गीत चतुर्वेदी : कॉलम 15 : फिलिप रॉथ - कामनाओं का प्रोफ़ेसर





पाँच दिन पहले दुनिया ने महान उपन्यासकार फिलिप रॉथ को खो दिया। रॉथ के बारे में सोचना, प्रकारांतर से, अमेरिका के बारे में सोचना है। उनके नाम के आगे जब “अमेरिकी उपन्यासकार” लिखा जाता है, तो वह उनकी राष्ट्रीयता की सूचना देने वाला विशेषण-मात्र नहीं होता, बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक विशिष्टता की ओर इशारा करता है। डॉन डेलिलो, सॉल बेलो, जॉन अपडाइक, थॉमस पिंचन, टोनी मॉरीसन, जेम्स बाल्डविन, डेविड फोस्टर वालेस, जोनाथन फ्रैंजन- ये सभी अमेरिकी हैं, लेकिन अमेरिकी विशेषण उनके लिए इतना संकटमूलक नहीं दिखता, जितना रॉथ के लिए दिखता है। ये सभी लेखक किन्हीं मामलों में यूरोपीय लेखक जैसा आभास भी दे सकते हैं। विलियम फॉकनर और अर्नेस्ट हेमिंग्वे भी अमेरिकी हैं, लेकिन उनका अमेरिका इतना पुराना है, देश के दक्षिणी हिस्सों के वर्णन के कारण उनमें दक्षिण व लातिनी अमेरिका के इतने सारे स्पर्श हैं कि सुदूर भारत में बैठकर उन्हें पढ़ना, कई बार, हमारे ही सांस्कृतिक परिवेश से बिछड़कर दूर चले गए एक भाई के बारे में पढ़ने जैसा लगता है। रॉथ के यहाँ राजनीतिक-संकट, व्यक्तित्व का संकट और यौन-संकट एक साथ अमल में आते हैं। इनमें किन्हीं दो संकटों का रिश्ता तो हर जगह स्थापित हो जाता है, लेकिन रॉथ के यहाँ तीनों का ऐसा परस्पर मिश्रण है कि वह एक विशिष्ट अमेरिकी समस्या की तरह उभरने लगता है, जिसे पूरी तरह समझने के लिए सत्तर के दशक से लेकर आख़िरी दशक के अमेरिकन ड्रीम को समझना ज़रूरी है। आमतौर पर, अमेरिकन ड्रीम से सभी वाक़िफ़ हैं, लेकिन यह भी एक सचाई है कि इस स्वप्न की सूक्ष्मताएँ दशकों के हिसाब से बदलती रहती हैं। तकनीक, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक शासन, समकालीन बौद्धिक विमर्श और ऐसे कितने ही छोटे-बड़े कारक इन सूक्ष्मताओं को प्रभावित करते चलते हैं। रॉथ की अमेरिकियत उनकी किताबों के संदर्भ में विशिष्ट है, किंतु अब उस अमेरिकियत की सूक्ष्मताएँ भी बदल चुकी हैं। लेखकीय जीवन से संन्यास लेने से पहले ख़ुद रॉथ ने इसके बारे में कहा था, “अब मैं अमेरिका के बारे में कुछ नहीं जानता। मैं यहाँ रहता भी नहीं। मैं बस इसे टीवी पर देख लेता हूँ।”

फिलिप रॉथ का लिखा मुझे बेहद पसंद है। उनकी किताबों की तरफ़ मैं बार-बार लौटकर जाता हूँ, ढँके-छिपे तौर पर ही सही। यह ढँकना-छिपना इसलिए कि एक पाठक के तौर पर हम अपनी पसंदीदा किताबों में ठीक उसी तरह प्रविष्ट होते हैं, जैसे हम आमतौर पर होते हैं, यानी पूरी तरह आवृत्त। लेकिन हमारे पसंदीदा लेखक बहुधा क्रूर होते हैं। वे हमें एक कोमल निर्ममता के साथ पंक्ति-दर-पंक्ति, पन्ना-दर-पन्ना, अनावृत्त करते चलते हैं। एक निजी रहस्य, जिसे हमने कभी ख़ुद के सामने भी न दोहराया होगा, वह हमारे प्रिय लेखक की किताब में लिखा हुआ मिल जाता है। तब एक मुश्किल स्थिति बन जाती है। हम तुरत उस लेखक को नापसंद करना चाहते हैं, लेकिन पाते हैं कि उसके साथ हमारे लगाव के दो धागे और जुड़ गए हैं।

