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Showing posts from March, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 12 : नेरूदा और स्त्रियाँ

पिछले सौ बरसों में जिस कवि पर सबसे ज़्यादा बात हुई है, वह हैं पाब्लो नेरूदा (1904-1973)। हो भी क्यों न, उन बरसों में प्रचलित काव्य-परंपराओं के साथ सबसे ज़्यादा छेड़छाड़ भी संभवत: उन्होंने ही की। उनकी सारी कविताओं को एक साथ रख दिया जाए, तो क़रीब चार हज़ार पन्नों की एक किताब बन जाएगी। अपने समय के कई आंदोलनों, विवादों, प्रेम-प्रसंगों व साहित्यिक विशेषाधिकारों से जुड़े रहने के कारण उन्होंने कविता से इतर एक ऐसा व्यक्तित्व भी पा लिया था, जो किसी कवि के प्रसार को व्यापक ही बनाता है। वह कम्युनिस्ट थे। देश और दुनिया की तत्कालीन परिस्थितियों से क्षुब्ध व विवश होकर, योजना बनाकर उन्होंने प्रतिरोध की महान कविताएँ लिखीं, लेकिन उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि प्रेम कविताओं से ही मिली थी और आज भी उनकी प्रेम कविताओं को ही शिद्दत से याद किया जाता है।
नेरूदा एक रेल मज़दूर के बेटे थे। उनके पैदा होने के दो साल बाद ही उनकी माँ की मृत्यु हो गई। सौतेली माँ से भी नेरूदा को बहुत प्रेम मिला, लेकिन पिता से वह ख़ाइफ़ रहते थे। दस साल की उम्र से उन्होंने कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था, लेकिन उनके पिता को उनका यह शौक़ पसंद न…

अम्बर रंजना पांडेय की छह नई कविताएँ

( अम्बर रंजना पांडेय हिंदी की युवा पीढ़ी के विलक्षण कवि हैं. ऐसे कवियों के यहाँ परंपरा, उसका भाषिक वैभव और लोक-व्यवहार प्रसंगवश नहीं, गहरे निमज्जन से मुमकिन होते हैं. प्रेम, मृत्यु और शोक पर लिखी गई उनकी इन नई कविताओं में यह अनुभव करने के अलावा कवि का क्रमिक-विकास भी देखा जा सकता है.) 


शारीरिक पीड़ा

उसने हाथ ऐसे मस्तक पर रखे थे जैसे कोई पत्थर मार रहा हो या खम्भे से उसका मस्तक बार बार टकरा रहा हो। उसकी शारीरिक पीड़ा का अस्पताल जाने से पूर्व बस इतना ही पता चला। उसका दाँत मुँह भींचने से अंदर ही अंदर टूट गया है यह पता ही नहीं चला किसी को भी। शारीरिक पीड़ा हमेशा मृत्यु से छोटी पड़ जाती है। धुली हुई साफ़ और ठण्डी सफ़ेद चादर जैसे शव से अधिक समय तक प्रेम नहीं किया जा सकता हालाँकि जीवित मनुष्य शव में बदलते ही प्रेम करने के सर्वथा योग्य हो जाता है। जीवितों से प्रेम करने पर प्रेम घृण्य हो जाता हैै।
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ह्रदय प्रत्यारोपण

ह्रदय प्रत्यारोपण हो सकता है मस्तिष्क नहीं। उसका ह्रदय दे दिया। ह्रदय प्रत्यारोपण से शोक मृत्यु से महीने भर तक स्थगित रहता है। वह जीवित है। वह उससे मिली तब शोक हुआ। ह्रदय जो प्…

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 11 : कारवी के फूल

कवि कह गया है कि नरगिस के फूल इस बात पर दुखी होते हैं कि उनकी सुंदरता को देखनेवाला कोई नहीं। हज़ार साल में कोई एक ऐसा नज़रवान, दृष्टिसंपन्न रसिक आता है, जो उसके सौंदर्य को जी-भर निहारता है। ब्रह्मकमल साल में एक बार खिलता है। यह दुर्लभ फूल पहले हिमालय में रहता था, धीरे-धीरे मैदानों में भी आ गया है। आधी रात के बाद खिलता है। गाढ़ी नींद के मीठे सपने की तरह खिलता है। मान्यता है, इसको खिलता देख मन में की गई कामना पूरी हो जाती है। अशोक के पेड़ पर जब कोई सुंदरी पैरों से आघात करती है, तब उसमें फूल आते हैं। खिलने के लिए उसे निश्चित स्पर्श चाहिए।
मैं सोचता हूँ, कारवी कैसे खिलता है?
ये सभी फूल नामधनी हैं। बहुत भाग्यशाली हैं। इन्हें कवियों ने छू दिया। कवि जिसके प्रेम में पड़ जाते हैं, वह अमर हो जाता है। चाहे स्त्री हो, चाहे फूल। कवि सिर्फ़ एक-दूसरे के शब्दों का ही हरण नहीं करते, बल्कि उनकी नायिकाओं का भी कर लेते हैं। वासवदत्ता से पहला प्रेम किसने किया होगा? राजा उदयन या राजकुमार कन्दर्पकेतु ने? कवि भास या कवि सुबंधु ने? या इनसे भी पहले पैशाची भाषा के कवि गुणाढ्य ने? किसी को नहीं पता, लेकिन वासवदत्ता पर…

