अम्बर रंजना पांडेय की छह नई कविताएँ




( अम्बर रंजना पांडेय हिंदी की युवा पीढ़ी के विलक्षण कवि हैं. ऐसे कवियों के यहाँ परंपरा, उसका भाषिक वैभव और लोक-व्यवहार प्रसंगवश नहीं, गहरे निमज्जन से मुमकिन होते हैं. प्रेम, मृत्यु और शोक पर लिखी गई उनकी इन नई कविताओं में यह अनुभव करने के अलावा कवि का क्रमिक-विकास भी देखा जा सकता है.) 


शारीरिक पीड़ा

उसने हाथ ऐसे मस्तक पर रखे थे जैसे कोई पत्थर मार रहा हो या खम्भे से उसका मस्तक बार बार टकरा रहा हो। उसकी शारीरिक पीड़ा का अस्पताल जाने से पूर्व बस इतना ही पता चला। उसका दाँत मुँह भींचने से अंदर ही अंदर टूट गया है यह पता ही नहीं चला किसी को भी। शारीरिक पीड़ा हमेशा मृत्यु से छोटी पड़ जाती है। धुली हुई साफ़ और ठण्डी सफ़ेद चादर जैसे शव से अधिक समय तक प्रेम नहीं किया जा सकता हालाँकि जीवित मनुष्य शव में बदलते ही प्रेम करने के सर्वथा योग्य हो जाता है। जीवितों से प्रेम करने पर प्रेम घृण्य हो जाता हैै।
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ह्रदय प्रत्यारोपण

ह्रदय प्रत्यारोपण हो सकता है मस्तिष्क नहीं। उसका ह्रदय दे दिया। ह्रदय प्रत्यारोपण से शोक मृत्यु से महीने भर तक स्थगित रहता है। वह जीवित है। वह उससे मिली तब शोक हुआ। ह्रदय जो प्रेम का आवास है, ऐसा मानते हैं, वह धमनियों का पुंज है केवल। उसे कोई स्मृति नहीं है। वह पहचान भी नहीं सका। ह्रदय से विश्वास उठ गया। इस ह्रदय के कारण इतने दिनों तक दुख नहीं किया। इस ह्रदय के लिए भुलाकर बैठी रही उसे। यह ह्रदय जीवित रहते हुए भी, रक्त को सब ओर उछालकर भी कम नहीं करता थोड़ा भी मेरा शोक। मनुष्य ह्रदय में नहीं होता। मनुष्य शरीर के किसी भी भाग में नहीं होता। फिर भी इसी के नष्ट हो जाने पर नष्ट हो जाता है।
*

शोक : 1
जले हुए होठों या आँखों में जल की तरह व्याप्त होता है शोक। पहले भी था, मृतक के जीवन में आने के दिन की प्रथम रात्रि से उसके अनंत वियोग का शोक जल की तरह भीतर भीतर रिसने लगता है। पाइपलाइन टूटने पर जैसे दीवाल बदरंग हो जाती है। इसी भीतरी रिसाव को अवसाद से मुक्ति पाने के लिए हम प्रेम, अनुराग आदि कह देते हैं। शोक इसलिए दारुण नहीं होता क्योंकि इसे सहा नहीं जा सकता बल्कि यह तो शान्ति प्रदान करनेवाला है। भय की समाप्ति शोक में ही तो है किंतु शोक इसलिए असहनीय है क्योंकि यह संसार के समक्ष शोकाकुल को एकदम से नग्न कर देता है।
घर के बाहर रखे हुए शव के सम्मुख रोना अनेक नीलरात्रियों, मेघमय दिनों के प्रेम, गुप्त वार्ताओं को पुष्प की तरह सबके सामने उजागर कर देता है। जिससे प्रेम था, जिसके सामने शरीर या ह्रदय या ह्रदय का कोई भाग या केवल गर्भ या मात्र गोपनीय कॉपी ही निर्वसन रहती थी, वह अब निष्प्राण बाँस से बँधा पड़ा हुआ है और संसार ह्रदय के अन्तरतम भाग को उलटकर देखता है किसी नाट्यप्रस्तुति की तरह।

