Tuesday, March 27, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 12 : नेरूदा और स्त्रियाँ



पिछले सौ बरसों में जिस कवि पर सबसे ज़्यादा बात हुई है, वह हैं पाब्लो नेरूदा (1904-1973)। हो भी क्यों न, उन बरसों में प्रचलित काव्य-परंपराओं के साथ सबसे ज़्यादा छेड़छाड़ भी संभवत: उन्होंने ही की। उनकी सारी कविताओं को एक साथ रख दिया जाए, तो क़रीब चार हज़ार पन्नों की एक किताब बन जाएगी। अपने समय के कई आंदोलनों, विवादों, प्रेम-प्रसंगों व साहित्यिक विशेषाधिकारों से जुड़े रहने के कारण उन्होंने कविता से इतर एक ऐसा व्यक्तित्व भी पा लिया था, जो किसी कवि के प्रसार को व्यापक ही बनाता है। वह कम्युनिस्ट थे। देश और दुनिया की तत्कालीन परिस्थितियों से क्षुब्ध व विवश होकर, योजना बनाकर उन्होंने प्रतिरोध की महान कविताएँ लिखीं, लेकिन उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि प्रेम कविताओं से ही मिली थी और आज भी उनकी प्रेम कविताओं को ही शिद्दत से याद किया जाता है।

नेरूदा एक रेल मज़दूर के बेटे थे। उनके पैदा होने के दो साल बाद ही उनकी माँ की मृत्यु हो गई। सौतेली माँ से भी नेरूदा को बहुत प्रेम मिला, लेकिन पिता से वह ख़ाइफ़ रहते थे। दस साल की उम्र से उन्होंने कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था, लेकिन उनके पिता को उनका यह शौक़ पसंद नहीं आया। जब उन्होंने अपनी कविताएँ छपवाना शुरू कीं, तो उन्हें डर था कि असली नाम से छपवाएँगे, तो पिता को पता चल जाएगा। वह लड़कों के स्कूल में पढ़ते थे। उसी स्कूल का लड़कियों का सेक्शन दूसरी इमारत में था, जिसकी प्रिंसिपल थीं लूसीला गोदोई अलाकयागा, जिन्हें दुनिया गाब्रीयला मिस्त्राल के नाम से जानती थी। वह अपने समय की बहुत बड़ी कवि थीं और आगे चलकर, 1945 में उन्हें साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हमारे महाकवि को शुरुआती मार्गदर्शन उन्हीं से मिला था। वह छद्म नाम से कविताएँ छपवाती थीं, इसी से नेरूदा को अपना नाम बदलने की युक्ति सूझी। किशोरावस्था से ही नेरूदा बहुत पढ़ते थे। चेक लेखक यान नेरूदा की कहानियाँ उन्होंने एक संकलन में पढ़ रखी थीं। उन्होंने अपने आसपास के स्पैनिश-भाषी समाज से नाम उठाया- ‘पाब्लो’, और उसमें चेक लेखक का नाम – ‘नेरूदा’ – जोड़ दिया। इस तरह बना- पाब्लो नेरूदा। यह नाम उनके साथ जीवन-भर के लिए जुड़ गया। उन्होंने राजनयिक के रूप में कई देशों में बड़े-बड़े पदों पर नौकरी की। इस दौरान उनका नाम होता- रिकार्दो नेफ्ताली रेएस बासोआल्तो, लेकिन अनजान लोगों के बीच इस नाम से काफ़ी भ्रम होता। चालीस की उम्र का होने के बाद नेरूदा ने क़ानूनी तौर पर अपना नाम पाब्लो नेरूदा ही करवा लिया। पुराना नाम सिर्फ़ एक स्मृति की तरह जुड़ा रहा, लेकिन अब तक याद किया जाता है।

दो नाम वाले लेखकों और कलाकारों को अक्सर कुछ व्यावहारिक समस्याएँ झेलनी होती हैं। रचनाएँ उपनाम से छपती हैं, और अगर उनके बदले पारिश्रमिक का चेक आ जाए, तो बैंक को समझाने की शुरुआती प्रक्रिया झेलनी पड़ती है। कुछ और भी समस्याएँ होती हैं। जैसे, एक असल क़िस्सा याद आ गया। किसी ज़माने में हिंदी की एक पत्रिका में छपा था। अज्ञेय का असली नाम था सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन। एक बार वह बिहार में किसी कार्यक्रम में गए थे। मंच पर उनके साथ एक और लेखक बैठे थे। आवाज़ की सुंदरता के कारण एक सज्जन को संचालन का काम तो मिल गया था, लेकिन उनका साहित्य-ज्ञान शून्य था। संचालक महोदय ने देखा कि मंच पर दो लेखक बैठे हैं, तो उन्होंने शुरुआत ही इस वाक्य से की, “साथियो, हमारे लिए बहुत ख़ुशी की बात है कि आज हमारे बीच सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन आए हैं और उससे भी ख़ुशी की बात यह है कि वह अपने साथ प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय जी को भी लेते आए हैं। दोनों मंच पर बैठे हैं। करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया जाए।”

ख़ैर, बात नेरूदा की। किशोरावस्था में ही उनकी कुछ कविताएँ छप गईं और वह अपने आसपास के साहित्यिक समाज से जुड़ गए। ख़ासकर युवा क्रांतिकारी लेखकों के समूह ‘क्लारिदाद’ से। अठारह-उन्नीस की उम्र में (1923) उनकी पहली किताब इसी समूह ने छापी थी- ‘क्रेपुसकुलारियो’ यानी गोधूलि-वेला! बहुत साधारण-सी कविताएँ। तत्कालीन आधुनिकतावादी कविता का एक युवकोचित अनुकरण। इसके छपते ही नेरूदा में पराजय-बोध भर गया। वह उन कविताओं की कमज़ोरियाँ समझ रहे थे। और यह भी जान गए थे कि इस तरह की कविताएँ सिर्फ़ उनके ‘क्लारिदाद’ समूह में ही चल सकती हैं। कवि अक्सर समूह में काम करते हैं। अपने समूह से मिली तारीफ़ को ही वे सबकुछ मान लेते हैं। यही उनका कम्फर्ट ज़ोन बन जाता है। उस समूह से बाहर अपनी कविता को पहुँचाने और उसे स्वीकार करवाने की चिंता व साहस अधिकांश कवियों में नहीं होता। लेकिन नेरूदा बेहद महत्वाकांक्षी कवि थे। कवि की महत्वाकांक्षा उसकी कविताओं की बुनावट व संरचना में आने वाले परिवर्तनों से जानी जाती है, प्रसिद्ध हो जाने की उसकी काव्येतर कलाबाज़ियों से नहीं।

नेरूदा ने कुछ ही महीनों के श्रम से एक नई किताब बनाई- ‘बेइंते पोएमास दे आमोर ई ऊना कानसिओन देसेस्पेरादा’ (बीस प्रेम कविताएँ व निराशा का एक गीत, 1924)। असफल प्रेम की शिकायत करती कामुक, ऐंद्रिक कविताएँ। वह चाहते, तो उनके अपने समूह की पत्रिका व प्रकाशन गृह से ये कविताएँ आसानी से छप जातीं, लेकिन उन्हें एक व्यापक पाठक-समूह चाहिए था। इसकी आकांक्षा में उन्होंने देश की कुछ बड़ी पत्रिकाओं में ये कविताएँ भेजीं, ख़ारिज हो गईं। इस संग्रह की एक बेहद ऐंद्रिक कविता को उन्होंने एक पारिवारिक पत्रिका में भेज दिया था। उसने भी छापने से इंकार कर दिया। देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह नासीमेंतो ने भी उनकी पांडुलिपि को ख़ारिज कर दिया। नेरूदा ने अपने मित्रों से मदद माँगनी शुरू की। सांतिआगो के कई प्रसिद्ध कवि व समीक्षक नेरूदा को पसंद करते थे। ऐसे ही दो थे पेद्रो प्रादो और अलोन। नेरूदा के अनुरोध पर अलोन ने दबाव डालकर उस पारिवारिक पत्रिका में उनकी वह ऐंद्रिक कविता छपवा दी। फिर, नेरूदा ने प्रादो को ख़त लिखकर अपनी कविताएँ पढ़ाईं और उनसे अनुरोध किया कि वह नासीमेंतो पर दबाव डालें। प्रादो बहुत रसूख़दार थे। उनके कहने-भर से नासीमेंतो ने नेरूदा की वह पुस्तक छाप दी। पाँच सौ प्रतियों का एक संस्करण। किताब बाहर आते ही नेरूदा की आलोचना शुरू हो गई। साहित्यिक समीक्षकों ने उन कविताओं की बहुत धुलाई की। महज़ बीस साल की उम्र वाले एक कवि द्वारा ऐसी कामुक प्रेम कविताएँ लिखा जाना उस साहित्य-समाज को हज़म नहीं हो रहा था। दूसरे, उन कविताओं में स्पैनिश आधुनिकतावादी शैली को खुली चुनौती दी गई थी। कुछ कविताएँ प्राचीन-मध्य-युगीन अलेक्ज़ांद्रिया छंद में लिखी गई थीं, जो उस समय के ‘आधुनिक’ कवियों को लगभग नागवार गुज़रता था। पुराने छंद में नई कामुक अभिव्यक्तियाँ। 1924 के समाज के लिए वह भी एक ‘टैबू’ की तरह था। एक ही कविता में कुछ पंक्तियों में अनुभूतियाँ बेहद सांद्र, तो अगली ही पंक्तियों में बेहद ढीली। एक ही वाक्य का कई-कई बार दोहराव, जैसे बातचीत की शैली में होता है। शास्त्रीय आलोचना ने अख़बारों में लेखों के ज़रिए कवि की ‘भूरि-भूरि’ निंदा की। नेरूदा में पहले संग्रह वाला पराजय बोध समाप्त हो चुका था। अपनी इन कविताओं को लेकर वह बहुत आत्मविश्वास में थे। उन्हें अंदाज़ा था कि अपनी कम उम्र के कारण वे इन कविताओं को अकेले अपने दम पर बाहर नहीं ला पाएँगे। इसीलिए उन्होंने इन कविताओं के लिए सिफ़ारिशें लगवाई थीं। उन्होंने भी जवाबी लेख लिखे और अपनी कविताओं का बहुत आक्रामक बचाव किया। नेरूदा की स्पैनिश रचनावली ‘ओब्रास कोम्प्लीतास’ में उनमें से कुछ लेख पढ़े जा सकते हैं। संभवत: वे अंग्रेज़ी में उपलब्ध नहीं।