फिलिप रॉथ के एक भी चरित्र को मैं अपने जैसा नहीं पाता, मेरा मानसिक व्यक्तित्व उनकी किताब के इंसानों से अलहदा है, उनकी संस्कृति, सवाल और संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएँ मुझसे बिल्कुल अलग हैं, लेकिन ऐसा तो मैं कई लेखकों के बारे में कह सकता हूँ। काफ़्का या मारकेस का भी कोई चरित्र मेरे जैसा नहीं है। मुझे ऐसी किताबें नहीं याद आतीं, जिनके चरित्र के साथ मैंने अपना कोई साम्य पाया हो। इसी के बरक्स मन में यह ख़्याल आता है कि हम अपने जैसे चरित्रों को खोजने के लिए किताबें पढ़ते ही कब हैं? हम तो हमेशा दूसरों की खिड़कियों में झाँकते हैं। हम मानते हैं कि हम अपने घर के सारे कोनों-अँतरों को जानते हैं, लेकिन अचानक ही दूसरों की खिड़कियों में एक दृश्य दिखता है और लगता है कि वहाँ जो कहानी चल रही है, वह हमारे अपने ही घर की है। दूसरे लोग, या “अन्य”, हमसे अलग होते हैं, लेकिन उन्हें जाने बिना हम ख़ुद, यानी “स्व” या “आत्म”, को नहीं पहचान पाते। जिन क्षणों में हम दूसरों के बारे में बात करते हैं, दरअसल, अपने आप के बारे में बात कर रहे होते हैं।

हर उपन्यास एक यात्रा-वृत्तांत है। आत्म की खोज की यात्रा का वृत्तांत। यात्रा एक ही है, वृत्तांत भी एक ही, लेकिन खोज दो हैं। एक, लेखक द्वारा की जाने वाली आत्म की खोज। दूसरे, पाठक द्वारा की जाने वाली आत्म की खोज। दोनों खोजों में औज़ार एक ही प्रयुक्त होता है। लेखक अनात्म को लिखते हुए आत्म को खोजना चाहता है, जबकि पाठक अनात्म को पढ़ते हुए। यह अनात्म या अन्य या अदर ही उपन्यास का मूल पाठ विकसित करता है, लेकिन उससे आत्म की अनुभूति होती है। ‘गॉस्ट राइटर’ में रॉथ का एक चरित्र कहता है, ‘अनात्म? काश, कोई मुझे पहले बता देता कि उसके बारे में भी लिखना चाहिए।‘ यही दृष्टिकोण रॉथ को विशिष्ट बनाता है। उनके पूरे गल्प-लेखन की जड़ में इस वाक्य को देखा जा सकता है। इसी कारण उनके द्वारा वर्णित अन्य को भी उनका अपना ही आत्म मान लिया जाता है।

द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद अमेरिका में उपन्यासकारों की जो नई पीढ़ी आई, फिलिप रॉथ उसके मुख्य नाम थे। वह यहूदी थे, लेकिन जन्म से अमेरिकी। उस समय के अधिकांश यहूदी लेखकों की तरह रॉथ भी यूरोपीय यहूदी-स्मृतियों में जाते हैं, जो कि उन्होंने कभी नहीं जी। उनकी आरंभिक किताबों में यह यहूदी पहचान ख़ासकर दिखती है। उनका जन्म न्यू जर्सी में हुआ था। आप अगर यह बात भूल भी जाएँ, तो भी उनकी किताबें आपको रटा देंगी कि यह लेखक न्यू जर्सी में पैदा हुआ था और अब चाहे जहाँ रहता हो, अपने बचपन व न्यू जर्सी को बेइंतहा याद करता है। उनके सर्वाधिक सफल उपन्यास ‘पोर्टनॉय’ज़ कम्प्लेन्ट’ के आरंभिक हिस्से उनके बचपन के मुहल्ले व न्यू जर्सी के सूक्ष्म विवरणों से भरे हुए हैं। अपने बचपन के शहर से जो लेखक दूर चले जाते हैं, उनके यहाँ उस शहर की स्मृतियाँ, प्रेमी (या प्रेमिकाओं) की स्मृतियों की तरह आती हैं। जेम्स जॉएस ने अपने लेखन में डबलिन को ऐसे चित्रित किया है जैसे वह हाड़-माँस व धड़कनों से बना शहर हो। रॉथ के शहर, जगहों को आधुनिक तरीक़े से चित्रित करने का एक लेखकीय सबक हैं, जहाँ जगहें महज़ परिवेश या महज़ चरित्र की तरह नहीं आतीं, बल्कि वे एक पाठ की तरह खुलती हैं, गल्प के एक औज़ार की तरह विकसित होती हैं।

