खाँसी से आती है /

मेरी हिचकी / एक अधूरी छूटी कविता द्वारा / लगाई गई पुकार है 
 


मैं तीन जगहों से चलता हूँ, अंत में एक ही जगह पहुँचता हूँ।
अद्वैत की प्रस्थानत्रयी को क्या मैं इस तरह देख सकता हूँ?
*  

भाषा सामूहिक है। भाषातीत निजी। अपने-अपने भाषातीत का आविष्कार हम ख़ुद करते हैं। हमारे भाव-जगत में, जो कुछ भी अनिवार्य है, सब भाषातीत है। अपनी अनिवार्यताओं के अन्वेषक हम ख़ुद हैं।

ख़ुद को कभी ऐसे संकट में मत डालना कि तुम्हें मूर्त व अमूर्त में से किसी एक का चुनाव करना पड़े। फिर भी, ऐसी कोई बाध्यता आ ही जाए, तो अमूर्त को चुनना। शिक्षक मूर्त है, उसके द्वारा दी गई शिक्षा अमूर्त। अक्षर, शब्द और वाक्य मूर्त हैं, उनसे उभरकर आया अर्थ अमूर्त। सिर्फ़ अमूर्त में ही वह क्षमता है, जो तुम्हें अदृश्य की गहराइयों तक ले जा सके।

एक घाव है, जो कभी नहीं भरता। उससे मुस्तक़िल ख़ून बहता रहता है। लेखन यही है। जिस दिन सारा ख़ून निकल जाता है, लिखना बंद हो जाता है। कवि, घाव की संतान है। उसका आधा श्रम उस घाव को नकारने में जाता है और बचा हुआ श्रम उस ख़ून को सहेजने में। मानो या न मानो, जब भी तुम कविता लिखते हो, अपना बहा हुआ ख़ून लिखते हो।

हर पल के भीतर एक अकुलाई अर्जेंसी है : “मुझे जी लो, वरना मैं ख़त्म हो जाऊँगा।”
हर पल के भीतर एक उदासीन उपेक्षा है : “छोड़ो भी, मुझे क्या जी रहे! अभी तो ख़त्म हो जाऊँगा।”

अति-प्राचीन समय में जब कोई बौद्ध-भिक्षु बोध प्राप्त कर लेता था, तब वह छुरा भोंककर अपनी जान ले लेता था। साधना कर-करके मुक्त हो गए, अब जीकर क्या करेंगे? यह आध्यात्मिक आत्महत्या थी और बौद्ध संघ को इससे कोई आपत्ति न थी। उसे सिर्फ़ यह चिंता थी कि हम कैसे मान लें कि आत्महत्या से पहले भिक्षु ने बोध प्राप्त कर ही लिया था? कौन-सी परीक्षा इस बात को तय करेगी? उचित ही था कि जल्द ही बुद्ध ने इस चलन पर रोक लगा दी।

प्रेम के इतिहास में ऐसी घटनाएँ नहीं दिखतीं। कोई यह नहीं कहता कि इस एक क्षण में मैंने संपूर्ण प्रेम पा लिया, अब इसके बाद जीना व्यर्थ है, और फिर ख़ुद को मार डाले। जैसे ही प्रेम की अनुभूतियाँ सांद्र होती हैं, जीवन जीने की इच्छा बढ़ जाती है। प्रेम पाकर जीने का ख़्याल आता है, मरने का नहीं, क्योंकि प्रेम अपने आप में एक मृत्यु है- एक संक्षिप्त मृत्यु!

एक नौजवान जीवन से निराश था। जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठा रोता रहता था। एक दिन मृत्यु की देवी वहाँ से गुज़री और उससे पूछा, “तुम इतना दुखी क्यों हो?” उसने कहा, “क्योंकि मैं बेहद असफल हूँ।”

मृत्यु की देवी ने उसे वरदान दिया कि तुम बेहद सफल वैद्य बनोगे, लेकिन सबका इलाज मत करना। मरीज़ के पास जाकर आँख बंद कर लेना। तुम्हें अगर मैं मरीज़ के पैर की तरफ़ खड़ी दिखूँ, तो समझ जाना कि यह ठीक हो जाएगा। अगर मैं उसके सिर की ओर दिखूँ, तो जान लेना कि कुछ ही दिनों में मैं उसे अपने साथ ले जाऊँगी। ऐसे मरीज़ का इलाज करने से मना कर देना।

नौजवान ने ऐसा ही करना शुरू किया और दूर-दूर तक एक सफल वैद्य के रूप में उसकी कीर्ति फैल गई, कि वह जिस मरीज़ को हाथ लगाता है, वह ठीक हो जाता है। वह बहुत सफल व धनवान हो गया।

एक रोज़ उस देश की राजकुमारी बीमार पड़ गई। राजा ने घोषणा करवाई कि जो इसका इलाज कर देगा, मैं इसकी शादी उसी से कराऊँगा। जगह-जगह से वैद्य आए, लेकिन सबने हाथ खड़े कर दिए। नौजवान वहाँ पहुँचा। उसे पहली ही नज़र में राजकुमारी से प्रेम हो गया, लेकिन उसने देखा कि मृत्यु की देवी उसके सिर की ओर खड़ी है।

वह कुछ देर सोचता रहा। वह किसी भी क़ीमत पर राजकुमारी को खोना नहीं चाहता था। उसने चार नौकर बुलाए और बिजली की तेज़ी से पलंग की दिशा बदल दी। अब मृत्यु की देवी राजकुमारी के पैरों की ओर खड़ी थी। नौजवान वैद्य की इस चतुराई से वह बहुत क्रोधित हुई और पैर पटकते हुए वहाँ से चली गई। राजकुमारी ठीक हो गई।

लेकिन उसी रात से नौजवान को सपने आने लगे कि मृत्यु की देवी उसके सिरहाने खड़ी है। वह पूरी रात सिरहाने को पैताना और पैताने को सिरहाना करता रहता, लेकिन देवी हर बार उसके सिर की ओर ही रहती। इससे वह इतना आतंकित रहने लगा कि कुछ ही रातों बाद उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया।

उसके बाद, हर रोज़ वह आत्महत्या की कोशिशें करता और हर बार बच जाता। कहते हैं कि वह अमर है। अब भी उसी जंगल में भटकता है, ख़ुद को मारने की नई-नई तरकीबें ईजाद करता हुआ, पर हर बार ज़िंदा बच जाता हुआ।

जब मृत्यु नाराज़ होती है, जीवन का शाप देती है।

पानी सूख जाता है, लेकिन फ़र्श पर शीतलता बनी रहती है। सूरज डूब जाता है, लेकिन अंधेरी हवा में तपिश बनी रहती है। तुम चली जाती हो, मेरे भीतर तुमसे संवाद बना रहता है।

जो बना रहता है, बचा रहता है, वह क्या होता है? शोक या उत्सव? फ़र्श पर बची शीतलता पानी का शोक है या उत्सव?