समीक्षक चिल्लाते रह गए, लेकिन पाठकों को कुछ और ही मंज़ूर था। उस समय की युवा पीढ़ी ने इस किताब को हाथोंहाथ लिया। जल्द ही गलियों में नौजवान गिटार पर उन कविताओं को गाने लगे। जिस ‘नयेपन’ को साहित्य-समाज का एक हिस्सा नहीं समझ पा रहा था, उस ‘नयेपन’ को साधारण पाठकों ने समझ लिया। और वह सच में नयापन ही था। कुछ ही समय में चीले के अधिकांश कवि नेरूदा की कविताओं की नक़ल करने लगे या उन कविताओं के रिस्पॉन्स में लिखने लगे। नेरूदा अचानक एक बहुत बड़ी साहित्यिक हस्ती बन गए। नासीमेंतो ने प्रादो के दबाव में उनकी किताब छापी थी, अनमने ढंग से। अब वह धड़ाधड़ उसके नये संस्करण निकालने लगा। आत्मविश्वास को कवियों का अवगुण माना जाता है, लेकिन नेरूदा ने यहाँ भी प्रचलित मान्यता को ध्वस्त कर दिया। इस उदाहरण से यह न समझा जाए कि नेरूदा हमेशा ही आत्मविश्वास से भरे रहते थे। उनके संशय का क़िस्सा अगली पंक्तियों में आएगा। दरअसल, काव्य-विवेक बहुत बुनियादी गुण है। किस समय कवि को संशय में होना है और किस समय आत्मविश्वास से भरा हुआ- एक विकसित काव्य-विवेक ही इसकी पहचान कर सकता है। जीवन और किताबों की पढ़ाई बहुत ज़रूरी उपक्रम हैं और इसका आधे से अधिक हिस्सा काव्य-विवेक के विकास के लिए ज़रूरी श्रम में ही ख़र्च होता है।

जैसे ही उनकी ये कविताएँ प्रसिद्ध हुईं, शुरू हो गया क़यासों का सिलसिला, कि आख़िर किस लड़की के लिए नेरूदा ने इतनी ऐंद्रिक व मार्मिक कविताएँ लिखी हैं, जिसे उनका देश, बाद में स्पैनिश भाषा से बना एक पूरा महाद्वीप, और उसके भी बाद पूरी दुनिया ने इतने चाव से पढ़ा। नेरूदा की मृत्यु तक इस रहस्य पर से पर्दा न उठ सका। जब तक जिये, नेरूदा के अनगिनत प्रेम संबंध रहे। जहाँ गए, वहाँ नये-नये प्रेम किए। ‘बीस प्रेम कविताओं’ की वह लड़की कौन थी, नेरूदा ने ख़ुद इसका उत्तर कभी नहीं दिया। जब बहुत चर्चा मची, तब किताब छपने के तीस साल बाद एक भाषण में उन्होंने एक इशारा दिया : “एक लड़की मेरे क़स्बे तेमूको की है, और दूसरी मेरे शहर सांतिआगो की।” यह इशारा काफ़ी नहीं था। इस रहस्य ने उनकी कविताओं को और प्रसारित किया। यह जिज्ञासु समीक्षकों का शग़ल था, क्योंकि पाठकों को उन कविताओं में नेरूदा की नहीं, अपनी प्रेमिका दिखती थी। जब नेरूदा साठ के हुए, तो उन्होंने अपने संस्मरणों में इस पर थोड़ी और रोशनी डाली। उन्होंने लिखा- “उस किताब में दो लड़कियाँ हैं। एक क़स्बाई यानी तेमुको की है, उसे मैं ‘मारीसोल’ कह सकता हूँ और दूसरी शहराती यानी सांतिआगो की, उसे ‘मारीसोम्ब्रा’ कह सकता हूँ।" दोनों साधारण स्पैनिश शब्द नहीं हैं, बल्कि गढ़े हुए हैं। ‘मारीसोल’ का अर्थ है समंदर व धूप। ‘मारीसोम्ब्रा’ का अर्थ है समंदर व छाँव। नेरूदा की मौत के बाद जिज्ञासु पत्रकारों ने दोनों लड़कियों को खोज निकाला। मारीसोल, तेमुको की रहने वाली तेरेसा वास्केस लियोन थी। मारीसोल नाम के अनुरूप ही वह चंचल, उल्लसित, ज़िंदादिल लड़की थी, अपने क़स्बे में उसने ब्यूटी क्वीन का ख़िताब जीता था। सांतिआगो आने के ठीक पहले नेरूदा उसके प्रेम में थे। पढ़ाई के लिए शहर आने के बाद वह मारीसोम्ब्रा के प्रेम में पड़ गए- यानी अलबेर्तीना रोसा। वह कॉलेज में उनकी सहपाठी थी, कम्युनिस्ट थी और हर जुलूस में दोनों साथ-साथ नारे लगाते थे। मारीसोम्ब्रा नाम के अनुसार ही वह सुंदर, लेकिन बेहद संजीदा, लगभग उदास-सी रहने वाली युवती थी। उस किताब की कविताओं में दोनों छिपे हुए, लेकिन ऐसे गड्‌डमड्ड तरीक़े से आती हैं कि साधारण युवतियाँ होने की जगह कविता की प्रेरक-देवियाँ बन जाती हैं। दोनों के पास नेरूदा के पुराने ख़त पाए गए, जिनसे पुष्टि हुई। कुछ अध्यवसायी लोगों के जिज्ञासु स्वभाव व खोजी प्रयासों से ये सब तथ्य बाहर आए, लेकिन अगर न भी आते, तो नेरूदा के काव्य के सौंदर्य पर कोई असर न पड़ता। अलबत्ता इन तथ्यों के आलोक में यह भी देखा जा सकता है कि नेरूदा की वे इक्कीस कविताएँ किस क़दर उस रहस्य से भरी हुई हैं, जिसे हम जीवन नाम से जानते हैं। हाँ, उन कविताओं का सौंदर्य इस रहस्य में भी है कि कैसे एक ही कविता जीवन की उदासियों से भरी रहती है और कुछ ही पंक्तियों बाद उसमें जीवन का अदम्य उल्लास खिलखिला उठता है। मारीसोल व मारीसोम्ब्रा का कैसा अद्भुत व रहस्यमयी मिश्रण है नेरूदा के यहाँ। 

प्रेम नेरूदा की कविताओं का खाद्य है। वह प्रेम को खाते हैं, तभी कविताएँ लिखते हैं। यह पंक्ति हर कवि के लिए कही जा सकती है, लेकिन प्रेम का वैसा वैभव हर कवि के यहाँ नहीं मिल पाता। प्रेम सफ़ेद पंखों वाला एक बूढ़ा बाज़ है, जो झपट्‌टा मारकर दिलों की नौजवानी को पंजों में जकड़ लेता है और नोंच-नोंचकर उसका माँस खाता है। प्रेम कवि को खाता है और कवि प्रेम को। यह परस्पर भक्षण है। नेरूदा इस खाद्य की तलाश में असंभव सीमाओं तक जाते हैं। वह तलाश यक़ीनन उनकी कविताओं में भी दिखती है।

यह प्रेम दैहिक लालसाओं से भी संचालित होता है। स्त्रियों के प्रति नेरूदा की लालसा लगभग अनियंत्रित थी। इस लालसा के कई पहलुओं पर ठीक से प्रकाश नहीं पड़ा है, क्योंकि वह उनके बेहद निजी दायरे में घटित होती थीं और तमाम लाइमलाइट के बावजूद नेरूदा रहस्यमय जीवन जीने में सफल थे। लेकिन समय के साथ कई बातें बाहर आई हैं। उन बातों व घटनाओं को अगर ग़ौर से पढ़ा-जाना जाए, तो कई लोगों की नज़र में नेरूदा की विशाल प्रतिमा भरभराकर गिर सकती है। जैसे एक बात का ख़ुलासा तो ख़ुद नेरूदा ने अपनी किताब ‘मेमॉयर्स’ में किया है – जब वह श्रीलंका में राजनयिक नौकरी पर थे, तब उन्होंने एक तमिल नौकरानी के साथ बलात्कार किया था।

प्रेम में वफ़ा और बेवफ़ाई की नेरूदा की परिभाषाएँ अपनी निजी थीं। मुझे ऐसा लगता है, उनकी इस सोच के पीछे उनके आरंभिक दिनों के ‘क्लारिदाद’ समूह का संग-साथ भी एक बड़ा कारण रहा होगा। वह समूह युवा क्रांतिकारियों का था, जो न सिर्फ़ क्रांति के स्वप्न देखता था, बल्कि नैतिकताओं की नई परिभाषाएँ गढ़ने की भी बहसें करता था। उस समूह और उस समय के अधिकांश क्रांतिकारी समूहों की मान्यता थी कि नैतिकता महज़ एक सामंती मूल्य है और नये समाज में ऐसे सारे मूल्यों को तोड़ देना चाहिए। ज़ाहिर है, नैतिकता ऐसा विषय है, जिसका सबसे ज़्यादा जुड़ाव सेक्स के साथ माना जाता है। वह समूह अति-स्वच्छंद सेक्स-आदतों का हिमायती था। उस दौर में नेरूदा बीस प्रेम कविताएँ जैसी किताब लिख पाए, तो उसके पीछे इस समूह की बहसों का भी योगदान था। वह किताब लिखकर नेरूदा ने अपने समय के टैबू को एक तरह से तोड़ा ही। निजी जीवन में भी शायद उन बहसों ने असर दिखाया था। तभी तो गाब्रीयल गार्सीया मारकेस, जिन्होंने नेरूदा को ‘दुनिया की किसी भी भाषा में बीसवीं सदी का महानतम कवि’ कहा था, ने उनके प्रेम-जीवन के बारे में दिलचस्प टिप्पणी की थी— “फेथफुलनेस और लॉयल्टी के बीच कन्फ्यूज़ नहीं होना चाहिए। नेरूदा, मातील्दा के प्रति हमेशा लॉयल रहे, लेकिन हमेशा फेथफुल नहीं रहे।” यहाँ जानबूझकर अंग्रेज़ी शब्दों को वैसा ही रहने दिया है, क्योंकि फेथफुल और लॉयल का फ़र्क़ अंग्रेज़ी (या स्पैनिश) में बेहतर समझा जा सकता है। हल्की-सी कोशिश यह कि -  किसी के प्रति निष्ठावान होकर भी पूरी तरह ईमानदार न होना।

नेरूदा और मातील्दा की प्रेमकथा किसी परिकथा जैसी है। एक बार नेरूदा बहुत बीमार हो गए। उनके देश चीले में उनकी जान को ख़तरा था। इसलिए उनके मित्रों ने उन्हें मेक्सिको में छिपाकर रखा। उनकी तीमारदारी के लिए एक विश्वस्त नर्स चाहिए थी, तो उनके मित्रों ने मातील्दे उर्रूतीया नामक एक युवती को मेक्सिको भेजा, जो उनकी कविताएँ गिटार पर गाया करती थी। दोनों में प्रेम हो गया। कुछ समय बाद नेरूदा योरप चले गए। फिर तमाम सरकारी दंद-फंद करके उन्होंने मातील्दा को भी वहीं बुला लिया।  दोनों योरप में कई जगह रहे, कभी खुलकर, कभी छिपकर। कुछ बरस बाद उन्होंने अपनी पहली पत्नी को छोड़कर मातील्दा से शादी कर ली। शादी से पहले के उन बरसों में जब वे साथ-साथ रहते थे, तब नेरूदा, लगभग हर सुबह मातील्दा के लिए एक कविता लिखते थे। उनमें से अधिकांश कविताएँ नेरूदा के संग्रह ‘लोस वेरसोस देल कापितान’ यानी ‘कप्तान रचित कविताएँ’ (1952, अंग्रेज़ी में ‘द कैप्टन्स वर्सेस’ 1972) में शामिल हैं। जब यह पहली बार छपी थी, तो किताब में कवि के तौर पर किसी का नाम नहीं था। यह एक अनाम कवि की कविताओं के रूप में छपी थी। इसे छपवाने के प्रति नेरूदा संशय में थे। यह कई स्तरों पर उभरा संशय था। वे कविताएँ उन्हें बहुत प्रिय थीं, बेहद निजी भी थीं, लेकिन उनकी गुणवत्ता के प्रति वह बेहद आश्वस्त नहीं थे। दूसरी बात, तब तक वह अपनी पहली पत्नी से अलग नहीं हुए थे और अगर अपने नाम से छपवाते, तो हंगामा मच जाता कि फिर से इतनी ऐंद्रिक प्रेम कविताएँ? इस बार ये किसके लिए हैं? तीसरा संशय और बड़ा था- क्या 1950 के दशक में, जब ‘कान्तो जनरल’ की कविताओं ने नेरूदा को प्रतिरोध के कवि के रूप में पूरी दुनिया में स्थापित कर दिया है, तब उन्हें अपनी ऐंद्रिक प्रेम-कविताओं का संग्रह लाना चाहिए? लेकिन वह मातील्दा से वादा कर चुके थे कि तुम्हारे लिए कविताओं की किताब लिखूँगा। ‘द कैप्टन्स वर्सेस’ पहली कड़ी थी। ‘सिएन सोनेतोस दे आमोर’ (प्यार के सौ सॉनेट, 1959) उसकी दूसरी कड़ी।