रॉथ से जितना प्यार किया गया है, उनसे नफ़रत भी कोई कम नहीं की गई है। मैंने इस तरह के वाक्य अक्सर पढ़े हैं- “मुझे रॉथ पसंद हैं, लेकिन....” और इस ‘लेकिन’ के बाद ऐसी तमाम बातें आती हैं, जो ‘लेकिन’ के पहले मौजूद “मुझे रॉथ पसंद हैं” को संदिग्ध बना देती हैं। और इन तमाम नकारात्मकताओं के मूल में महज़ एक बात है- पुरुष देह व मन की कामनाओं का निर्मम चित्रण। इनका जितना बेरहम व बहसाकुल चित्रण रॉथ ने किया है, उनके समकालीनों में शायद ही किसी ने किया हो। अपने कई साक्षात्कारों में उन्होंने कहा भी है, “शर्म लेखक का गुण नहीं होती। बिना शर्म छोड़े आप अच्छे लेखक नहीं हो सकते, सच्चे तो क़तई नहीं।”

रॉथ की शैली ने उनकी इस समस्या को बढ़ाया ही। उन्होंने मेटाफिक्शन नामक डिवाइस का प्रयोग करते हुए गल्प की रचना की। मेटाफिक्शन को आमतौर पर उत्तर-आधुनिक औज़ार माना जाता है और इसकी कई परिभाषाएँ दी जाती हैं, लेकिन उत्तर-आधुनिकता के उदय से पहले ही यह औज़ार दुनिया के साहित्य में मौजूद था, रॉथ ने अपनी ज़रूरत व तरीक़े से उसकी संभावनाओं का विस्तार ही किया। इस तरह के गल्प में, लेखक कई बार मुख्य चरित्र बन जाता है, कभी अपने नाम से तो कभी नाम बदलकर। कल्पना व यथार्थ का भेद मिटने लगता है। आत्म की खोज में लगा हुआ गल्प जब दूसरे की कथा कहता है, तो वह आत्मकथा होने का भान देने लगता है। उनके एक मुख्य चरित्र का नाम फिलिप रॉथ ही है। उसे लेकर उन्होंने चार उपन्यास लिखे व एक आत्मकथा। दूसरा चरित्र, जो उनके नौ उपन्यासों में आया और उनका सर्वश्रेष्ठ चरित्र माना जाता है- नैथन ज़ुकरमान, जो तिहरे अर्थों में फिलिप रॉथ ख़ुद हैं। इसे ‘ऑल्टर-ऑल्टर-ईगो’ कहा जा सकता है। इस तिलिस्म को ऐसे देखिए – किताब के लेखक हैं फिलिप रॉथ, जो लेखक पीटर टार्नोपोल नामक एक पात्र रचते हैं जो कि शायद ख़ुद रॉथ है, और टार्नोपोल भी एक चरित्र की रचना करता है, वह है  ज़ुकरमान, जो कि ख़ुद भी लेखक है और जो कि ख़ुद रॉथ ही लगता है। एक ही दृश्य को तीन अलग-अलग व्यक्तित्व मिलकर रच रहे हैं। लेखक रॉथ बताना चाहते हैं कि यह सब ज़ुकरमान के जीवन में हो रहा, लेकिन इस तिलिस्म के प्रभाव में पाठक का मानस यह मानने लगता है कि यह सब रॉथ के जीवन में चल रहा। इसीलिए, रॉथ के उपन्यासों में कथा व आत्मकथा, कल्पना व यथार्थ, इन सबके बीच की दूरी मिटने लगती है। इसके हमेशा अच्छे परिणाम ही पड़ें, कोई ज़रूरी नहीं। लेखक, आलोचकों और समीक्षकों के हाथ पड़ गई गेंद होता है, वे जिस विधि चाहें, उछाल दें। इस तकनीक के कारण रॉथ के उपन्यासों ने ऐसा घटाटोप बनाया कि अच्छे और बड़े समीक्षक भी भरमाए बिना न रह पाए। उम्र के आख़िरी बरसों में रॉथ ने चिढ़कर एक बात कही थी, जो बहुत मशहूर और बहु-उद्धृत है- “मैं कथा लिखता हूँ, तो वे लोग आत्मकथा मानने लगते हैं। मैं आत्मकथा लिखता हूँ, तो वे उसे काल्पनिक कथा कहने लगते हैं। मैं इतना ही मूर्ख हूँ और वे इतने ही समझदार हैं, तो चलिए, उन्हीं को तय करने दीजिए कि मेरी किताबें क्या हैं।”