मरण कहे बिना स्मरण का उच्चारण पूरा नहीं होता। हम सिर्फ़ उन्हीं पलों को याद कर सकते हैं, जो मर चुके हैं।

माँ के निधन पर शोक करते रोलाँ बार्थ ने लिखा था, “मैं तुम्हारे जैसा नहीं था, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ नहीं मरा।”

सिकंदर ने पश्चिमी भारत में भरपूर तबाही मचाई थी। वह सबकुछ ऐतिहासिक है। सेनाएँ स्वभावत: क्रूर होती हैं और उस ज़माने में लूटपाट की विशेष महत्ता थी।

उसके भारत हमले के सौ साल बाद मकदूनिया और यूनान में भयानक प्राकृतिक आपदाएँ आईं। लोग मर रहे थे। शासन असहाय था। इतने संसाधन भी नहीं थे कि जनता की मदद की जा सके।

उन दिनों भारत में अशोक का शासन था। वह तब तक इंसान बन चुका था। उसके बौद्ध प्रचारक यूनान जाते रहते थे। कहा जाता है कि उसने विशेष आदेश दिए। बहुत बड़ी राहत-सामग्री यूनान भिजवाई गई। वह आधुनिक काल नहीं था, फिर भी सरहदों के पार, दुश्मनियों के माहौल में, इंसानी मदद की वह पहल कितनी सुंदर थी।

विद्वान कहते हैं कि यह सिर्फ़ धर्म-प्रचार या राजनयिक निर्णय नहीं था, यह सिकंदर के उत्पातों के प्रति अशोक का बदला था। महान सभ्यताएँ अपना बदला ऐसे ही चुकाती हैं।

इतिहास में हम नायक भले तलाश लें, प्रति-नायक, खलनायक नहीं तलाशने चाहिए, क्योंकि ये दोनों भूमिकाएँ हर किरदार अदा करता है। हर नायक किसी न किसी मोड़ पर खलनायक होता है।

संगीत को यदि पूरी तरह शब्दों में ढाल दिया जाए, तो क्या वह कविता बन जाएगा? कविता के भीतर जो नि:शब्द संगीत होता है, ऐसे में वह कहाँ जाएगा? वह तो शब्दों में आने से मना कर देगा। अगर वह शब्दों में आ गया, तो कविता नष्ट हो जाएगी। तब वह संगीत क्या बनेगा? शायद वह दर्शन बन जाएगा। दर्शन, संसार का चित्र नहीं, बल्कि संसार की व्याख्या के चित्र की योजना है। संगीत भी यही है।

पर सोचने वाली बात यह है कि क्या वह चित्र कभी पूरा भी होता है?  

जिसकी अनुपस्थिति में भी तुम जिससे मानसिक संवाद करते हो, उसके साथ तुम्हारा प्रेम होना तय है। भले वह सौ साल पहले ही क्यों न मर चुका हो। यह तुम्हारे हृदय की नहीं, संसार की बनावट की सीमा है कि तुम उससे कभी मिल न पाओ।

प्रेम अलग शै है, प्रेम की अभिव्यक्तियाँ निहायत अलग।
क़तई ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे हिस्से दोनों आएँ।

मंथरता। मेरी मंथरता।

हवाई जहाज़ में बैठती है और बहुत दूर पहुँच जाती है। ट्रेन में बैठती है और बहुत तेज़ी से गुज़रती है। मैं सड़क पर दौड़ता हूँ, तब वह मेरे कंधों पर बैठी रहती है।

गति मेरे लिए क्या करती है? बस, मेरी मंथरता को एक से दूसरी जगह पहुँचा देती है।

जो हर बात पर लड़ते हैं, भूल जाते हैं कि एक दिन वे भी मर जाएँगे।

एक व्यक्ति ने लिखा : पीड़ा। दूसरे ने पढ़ा : सौंदर्यशास्त्र।
एक ही शब्द का उच्चारण, दो लोगों के लिए कितना अलग-अलग होता है।

मेरा मन था कि लौटते समय ट्राम पकड़ूँ, लेकिन मेरे शहर में ट्राम नहीं चलती। ज़ोरों की बारिश हुई, पर सिवाय मेरे पतले होंठों के, कुछ गीला न हुआ।

रास्ते में एक खेत पड़ा। मैंने वहाँ उस पेड़ के बीज बिखेर दिए, जिसे बोते सभी हैं, पर उगता हुआ आज तक कोई ना देख पाया।  

कुएँ के पास एक दरवेश कौओं को पुकार रहा था। हर कौए को पता था कि कौन-सा ‘आओ’ उसके लिए उच्चारा गया है। मेरे गाल कभी नहीं जान पाते कि कौन-सा आँसू किस दुख के लिए निकला था, कौन-सा थप्पड़ किस अपराध के लिए।

दक्षिण की ओर एक जंगल था, जहाँ पेड़ों पर पत्तों की जगह आईने उगे थे। पीले पड़कर गिर गए आईनों को लोग उठा ले जाते और रूप निहारते। मुझे किसी में अपना प्रतिबिंब दिखाई न पड़ा। आईने ईश्वर द्वारा भेजे गए जासूस हैं।

मैं लौट आया। चाहता था कि लौटकर अपने घर पहुँचूँ, पर मेरे शहर में अब मेरा घर नहीं रहता।
कुछ लोगों के हाथ में मेरी तस्वीर थी। मुझे दिखाकर वे बोले, “तुमने इसे कहीं देखा है? हम इसे कब से खोज रहे।”