तीसरा संशय संभवत: सबसे बड़ा था और नेरूदा उसके बारे में न के बराबर बात करते हैं। नेरूदा को प्रसिद्धि प्रेम कविताओं से मिली थी, लेकिन जल्द ही वह अपने देश-काल की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों के प्रवक्ता बन गए। अपनी संस्कृति, सभ्यता, राजनीतिक दृष्टिकोण व प्रतिरोध का प्रवक्ता बनना किसी भी लेखक के लिए सबसे जोखिम-भरी स्थिति होती है। वह उसे कई क़िस्म के अदृश्य बंधनों में बाँध देती है। ‘बीस प्रेम कविताओं’ के बाद नेरूदा अपने देश की राजनीति में सक्रिय हुए और कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। 1934 में वह सरकारी ज़िम्मेदारी पर स्पेन आ गए। गाब्रीयला मिस्त्राल की जगह उन्हें वहाँ चीले का कॉन्सुल बनाया गया। वहीं स्पैनिश कवि फेदेरीको गार्सीया लोर्का के साथ उनकी क़रीबी दोस्ती हुई। एक-दूसरे के प्रति उनमें कितना प्रेम था, इस बात से समझा जा सकता है कि जब नेरूदा माद्रिद पहुँचे, तो रेलवे स्टेशन पर उनकी अगुआनी करने लोर्का आये थे। दोनों मार्क्सवादी विचारधारा के थे और जनांदोलनों के प्रति बहुत समर्पित व उत्साहित रहते थे।

1936 में स्पेन में फासिस्ट जनरल फ्रैंको ने तख़्तापलट कर दिया। इससे वहाँ गृहयुद्ध छिड़ गया। हिटलर और मुसोलिनी, फ्रैंको को हथियारों की मदद कर रहे थे। वामपंथी नेताओं व कवियों को इस फासीवादी उभार की आशंका पहले से थी। उन्होंने माद्रिद में एक फासीवाद-विरोधी मोर्चा बनाया। लोर्का उसके मुख्य स्तंभ थे। उन्होंने फासीवादी विरोधी भाषण दिए, कविताएँ लिखीं, नाटक किए, पत्रिका निकाली। उसमें उस समय के सभी बड़े स्पैनिश कवि छपे। नेरूदा से लेकर अंतोनियो मचादो व राफ़ाएल अलबेर्ती तक। स्पेन के अंदरूनी इलाक़ों में रिपब्लिकन सैनिकों का संहार करती हुई फ्रैंको की फासिस्ट सेना माद्रिद तक पहुँच गई और उसने लोर्का को गिरफ़्तार कर लिया। जब उनका दोष पूछा गया, तो एक अफ़सर ने कहा, “दूसरों ने हमें जितना नुक़सान पिस्तौल से नहीं पहुँचाया है, उससे कहीं ज़्यादा नुक़सान लोर्का ने अपनी क़लम से पहुँचाया है।” और उसके दो दिन बाद लोर्का की हत्या कर दी गई। आज तक लोर्का की लाश का भी पता न चला।

नेरूदा इससे बहुत दुखी हुए। इस घटना ने उनके जीवन व कविताओं पर बड़ा असर डाला। उन्होंने कहा – “यह लोर्का की नहीं, कविता की हत्या है।” उन्होंने राष्ट्रवादी-फासीवादी ताक़तों के विरोध में सीधी और तीखी कविताएँ लिखनी शुरू कीं। उन कविताओं में उन्होंने साफ़ लिखा कि अब मैं कैसे फूलों व सुगंधों की बात करूँ, जब मैं देख रहा हूँ कि स्पेन की गलियों में मासूम बच्चों का रक्त बह रहा है। रिपब्लकिन सैनिकों ने इन कविताओं से नई ताक़त पाई। गृहयुद्ध के मोर्चे पर एक तरफ़ गोलियाँ चल रही हैं, दूसरी तरफ़ रिपब्लिकन सैनिकों की नई टुकड़ी जोश भरने के लिए नेरूदा की कविताएँ गा रही है। उन सैनिकों ने फासिस्ट झंडों पर क़ब्ज़ा किया, उन्हें गलाकर उनसे लुगदी बनाई और उससे बने काग़ज़ पर नेरूदा की कविताएँ छापकर अपने साथियों में बँटवाईं। कविता प्रतिरोध का महत्वपूर्ण औज़ार होती है- यह बात सिर्फ़ कही जाती थी। स्पैनिश गृहयुद्ध में नेरूदा, उनके साथी कवियों और फासीवाद से लड़ रहे सैनिकों ने इस बात को साबित कर दिया कि ये कविताएँ ही दरअसल प्रतिरोध का असली ईंधन हैं। नेरूदा, मचादो, अलबेर्ती आदि कवियों ने जो चाबुक कविताएँ लिखीं और जनता को एकजुट करने में अपनी जो जबरी भूमिका निभाई कि स्पैनिश इतिहास में उस गृहयुद्ध को ‘कवियों द्वारा लड़ा गया युद्ध’ भी कहा जाता है। अगर समय के बड़े फलक पर देखा जाए, तो फासिस्ट नहीं, अंतत: प्रतिरोध की यही कविताएँ जीतीं।

‘एस्पान्या एन एल कोराज़ोन’ (स्पेन मेरे दिल में, 1936) और ‘कान्तो खेनेराल' (कान्तो जनरल, 1950) में नेरूदा की ऐसी कविताएँ संकलित हैं। इन दोनों के बीच तीन और संग्रह आए थे। उनमें भी प्रतिरोध का स्वर ही मुखर था। इस पृष्ठभूमि में 1952 में ‘द कैप्टन्स वर्सेस’ की प्रेम-कविताओं को अपने नाम से छपवाने में अगर उन्हें संकोच हो रहा था, तो ग़ैर-वाजिब नहीं है। प्रतिरोध के उस दौर में भी नेरूदा प्यार तो कर ही रहे थे- अपने जीवन का सबसे बड़ा प्रेम, छिप-छिपाकर। और उस प्रेम से जीवद्रव्य लेकर ऐंद्रिक प्रेम की कविताएँ भी लिख रहे थे। उन कविताओं के प्रति उनमें जो संशय था, वह भी उनके विकसित काव्य-विवेक का ही परिचायक था।

हालाँकि, इस बार भी प्रेम-कविताएँ लिखते समय नेरूदा के सामने वही पुराना संकट था कि प्रेम पर लिखते समय सेक्सिस्ट होने से कैसे बचा जाए। नेरूदा की कविताओं में दैहिक प्रेम की अद्भुत छटाएँ हैं। चाहे सदियों पुराने संस्कृत काव्य में प्रेम को देखा जाए या बीसवीं सदी में नेरूदा और उनके समानधर्मा कवियों की ऐंद्रिक कविताओं को, पुरुषों द्वारा लिखी गई इस कविता के अधिकांश हिस्से में स्त्री की देह को एक वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाता है। प्रेम और देह का यह रिश्ता बड़ा विरोधाभासी है। दैहिक प्रेम को संबोधित दुनिया की अधिकांश कविताएँ पुरुषों ने लिखी हैं। स्त्री के नितंबों को पहाड़, जंघाओं को पेड़ का तना, स्तनों को फल और योनि को पुष्प कहने की एक भरी-पूरी परंपरा है। हमारे यहाँ संस्कृत में नायिका-भेद और मध्ययुग का रीतिकाल तो इसका चरम रहा है। किसी कवि ने लिखा- “तुम्हारे दो स्तनों के बीच मैं इस तरह बैठता हूँ, जैसे दो पहाड़ों के बीच, उनकी छाँव में छंद लिखता हूँ।” कभी-कभी सोचता हूँ कि महिलाओं ने प्रेम, दैहिक प्रेम, पर लिखते हुए ऐसा अतिवादी-सेक्सिस्ट रवैया क्यों नहीं अपनाया? उन्होंने पुरुष अंगों का कम ही वर्णन किया, जहाँ किया, तो अधिकतर मद्धम अंदाज़ में। पुरुषों ने योनि को पुष्प की तरह देखा, तो स्त्रियों ने लिंग को क़लम की तरह क्यों नहीं देखा--- “मैं तुम्हारे लिंग को क़लम की तरह थामकर लिखती हूँ अपनी कविताएँ”। क़तई ज़रूरी नहीं कि स्त्री की लिखी कविता में ऐसी पंक्तियाँ हों, कि वह भी पुरुषों की तरह अतिवादी-सेक्सिस्ट हो जाए, लेकिन मान लीजिए, अगर ऐसी पंक्तियाँ हों, तो? जिस तरह पुरुष, स्त्री के अंगों को वस्तु मानकर लिखते हैं, वैसा ही स्त्रियाँ भी करें, तो? यक़ीनन वे हास्यास्पद बन जाएँगी। ऐसी पंक्तियों का ख़ूब मज़ाक़ बनाया जाएगा, महिला कवि पर हज़ार छींटे उड़ाए जाएँगे, शायद कोई धार्मिक-सामाजिक समूह उनका बलात्कार करने की धमकी दे दे या उनका गला रेतकर लाने वालों को लाखों का इनाम देने की घोषणा कर दे। प्रेम और सेक्स को लेकर दोनों की अभिव्यक्तियाँ अलग होती हैं, यह कोई नई बात नहीं। जेंडर के कोण से सोचा जाए, तो दुनिया की कविता के इतिहास में भयंकर असंतुलन है, प्रेम कविताओं के इतिहास में तो और भी ज़्यादा। लेकिन, जेंडर का यह असंतुलन तो हर क़िस्म के इतिहास में है।