मोनिका कुमार की पाँच नई कविताएँ

(मोनिका के ही एक शब्द के सहारे कहा जाए, तो वह अपनी कविता में 'विनम्रा' हैं। (निज) संसार देखने की उनकी विनम्र-दृष्टि में ऐसी कई बातों की समाई सम्भव हुई है, जो अन्यथा बहुत मुखर, नाराज़ और अनिवार्यतः आक्रामक स्त्री-कवि-दृष्टि में अँट नहीं पातीं। मोनिका की कविताएँ पिछले पाँचेक बरस में हिंदी के भूगोल में रहने-फैलने के अलावा 'माडर्न पोयट्री इन ट्रैन्स्लेशन' जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पत्रिका तक गई हैं। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पेश हैं उनकी पाँच नई कविताएँ)

आग पानी

विनम्र स्त्री है वह
परिचित और अजनबी
सभी के प्रति विनम्र
आवाज़ धीमी थी
विनम्रता ने उसकी आवाज़ को धीमा कर दिया था
दुपट्टा ओढ़ना भले भूल जाए
विनम्रता के आँचल से ढकी रहती है


अखंड विनम्रा है वह
विनम्रता ने सभी को उसके निकट कर दिया
विनम्रता से ही उसकी सभी से अनिवार्य दूरी भी बन गई 
दुनिया आश्वस्त हो गई थी
आग पानी से दूर
हानियों से परे
विनम्रता के वायुमंडल में
बस गई है वह 
उसे भी लगने लगा
दुनिया टिक गई है

कोलाहल थम गया है
उसे पता होता विनम्रता ऐसा दिलकश कवच है
वह बहुत सी परेशानियों से पहले ही बच जाती
पर कैसे पत…

संगीता गुन्देचा की 'जी' कविताएँ

(हिंदी जिन अनेक बोलियों से पुसती चली आ रही है, उसकी एक रंगत मालवी भी है। संगीता गुन्देचा की इन कविताओं में मालवी कंठ एक अलग सौंदर्य पैदा करता है। इसे कुछ हद तक कविता के अकथ अनुभव-स्रोत के अक्षत आविर्भाव की तरह भी पढ़ा जा सकता है। )

'जी' कविताएँ

1
बस एक बुखार की देर और है
जी कहती है
वह आँखें मटकाती एक हाथ से
दूसरे को मलती हुई आकाश की ओर देखती है:
बस एक बुखार को बदन और बच्यो!

2
वह बीमार हुई और शहर के
डाॅक्टर के पास जाने से मना कर दिया:
ऐ पूनमचन्द थारो जरा भी माजनो व्हे
तो म्हारे यांसे कंइ लइजावा मत दीजे
म्हारे तो यांज शान्तिनाथ को सायरो है।

3
जी के घर शान्तिनाथ हैं
वह रोज़ सुबह नहा कर उनकी पूजा करती है
केसर, चन्दन और गुलाब से
अपने पेड़ को फूलों से लदा देख
वह ताली बजाते हुए कहती है:
ये फूल कभी कम नहीं हो सकते
इ फूल कदी कम नी व्हइ सके
शान्तिनाथ के या सोरभ घणी हउ लगे!

4
गाँव में लोगों को पता चल गया है
परकोटे की राजपूत स्त्रियाँ
रंग-बिरंगी साड़ियों में
घूँघट लेकर जी से मिलने आ रही हैं
अपने बच्चे को लेकर
पड़ोसी कुम्हार और उसकी पत्नी आये हैं
उनके मटकों पर चित्रकारी कैसी हो
यह वे जी से …

वन नाइट स्टैंड के बाबत चंद जनाना फ़लसफ़े : बाबुषा कोहली की नई कविताएँ

बीयर
गए जुमेरात  उसने ऊब को तह कर दराज में रखा और शेल्फ़ से गिलास निकालते हुए कहा;
"बीयर पीने का मतलब शराबी होना नहीं होता.  चलो ! एक पेग न सही, दो सिप ही ले लो ? "
"सच्चे शराबी बीयर नहीं पीते, लड़के !"
तटस्थता से मैंने कहा. *
एच आई वी
"त्वचा पर चुभने वाली कोई भी नुकीली चीज़  हर बार नयी इस्तेमाल करने से कम रहती है आशंका कुछेक लाइलाज रोगों की"
नयी सिरींज निकालते हुए बोली डॉ दोस्त  हिदायती अंदाज़ में.
"त्वचा पर चुभने वाली कोई नुकीली चीज़ हर बार नयी होने पर बढ़ सकती है आशंका कुछेक लाइलाज रोगों की."
विरक्त भाव से मैंने कहा. *
टाइटैनिक
औरतों के दिल में एक गुपचुप चूहेदानी होती है.
किसी अजनबी या मर्द दोस्त के कमरे में जाने के पहले एक बार उस चूहेदानी में झाँक लेना ठीक होता है.
जो दुबके रहें चूहे  तो ठीक मची हो खलबली चूहेदानी में तो  नहीं खटखटाना चाहिए कमरे का दरवाज़ा
जानती हो, टाइटैनिक जब निकला था अपने पहले ( और आख़िरी)  सफ़र में; उसके कप्तान को लगता था कई बार वो लेकर गुज़रेगा ये जहाज़ समन्दर की बर्फ़ काटते हुए इन इलाक़ों से
चूहे जबकि दे रहे थे सब इशारे. *