क्या बताता मैं उन्हें?
कि बहुत दूर, मैं तुम्हारे द्वार पर दस्तक की तरह छूट आया।
* * *


Wednesday, June 20, 2018

अजंता देव की लंबी कविता






हुसनसर की बावड़ी उर्फ़ स्त्रियों की गुप्त बातचीत


सोनमाछरी जैसी कौंधती रेत पर
आना चुपचाप
मेरे पाजेब खो दूंगी एक दिन पहले
पानी लेने जाऊँगी तब
किवाड़ों  की जोड़ पे चुपड़ दूंगी कड़वा तेल
माचे की तनी कस दूंगी आज
जूती और लाठी कब से डूबे हैं तेल में
आज धूप में छोड़ना है
बंशीधर पंचांग में अगली अमावस को घेर दिया है काजल की तीली से
तुमने भी वो ही घेरा है ना ,जाँच लो
ऊँट के खुर बाँध के आना
वो खोजेंगे पार देस
अपन निकल जायेंगे लखपत की ओर
वैसे भी किसे पड़ी है मेरी
सोने की बिस्कुट तो ना है
कि कोई इतनी मेहनत करेगा तस्करी पे
सोचेंगे बापू और हाथ से रेत झाड़ के छाछ पी लेंगे दो गिलास।

(चिट्ठी,जो लड़की ने प्रेमी के लिए सहेली को लिखवाई।) 


अगर फूल सा ही हो मेरा जीवन
जैसा आशीर्वाद मिलता रहा बरसों
फिर होगा ज़रूर ही बबूल का
छोटा, पीला और काँटो भरा।
         
(जैसा युवती ने बूढ़ी स्त्री का पाँव छूकर सोचा, फिर सहेली को बताया।)
               

रेत पर ऊँट की तरह दौड़ गया मेरा प्रेमी
छल  छल पानी की ओर
मेरा बादला अभी आधा भरा था
मैंने उसे ढुलका दिया फोग की जड़ों में।
             
(त्याग दी गई स्त्री की सहेली ने प्रेमी को  जो संदेश दिया।)


इस गाँव के अलावा
दूर दूर तक पानी पड़ा है
हुसनसर की बावड़ी लबालब है
ठंडी भीगी बायरिया मधरी मधरी चल रही है
क्या दोष पड़ा है कुंडली में
यहां से बिन बरसे फनफना के निकलते जाते हैं
तेरी ससुराल में तो सावन ही सावन है
पूछेगी ना बादल से अबके जब घटा लूमेगी ?
                     
(युवती  ने सहेली से दुःख कहा ,जो प्रेमी के मित्र ने सुना।)
                    
 
दूध का दही जमाती है रात भर
सवेरे मथ कर बिलोती है मक्खन आने तक
तुम्हारे घर तो मवेशियों की रेवड़ है
जानते ही हो
घी तो रखा जाएगा मर्तबान में
पर छाछ तो ताज़ी ही पी जाती है दोस्त।
             
(प्रेमी को मित्र की सलाह ,जो सहेली ने सुनी।)


मत रोक जाने वाले को
और रोकना मत आने वाले को
खेजड़ी ख़ाली नहीं हो जाती सांगरी उतारने से
अगले मौसम में फिर लग जाती हैं फलियाँ
तू तो पेड़ पूजती है
देखा ही होगा ये ब्यौपार हर साल ।
           
(जैसा सहेली ने उदास सखी को समझाया।)


क्या है यहाँ ?उड़ती रेत और भीषण गरमी के सिवा ?
नहीं रहूँगी इस धोरों वाले देस
चली जाऊँगी कैसे भी
ऊँट के रोयें में चिपक के गोखरू की तरह
बैलगाड़ी के पहिए से लिपटी रेत की तरह
कैर सांगरी की बोरियों में छिपा कर  रखी अफ़ीम के जैसे
यहाँ मैं बिदेसी की तरह रहती हूँ
मुझे अपने देस जाना है
           
(जैसा युवती ने सहेली से कहा।) 


लहू का स्वाद जाता नहीं
बना रहता है जीभ पर लोहे की तरह टनकता
बचने और मरने के उस आख़िरी क्षण की गन्ध ही तो अमृत है
तभी तो आसान भोजन छोड़ कर
शिकारी की तरह लपक कर चला गया घने केश के जंगल में
और फिर धारोष्ण सिर्फ़ दूध ही तो नहीं होता

(जैसा युवती ने  परदेस गए प्रेमी के बारे में अपनी सहेली को कहा।) 
           

उससे प्रेम करने का उपाय था मेरे पास
ठौर मर जाना
फिर जन्म लेना उसकी गली में
मगर प्रेम ने ही रोक लिया प्रेम करने से।
             
(जैसा कहा एक प्रौढ़ा ने अपनी सहेली को ,एक युवा घुड़सवार को देख कर।)
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(अजंता देव की सबद पर कविताएं यहां पढ़ सकते हैं)

Tuesday, June 12, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 16 : साँची में बुद्ध





साँची मेरे घर से अधिक दूर नहीं। इसलिए वहाँ बार-बार जाना हो पाता है। बुद्ध से जुड़ी वह एकमात्र जगह है, जहाँ मैं इतनी बार गया हूँ। कहते हैं, बुद्ध वहाँ कभी नहीं गए थे। बावजूद, साँची, बौद्ध मानचित्र का महान स्थल है। गौतम के चरन जहाँ-जहाँ नहीं पड़े, वहाँ भी उनके चरनों के निशान हैं। बाहर की दुनिया में वह अपना चलना पूरा कर जा चुके हैं। भीतर की दुनिया में उनके पदचिह्न गीले नज़र आते हैं, जैसे अभी-अभी वह चलकर गए हों। प्रेम क्या है? जो बाहर बीत चुका हो, उसे अपने भीतर महसूस करना, करते ही रहना। यह अनायास ही है कि बुद्ध का उल्लेख हो और पार्श्वभूमि में प्रेम का संगीत बज उठे।

दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं, जिसके पास कहने के लिए कोई कहानी न हो। हर कहानी उसके लेखक द्वारा रची गई लीला होती है। साँची की कहानी बुद्ध ने नहीं, अशोक ने लिखी थी। साँची, अशोक की लीला है। बुद्ध उसके नायक हैं। साँची-कथा में हर जगह बुद्ध दिखते हैं, अशोक पीछे छिपा रहता है, जैसे कोई लेखक अपने पन्नों के पीछे छिपा हो। अशोक, जिसने इतिहास में भयंकर रक्तपात किया था, कलिंग-युद्ध के रक्तपात की ग्लानि में इस तरह डूबा कि बौद्ध हो गया। हिंसा का व्यापारी अहिंसा का पुजारी बन गया। लेकिन साँची की भूमि के साथ उसका रिश्ता, बुद्ध के साथ उसके रिश्ते से ज़्यादा पुराना है।

महावंशमें इसकी कथा विस्तार से है। तब अशोक सम्राट नहीं, राजकुमार था। उसे प्रियवर्धन नाम से जाना जाता था। उसे उज्जैन का शासक या सूबेदार नियुक्त किया गया था। वैशाली से उज्जैन तक एक बहुत बड़ा राजमार्ग था, जिसे तत्कालीन भाषा में प्रतीलक कहा जाता था। उज्जैन, व्यापार का बड़ा केंद्र था। मौर्य शासक, पाटलिपुत्र के बाद सबसे अधिक महत्व उज्जैन को देते थे। यहाँ से माल गुजरात के भरुच बंदरगाह होते हुए मध्य-पूर्व और योरप तक जाता था। ज़ाहिर है, यहाँ का सूबेदार होने के नाते अशोक बहुत शक्तिशाली और व्यस्त था। पाटलिपुत्र और उज्जैन के बीच उसकी दौड़ चलती रहती थी। इसी राजमार्ग पर वर्तमान साँची और उसके क़रीब स्थित विदिशा हैं। विदिशा उस समय की संपन्न व सांस्कृतिक नगरी थी। आवागमन के दौरान अशोक का विदिशा रुकना हुआ। वहाँ के नगरसेठ की बेटी देवी के साथ उसका प्रेम और ब्याह हुआ, जिससे महेंद्र व उज्जेनिय नामक दो बेटे और संघमित्रा नामक बेटी हुई। राजा बनने के बाद अशोक पाटलिपुत्र चला गया, लेकिन उसका यह परिवार यहीं रहा।

बाद में महेंद्र व संघमित्रा बौद्ध भिक्षु बन गए। श्रीलंका में बौद्ध-धर्म के प्रचार का श्रेय इन्हीं को है। लंका जाने से पहले महेंद्र अपनी माँ से मिलने विदिशा गया। तब माँ उसे वेदिसगिरि (साँची का एक पुराना नाम यानी विदिशा के पास स्थित पहाड़) के विहार में ले गई। वहाँ अपने हाथ से खाना बनाकर बेटे को खिलाया। महेंद्र वहाँ एक महीने तक रहा और अपने दल के साथ वहीं से श्रीलंका रवाना हुआ। बौद्ध-धर्म की स्थापना के लिए दोनों भाई-बहन अपने साथ बोधिवृक्ष का एक पौधा ले गए थे। हीनयानी परंपरा के अनुसार, बौद्ध-धर्म का पहला अधिकृत अंतर्राष्ट्रीय प्रचार साँची से शुरू हुआ था। इस नाते भी इस जगह का महत्व है।

इसके बाद इस कथा में सारी संभावनाएँ हैं। मसलन, संभवत: देवी के आग्रह पर अशोक ने वेदिसगिरि में स्तूप का निर्माण करवाया या अशोक की अपनी ही प्रेरणा रही हो। अशोक, महेंद्र को लेकर चिंतित तो रहता ही था। वह ख़ुद बौद्ध हो गया था, सैन्य-अभियानों व युद्धों से दूरी बना ली थी, लेकिन इन सबसे सत्ता की राजनीति तो नहीं बदल जाती। उसके उत्तराधिकारी के रूप में उसकी संतानों में संघर्ष चलता था। उसका दरबार मुख्यत: हिंदू था। वैश्य वर्ण की पत्नी से हुए उसके बेटे को उत्तराधिकारी के रूप में बार-बार अमान्य किया जा रहा था। शायद अशोक को एक डर यह भी था कि इस संघर्ष में उसके दूसरे बेटों की तरह कहीं महेंद्र की भी हत्या न हो जाए, भले ही वह घोषित तौर पर बौद्ध भिक्षु बन सत्ता की दौड़ से बाहर हो चुका था। महेंद्र के श्रीलंका जाने को कई इतिहासकार महज़ धार्मिक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक कृत्य मानते हैं ताकि अशोक अपने साम्राज्य को स्थिर रख सके। देवी धार्मिक थी, बौद्ध-धर्म में उसकी गहरी आस्था थी, महेंद्र व संघमित्रा के त्याग के कारण वह देवी के आग्रह को ठुकरा न पाया होगा, इसलिए जब उसने देश-भर में स्तूप बनवाए, तो साँची को महत्वपूर्ण जगह के रूप में चुना। वरना कोई कारण न था कि साँची में ऐसा विशाल स्तूप बन सके। उस समय तक के बौद्ध-इतिहास में उन्हीं जगहों का विशिष्ट महत्व था, जहाँ बुद्ध ने कुछ समय व्यतीत किया हो। साँची हरगिज़ ऐसी जगह नहीं थी।

दूसरा कारण संभवत: बौद्ध-धर्म की तत्कालीन स्थिति थी। बुद्ध के महापरिनिर्वाण को क़रीब तीन सौ साल बीत चुके थे। बौद्ध-धर्म में लगातार परिवर्तन आ रहे थे। नये-नये पंथ बन रहे थे। बुद्धवचनों की नई-नई व्याख्याएँ हो रही थीं। सारे व्याख्याकार ख़ुद को सही, दूसरों को ग़लत बताते थे। आये दिन संघ में बहसें होती थीं, कोई न कोई टूटकर अलग होता था, वह अपने साथ समर्थकों का एक बड़ा समूह लेकर जाता। महासांघिक अधिक सक्रिय थे। हो सकता है कि संघ की इस उठापटक को नियंत्रित करने के लिए अशोक ने साँची में स्तूप बनवाए हों, क्योंकि महासांघिक मालवा में ज़्यादा थे। इसीलिए साँची में अशोक ने जो अभिलेख लगवाए, उनमें साफ़-साफ़ चेतावनी थी-  जो कोई संघ को तोड़ने की कोशिश करेगा, उसे सफ़ेद कपड़े पहनाकर संघ से बाहर कर दिया जाएगा।सफ़ेद कपड़े पहनाना एक बड़ी सज़ा थी। इसका एक अर्थ यह हुआ कि उसे संघ से निकाल दिया गया। दूसरा अर्थ कि अब यह व्यक्ति वापस गृहस्थ बन सकता है। भिक्षु बनने के बाद वापस गृहस्थ बन जाना कम अपमान नहीं था।