नेरूदा ने संभवत: इसके बारे में सोचा था, लेकिन सेक्सिस्ट होने के ऐसे आरोपों को कोई मूल्य नहीं दिया। उन्होंने बेधड़क स्त्री-अंगों पर पुरुषवादी दृष्टिकोण से लिखा। उनकी काव्य-मेधा इतनी तीक्ष्ण थी कि धक गया। आज के समय नेरूदा जाने कौन-सा औज़ार अपनाते, जाने क्या युक्ति लगाते, क्योंकि आज वैसी कविताएँ नहीं धकने वालीं। हालाँकि अब भी, सेंसुअल या ऐंद्रिक लिखते समय तमाम कवियों पर सेक्सिस्ट होने का ख़तरा मँडराता ही रहता है। फेमिनिस्ट आलोचक नेरूदा की कविताओं के इस सेक्सिज़्म पर हमेशा तीखी टिप्पणी करते हैं, तो कई आलोचक नेरूदा की कविताओं में अर्थों की कई परतों का हवाला देते हुए उनका बचाव भी करते हैं।

नेरूदा की प्रेम-कविताओं में यह निडर ऐंद्रिकता अंत तक दिखाई देती है। आख़िर, अंत तक उन्होंने नये-नये प्रेम करना बंद भी तो नहीं किया था। मातील्दा के साथ हुआ उनका प्रेम सबसे चर्चित था, लेकिन जैसा कि मारकेस के कथन से भी स्पष्ट है, वह उनका आख़िरी प्रेम नहीं था।

‘ला एस्पादा एनसेन्दीदा’ (जलती हुई तलवार, 1970) नेरूदा के जीवन की सबसे ऐंद्रिक किताबों में से एक है। पूरी किताब एक लंबी कविता है।  इसमें फिर से सृष्टि के विनाश की कल्‍पना है। उसके बाद भी एक स्‍त्री और एक पुरुष बचे रह जाते हैं। यह नये आदम और ईव हैं। इसमें आदम तो ख़ुद नेरूदा ही हैं, लेकिन ईव, मातील्‍दा नहीं हैं।

यह नेरूदा के जीवन का आखि़री प्रेम था।

एक साल पहले : मातील्‍दा ने अपनी भतीजी अलीसिया उर्रूतिया को अपने घर रहने बुलाया था। क़रीब तीस वर्षीय अलीसिया किसी पारिवारिक समस्‍या में थीं और अपनी बेटी के साथ वहाँ रहने चली आईं। 65 की उम्र के नेरूदा को अलीसिया से प्रेम हो गया। और जैसा कि, महाकवि जुनूनी थे, यह प्रेम भी उनके तमाम प्रेमों की तरह जुनून से भरा रहा।

जब मातील्‍दा को उनके इस प्रेम के बारे में पता चला, तो वह बहुत क्रोधित हुईं। उन्‍होंने अलीसिया का सारा सामान बाहर सड़क पर फेंक दिया। हिंसक झड़प के बाद अलीसिया को भी घर से निकाल दिया। लेकिन ख़तों के ज़रिए नेरूदा, अलीसिया से जुड़े रहे। उन्‍होंने उसे 'रोसारिया' नाम दिया था। ‘जलती हुई तलवार’ की ईव का नाम भी रोसारिया ही है।

मातील्‍दा की नाराज़गी बढ़ती जा रही थी। नेरूदा ख़ुद को रोक नहीं पा रहे थे। जब उन्‍हें अपनी शादी संकटग्रस्‍त लगने लगी, तो उसे बचाने के लिए उन्‍होंने राष्‍ट्रपति अयेंदे से बात की और गुज़ारिश की कि उन्‍हें चीले के राजदूत के तौर पर पेरिस में नियुक्‍त कर दिया जाए, वरना यह प्रेम-संबंध एक बड़ा स्‍कैंडल बन जाएगा। अयेंदे, नेरूदा के निजी दोस्‍तों में से थे। उनका आग्रह तुरंत माना गया। नेरूदा ने पेरिस इसलिए भी चुना था कि वहाँ किडनी से संबंधित उनके रोग का इलाज भी आसान था।

पेरिस पहुँचने के बाद भी ख़तो-किताबत बंद न हो सकी। उन्‍होंने अपने मातहत के पते पर अलीसिया से ख़त मंगाने शुरू किए। जिस समय वह योजना बना रहे थे कि वह अपनी नई प्रेमिका को भी पेरिस बुला लें, उनका स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ने लगा। उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा। मातील्‍दा ने उनके ख़राब स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए तय किया कि वह उनके नए प्रेम पर कोई आपत्ति नहीं लेंगी। उन्‍हें यह भान हो गया था कि यह नेरूदा का अंत समय है। कुछ ही समय बाद महाकवि की मृत्‍यु हो गई।

उनके मरने के काफ़ी बरसों बाद अलीसिया ने अपनी तरफ़ से यह स्‍वीकार किया कि वह नेरूदा की आखि़री स्‍त्री थीं। उसके पास से नेरूदा की कई अप्रकाशित कविताएं भी मिलीं। जैसा कि नेरूदा का शौक़ था, वह अपनी कविताओं की हस्‍तलिखित प्रतियाँ उसे भेंट कर देते थे, जिसके लिए वे लिखी गई होतीं

नेरूदा महाकवि थे। सदी के सर्वश्रेष्ठ कवि। वह ‘दिलफेंक दास हृदय कुमार प्रेमोपाध्याय’ भी थे। लाखों की भीड़ के सामने कविता पढ़ने वाले विरले कवि। दमितों और शोषितों के लिए लड़ने वाले ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ता। दीवाना बना देने वाली शख़्सियत थे, तो प्रतिरोध की बुलंद आवाज़ भी। उनकी कविताओं में अद्भुत बिंब थे, तो सेक्सिज़्म की सीधी छाप भी। यारों के यार थे, तो ‘बलात्कारी’ भी थे। वह प्रेम के महान गायक थे, तो विश्वासघात की मिसाल भी थे। एक नेरूदा थे। उनके कई-कई रूप थे। अपने-अपने अनुसार उन्हें सही-ग़लत मानने की छूट हो सकती है, लेकिन यह ज़रूर है कि वह खुली किताब के भेस में एक रहस्य थे।


Thursday, March 15, 2018

अम्बर रंजना पांडेय की छह नई कविताएँ




( अम्बर रंजना पांडेय हिंदी की युवा पीढ़ी के विलक्षण कवि हैं. ऐसे कवियों के यहाँ परंपरा, उसका भाषिक वैभव और लोक-व्यवहार प्रसंगवश नहीं, गहरे निमज्जन से मुमकिन होते हैं. प्रेम, मृत्यु और शोक पर लिखी गई उनकी इन नई कविताओं में यह अनुभव करने के अलावा कवि का क्रमिक-विकास भी देखा जा सकता है.) 


शारीरिक पीड़ा

उसने हाथ ऐसे मस्तक पर रखे थे जैसे कोई पत्थर मार रहा हो या खम्भे से उसका मस्तक बार बार टकरा रहा हो। उसकी शारीरिक पीड़ा का अस्पताल जाने से पूर्व बस इतना ही पता चला। उसका दाँत मुँह भींचने से अंदर ही अंदर टूट गया है यह पता ही नहीं चला किसी को भी। शारीरिक पीड़ा हमेशा मृत्यु से छोटी पड़ जाती है। धुली हुई साफ़ और ठण्डी सफ़ेद चादर जैसे शव से अधिक समय तक प्रेम नहीं किया जा सकता हालाँकि जीवित मनुष्य शव में बदलते ही प्रेम करने के सर्वथा योग्य हो जाता है। जीवितों से प्रेम करने पर प्रेम घृण्य हो जाता हैै।
*

ह्रदय प्रत्यारोपण

ह्रदय प्रत्यारोपण हो सकता है मस्तिष्क नहीं। उसका ह्रदय दे दिया। ह्रदय प्रत्यारोपण से शोक मृत्यु से महीने भर तक स्थगित रहता है। वह जीवित है। वह उससे मिली तब शोक हुआ। ह्रदय जो प्रेम का आवास है, ऐसा मानते हैं, वह धमनियों का पुंज है केवल। उसे कोई स्मृति नहीं है। वह पहचान भी नहीं सका। ह्रदय से विश्वास उठ गया। इस ह्रदय के कारण इतने दिनों तक दुख नहीं किया। इस ह्रदय के लिए भुलाकर बैठी रही उसे। यह ह्रदय जीवित रहते हुए भी, रक्त को सब ओर उछालकर भी कम नहीं करता थोड़ा भी मेरा शोक। मनुष्य ह्रदय में नहीं होता। मनुष्य शरीर के किसी भी भाग में नहीं होता। फिर भी इसी के नष्ट हो जाने पर नष्ट हो जाता है।
*

शोक : 1
जले हुए होठों या आँखों में जल की तरह व्याप्त होता है शोक। पहले भी था, मृतक के जीवन में आने के दिन की प्रथम रात्रि से उसके अनंत वियोग का शोक जल की तरह भीतर भीतर रिसने लगता है। पाइपलाइन टूटने पर जैसे दीवाल बदरंग हो जाती है। इसी भीतरी रिसाव को अवसाद से मुक्ति पाने के लिए हम प्रेम, अनुराग आदि कह देते हैं। शोक इसलिए दारुण नहीं होता क्योंकि इसे सहा नहीं जा सकता बल्कि यह तो शान्ति प्रदान करनेवाला है। भय की समाप्ति शोक में ही तो है किंतु शोक इसलिए असहनीय है क्योंकि यह संसार के समक्ष शोकाकुल को एकदम से नग्न कर देता है।
घर के बाहर रखे हुए शव के सम्मुख रोना अनेक नीलरात्रियों, मेघमय दिनों के प्रेम, गुप्त वार्ताओं को पुष्प की तरह सबके सामने उजागर कर देता है। जिससे प्रेम था, जिसके सामने शरीर या ह्रदय या ह्रदय का कोई भाग या केवल गर्भ या मात्र गोपनीय कॉपी ही निर्वसन रहती थी, वह अब निष्प्राण बाँस से बँधा पड़ा हुआ है और संसार ह्रदय के अन्तरतम भाग को उलटकर देखता है किसी नाट्यप्रस्तुति की तरह।

शोक मृत्यु की रात्रि नहीं, दूसरे दिन नहीं, बहुत बाद प्रकट होता है जब शोक करनेवाले को पूर्णत: विश्वास हो जाए कि मृतक अब नहीं लौटेगा और उसे शोक करना अब बंद कर देना चाहिए।
*

शोक : 2

मृतक के लिए रोने की ध्वनि से अधिक मधुर कुछ भी नहीं इसलिए तुम ज़ोर ज़ोर से रोओ। जो लोग तुम्हें घेरकर खड़े है, उन्हें सम्बोधित करके कुछ मत कहो, आज केवल मृतक से संवाद करो— उसके निष्प्राण हाथों से अपनी आँखें ढाँक लो, उसके पैरों के अविचल अँगूठों पर अपने आँसूँ गिरने दो तुम। खाएगा नहीं कुछ वह आज इसलिए उसे पानी पिलाओ। ठण्डा पानी पिलाओ तो क्या हुआ कि वह बीती रात बर्फ़ की सिला पर बिताकर आया है; वह तुम्हारे हाथ से ठण्डा पानी पीना चाहता है। ध्यान रखो कि पानी साफ़ हो, गिलास में कण, कीड़े आदि देखो पिलाने से पूर्व। यह भी ध्यान रखो कि पिलाने के बाद गिलास उचित स्थान पर रख दिया जाए, यह न हो कि शोक में तुम गिलास यहाँ-वहाँ रख दो और मृतक को ले जाने की हड़बड़ी में गिलास गिर जाए पानी फैल जाए। अंतिम यात्रा से पूर्व ऐसा अशुभ संकेत हो।

