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सबद विशेष : 21 : गीत चतुर्वेदी की चार नई कविताएँ



गीत चतुर्वेदी की नई कविताओं के साथ ‘सबद’ दस साल पूरे कर, प्रकाशन के ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. ‘सबद’ की  शुरुआत 18 मई 2008 को हुई थी.

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गीत चतुर्वेदी : चार नई कविताएँ


अपराधी ईश्वर

सच बताऊँ? स्वर्ग की दीवार पर खड़ा होकर 
मैं नीचे झाँक रहा था. 
तभी किसी ने मुझे धक्का मार गिरा दिया. 

कुछ यूँ मैं इस धरती पर आया.

एक औरत सूप में रखकर चावल पछोर रही थी.
उसके संगीत ने मुझे किसी गेंद की तरह लोक लिया
और मैं चोट से बच गया.

मैंने देवदूतों को आवाज़ लगाई
पर उन्होंने मुझे वापस स्वर्ग ले जाने से इंकार कर दिया.

बोले : इसका कुछ नहीं कर सकते, इसे ज़िंदगी का रोग है.

अजीब पगलेट था यह.
वहाँ स्वर्ग में जब कभी ईश्वर
किसी को दंड देने के लिए अपनी तलवार निकालता,
यह उस पर ज़ंग बनकर चिपक जाता था.

तंग आकर ख़ुद ईश्वर ने इसे धक्का दे दिया.
* * *


जाने से पहले

दुनिया बेसुरे संगीत से सम्मोहित है
और तुम मेरी छुअन से बुना गया मौन.

मेरे सपने मछलियों की तरह हैं
नींद से बाहर साँस नहीं ले पाते.

एक बगुला घात लगाकर बैठा रहता है
मेरी नींद के जल-तल पर.

वक़्त गुज़रता जाता है.
वक़्त को गुज़रने के लिए जाने कितने पल चाहिए.
मैं वक़्त से तेज़ हूँ, एक पल में गुज़र जाऊँगा.

जाने से पहले तुम्हें क्या दूँगा?
मेरे सपने तो बगुले खा जाएँगे.

तुम कहती हो, मासूमियत? अरे नहीं!
प्यार वह फल है, जिस पर मासूमियत का छिलका होता है
और बिना छिलका उतारे इस फल को खाया नहीं जाता.

यह जो मेरा जिस्म है
इसे उगाने में मुझे बरसों लगे हैं.
दिल तो ख़ैर मेरा जन्मजात ऐसा ही है,
क़दम-क़दम पर ज़ख़्मी होता.

माँगोगी, तो भी यह जिस्म नहीं दे पाऊँगा,
आग का इस पर बरसों से दावा है.

यह दिल देता हूँ, इसे एहतियात से रखना
कि यह उसका है, जिसने सपने देखे थे.
* * *


पीली साड़ियाँ

हर शाम मेरी माँ बहुत अच्छे-से सजती है
महज़ एक पुरानी क्रीम, चुटकी-भर टैल्कम पाउडर की मदद से.

पीले रंग की एक साड़ी पहन उस जगह आ बैठती है
जहाँ किताबें पढ़ते हैं पिता मूर्तियों की तरह तल्लीन.

अपनी मद्धम आवाज़ में वह कुछ कहती है
दिन-ब-दिन बहरे होते पिता नहीं सुनते.

माँ बुदबुदाती है, जब कान थे, तब भी नहीं सुना
अब क्या सुनेंगे, पकल नींबुओं जैसी इस उम्र में.

उनका ध्यान खींचने के लिए चोरी से
स्टील का एक गिलास गिरा देती है वह टेबल से.

सिर उठा देखते हैं पिता, उनकी आँखें चमक जाती हैं
आधी सदी बीत चुकी है शाम के इस कारोबार में.

पीला, ऊर्जा व सोहाग का रंग है, तुम पर बहुत फबता है
कहते हैं वह, अपनी सुनहरी दलीलों की ओट में मुस्कराते

जबकि मैं जानता हूँ, जिन जगहों से आए हैं पिता
वहाँ दूर-दूर तक फैले होते थे सरसों के पीले खेत.

जब आँचल लहराती है मेरी माँ, लहरों से भर जाता है
पीले रंग का एक समुद्र : शाम की वह सूरजमुखी शांति. 

मेरी माँ ने ताउम्र महज़ पीली साड़ियाँ पहनीं
ताकि हर शाम अपने बचपन में लौट सकें मेरे पिता. 
* * *


बक़लम  ख़ुद

मेरी प्रार्थनाओं का जवाब किसी ने नहीं दिया
देवताओं से ताक़तवर है अगरबत्ती की ख़ुशबू.

मैं कुछ नहीं, महज़ उस स्वप्न का टुकड़ा हूँ
जिसे एक मेहनतकश पुरुष और एक सुंदर स्त्री ने एक साझी नींद में देखा था

उस स्वप्न में एक पुल था, एक सीढ़ी थी और रंगीन धागे
जिनसे चिंदियों को सिलकर चादर बनाई जाती थी

जो सीढ़ी सितारों तक जाती थी, उसे किसी ने तोड़ दिया.
उसकी लकड़ी से अब चिताएँ जलाई जाती हैं.