अशोक ने साँची में स्तूप बनवाया, उसके पीछे इनमें से कोई एक कारण रहा होगा। या सभी कारण रहे होंगे। या कोई अलग ही कारण रहा होगा। साफ़-साफ़ नहीं पता। पर साँची इसलिए है कि वहाँ स्तूप है। वरना अब तक मिट चुका होता। ट्रेन से उस राह गुज़र जाएँ, दूर से स्तूप दिखने लगता है। जो दिखता है, वह अशोक का बनवाया स्तूप नहीं है। वह तो अंदर छिपा हुआ है। मौर्यों के कुछ समय बाद जब यह पूरा इलाक़ा पुष्यमित्र शुंग के अधीन था, तो उसने अशोक वाले स्तूप के ऊपर एक नया और बड़ा स्तूप बनवा दिया। तब से अगले हज़ार साल तक साँची के स्तूप में कुछ न कुछ जुड़ता ही रहा। जिन राजाओं को बुद्ध में श्रद्धा थी, यहाँ कुछ न कुछ जुड़वाते रहे। मूर्तियाँ गढ़ी जाती रहीं। कथाएँ कही जाती रहीं।

सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में यह टीले के नीचे छिप गया था। 1818 में इसे अंग्रेज़ जनरल टायलर ने फिर खोजा। अगले 118 साल तक यहाँ कुछ न कुछ खोजा ही जाता रहा। साँची में साठ से ज़्यादा स्तूप मिले, लेकिन हम आज दो मुख्य स्तूपों को ही देखते हैं। खुदाई में बहुत कुछ मिला। अशोक का लगवाया एक स्तंभ भी। बहुत कुछ अंग्रेज़ अपने साथ लेते गए। बहुत कुछ यहीं छूट गया। कुछ चीज़ें वे ले जाना चाहते थे, पर इतने वज़नदार पत्थरों को ले जाने का कोई उपाय नहीं सूझा, तो मजबूरन छोड़ना पड़ा।

अशोक से शुरू हुई कहानी अंग्रेज़ों तक पहुँच गई। दोनों का साम्राज्य विशाल था। अंग्रेज़ों ने इस देश के इतिहास को फिर से खोजा। हमारी बातें हमको ही बताईं। इस चक्कर में कई घपले भी किए। लेकिन असल घपला तो हमसे ही होता रहा। आज दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी उमग-उमगकर देश के महान ज्ञानमार्गी होने के दावे करते हैं, सांस्कृतिक विरासत की दुहाइयाँ दी जाती हैं, लेकिन सदियों तक यह सांस्कृतिक चेतना यहाँ के निवासियों में ग़ायब रही और अंग्रेज़ों के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा की जाती रही। हमारे ज्ञान का सारा व्यापार ब्राह्मणों ने अपने हाथों में ले रखा था। उन्होंने ज्ञान का कैसा मैनीपुलेशन किया, उसमें कितने भ्रम जोड़े, इसके भी उदाहरण इतिहास में हैं। हम सभी जानते हैं कि जेम्स प्रिंसेप को 1830 में ऐसा एक भी विद्वान नहीं मिला था, जो ब्राह्मी लिपि पढ़ सकता हो।

अशोक के स्तंभों व अभिलेखों से जुड़ा एक वाक़या है। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ चौदहवीं सदी में हुआ था। युद्धों के दौरान उसे हरियाणा के यमुनानगर व आसपास के इलाक़ों में पत्थर का एक बड़ा स्तंभ मिला, जिस पर अनजान भाषा में कुछ लिखा हुआ था। कई मज़दूर लगाए गए। कई दिनों की मेहनत के बाद उसे दिल्ली लाया गया। तुग़लक़ ने उस ज़माने के तमाम विद्वानों, पंडितों व ब्राह्मणों को बुलाया कि कोई तो पढ़कर बता दे, उस स्तंभ पर क्या लिखा है। कोई नहीं पढ़ पाया। हार मानना कुछ पंडितों के स्वभाव में नहीं होता। ऐसे महानुभावों ने फट्-से पढ़ दिया, “इस पत्थर पर लिखा है, जब तक आसमान में सूरज व चाँद रहेंगे, सुल्तान का इक़बाल बुलंद रहेगा।सुल्तान को यक़ीन न हुआ, पर ऐसी बातें सुनकर सुल्तान लोग अमूमन ख़ुश हो जाया करते थे। तुग़लक़ भी हो गया। वह स्तंभ दिल्ली की शोभा बढ़ाता रहा। कहते हैं, दो सदी बाद अकबर का ध्यान उस पर गया। उसने भी कई विद्वानों से पूछा, पर कोई उस लिखाई को पढ़ न पाया। उसने बनारस से बड़े पंडित बुलवाए, जिन्होंनेपढ़करबताया कि वनवास के समय युधिष्ठिर ने द्रौपदी को याद करते हुए अपने दिल का हाल इस पर लिखा है। ढाई सौ साल बाद, 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने किंचित भाग्य व कठिन मेहनत से ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में कामयाबी पाई और तब पता चला कि अशोक के बनवाए उस स्तंभ में बुद्ध के वचन और शासन संबंधी नियम उकेरे गए हैं। वह स्तंभ आज भी फ़िरोज़शाह कोटला में स्थापित है।

ऐसी बातों को देखते हुए सहज ही अंदाज़ा लगता है कि ज्ञानमार्ग का नेतृत्व करने वाले हमारे मध्ययुगीन पंडितों में से कुछ ने अपने छद्म-ज्ञान व दर्प-मिथ्या से कुछ ग्रंथों-पुराणों को भी ज़रूर उपकृत किया होगा। भारतीय इतिहास का घटाटोप कम होने में इससे कोई मदद नहीं मिलती।