मृतक से क्षमा माँगो कि तुम उसके प्रिय रंग के आँसुओं में नहीं रो सकते क्योंकि शरीर संरचना में आँसू पारदर्शी है।
*

सूतक की पुतली

अगरबत्ती मत जलाना तुम
मेरे शव के निकट। धूम से
मस्तिष्क में ब्रह्मकीट है
वह ‘भन-भन’कर खाने लगता
है खोपड़ी की हड्डी अंदर।

बहनों की बाट जोहते शव
यदि रखा रहे तो चंदन घिस
माथे करतलों पर लगाना।
तब चंदन की वह मुठिया जो
शव के लिए थी वह अपवित्र
है उसे मेरे शव की नाक
के निकट रख देना। मोह मत
करना। जाने देना। मिट्टी
का दीप जलाना। जाने के
बाद घूरे पर डाल आना।

जब तक प्राण हो तब तक चाम-
हाड़ों की यह पुतली पावन
होती है। छू नहाना नहीं पड़ता।
प्राण निकलते ही यह शरीर
अति घृण्य हो जाता है। प्रिय
जिसका हो वह लिपट लिपटकर
रोता है। दूसरे देहरी
पार मल मल कर नहाते हैं।
पत्थर पर पछीट पछीटकर
वस्त्र धोते हैं। यही रीति
है। इसका पालन तुम करना।

तीसरे दिन अस्थिसंचय को
जब घर के पुरुष भेजना
ठण्डा जल भेजना। जिस भूमि
पर मुझे दाघ दिया गया है
उसमें बहुत ताप है।
*

प्रसूतिगृह में शव

अस्पताल से उलूक कुछ लेकर उड़ा है शिशुओं के ह्रदयरोग विशेषज्ञ सघन चिकित्साकक्ष के अतिशीतल अंधकार से बाहर धूप में आकर आपको अच्छा तो अनुभव होता है? शिशुओं के शव शिशुओं जितने ही सुंदर हैं या रक्तप्रवाह अवरुद्ध हो जाने के कारण त्वचा पर जगह जगह बैंगनी पुष्प खिल गए है वर्षा में कृष्णकमल से?
धूप ने सबसे अधिक प्रेम किया वातानुकूलित प्रसूतिगृह में मृतशिशुओं के रखे जानेवाले बहुत शीतल कमरे से बाहर निकलने पर। युवा पिताओं को पहली बार अनुभव हुआ धूप से जीवन होता है और माँओं का क्या हुआ? उन्हें ले गए उनके मृतशिशुओं के युवा पिता। धूप की खोज में। उन युवा माँओं के गर्भाशय खुले हुए थे, कोमल किंतु ऊष्ण; कौओं के घौंसलों की तरह मज़बूत। उन्हें अभी बहुत शिशुओं को जन्म देना था।
***

(सबद पर अम्बर की अन्य कवितायेँ यहाँ)

Monday, March 12, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 11 : कारवी के फूल



कवि कह गया है कि नरगिस के फूल इस बात पर दुखी होते हैं कि उनकी सुंदरता को देखनेवाला कोई नहीं। हज़ार साल में कोई एक ऐसा नज़रवान, दृष्टिसंपन्न रसिक आता है, जो उसके सौंदर्य को जी-भर निहारता है। ब्रह्मकमल साल में एक बार खिलता है। यह दुर्लभ फूल पहले हिमालय में रहता था, धीरे-धीरे मैदानों में भी आ गया है। आधी रात के बाद खिलता है। गाढ़ी नींद के मीठे सपने की तरह खिलता है। मान्यता है, इसको खिलता देख मन में की गई कामना पूरी हो जाती है। अशोक के पेड़ पर जब कोई सुंदरी पैरों से आघात करती है, तब उसमें फूल आते हैं। खिलने के लिए उसे निश्चित स्पर्श चाहिए।

मैं सोचता हूँ, कारवी कैसे खिलता है?

ये सभी फूल नामधनी हैं। बहुत भाग्यशाली हैं। इन्हें कवियों ने छू दिया। कवि जिसके प्रेम में पड़ जाते हैं, वह अमर हो जाता है। चाहे स्त्री हो, चाहे फूल। कवि सिर्फ़ एक-दूसरे के शब्दों का ही हरण नहीं करते, बल्कि उनकी नायिकाओं का भी कर लेते हैं। वासवदत्ता से पहला प्रेम किसने किया होगा? राजा उदयन या राजकुमार कन्दर्पकेतु ने? कवि भास या कवि सुबंधु ने? या इनसे भी पहले पैशाची भाषा के कवि गुणाढ्य ने? किसी को नहीं पता, लेकिन वासवदत्ता पर बहुतों ने लिखा। अलग-अलग तरह से लिखा। जिन-जिनने वासवदत्ता के अप्रतिम सौंदर्य का वर्णन किया, वे सब उसके प्रेम में पड़े होंगे। कवि के पास अमरफल होता है। वह भले ख़ुद उसे चख न सके, पर उस नायिका को ज़रूर चखाना चाहता है, जिसके प्रेम में पड़ जाए। वह अपनी नायिका को फूलों की उपमा देता है। इस नाते फूलों से भी नायिका जैसा ही प्रेम करने लगता है। उन्हें भी अमर बना देता है। जबकि फूल हमारे चारों तरफ़ होते हैं। हम उन्हें देखकर भी नहीं देखते।

फूलों के बारे में हम कितना कम जानते हैं। गिनती के फूलों को छोड़ दें, तो बाक़ी कई फूलों को हम उनके नाम से नहीं पहचान पाते। नाम सुन रखा हो, लेकिन सामने आ जाए, तो अजनबियों की तरह देखते हैं। कारवी का फूल ऐसा ही है। एक अकेले फूल को देख लें, तो पहली नज़र में वह इतना विलक्षण, इतना विशिष्ट नहीं लगता कि उसे स्मृति में जगह दी जा सके। इसीलिए, कारवी समूह का फूल है। यह फूलों से गाया गया कोरस है। महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों पर कारवी सात साल में एक बार खिलता है और जब खिलता है, तो पूरी पर्वत-शृंखला को नीली चादर ओढ़ा देता है।

कारवी का जीवनचक्र संघर्ष की किसी कहानी जैसा है। इसके बीज पहली बरसात में अंकुरित हो जाते हैं। फिर साल-दर-साल इनका विकास होता है। सात साल में भी कुछ का आकार पौधों जितना ही होता है, कुछ दुर्बल नन्हें वृक्षों जितने हो जाते हैं। बहुत अधिक पत्तियाँ नहीं जुटा पाते। आठवें साल डोडे जैसी दिखने वाली कली खिलती है, जो जल्द ही नीले, जामुनी फूलों में बदल जाती है। भँवरों और मधुमक्खियों को ये बहुत प्रिय हैं। वे इनसे रस चूसते हैं और इनके पराग को दूर तक पहुँचाते हैं। फूल आने के कुछ ही समय बाद इसमें छोटा-सा फल लगता है, जो जल्द ही गिर जाता है। फिर ये फूल मुरझा जाते हैं। पूरा पौधा ही सूख जाता है। सात साल तक इंतज़ार करने के बाद इसके फूल महज़ सर्दियों के कुछ हफ़्तों तक बने रह पाते हैं। कारवी का एक पौधा जीवन में एक ही बार पुष्पित होता है। जब खिलते हैं, तो कई एकड़ तक सिर्फ़ नीला ही नीला दिखाई देता है। जब सूखते हैं, तो कई एकड़ तक वीरानगी नज़र आती है। इसके फल ज़मीन पर गिरे बिखरे रहते हैं। नमी और धूप के कारण एक दिन इन नन्हें फलों में विस्फोट होता है, जिससे इसके बीज दस-बारह फीट तक बिखर जाते हैं। फिर बारिश का इंतज़ार करते हैं। बूँदें पड़ने के साथ अंकुरित होते हैं और फिर वही सप्त-वर्षीय जीवनचक्र शुरू हो जाता है।

एक साथ कई बीज अंकुरित होते हैं, इसीलिए कारवी समूह में उगता है। न खिलेगा, तो सात साल तक नहीं खिलेगा। और खिल गया, तो मीलों दूर तक बस कारवी ही कारवी। शेष दूसरे पौधे तब जैसे लजाकर छुप जाते हैं। उनका रंग कारवी के नीले, जामुनी रंगों के नीचे दब जाता है। हरे के साथ जामुनी की मैचिंग करने में आधुनिक मनुष्य को भले संकोच हो, प्रकृति को कोई संकोच नहीं होता। रंगों के मेल का सौंदर्य हमने अभी भी प्रकृति से पूरी तरह नहीं सीखा है। कारवी जब हुलसकर कोरस में गाता है, तो उसे मराठी में मेल कहा जाता है। यानी मिलाप, एकत्र होना, मेला भर जाना।


इसे खिलता देखने के लिए मुंबई से ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं, लेकिन मुंबईवालों को ख़बर नहीं होती कि उनके पास ही कारवी उगता है। जैसे मुंबईवालों को यह ख़बर नहीं होती कि उनके शहर के बिल्कुल पास जव्हार है, मोखाड़ा है, तलासरी है, वाड़ा है। ये सब मुंबई से लगे आदिवासी इलाक़े हैं। मुंबई का भूगोल अजब कल्पनाशील है कि वह लंदन व न्यूयॉर्क को अपना पड़ोसी मान लेता है, लेकिन इन इलाक़ों को नहीं मान पाता। वारली चित्रकला के नाम से इन जगहों की कला पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन ये जगहें कमनाम हैं। हर बड़े शहर के हैंडलूम स्टोर्स में वारली शैली के चित्रांकन वाला एक कपड़ा तो ज़रूर मिल जाएगा।