पुरुष देह की कामनाओं का बेबाक चित्रण और कथा-आत्मकथा के बीच के इस घटाटोप के कारण रॉथ पर फेमिनिस्ट रैथ (Wrath कोप, क्रोध) बार-बार गिरा। एक बड़ी मुहिम चल पड़ी कि उन्हें स्त्री-विरोधी साबित कर दिया जाए, जो कि अब तक नहीं थमी है। इन लोगों को सेक्सिज़म के ऐसे ‘सबूत’ उनकी किताबों में बिखरे मिल ही जाते हैं। ‘पोर्टनॉय’ज़ कम्प्लेंट’ में हस्तमैथुन के इतने दृश्य हैं कि उस किताब को पढ़ने के बाद एक मशहूर लेखिका ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, “रॉथ से मिलने का मुझे बड़ा मन है, लेकिन तय है कि मैं उनसे हाथ नहीं मिलाऊँगी।” यह उपन्यास एक किशोर यहूदी पर केंद्रित है, जो अपनी यौन-समस्याओं के बारे में एक मनोचिकित्सक से बात कर रहा है। ग्लानि के भाव से भरे होने के बाद भी वह अपनी किशोर-समझ के साथ यौन मुद्दों से जुड़े सामाजिक सवालों को भी छेड़ रहा है। विश्व-साहित्य में यहूदी चरित्र बिना ग्लानि के कम ही दिखते हैं और अमेरिकी यहूदी लेखकों द्वारा रचे चरित्रों में तो यह भाव अब तक देखा जाता है। इस किताब ने रॉथ को अमेरिका में सेलिब्रिटी का दर्जा दे दिया। 1969-70 के दौरान इसने अमेरिका में मारियो पुज़ो की ‘गॉडफादर’ की बिक्री के रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। तत्कालीन युवाओं ने इस उपन्यास को हाथोहाथ लिया था, लेकिन अधिकांश बड़ी पत्रिकाओं ने इसकी तीखी आलोचना की थी। न्यूयॉर्कर ने कहा था- ‘अमेरिका में अब तक छपी सबसे गंदी किताब’। एक अन्य पत्रिका ने लिखा था- ‘अगर किसी को क्रूरतम सज़ा देनी हो, तो उसे यह किताब दो बार पढ़वा दी जाए।’ आज ‘पोर्टनॉय’ज़ कम्प्लेंट’ अमेरिकी साहित्य के आधुनिक क्लासिक्स में गिना जाता है। पाँच दशक पहले उसने जिस बहस की शुरुआत की, वह कमोबेश आज तक चल रही है। 

ज़ुकरमान की तरह रॉथ का एक और चरित्र है डेविड केपेश। इसे लेकर उन्होंने तीन उपन्यास लिखे। पहला उपन्यास ‘द ब्रेस्ट’ 1972 में आया था। डेविड केपेश साहित्य का प्रोफ़ेसर है। आम पुरुषों की तरह उसे भी स्त्री के स्तन बहुत पसंद हैं। एक दिन अपनी प्रेमिका के साथ बातचीत में इस पसंद का ज़िक्र करते हुए वह कहता है कि काश, मेरे भी स्तन होते, मैं ख़ुद एक स्तन होता। उसकी कई इच्छाएँ हैं, जो पूरी नहीं होतीं, लेकिन यह इच्छा तुरंत पूरी हो जाती है। अगली सुबह वह 75 किलो के एक स्तन में तब्दील हो जाता है। और यहाँ से एक यौन-विमर्श शुरू होता है। इच्छाओं और कामनाओं का ऐसा भूचाल आता है कि डेविड केपेश के जीवन में कोई और विषय ही नहीं बचता। केपेश इस समस्या को प्रतीकात्मक मानना चाहता है, लेकिन उसका मनोचिकित्सक उसे असल स्तन होने जैसा आभास करवाता है।