एक टूटा हुआ आईना हूँ चाँद के हाथों छूटकर गिरा
जिसमें एक दुनिया के अनेक चेहरे दिखाई देते हैं.

चटोरे संन्यासियों के बाज़ार में
मेरी इच्छाएँ काले मुर्ग़ों-सी नीलाम होती हैं.

दुनिया को कविता सुनाता हूँ
जैसे कमज़ोर दिलवालों को सावधानी से बुरी ख़बरें.




 


 

Comments

जिस ईश्वर ने इस प्यारे कवि को स्वर्ग से धक्का दिया है, उसी ने उनकी स्याही में ऐसी रौशनाई भरी होगी और कान में मन्तर फूँक दिया होगा कि, जाओ गीत ! क्रूरता से भरी इस दुनिया की खूंरेज़ शमशीरों में ज़ंग बन लग जाओ। मनुष्यता के कार्यकर्ता भी तो धरती से उछाल कर स्वर्ग पहुँचाए जाते हैं।
Manish Kumar said…
मैं आपकी कविताओं से बेइन्तेहा मुहब्बत करता हूं ।
आप कमाल कमाल कमाल हैं गीत ।
Harsha Verma said…
'पीली साड़ियाँ' कविता पढ़कर अब आस-पास होने वाली/हो रही घटनाओं पर ज़्यादा ध्यान जा रहा है :) इन सुंदर कविताओं के लिए कवि का आभार..

सबद का ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश आपकी अभिव्यक्तियों के तरीकों में और भी गहराई और नई ऊर्जा भरे, अनुराग.
गीत के क्या कहने ! गज्जब की मैत्री हुई हैं इनकी कविता से.

दुनिया को कविता सुनाता हूँ
जैसे कमज़ोर दिलवालों को सावधानी से बुरी ख़बरें.
Shaloo Jain said…
जाने से पहले
सचचच
मौन हो गई पढ़कर
बस यूं ही
जाने से पहले ...........
👌👌👌👌👌💐💐💐🙏🙏🙏
Ambikesh Mishra said…
अजीब पगलेट था यह.
वहाँ स्वर्ग में जब कभी ईश्वर
किसी को दंड देने के लिए अपनी तलवार निकालता,
यह उस पर ज़ंग बनकर चिपक जाता था.
तंग आकर ख़ुद ईश्वर ने इसे धक्का दे दिया.
Gaurav Adeeb said…
पीली साड़ियाँ
ह्म्म्म सुन्दर बेहद सुन्दर ।।
Rahul Tomar said…
वाह बस वाह।
ईश्वर ने धक्का देकर ठीक ही किया!
बहुत ख़ूबसूरत कविताएँ हैं सर
बाक़ी और क्या कहूँ, समझ नहीं आ रहा
फिर से पढ़ने का मन हो रहा है।
फिर से पढ़ता हूँ। :)
Utpal Banerjee said…
कमाल की कविताएँ।
Anonymous said…
'पीली साड़ियाँ'तो बहुत ज़्यादा अच्छी है। बहुत शुक्रिया और आभार।
महेशमिश्र said…
'पीली साड़ियाँ'तो बहुत ज़्यादा अच्छी है। बहुत शुक्रिया और आभार।
Anonymous said…
गीत
गीत
गीत

मैं एक दीवार पर खूब बड़े साइज में लिखना चाहती हूं //////---- गीत -----/////

तुम बहुत बहुत बहुत शानदार हो

---- वंदना
Anita Manda said…
आधी सदी बीत चुकी है शाम के इस कारोबार में.

ख़ुदाया यह कारोबार यूँ ही चलता रहे।
Harish Bhatia said…
Great,
Geet,tum itanii khoobsoorat aur itanii niyamitata se kavitayen lokh rahe ho ke mere liye tumhari 3 sarvottam kavitayen ka chayan ( Kavyapath meri aawaz mein 101 Hindi kavitaon ka!!) kathin chunauti ban jayega...
Ambikesh Mishra said…
सर आप दूसरे केदार सिंह हो।
Harshita Pratap Sing said…
Amazing sir
Jassi Sangha said…
Waaah!!!! Kya khoob!!
Bina Vachani said…
बेहद सुंदर अभिव्यक्ति!! गजब का है आपका चिंतन और लेखन
Arun Inder Vyas said…
ईश्क का ईनाम लेकर लौटे हो या तो लौटा दो नही तो फिर तूम जो स्याही से शब्दों को प्रेम करना सीखा रहे हो इसे जारी रखो #गीत।
लव यू डीयर।
Gautam Yogendra said…
सभी कविताएँ खूबसूरत सर.. :)
Bhupinder Preet said…
Beautiful
Mohan Verma said…
हर बार की तरह बेमिसाल कविताएं
Seema Gupta said…
आपकी कविताओं में उस सूप के संगीत का जादू है....... बहुत सुन्दर 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹
Usha Bhatia said…
Four poems ?? A treasure indeed .just love the dazzle of sheer truth emanating from your creations
aapki sabhi poem bahut hi khubsurat hoti.lekin kuch dil chuu jati jati hai.apko padhna ek alag anubhav..
http://bulletinofblog.blogspot.in/2018/05/blog-post_29.html

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