सह्याद्रि पर्वत-शृंखला, गुजरात और महाराष्ट्र को जोड़नेवाले बिंदु से शुरू होकर केरल, तमिलनाडु तक जाती है। इसे पश्चिम घाट नाम से भी जाना जाता है। इसका शुमार प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध दुनिया की दस सबसे चर्चित जगहों में होता है। जो वनस्पतियाँ विश्व की दूसरी जगहों पर लुप्तप्राय हैं, यहाँ मिल जाती हैं। उत्तर में जो महत्व विंध्य को मिला था, दक्षिण में वही सह्याद्रि को है। उत्तर के कवियों ने दुर्गा को विंध्यवासिनी कहा है, दक्षिण के कवि उन्हें सह्यवासिनी कहते हैं। उत्तर व दक्षिण में कितना अंतर है। उत्तर, दक्षिण को कितना कम जानता है। शूद्रक के जगत्प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकममें चारुदत्त का सिर बलिवेदी पर है, प्रहार से पहले ही चाण्डाल का खड्ग हाथ से गिर जाता है, राम-राम की तर्ज पर उसके मुँह से निकलता है, “भगवति सह्यवासिनि! प्रसीद प्रसीद!” भवभूति की मालती-माधवमें दुर्गा सह्यवासिनि के रूप में आती हैं। दक्षिण से आए इन सारे कवियों का सह्याद्रि से गहरा नाता रहा है। मैं सोचता हूँ, क्या इनके युगों में कारवी नहीं खिला होगा? इनके साहित्य में कारवी क्यों नहीं मिलता? या मिलता है, तो उन नामों से, जिन्हें अब हम सामूहिक रूप से भूल चुके हैं? आख़िर कितने सारे नाम तो बदल गए हैं। फूल भी बदल गए हैं। अशोक के फूलों पर कालिदास ने कितने सुंदर छंद बनाए। युवतियाँ उससे केशसज्जा करती थीं। वसंत में यह फूल लोगों के कामभाव को उद्दीप्त कर देता था। मकरंद से भरे हुए, भँवरों के अतिप्रिय, ऐसे गहरे लाल फूल, जिनके आगे लालमणि भी फीकी लगे। इसीलिए महाकवि इसे रक्ताशोक कहते थे। वह अशोक अब कितना कम दिखता है। हमारे शहरों के बग़ीचों में, सड़क किनारे जो लंबे-छरहरे, नोकदार पत्तियों वाले पेड़ अशोक के नाम से पहचाने जाते हैं, वे अशोक नहीं हैं जिनके फूलों के बारे में हम पढ़ते आए हैं। यह उस अशोक वाटिका का वृक्ष नहीं, जिसमें सीता रही थीं और हनुमान उनसे मिलने गए थे। यह प्रेम के मनोभावों का प्रतीक अशोक नहीं, जहाँ यक्ष रहा करते थे। यह वह अशोक नहीं, जिसके तने में छिपकर कामदेव रहा करते थे। यह वह अशोक नहीं, जिसे किसी ठंडे प्रदेश से कभी गंधर्व लाए होंगे। यह नया अशोक है। इसमें फूल नहीं दिखते। कभी आ गए, तो वे लाल नहीं होते। जबकि अशोक के फूल लाल का पर्याय थे।

जैसे लवली की सूखी पत्तियाँ, पीले रंग की पर्याय थीं। लवली संस्कृत का शब्द है। हम इस शब्द को नहीं जानते, लेकिन इसी वर्तनी व उच्चारण वाले अंग्रेज़ी शब्द को जानते हैं। विक्रमोर्वशीयमके पाँचवें अंक में कालिदास कहते हैं, “लवलीदलपाण्डुराननच्छायम!” यानी पुरुरवा को उर्वशी का चेहरा लवली की पत्तियों जैसा पीला दिखाई देने लगा था। कितना मुश्किल है इस लवली वृक्ष (या लता) को खोजना! हमारी भाषाओं के इतिहास में यह नाम कितना विस्मृत हो चुका है, लेकिन शुक्र है कि वृक्ष विस्मृत नहीं है। लवली एक क़िस्म का आँवला है, जिसे काट आँवला कहते हैं। अलग क्षेत्रों में इसके अलग नाम हैं, जैसे हरफारेवड़ी, किरनेली या हरफारी। आयुर्वेद में कुछ जगहों पर इसे कोमल-अम्लिका नाम से संबोधित किया गया है।

अशोक का नाम वही रहा, लेकिन इतने बरसों में पेड़ बदल गया। लवली का पेड़ वही रहा, लेकिन इतने बरसों में नाम बदल गया। जीवन के बारे में हमारा ज्ञान भाषाओं पर आधारित होता है। वे लगातार बदलती रहती हैं। उन बदलावों को दर्ज करना हम भूल जाएँ, तो हमारा ज्ञान नकारात्मक आशयों में प्रभावित होता है। इतिहास की कई बातें अब हमारे लिए गुत्थियाँ हैं, तो उनके पीछे एक कारण यह भी है कि हमने अपनी प्राचीन भाषाओं के शब्दों को या तो खो दिया है या आज के युग में उनके अर्थों को बदल दिया है।

मैं सोचता हूँ, क्या कारवी का नाम भी बदल गया होगा? संस्कृत साहित्य में वर्णित अनगिनत फूलों में से कोई एक फूल, कारवी का रहा होगा, लेकिन इस नाम से नहीं, किसी और नाम से? या फिर उस युग में इसे नीलकुरुंजी या वनलता की ही कोई उपजाति माना जाता होगा? कारवी मराठी का शब्द है। मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे मरुआदोना कहते हैं। ज़ाहिर है, मरुआदोना भी आंचलिक शब्द है। ठेठ संस्कृत या हिंदी में इसका क्या नाम है? कुछ है भी या नहीं, ख़बर नहीं। फूल आंचलिक है, तो नाम भी आंचलिक है। इसकी कहानी बस इतनी है, जितनी ऊपर बताई। और ख़ास बात सिर्फ़ इतनी है कि सात साल में एक बार खिलता है, लेकिन जब खिलता है, तो पूरे पहाड़ को नीलगिरि बना देता है। कारवी तो इतना अभागा है कि पूरे पहाड़ को नीला कर देने के बाद भी इसे पहाड़ के नामकरण का श्रेय नहीं मिल पाता। क़ायदे से, जहाँ उगता है, उस पहाड़ को नीलगिरि नाम देना चाहिए, लेकिन नीलगिरि नामक पहाड़ तो सह्याद्रि के और दक्षिण में जाने पर मिलता है। कारवी जैसा ही एक फूल वहाँ खिलता है, जिसका नाम है नीलकुरुंजी। यह बारह साल में एक बार खिलता है। जिन पहाड़ों पर खिलता है, वे नीलगिरि कहलाते हैं। हमारे इतिहास में कई नीलगिरि हैं। कामरूप में देवी कामाख्या जिन पहाड़ों पर बसती हैं, उन्हें भी नीले फूलों के कारण नीलगिरि कहा जाता था। लेकिन कारवी के निवासस्थान को यह नाम न मिल पाया।


संस्कृत के कवियों ने जितना फूलों के बारे में लिखा है, शायद ही दुनिया की किसी भाषा के कवियों ने लिखा हो, लेकिन कवियों ने सिर्फ़ उन्हीं फूलों को चुना, जिनके साथ सौंदर्य के बिंब व कथाएँ जुड़ी थीं। कवि का स्वभाव भँवरे जैसा ही होता है। सिर्फ़ उन्हीं फूलों पर बैठता है, जहाँ से काम लायक़ रस मिल सके।

कुंद सरस्वती का फूल है। या कुंदेंदुतुषारहारधवला... कुंद की माला सरस्वती को बड़ी प्रिय है, क्योंकि उसकी सफ़ेदी अद्वितीय है। माधवी, सुगंधित, मधु-गुणों से भरा लता-पुष्प है। दोनों चमेली की उपजातियाँ हैं। पहले कुंद खिलता है, उसके कुछ समय बाद माधवी खिलती है। माधवी खिलना शुरू होती है, कुंद कुम्हलाना शुरू हो जाता है। माधवी पूरी तरह खिल जाती है, कुंद पूरी तरह मुरझा जाता है। विक्रमोर्वशीयममें कालिदास ने पुरुरवा की पत्नी को कुंद कहा है और उसकी प्रेमिका यानी उर्वशी को माधवी। विवाहेतर प्रेम-संबंध जब पूरी तरह खिलने लगता है, विवाहिता स्त्री मुरझा जाती है।

सहकार आम का पेड़ है। वह अपनी जगह खड़ा, लहराता रहता है। कहीं से मल्लिका लता आती है और सहकार से लिपट जाती है। सहकार प्रेम में उपस्थिति की तरह है। वह हमेशा स्थिर रहेगा। मल्लिका प्रेम में अनुभूति की तरह है। वह हमेशा बदलती रहेगी। प्रेम को पाने के लिए सहकार अपनी जगह से नहीं हिलेगा, हर बार मल्लिका को ही उसके पास आकर लिपटना होगा।

भास और कालिदास के यहाँ फूल ही फूल हैं। भास के यहाँ हरे रंग का कमल है, कालिदास के यहाँ हरा कमल नहीं है। भास के यहाँ काले फूल भी हैं। रणक्षेत्र में रथ की ध्वजा को काले फूलों से सजाया जाता था, जो टूटकर गिरने के बाद रणभूमि की शोभा बढ़ाते थे। कालिदास के पास फूल, रण-पुष्पों की तरह नहीं। लेकिन फूलों के प्रति कालिदास का अनुराग भास से कहीं ज़्यादा है। रघुवंश में एक जगह कहा है कि राजा को जितनी चिंता प्रजा की करनी चाहिए, उतनी ही चिंता फूलों की भी करनी चाहिए। फूलों का वर्णन करने के लिए कालिदास सुदूर वक्षु देश (आज का आमू दरिया) तक चले जाते हैं। केसर पुष्पों का बखान करते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि कालिदास के वर्णन के बाद वे पुष्प नीचे कश्मीर तक आए। महाकवि तो यह संकेत तक करते हैं कि जिन पेड़ों को फूल नहीं आया, उनका बसंत से संयोग ही न हुआ।

कालिदास वक्षु देश तक चले जाते हैं, हिमालय के अंदरूनी हिस्सों के फूलों के बारे में बता देते हैं, विंध्य प्रदेश की पुष्पराशि को चित्रित कर देते हैं, दक्षिण में पहुँच जाते हैं, देश के कई हिस्सों पर उनकी नज़र है। कथाओं को मानें, तो मृत्यु का वरण करने के लिए वह श्रीलंका तक चले गए, लेकिन सह्याद्रि के कारवी पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। किसी ने आकर उन्हें यह न बताया कि एक बार दक्षिण में उन जगहों की यात्रा कर आओ, जहाँ पहाड़ियाँ, कभी-कभी समंदर होने का भ्रम देती हैं। नीले कारवी को कालिदास ने शायद न देखा होगा। देखा होता, तो उस नीलालोक प्रसार पर उनके यहाँ एक छंद ज़रूर होता। कालिदास कभी पुष्पद्रोही नहीं हो सकते, जो फूल को देखकर भी अनदेखा कर दें। सौंदर्य का पुजारी, सौंदर्य का घाती नहीं हो सकता, सौंदर्य की बलि भले हो जाए। भास तो ठेठ दक्षिण के थे। जिन बरसों में सह्याद्रि पर नीला कारवी फूलता था, क्या उन बरसों में वह कभी उस राह न गुज़रे होंगे? नीले फूल तो भास को विशेष रूप से पंसद जान पड़ते हैं।

कारवी के साथ तो कोई कथा भी नहीं जुड़ी। कैसा अभाग है कि इतना सुंदर फूल कथाविहीन है। मनुष्य की सभ्यता में प्रेम के गल्प की रचना फूलों ने ही की है। पर देखो, गल्पकार के पास अपने ही जीवन का कोई गल्प नहीं। इतिहास हो या वर्तमान, मुख्य धारा का दबाव हमेशा बना रहता है। कारवी मुख्य धारा का फूल भी नहीं। किनारे सह्याद्रि में पाया जाता है। वह जनजातियों का क्षेत्र है। कारवी के उन्नत वृक्षों के तनों या टहनियों का प्रयोग वे कच्चे मकान बनाने में करते हैं। उनका सांस्कृतिक गल्प अभी तक मुख्य धारा में पूरी तरह शामिल नहीं हो पाया है। जिसके साथ कोई कहानी न जुड़ी हो, उसे भला इतिहास क्यों याद रखेगा? और कवि तो इतिहासकारों से ज़्यादा चूज़ी होते हैं। वे भला ऐसे फूल को महत्व क्यों देने लगे, जिससे प्रेम के बिंब न बनते हों? जिन्हें नवयौवनाओं ने अपने केशों में न सजाया हो? जिनकी कलियों को कान में बालियों की तरह न धारा हो?