शोक मृत्यु की रात्रि नहीं, दूसरे दिन नहीं, बहुत बाद प्रकट होता है जब शोक करनेवाले को पूर्णत: विश्वास हो जाए कि मृतक अब नहीं लौटेगा और उसे शोक करना अब बंद कर देना चाहिए।
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शोक : 2

मृतक के लिए रोने की ध्वनि से अधिक मधुर कुछ भी नहीं इसलिए तुम ज़ोर ज़ोर से रोओ। जो लोग तुम्हें घेरकर खड़े है, उन्हें सम्बोधित करके कुछ मत कहो, आज केवल मृतक से संवाद करो— उसके निष्प्राण हाथों से अपनी आँखें ढाँक लो, उसके पैरों के अविचल अँगूठों पर अपने आँसूँ गिरने दो तुम। खाएगा नहीं कुछ वह आज इसलिए उसे पानी पिलाओ। ठण्डा पानी पिलाओ तो क्या हुआ कि वह बीती रात बर्फ़ की सिला पर बिताकर आया है; वह तुम्हारे हाथ से ठण्डा पानी पीना चाहता है। ध्यान रखो कि पानी साफ़ हो, गिलास में कण, कीड़े आदि देखो पिलाने से पूर्व। यह भी ध्यान रखो कि पिलाने के बाद गिलास उचित स्थान पर रख दिया जाए, यह न हो कि शोक में तुम गिलास यहाँ-वहाँ रख दो और मृतक को ले जाने की हड़बड़ी में गिलास गिर जाए पानी फैल जाए। अंतिम यात्रा से पूर्व ऐसा अशुभ संकेत हो।

मृतक से क्षमा माँगो कि तुम उसके प्रिय रंग के आँसुओं में नहीं रो सकते क्योंकि शरीर संरचना में आँसू पारदर्शी है।
*

सूतक की पुतली

अगरबत्ती मत जलाना तुम
मेरे शव के निकट। धूम से
मस्तिष्क में ब्रह्मकीट है
वह ‘भन-भन’कर खाने लगता
है खोपड़ी की हड्डी अंदर।

बहनों की बाट जोहते शव
यदि रखा रहे तो चंदन घिस
माथे करतलों पर लगाना।
तब चंदन की वह मुठिया जो
शव के लिए थी वह अपवित्र
है उसे मेरे शव की नाक
के निकट रख देना। मोह मत
करना। जाने देना। मिट्टी
का दीप जलाना। जाने के
बाद घूरे पर डाल आना।

जब तक प्राण हो तब तक चाम-
हाड़ों की यह पुतली पावन
होती है। छू नहाना नहीं पड़ता।
प्राण निकलते ही यह शरीर
अति घृण्य हो जाता है। प्रिय
जिसका हो वह लिपट लिपटकर
रोता है। दूसरे देहरी
पार मल मल कर नहाते हैं।
पत्थर पर पछीट पछीटकर
वस्त्र धोते हैं। यही रीति
है। इसका पालन तुम करना।

तीसरे दिन अस्थिसंचय को
जब घर के पुरुष भेजना
ठण्डा जल भेजना। जिस भूमि
पर मुझे दाघ दिया गया है
उसमें बहुत ताप है।
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प्रसूतिगृह में शव

अस्पताल से उलूक कुछ लेकर उड़ा है शिशुओं के ह्रदयरोग विशेषज्ञ सघन चिकित्साकक्ष के अतिशीतल अंधकार से बाहर धूप में आकर आपको अच्छा तो अनुभव होता है? शिशुओं के शव शिशुओं जितने ही सुंदर हैं या रक्तप्रवाह अवरुद्ध हो जाने के कारण त्वचा पर जगह जगह बैंगनी पुष्प खिल गए है वर्षा में कृष्णकमल से?
धूप ने सबसे अधिक प्रेम किया वातानुकूलित प्रसूतिगृह में मृतशिशुओं के रखे जानेवाले बहुत शीतल कमरे से बाहर निकलने पर। युवा पिताओं को पहली बार अनुभव हुआ धूप से जीवन होता है और माँओं का क्या हुआ? उन्हें ले गए उनके मृतशिशुओं के युवा पिता। धूप की खोज में। उन युवा माँओं के गर्भाशय खुले हुए थे, कोमल किंतु ऊष्ण; कौओं के घौंसलों की तरह मज़बूत। उन्हें अभी बहुत शिशुओं को जन्म देना था।
***