बात साँची की हो रही थी। उस पूरे काल को लेकर मुझमें एक उत्सुकता बनी रहती है। महाकवि कालिदास याद आ जाते हैं। प्रतीलक राजमार्ग से उनका नाता था, उज्जैन का वर्णनमेघूदतमें और विदिशा का वर्णनमालविकाग्निमित्रमें मिलता है। दोनों स्थानों से उनका गहरा अनुराग है। उनका नायक अग्निमित्र, उसी पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था, जिसने स्तूप को नया आकार दिया था। अग्निमित्र विदिशा का राजा था। मालविका, मालवा की राजकुमारी। दोनों का प्रणय विदिशा में हुआ। क्या कालिदास इन स्थानों पर गए थे? क्या वह साँची भी गए थे? कालिदास की रचनाओं में भारत का बौद्ध इतिहास कम ही दिखता है। मान्यता है कि बौद्ध कवि अश्वघोष उनसे पहले हुए थे। कालिदास पर अश्वघोष का प्रभाव तो दिख जाता है, लेकिन उन्हें बौद्ध प्रतीकों-कथाओं में शायद वह रस नहीं मिलता होगा, वरना अपने छंदों में वे उन्हें प्रचुरता से पिरोते। उल्टे, कई विद्वानों को लगता है कि वह बौद्ध-प्रतीकों को लेकर उपहास-भाव में रहते थे।मेघदूतके आरंभ में ही यक्ष, मेघ से कहता है कि विदिशा से पहले तुम्हें नीच नामक पहाड़ी दिखेगी, वहाँ की गुफाओं में व्यभिचार चलता है, तुम वहाँ अटक मत जाना, तुरंत वहाँ से निकल लेना। यह नीच नामक पहाड़ी कौन-सी थी? कालिदास के कुछ विशेषज्ञ अंदाज़ा लगाते हैं कि यह साँची की पहाड़ी है, जो कि विदिशा से ठीक पहले है, ज़्यादा ऊँची नहीं है, नीची ही है। इसीलिए महाकवि ने उसे नीच कहा होगा। उसकी गुफाओं में व्यभिचार चलता है, इस नाते भी उसे नीच कहा होगा।

पता नहीं, सच क्या है, लेकिन सोच है कि सुइयाँ घूमने लगती हैं। कालिदास का समय अगर सच में पाँचवीं सदी ही था, तो एक बात ध्यान में आती है कि यही समय था, जब बौद्ध-धर्म अपने सबसे अलग रूप में विकसित हो रहा था। तमाम यानों से गुज़रने के बाद उसमें तंत्र का समावेश होने लगा था। पंचमकार साधना उनमें प्रचलित हो रही थी। अनियंत्रित मैथुन को बौद्ध तंत्र में साधना का अनिवार्य अंग माना जाने लगा था। मैथुन का ऐसा खुला प्रयोग अ-तांत्रिक, -बौद्धों को अगर व्यभिचार लगे, तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं। तो क्या उस समय साँची में बौद्ध तांत्रिकों का बोलबाला हो गया था? इसके पुख़्ता प्रमाण इतिहास में नहीं मिल पाते। तार्किक दृष्टि से भी यह कुछ सही नहीं जान पड़ता, क्योंकि महेंद्र व संघमित्रा के कारण साँची का सीधा रिश्ता श्रीलंकाई बौद्ध शाखा से बनता है, जोकि अधिकांशत: हीनयानी या थेरवादी है और तंत्र का अधिक प्रयोग उसमें नहीं दिखता। तिब्बती व चीनी बौद्धों में तंत्र अधिक दिखता है।

स्थान व समय के हिसाब से जितनी तब्दीलियाँ बौद्ध धर्म व दर्शन में हुई हैं, उतना शायद ही किसी अन्य धर्म व दर्शन में हुई हों। यह भी इस दर्शन की महानता व लोच है। बौद्ध मनीषी लकीर के फ़क़ीर नहीं रहे, उनमें सतत दार्शनिक विकास की अभिलाषाएँ थीं। बुद्ध की बुनियादी शिक्षाएँ वहीं रहीं, लेकिन उनकी व्याख्याएँ बदलती रहीं। नई व्याख्या के साथ एक नया पंथ सामने आया। यह लोच ख़ुद बुद्ध में भी था। वह व्यावहारिक थे, समस्याओं का पूर्वानुमान कर लेते थे और संघ के नियमों में उस अनुसार बदलाव भी कर देते थे।

साँची के पहले स्तूप में बुद्ध की अस्थियों के अवशेष हैं, तो दूसरे में उनके प्रधान शिष्यों सारिपुत्त व मौदगल्यायन के। वहाँ दस आचार्यों के भी अवशेष रहे। वे सभी अलग-अलग समय पर हिमालय क्षेत्र में धर्म की शिक्षा देने गए थे। उनमें से तीन आचार्यों ने बुद्धवचनों की नये ढंग से व्याख्या की थी और एक नया पंथ चलाया था, जिसेहैमावतकहा जाता था। मुझे यह जानने की जिज्ञासा बराबर रहती है कि ये लोग स्थविरवाद से ख़ुद को किस तरह अलग करते थे, पर उसके विवरण नहीं मिल पाते। यह और इस जैसे कई पंथ शायद महायान के महासमुद्र में घुल गए। या इतिहास के जलप्रवाह के बीच उगी किसी वनस्पति पर तिनकों की तरह अब भी अटके हैं, मगर हमारी नज़र उतनी सूक्ष्म नहीं कि वहाँ तक पहुँच सके।

बुद्ध के शरीर के अवशेषों को संभालकर रखना, उनकी पूजा करना भी एक बदलाव था। बुद्ध का मार्ग आराधना का नहीं, उपासना का था। आराधना के लिए बाहरी वस्तु व कर्मकांड की आवश्यकता होती है, उपासना आंतरिक होती है, उसके अपने नियम होते हैं, कर्मकांड नहीं। संघ में भिक्षुओं के अलावा उपासक हुआ करते थे। मूर्ति-पूजा पर भी निषेध था। बुद्ध के अवशेषों को संभालकर रखने और उनके प्रति आस्थावान होने की पहल उनके प्रमुख शिष्य व उपस्थाक (सचिव) आनंद ने की थी। बुद्ध इसके लिए क़तई राज़ी न थे, लेकिन आनंद ने प्रश्न कर-करके उन्हें मना लिया। संघ के नियमों में ऐसे कई बदलावों का श्रेय आनंद को है, उनके सारगर्भित प्रश्नों व दूरदृष्टि को है। अंतिम दिनों में बुद्ध ने ख़ुद कोचक्रवर्तीकहा था और यह बताया था किचक्रवर्तीके स्तूप किस शैली में बनाए जाते हैं।