फूलों के देवता का पक्षपात तो सर्वविदित है। कामदेव फूलों के भी देव हैं। बसंत उनका सहयोगी है। उनके पाँच बाण थे, पाँच फूलों से बने हुए। पहला श्वेत कमल, जो उन्माद का बाण है। दूसरा, अशोक, जो तापन का बाण है। तीसरा आम के फूलों से बना, जो शोषण का बाण है। चौथा नवमल्लिका, जो स्तंभन का बाण है। पाँचवाँ नीलकमल, जो सम्मोहन का बाण है। कहते हैं, कामदेव अपना हमला इन्हीं पाँच चरणों में करते हैं। उन्होंने अपने बाणों के लिए फूलों का चयन किस आधार पर किया था, यह कोई कैसे जान सकता है। कामदेव, श्वेत कमल को उन्माद उपजाने के लिए प्रयुक्त करते हैं, जबकि संस्कृत काव्य में कई जगह वर्णन है कि कोई मनोरोग या उन्माद से पीड़ित हो, तो उसके माथे पर श्वेत कमल व उसका डंठल बाँधना चाहिए, मानसिक शांति मिलेगी। प्रेम का देवता ऐसा चतुर है कि जिस फूल को दूसरों ने दवा का दर्जा दिया, उसी को रोग की तरह  अपने शिकार पर छोड़ दिया.

और भी तो फूल हो सकते थे। फूलों के देव को फूलों की क्या कमी? लेकिन किसी के चयन पर सवाल कैसे किया जा सकता है? कितना निरर्थक है यह! देव का धनुष है, देव की मर्ज़ी, चाहे जिस फूल को चुन ले। फिर भी, मन में तो सवाल उठता ही है! ख़ासकर तब, जब बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में हम देखते हैं कि प्रेम का सारा क्रियाकलाप गुलाब के इर्द-गिर्द होता है। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि कोई सरे राह, एक घुटना टेक, आम की मंजरियाँ बढ़ाकर प्रेमिका से प्रणय-निवेदन कर रहा हो? कमल का फूल देकर कितने लोगों ने प्रपोज़ किया होगा? चाहे, तो कोई कोशिश कर सकता है। प्रेम के प्रतीक अक्सर समकालीन कला व उसके अभिजात बाज़ार द्वारा गढ़े जाते हैं। जब बाज़ार इस रूप में नहीं था, तब भी अभिजात अपने प्रबल रूप में उपस्थित था।

संस्कृत साहित्य में गुलाब को वह महत्व प्राप्त नहीं है, जो आज है। गुलाब की अलग-अलग क़िस्में थीं और अधिकांश के नाम अलग थे। कहीं उसे शतपुष्पि कहा गया, तो कहीं वृत्तपुष्प। आज की संस्कृत में गुलाब के लिए सर्वाधिक प्रचलित शब्द है स्थलपद्मम यानी ज़मीन पर उगने वाला कमल। लेकिन इनमें से किसी भी नाम को छू लें, संस्कृत काव्य में वह प्रेम के मुख्य प्रतीक के रूप में नहीं मिल पाता। जबकि इस भूमि पर गुलाब बहुतायत में पाया जाता था। चरक और सुश्रुत ने बाक़ायदा इन फूलों (शतपत्री, गंधाद्य, सुशीत, सुमन, सुवृत्त) का उल्लेख किया है, लेकिन बुख़ार उतारने के लिए, प्यार का बुख़ार चढ़ाने के लिए नहीं। बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन गुलाबजल बनाने की विधि जानते थे। वात्स्यायन, कामसूत्र में गुलाब की क़िस्मों का उल्लेख करते हैं, लेकिन शयनकक्ष सजाने के लिए कई अन्य फूलों के सहयोगी के रूप में, लगभग गौण उल्लेख। कालिदास व सौंदर्य के अन्य कवियों के पास गुलाब का वैभव नहीं। उनके ज़माने में जिन फूलों में प्रेम-प्रतीकों का वास था, उनकी जगह आज छिन चुकी है। आज प्रेम का अधिकांश ऐश्वर्य गुलाब के पास है। गुलाब का यह सत्कार यूरोप और मध्य-पूर्व ने किया। कहते हैं, सिकंदर जब भारत आया, तो जिन चीज़ों को देख वह हैरान हुआ था, उनमें गुलाब भी था। उसी ने इसके पौधे यूरोप में अरस्तू के पास भिजवाए।

जब गुलाब जैसे दबंग फूल की यह हालत थी, तो बेचारे कारवी के बारे में कवियों से क्या सवाल पूछा जाए? कैसे पूछा जाए कामदेव से कि तुम्हारे बाणों में गुलाब क्यों नहीं था? कारवी भी क्यों नहीं था? मैं तो कारवी का पक्ष लेने पर तुला हुआ हूँ। कामदेव ने पक्षपात किया था, तो भला मैं क्यों न इसका सुख लूँ? वामन पुराण कहता है कि जब शिव ने उन्हें भस्म किया, तो उनका धनुष ज़मीन पर गिरकर टूट गया और पाँच भागों में बँट गया। धनुष की मूठ जहाँ गिरी, वहाँ से चम्पा का फूल उगा। उसके दोनों मोड़ जहाँ गिरे, एक से केसर के फूल उग आए, दूसरे से पाटल के फूल। (यह पाटल गुलाब नहीं है। उत्तर भारत की बोलियों में इस फूल को अब अधकपारी या पाचल कहा जाने लगा है।)  धनुष का मध्य भाग जहाँ गिरा, वहाँ पाँच पंखुड़ियों वाली चमेली उग आई। और धनुष की कटि जहाँ गिरी थी, वहाँ से मल्लिका या बेला के फूल उगे।

ये भी बेहद चुने हुए फूल हैं। ऐसे फूल, जो प्राचीन साहित्य में बार-बार दिखाई देते हैं। यक़ीनन, उस समय प्राकृतिक नेमतें आज से कहीं ज़्यादा रही होंगी, विभिन्न क़िस्म के फूलों के साथ मनुष्य का संबंध भी आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रहा होगा, फिर भी अधिकांश कवियों के पास एक ही जैसे फूलों का उल्लेख है। एक कवि ने जिस फूल की तारीफ़ कर दी, परवर्ती कवियों ने भी उस फूल को सराहा। ऐसे में मुझे लगता है कि अगर किसी एक कवि ने कारवी के फूल को विरहिणी की प्रतीक्षा के पूरे होने के प्रतीक की तरह चित्रित किया होता, तो शायद कारवी का फूल भी नामधनी हो जाता।

कामदेव के धनुष-विखंडन पर कुछ विद्वान कहते हैं, जहाँ वासना का नाश होता है, वहाँ फूल खिलते हैं। लेकिन कामदेव को महज़ वासना का देव नहीं माना जा सकता, वह जीवमात्र की एक बुनियादी अनुभूति का अधिष्ठाता है। आम मान्यता है कि शिव ने कामदेव को हरा दिया, पर ग़ौर से देखें, तो शिव भी हारे हुए लगते हैं। क्रोधाग्नि की वह घटना दोनों पक्षों की जय या पराजय, दोनों रूपों में देखी जा सकती है। अनंग होने के बाद भी कामदेव का नाश न हुआ। विदेह होकर भी उसने शिव पर वैसा ही प्रभाव डाला। आख़िर कुछ समय बाद वह पार्वती की ओर आकर्षित तो हुए ही। कामदेव की सत्ता अडिग रही। हालाँकि उन्होंने शिव से बदला लिया था, जब अगले जन्म में वह श्रीकृष्ण के पुत्र बने। रुक्मिणी की कोख से प्रद्युम्न बनकर उनका जन्म हुआ। विष्णु व भागवत पुराणों में इसकी अलग-अलग कथाएँ हैं। अनिरुद्ध व उषा के विवाह के अवसर पर देवों व असुरों में संग्राम हो गया। संयोगवश, शिव की सेना असुरों के साथ थी, कार्तिकेय उसके सेनापति। इधर, देवसेना के सेनापति कामदेव यानी प्रद्युम्न थे। यह एकमात्र ऐसी लड़ाई है, जिसमें शिव पराजित हुए थे, क्योंकि प्रद्युम्न ने कार्तिकेय को हरा दिया था। लेकिन बदले की इस तथाकथित लड़ाई को जाने व माने बिना भी यह महसूस किया जा सकता है कि अनंग रूप में भी कामदेव ने शिव को प्रेम करने पर विवश कर दिया था। बाद में भले पार्वती के आग्रह पर कामदेव को उनका रूप लौटा दिया और वह मस्त होकर पूरी सृष्टि पर फूल से निशाना साधते रहे।

प्रेम के सारे निशाने फूलों से ही सधते हैं, क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वह साधारण-सा फूल हो या कोई महानसेलेब्रिटीफूल? कारवी को क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कोई उस पर कविता लिखे या न लिखे? वह ख़ुद पहाड़ी की विस्तृत छाती पर, पेट के बल लेटकर, उल्लास की नीली कविता लिखता है। जैसे हेनरी मातीस अपने कैनवास पर नीले का एक स्ट्रोक मारता है। कारवी प्रतीक्षा का नीला छंद है। छंद का अर्थ आवरण है। कारवी तो अपना संघर्ष करता है, सात साल तक कोशिश करता है, आठवें साल फूल उगा देता है। हार नहीं मानता। जैसे नीलकुरुंजी बारह साल तक हार नहीं मानती। समझ लीजिए, नरगिस 999 साल तक प्रतीक्षा करने के बाद एक दिन निराश हो जाए, तो हज़ारवें साल में आने वाले दीदावर का स्वागत कैसे कर पाएगी? फूल चाहे कोई भी हो, कारवी, गुलाब, चम्पा या अशोक, मनुष्य की जिजीविषा के प्रामाणिक रूप हैं- कुछ भी हो जाए, वे अपना खिलना नहीं रोकते। कैसा भी परिवेश हो, अपना स्वभाव नहीं बदलते। असंभव रेगिस्तानों में उगनेवाली नागफनी भी अंतत: अपना फूल खिला ही देती है।

फूलों को बहुत नाज़ुक माना जाता है। उनसे भी नाज़ुक कोई है? हाँ, गद हैं। गद श्रीकृष्ण के छोटे भाई थे, जिन्हें फूलों से भी नाज़ुक माना जाता था। श्रम का कोई भी काम उनसे कह दिया जाए, गद महाशय वहाँ से खिसक लेते थे। लेकिन इसमें नज़ाकत कम, आलस्य अधिक दिखता है। फूलों की नज़ाकत में आलस्य नहीं है, ताज़गी है। चीज़ों को ज़रा-सा उलटकर देखा जाए, तो फूलों से मज़बूत कुछ न मिलेगा। रौंदे जाने के तमाम इतिहास के बाद भी सिर उठाकर खड़ा एक फूल ताक़त की प्रेरणा है। मनुष्य भी सदियों से दमन झेलता आया है, फिर भी सिर उठाकर खड़ा है। देवता की आराधना करें या न करें, लेकिन उसके चरणों में पड़े फूल की आराधना ज़रूर करनी चाहिए। चाहे सुख हो या दुख, वे मनुष्य की यात्रा के सबसे प्रेरक व रंगदार साथी रहे हैं।