यह काफ़्का है। केपेश का काफ़्का, चेख़ॉव और गोगोल के साथ गहरा रिश्ता है। यदि काफ़्का एक देश का नाम होता, तो तय है, फिलिप रॉथ के पास उसकी चमकती हुई नागरिकता होती। काफ़्का के ‘मेटामॉर्फासिस’ में नायक ग्रेगर साम्सा एक सुबह उठता है, तो पाता है कि वह एक विशाल कीड़े में तब्दील हो गया है और उसके बाद मनुष्य के अस्तित्व के खोखलेपन, शोषण और नैतिकता पर एक बड़ा विमर्श खड़ा होता है। रॉथ के यहाँ केपेश स्तन में बदल जाता है। यह एक छोटा लेकिन विशिष्ट उपन्यास था और इस पर बहुत चर्चा हुई, लेकिन रॉथ पर नारीवादियों द्वारा हमले भी बहुत किए गए। 

केपेश सीरिज की दूसरी किताब पाँच साल बाद आई, जिसका शीर्षक था ‘द प्रोफ़ेसर ऑफ़ डिज़ायर’। इसमें भी हमें यौन-अक्षमताओं से त्रस्त काफ़्का के प्रतिबिंब दिखते हैं। पहली किताब के कई सारे प्रश्न नई घटनाओं व संदर्भों के साथ इसमें फिर खड़े होते हैं। यौन-कुंठाओं व भावनात्मक ज़िम्मेदारियों से भागते केपेश की शादी बर्बाद हो जाती है। किताब के अंत में वह एक अजीब सपना देखता है कि वह प्राग गया है, जहाँ काफ़्का के जीवन में आई एक वेश्या अभी तक जीवित है और वह केपेश को अपनी योनि दिखाती है और वह सोच में पड़ जाता है कि इसमें ऐसा क्या है, जिसने इतने बरसों तक काफ़्का की दिलचस्पी इसमें बनाए रखी थी। ये उपन्यास सिर्फ़ सेक्स नहीं हैं, बल्कि साहित्य व कामनाओं से जुड़े प्रश्नों पर पूरी बहस है। रॉथ के पूरे साहित्य की दिलचस्पी प्रश्नों व उनका जवाब जानने के बजाय, प्रश्नों को उठाकर अलग-अलग दृष्टिकोणों से उन पर बहस करने में अधिक रही है। उनके सबसे क़रीबी मित्र व समर्थक भी उनकी किसी न किसी किताब को लेकर उद्वेलित हो चुके हैं। अपने देश को असहज कर देना, उनकी हर किताब की आदत है। साधारण तौर पर यह मान लिया गया कि फिलिप रॉथ अपने उपन्यासों के नायकों की ही तरह सेक्सिस्ट, सैडिस्ट या यौन-मनोरोगी हैं, किंतु असल सवाल रॉथ नहीं, पूरे अमेरिका के संदर्भ में खड़ा होता है। जिन किताबों व चरित्रों पर पूरा अमेरिका बहस कर रहा था, क्या वह अमेरिका ख़ुद ही सेक्सिस्ट व यौन-मनोरोगी था? अनियंत्रित कामनाओं से ग्रस्त चरित्रों का सृजन करने के कारण लेखक को भी यदि वैसा ही मान लिया जाए, तो उन चरित्रों पर देशव्यापी बहस करने वाले पाठक को वैसा क्यों नहीं माना जा सकता? आख़िर, बहस तो तभी होगी, जब लेखक, उस पाठक के मन को आईने में उतारने में कामयाब हो चुका होगा।

फिलिप रॉथ की विविधता उन्हें कई समकालीनों के बीच ईर्ष्या का विषय बना देती है। कामनाओं पर लिखे इन उपन्यासों को देखकर कोई अंदाज़ा लगा सकता है कि वह किस परंपरा में खड़े होते हैं, लेकिन उनके अन्य उपन्यास ऐसी धारणाओं को खंडित कर देते हैं। मसलन अमेरिकन त्रयी कहलाने वाले उपन्यास ‘अमेरकिन पैस्टोरल’, ‘आय मैरीड अ कम्युनिस्ट’ और ‘द ह्यूमन स्टेन’। कामनाओं की नाज़ुकबयानी इनमें भी है, लेकिन उनसे अधिक स्मृतियों का खंडित आवाह्न। स्मृति व इतिहास से मुठभेड़ किए बिना आत्म के प्रश्नों को सुलझाया नहीं जा सकता और इतिहास अनिवार्यत: राजनीति है। इतिहास के मुद्दों को छेड़ना अपने सांस्कृतिक वर्तमान की पड़ताल करना भी है। एक सनकी राष्ट्रपति और राष्ट्रवादी ताक़तों ने अमेरिका पर मानो क़ब्ज़ा कर लिया है। ‘द प्लॉट अगेंस्ट अमेरिका’ में रॉथ ने इसकी आशंका पहले ही जता दी थी।