शायद आनंद का यह मानना रहा हो कि देह-दर्शन का मनुष्य की आस्था पर गहरा असर पड़ता है। शायद इसी कारण बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद आनंद संकट में भी पड़े थे। भिक्षुओं ने उन पर कई तरह के आरोप लगाए थे और उन्हें परिषद में आमंत्रित नहीं किया था। तिब्बती परंपरा के अनुसार, उन पर लगे कई आरोपों में से एक यह भी था कि बुद्ध की मृत्यु के बाद उन्होंने दुष्चरित्र स्त्रियों व पुरुषों को भी बुद्ध के गुप्तांगों का दर्शन करने दिया। आनंद ने इसका जवाब दिया था कि बुद्ध के गुप्तांगों के दर्शन से पापियों की वासनाओं से मुक्ति हो गई। परिषद उनके जवाबों से संतुष्ट हुई थी और उन्हें ससम्मान वापस बुलाया गया था।

मूर्ति-पूजा का निषेध करने वाले बौद्ध-धर्म ने कालांतर में मूर्ति-पूजा को अपनाया और दुनिया में बुद्ध की विशाल प्रतिमाएँ बनीं। आध्यात्मिक-दर्शन को देह-दर्शन पर वरीयता देने वाले बौद्ध-धर्म ने देह के अवशेषों को सुरक्षित रखकर उनके प्रति आस्थावान होने को मान्यता दी और जगह-जगह उनके स्तूप बने। एक समय था, जब बौद्ध भिक्षु, स्त्रियों को संघ में प्रवेश नहीं देना चाहते थे कि वे उनकी साधना को भंग कर देंगी। वहीं एक समय ऐसा भी आया, जब अलग पंथ में विश्वास करने वाले बौद्ध भिक्षु अपनी साधना को तब तक पूरा नहीं मानते थे, जब तक कि वे स्त्री से संभोग न कर लें।

पुराने को काटकर नये को धारण करना बौद्ध दर्शन की ऐतिहासिक विशिष्टता रही है, इसीलिए यह अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग तरह से विकसित हुआ। यह नया विचार सही होता था या ग़लत, इस पर हज़ार बहसें रहीं। इच्छामृत्यु या आत्महत्या का विचार एक उदाहरण है। यह उन विषयों में से है, जिन पर बौद्ध-दर्शन में सबसे अधिक जिरह की जाती है। आमतौर पर बौद्ध-धर्म आत्महत्या को निंदनीय मानता है। मृत्यु परम-दुख है। दुख से सुख पाने की कोशिश- यानी अभी तक दुख से मुक्ति नहीं हो पाई है। दुख से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या करना पलायन है और बौद्ध-दर्शन इसकी अनुमति नहीं देता, इसके बावजूद अपने जीवनकाल में बुद्ध ने तीन आत्महत्याओं (गोधिक, वक्कालि व चन्न) को वैध घोषित किया था। बुद्ध के एक प्रवचन के बाद पाँच सौ भिक्षुओं ने आत्महत्या कर ली थी। बुद्ध ने न इसकी निंदा की थी, न ही समर्थन।विनय पिटकमें आत्महत्या की कोशिश करने पर संघ से निकाल देने के नियमों का वर्णन है, तो साथ में उन विशेष परिस्थितियों का भी, जिनके तहत आत्महत्या या इच्छामृत्यु को मान्यता दी गई है। शायद यह हो सकता है कि जब बुद्ध के वचनों की व्याख्या की जा रही थी, तब तक व्याख्याकारों ने वह चिंतन प्राप्त कर लिया था, जिनसे इच्छामृत्यु के कुछ तरीक़ों को भिक्षुओं के लिए मान्य किया जा सके।

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साँची जाएँ व जातक के बारे में न सोचें, ऐसा नहीं हो सकता। साँची की महान विशेषता उसके तोरण-द्वार हैं। संभवत: ये सातवाहन राजाओं ने बनवाए थे। हर द्वार पर बुद्ध के जीवन के अंश व कोई जातक कथा उकेरी गई है। छद्दंत जातक, जिसमें शाक्यमुनि किसी एक पूर्वजन्म में हिमालय में रहने वाले हाथी थे। महाकपि जातक, जिसमें वह एक विशाल बंदर थे। वेस्संतर जातक, जिसमें वह एक राजकुमार हैं और अपना सबकुछ दान-त्याग कर देते हैं।  अलंबुस जातक, जिसमें उनके एक सींग है व उनका नाम ऋष्यशृंग है,अपने तपोबल से वह इंद्र का आसन हिला देते हैं, तो घबराया इंद्र उन्हें पथभ्रष्ट करने के लिए अलंबुसा नामक अप्सरा को भेजता है। वाल्मीकि रामायण में भी, एकदम आरंभ में, एक ऋष्यशृंग की कथा है, जो इससे मिलती-जुलती है। 

विस्तार में ये कथाएँ आनंददायक हैं, किंतु यहाँ उतने की संभावना नहीं है। चारों तोरण-द्वारों पर इनके अलावा बुद्ध के जीवन के कई प्रसंग हैं। लेकिन उनके साथ कोई लिखित वर्णन नहीं। आपको अगर ये कथाएँ न पता हों, तो यह समझ पाना भी मुश्किल है कि कौन-सा शिल्प, कौन-सी कथा कह रहा। बिना कथा के यह संसार निष्प्राण है। अशोक की, बुद्ध की कहानी हटा दीजिए, साँची शून्य हो जाएगी। कहानी न हो, तो हर इंसान पत्थर की मूरत है। ऐसी मूरत, जिसे देखा जा सकता है, लेकिन जाना नहीं जा सकता। छुआ जा सकता है, लेकिन समझा नहीं जा सकता। कहानी सृष्टि की नासिकाओं से गुज़रती साँस है। अपने हिस्से की इस साँस को पाने के लिए एक योग्य गाइड करना होगा। कुछ बरस पहले तक इन कथाओं की स्वचालित ऑडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध थी, पर जाने क्यों अब बंद है।