(सबद पर अम्बर की अन्य कवितायेँ यहाँ)

Comments

मृत्यु पर कहा गया, इस तरह... जितनी गहराई सोची जा सकती है, रचनाकार इस प्रक्रिया में और कितने गहरे से अनुभव को शब्दों में लाये होंगे, यह खयाल-सवाल बार-बार आता रहा| बहुत खूब कहा :)
कितना मार्मिक....
vandana gupta said…
निशब्द करती बेहद गहन प्रस्तुति
to write about grief as celebration of loss, to be the watcher and the watched Amber has odne amazing work in these "death poems"
प्रसूति गृह में शव ने तो मुझे रुला ही दिया। और उससे पूर्व वाली 'सूतक' कविता मन को मुट्ठी में बाँध स्पांज सा निचोड़ गई।
Kuldip Kaur said…
मोह मत
करना। जाने देना...

There is a death tune in this poetry.
Vinod Vithall said…
शानदार कविताएँ हैं। चौंका देने वाली। अनुराग आपका आभार !
पीड़ा, मृत्यु और शोक पर लिखना दुष्कर है, उसपर नए तरीके से कहना और कठिन। अम्बर ने पहचाने हुए को एक नया स्वर दिया है।

शोक के दोनों भाग सबसे ज्यादा पसन्द आये।
Rahul Tomar said…
"मृतक से क्षमा माँगो कि तुम उसके प्रिय रंग के आँसुओं में नहीं रो सकते क्योंकि शरीर संरचना में आँसू पारदर्शी है।"

कितनी ताज़गी है इन कविताओं वाह।।
मृत देह /मृत्यु की इतनी ऐसी अभिव्यक्ति !!!! वाह सलाम आपकी लेखनी को 👏🙏
निश्चित अम्बर को उस विराट का दर्शन हो चुका है। ऐसी कविता यूँही नही घटती... शुभकामनाएं अम्बर
Somesh Dutt said…
बहुत महीन धागे है शोक में
ओह! कविताएं!
सब कुछ नजदिकी से गुज़रा हुआ सा प्रतीत हुआ.... एक अनदेखा बिंब प्रवाहित होता रहा कविता को पढ़ते हुए..इस छोर से उस छोर तक।
Vasundhara Vyas said…
मृत्यु और शोक पर भी उतने ही सौन्दर्य से लिखा जा सकता है जितना कि प्रेम पर... ये कमाल तुम्हारे ही शब्द दिखा सकते हैं अम्बर...मुग्ध हुआ मन
Shruti Agrawal said…
कितनी सुंदर और भयावह दोनों का मिश्रण हैं ये कविताएं। अम्बर तुम सिर्फ अम्बर ही हो सकते हो।
Vivek S. Mishra said…
आपकी कविताएं पढ़ते हुए डूबते हुए अचानक आभास होता है, जैसे मैं David Lynch की किसी फ़िल्म का कोई पात्र बन गया हूँ...!!
गहरे भावबोध की कविताएं। बहुत बधाई।
Prabhakar Bist said…
आपकी रचनाओं इतना वेग है कि बहा कर ले जाती हैं अपनी प्रबल धारा में और पाठक स्वयं को उनका एक पात्र समझने लगता है। कमाल कर दिया आपने अम्बरू। शुभकामनाएँ।
Gargi Mishra said…
शोक पर ये कविताएँ सुँदर हैं। जीवन रहते शोक से जुड़ना यह और भी सुँदर। Ammber Pandey शुभकामनाएँ।
anshu tiwari said…
"Chu nahaana nahi padta"

Well depicted!

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