रॉथ पर चाहे जितने हमले किए गए, इस बात से क़तई इंकार नहीं किया जा सकता कि वह अपने समय के बौद्धिक वातावरण को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले लेखक रहे। उन्होंने सच और झूठ, गल्प व यथार्थ, कल्पना और तथ्य के बीच की जगह को लगातार धुँधला किया। अपने पूरे जीवन हम यही करते हैं। सच और झूठ को मिलाकर जीवन का आख्यान रचते हैं और एक दिन ख़ुद ही भूल जाते हैं कि क्या सच था और क्या झूठ। शब्दों का एक पाठ बुनकर हम अपने-अपने सच की संरचना करते हैं। रॉथ ने अपने लेखक की प्रविधि समकालीन मनुष्य की इसी प्रवृत्ति से प्राप्त की है। हम अपनी इस प्रवृत्ति को ढँक-छिपकर रखते हैं, लेकिन रॉथ जैसा लेखक अपनी किताब के भीतर इसे निर्ममता से अनावृत्त कर देता है।

Comments

Usha Bhatia said…
Impressive..overwhelming
write-up ..thank you...
Rahul Tomar said…
रॉथ का लिखा
मैंने अभी तक कुछ भी नहीं पढ़ा
यह कॉलम पढ़ने के बाद अब उन्हें पढ़ने की इच्छा हो रही है।

बहुत बहुत ख़ूबसूरत लिखा है सर।💐💐🙏🙏
Ambikesh Mishra said…
कुछ अच्छा लिखने के लिए कितना पढ़ना पड़ता है आप के उद्धरण से पता चला, इस तरह का आलेख लिखना बहुत अधिक मेहनत का काम है।
Anita Manda said…
रॉथ के शहर, जगहों को आधुनिक तरीक़े से चित्रित करने का एक लेखकीय सबक हैं, जहाँ जगहें महज़ परिवेश या महज़ चरित्र की तरह नहीं आतीं, बल्कि वे एक पाठ की तरह खुलती हैं, गल्प के एक औज़ार की तरह विकसित होती हैं।

- एक लेखक के बारे में बारीक़ अध्ययन, आलेख पढ़ समृद्ध हुए। शुक्रिया!
फिलिप राथ, सच ही कहा कामनाओं के प्रोफेसर
Utpal Banerjee said…
पढ़ लिया. बहुत अच्छा लिखा है गीत. इस लेख के लिए शुक्रिया.
अच्छा लिखा है।
Kuldip Kaur said…
A well written piece Geet ji
GurPreet SinGh said…
ਕਮਾਲ ਗੀਤ 🌻
जिनके पास विश्व साहित्य उपलब्ध नहीं है मगर वो दुनिया के बड़े लेखको के नाम से परिचित हैं और उनके काम को जानना चाहते है जिनमे फिलिप राथ भी है इस लेख को पढ़ते हुए उन्हें फिलिप राथ के बारे में अच्छी जानकारी मिलेगी

इस तरह की जानकारी हमारे जैसे सुदूर अंचलो में बैठे हुए पाठको के लिए संजीवनी से कम नही। इसके लिए गीत भाई का शुक्रिया
Usha Bhatia said…
True ..at times critics treat their job as a sport(like a ball in their hands) Most writers have to pass through
the inferno of critic's passions prejudices (even if they possess astonishing creativity ) Thomas Hardy
was also upset by the reaction of critics and said that he was tired of being
"Shot at "
Gaurav Adeeb said…
Har baar ki tarah hum nausikhiyon ke liye behad naveen aur gyanvardhak.. ye sab kitaab ki shkl mein kyun na banaye jaayein Anurag Vats .. nivedan hai
Gyasu Shaikh said…
रात को पढ़ लिया...आपके कथन में
मोहब्बत होती है ...modernization का
ओज होता है...धवल रौशनी-सा...आपका
पक्षकार होना किसी भी लेखक के प्रति सहज
होता है, इतमिनानबख्श भी ...
आत्मिय होते हैं आप के इस तरह के आलेख...
जो अन्यत्र कम ही मिले. किसी ने कहीं सच ही
कहा हैं: "आपका लेखन समृद्ध करे"

Popular posts from this blog

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त