द्वारों पर इन मूर्तियों के बीच आप शालभंजिका को उपेक्षित नहीं कर पाएँगे। हर द्वार पर, उन्नत वक्षों व सुडौल नितंबों वाली यह मूर्ति एक यक्षिणी की है। शालभंजिका का अर्थ है- शाल वृक्ष की शाखाओं को तोड़ने वाली। यक्ष वृक्षों के देवता माने जाते हैं। वे काम-कला में आश्चर्यजनक रूप से माहिर होते हैं। पुराने ग्रंथों में वर्णन है कि जब विरहणी स्त्रियाँ काम-दग्ध होती थीं, तब वे यक्षों की आराधना करती थीं। यही गुण उनकी महिला साथी यानी यक्षिणियों का भी है। वे विरही पुरुषों की कामाग्नि को शांत करने के उपाय जानती थीं। शालभंजिका यक्षिणी है, लेकिन साँची के द्वारों पर उसकी कामशास्त्रीय व्याख्या न तो तार्किक जान पड़ेगी, न ही प्रासंगिक। गुप्तकालीन शिल्पकला में शालभंजिका एक डेकोरेटिव आइटम है, अमूमन स्वागत का प्रतीक। साँची के द्वारों पर भी यह स्वागत की मुद्रा में है। पूर्वी द्वार पर लगी शालभंजिका इतनी सजीव है कि लगता है, पंख खोलकर अभी उड़ जाएगी।

साँची के स्तूप, विहार व संग्रहालय में बुद्ध, बोधिसत्व की खंडित-अखंडित मूर्तियाँ ख़ूब हैं, लेकिन मेरी सबसे प्रिय मूर्ति है पृथ्वी-स्पर्श मुद्रा में बैठे बुद्ध। स्तूप से दूर यह एक खंडित प्रतिमा है। यह मार-विजय की कथा कहती है। यह संबोधि में आख़िरी अड़चन पर विजय की कथा है। मार, कामदेव का एक नाम है। बौद्ध-धर्म, हिंदू धर्म से कभी पूरी तरह अलग नहीं हो पाया। वह वैदिक धर्म पर एक प्रतिक्रिया की तरह उत्पन्न हुआ था, इसलिए कई हिंदू देवी-देवता उसमें स्थान पाते हैं, किंतु वैसे ही वैभव के साथ नहीं। ब्रह्मा और इंद्र बौद्ध-धर्म में भी हैं, लेकिन बुद्ध के अधीनस्थ। कामदेव भीमारनाम व कई अन्य गुणों के साथ मोह-माया-भ्रम-दुर्बुद्धि के रूप में वहाँ विद्यमान है।

कामदेव ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं, लेकिन वह अकेले पूर्ण प्रभावी कभी नहीं हो पाए। कहीं न कहीं उन्हें शिकस्त झेलनी पड़ती थी। इसके लिए वह ब्रह्मा से नई-नई शक्तियाँ माँगते थे। आरंभ में उन्हें पत्नी के रूप में रति मिली। फिर मित्र के रूप में बसंत मिला। फिर दूसरी पत्नी प्रीति मिली। अब भी वह कई जगहों पर हार जाते थे, तो उन्हें दो पत्नियाँ और मिल गईं। फिर भी वह सदा-अजेय न हो पाए, तो ब्रह्मा ने सृष्टि के सारे अच्छे विचारों व बुरे विचारों को एकत्रित करके करोड़ों-करोड़ संख्या वाली एक सेना बना दी। मूलत: उस सेना का नाम मार था, जो बौद्ध परंपरा में स्वयं कामदेव का नाम पड़ गया। मार के पास एक विशाल सेना है। उसकी अनगिनत बेटियाँ हैं, जो मनुष्य जाति को फँसाए-बरगलाए रखने का काम करती हैं। साँची के उत्तरी तोरण-द्वार पर मार की सेना व उसकी बेटियाँ चित्रित हैं।

बोधिवृक्ष के नीचे बुद्ध ध्यान-मग्न हैं। उसी समय मार अपनी सेना के साथ उन पर आक्रमण कर देता है। अपनी ध्यान-शक्ति से बुद्ध उस सेना को परास्त करते हैं। अंत में स्वयं मार उन्हें चुनौती देता है और उस जगह से हटने को कहता है।

बुद्ध कहते हैं, “मुझे संबोधि प्राप्त हो गई है। यह जगह मेरी है।

मार पूछता है, “कौन गवाही देगा कि तुम्हें संबोधि मिल गई? कि यह जगह तुम्हारी है?”

बुद्ध ने अपनी पद्म-मुद्रा खोल दी, बायाँ हाथ घुटने पर बनाए रखा, दाएँ हाथ की तर्जनी से पृथ्वी का स्पर्श किया और कहा, “यह पृथ्वी गवाही देगी।

उसी समय भूडोल आ गया। पृथ्वी ने गवाही देना क़बूल किया। मार घबरा गया। उसने पराजय मानी और वहाँ से चला गया। बुद्ध के जीवन में, इसके बाद, मार ने कई बार प्रवेश किया, लेकिन हर बार हाथ जोड़कर, अनुचर-भाव से।

यह ऐतिहासिक मुद्रा है। यह अद्भुत कथा है। यह अद्वितीय प्रतीक है। जब गवाही की बात होती है, तो सारे धर्म, सारे महापुरुष ऊपर आसमान की ओर संकेत करते हैं। यह बुद्ध हैं, जो गवाही के लिए उंगली नीचे करते हैं, धरती का स्पर्श करते हैं और बताते हैं कि जो कुछ है, इसी धरती पर है, इसी लोक में है। किसी दूसरी दुनिया में नहीं। किसी दूसरे लोक में नहीं। लोकेतर भी इसी लोक में है और लोकोत्तर भी। जो कुछ है, इसी पल में है। इस पल से बाहर कुछ नहीं। इस धरती से दूर कुछ भी नहीं। इस धरती से क़रीब कुछ भी नहीं।