Thursday, March 08, 2018

मोनिका कुमार की पाँच नई कविताएँ





(मोनिका के ही एक शब्द के सहारे कहा जाए, तो वह अपनी कविता में 'विनम्रा' हैं। (निज) संसार देखने की उनकी विनम्र-दृष्टि में ऐसी कई बातों की समाई सम्भव हुई है, जो अन्यथा बहुत मुखर, नाराज़ और अनिवार्यतः आक्रामक स्त्री-कवि-दृष्टि में अँट नहीं पातीं। मोनिका की कविताएँ पिछले पाँचेक बरस में हिंदी के भूगोल में रहने-फैलने के अलावा 'माडर्न पोयट्री इन ट्रैन्स्लेशन' जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पत्रिका तक गई हैं। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पेश हैं उनकी पाँच नई कविताएँ)


आग पानी

विनम्र स्त्री है वह
परिचित और अजनबी
सभी के प्रति विनम्र
आवाज़ धीमी थी
विनम्रता ने उसकी आवाज़ को धीमा कर दिया था
दुपट्टा ओढ़ना भले भूल जाए
विनम्रता के आँचल से ढकी रहती है


अखंड विनम्रा है वह
विनम्रता ने सभी को उसके निकट कर दिया
विनम्रता से ही उसकी सभी से अनिवार्य दूरी भी बन गई 
दुनिया आश्वस्त हो गई थी
आग पानी से दूर
हानियों से परे
विनम्रता के वायुमंडल में
बस गई है वह 
उसे भी लगने लगा
दुनिया टिक गई है

कोलाहल थम गया है
उसे पता होता विनम्रता ऐसा दिलकश कवच है
वह बहुत सी परेशानियों से पहले ही बच जाती
पर कैसे पता चलता पहले
जब तक उसने विनम्रता की वटी नहीं बनाई थी
अपनी आग में वह जले जा रही थी
अपने पानी में डूब जा रही थी


विनम्रता के आवरण को जो तोड़ सके
वटी के असर को जो बेअसर कर दे
विनम्र साँसों की आग में जो जल सके
उजले पानी में जो डूब सके
विनम्र जीवन के हर क्षण
वह ऐसे प्रेमी की प्रतीक्षा करती है
*


सदमे से उबरने का पहला दिन

काम पर लौटने का निर्णय करके
साहस जुटा कर घर से निकलती हूँ
चौक पर पहुँच कर याद नहीं आता
किस तरफ मुड़ना है
सड़क का जाना पहचाना शोर
याददाश्त से कोई याद नहीं टटोलता
सदमे से उभरा वैराग्य
छोटी दुश्मनियों और नफ़रतों से आज़ाद कर देता है
यह वैराग्य ऐसे विषाद से परिचय कराता है
जो अपने नएपन की वजह से इतना अजनबी होता है
कि भरे हुए पेट में ख़ालीपन भर देता है
और मुंह से स्वाद छीन लेता है
ऐसे पहले दिन में
मुझे अपनी पहचान के पुराने दुःखों की याद आती है
दुश्मनियों और नफ़रतों की याद आती है
जो इस तरह रच बस गई थी जीवन में
दुःख की अनिवार्यता का धर्म भी निभ रहा था
और दिन फिर भी अच्छा गुज़र रहा था
बनस्बित इस दिन के
जो अपने नवजात अजनबीपन के कारण
मेरी रोज़ की सड़कों से मुझे बेगाना कर रहा है
*

गपोड़ी रिश्तेदार की मृत्यु

दूर के रिश्तेदार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई
यह ख़बर सुनकर हमारे परिवार में आतंक फैल गया
इस तरह सड़क दुघटना में अचानक मर जाने की
हमारे परिवार में यह पहली घटना थी
धीरे धीरे पता चला कि घटना स्थल पर ही उस युवक रिश्तेदार ने दम तोड़ दिया था
ख़ून का क़तरा नहीं बहा
अंदरूनी चोट बहुत गहरी रही होगी
यह बात सुनकर हम सभी का ख़ून सूख गया था

ख़बर की इस अगली खेप ने हमारे परिवार को और आक्रांत कर दिया
कुछ दिनों तक वे बेआवाज़ सांस लेकर जीवित रहे
शोकाकुल और भयभीत
वे मृत्यु की कटु नज़र से बचना चाहते थे
मृत्यु जो किसी भी बात का बुरा मानकर उसे मार सकती है
हमारे स्कूल की वार्षिक परीक्षा ने माँ को
और स्कूल की फीस ने डैडी को इस भय से उबार लिया था


बिना कतरा ख़ून बहे गहरी चोट से मर जाने के कारण
रिश्तेदार का वजूद जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु की निर्ममता का उदाहरण बन गया
उदाहरण ही नहीं
वह बच्चों को रोज़ दी जाने वाली चेतावनी बन गया
कि सड़क पर सावधानी और बहुत सावधानी से उतरना चाहिए
हालाँकि उदाहरण और चेतावनी बनने से पहला उसका जीवन था गौण जीवन
जब उसका रुतबा परिवार का सिरमौर गपोड़ी होने का था
जिसकी दिलचस्प गप्पें सुनकर परिवार के लोगों का पाव भर ख़ून बढ़ जाता था
*

शरद पूर्णिमा

क्लांत जबकि सभी जगहें होने लगी हैं
तुम्हारी कला का मेरे चंद्रमा अंत नहीं
मैं लौटी हूँ एकांत में
यानी  कि ऐसी रात में
चाँदनी जो बरस जाए
तो फूलों की तरह चुन सकती हूँ

वंचना होगी इस रात से पूर्व और रातोत्तर भी होंगी
प्रचुर रात में केवल प्रचुरताएँ सहज हैं
चाँदी के गहनों की मुझ शौक़ीन को क्या वंचना
शरद के चाँद की संगति में बालों की डोरी भी चाँदी की
चंद्रबाला का धैर्य चाँदी का
चंद्रकांता का साहस चाँदी का

चंद्रबिंदु है शरद पूर्णिमा का चाँद
पूर्णिमाओं की वर्णमाला में
आधे ‘न’ की खिड़की से देखो
इस पार गर्मियों के लंबे दिन
उस पार सर्दियों की लंबी रातें हैं
आदि कवि जन्म रहा शरद की पूर्णिमा में
चंद्रमोहन की प्रतीक्षा चाँदी की
चंद्रबलि की आकुलता चाँदी की

एकांत का वर पाया चंद्रमा से
घटना बढ़ना और खिलना
खिलना बढ़ना और घट जाना
लौटना फिर फिर अकुंठ
शरद की पूर्णिमा में
एकांत को पवित्र करना
पारिजात की सुगंधि से
*


नकोदर-होशियारपुर अप डाऊन


रोज़ एक ही सड़क और लगभग एक ही बस में चार वर्षों तक दो घंटे सुबह और दो घंटे शाम को बैठने से धैर्य बढ़ता है। रोज़ जाने अनजाने चेहरे पढ़ने से आपके भीतर ऐसी प्रज्ञा जन्म ले सकती है जैसे आप इस दुनिया के सारे चेहरे पढ़ चुके हैं। पचपन लोगों के साथ अकेले सफर करने के बाद आप पांच सौ पांच हज़ार और पांच लाख तक की संख्या तक के सहयात्रियों के साथ अकेले लेकिन निर्भय सफर कर सकते हैं। फिर यह संख्या और उसका छोटा या बड़ा होने का एहसास ख़तम हो जाएगा, आप निर्भय है - इस सजगता का आवरण भी स्वत गिर जाएगा। यह रोज़ाना सफर हर दुःख को एक स्थिति में बदल देगा, एक स्थिति जिसकी नियति एक दिन सुख में बदल जाना है। अत्याधिक आबादी वाले देश में सार्वजनिक स्थानों को रोने जैसे बेहद निजी कामों के लिए इस्तेमाल करने की प्रतिभा अर्जित करना अब कोई दूर की बात नहीं।  वर्जित जो भी अधीर के लिए वर्जित है।  संसार को रोज़ चलती बस के बाहर के पेड़ों की तरह आगे पीछे छोड़ने से यह एक दिन स्थिर हो जाएगा। आप संसार से दुःख पाना बंद कर देंगे। जबकि संसार में अब अधिक नहीं बचा देखने के लिए लेकिन सौभाग्यवश संसार की इच्छा का अंत जीवन के संघर्ष और सुख का अंत नहीं है। 
***

(सबद पर मोनिका की अन्य कविताएँ यहाँ)

Tuesday, March 06, 2018

संगीता गुन्देचा की 'जी' कविताएँ





(हिंदी जिन अनेक बोलियों से पुसती चली आ रही है, उसकी एक रंगत मालवी भी है। संगीता गुन्देचा की इन कविताओं में मालवी कंठ एक अलग सौंदर्य पैदा करता है। इसे कुछ हद तक कविता के अकथ अनुभव-स्रोत के अक्षत आविर्भाव की तरह भी पढ़ा जा सकता है। )


'जी' कविताएँ

1
बस एक बुखार की देर और है
जी कहती है
वह आँखें मटकाती एक हाथ से
दूसरे को मलती हुई आकाश की ओर देखती है:
बस एक बुखार को बदन और बच्यो!
 
2
वह बीमार हुई और शहर के
डाॅक्टर के पास जाने से मना कर दिया:
ऐ पूनमचन्द थारो जरा भी माजनो व्हे
तो म्हारे यांसे कंइ लइजावा मत दीजे
म्हारे तो यांज शान्तिनाथ को सायरो है।

3
जी के घर शान्तिनाथ हैं
वह रोज़ सुबह नहा कर उनकी पूजा करती है
केसर, चन्दन और गुलाब से
अपने पेड़ को फूलों से लदा देख
वह ताली बजाते हुए कहती है:
ये फूल कभी कम नहीं हो सकते
इ फूल कदी कम नी व्हइ सके
शान्तिनाथ के या सोरभ घणी हउ लगे!

4
गाँव में लोगों को पता चल गया है
परकोटे की राजपूत स्त्रियाँ
रंग-बिरंगी साड़ियों में
घूँघट लेकर जी से मिलने आ रही हैं
अपने बच्चे को लेकर
पड़ोसी कुम्हार और उसकी पत्नी आये हैं
उनके मटकों पर चित्रकारी कैसी हो
यह वे जी से पूछते आये हैं।

5
गली में रंभाती गायें
जी को पुकार रही हैं
उन्हें रोटी और उनके ग्वालों को
गाली देने वाली जी को उनके खुरों की आवाज़
पहले ही आ चुकी है
उसकी आँखों के कोर पर आ-आकर
आँसू आ लगे हैं।

6
जी अपने घाघरे, लुगड़े और काँचली में
यहाँ से वहाँ फिसलती रहती
गिलहरी की तरह।
             
7
अपने दोनों पैर गँवा चुके
जी के दोस्त अपने  बेटे के कन्धों पर चल कर
उसे गुजराती-मन्त्र सुनाने आये हैं
एक सत्संगी औरत अभी-अभी
उसे भजन सुना कर गयी है
आसपास बैठे लोगों के घेरे ने
उसे ज़ोर से दोहराया:

माला री थारे जपनो कठिन है
सुमिरन रे थारे करनो कठिन है।

8
कराहती हुई जी के सिरहाने
मालिन सुर्ख़ गुलाब रख गयी है
माँ उसके कानों पर अपने ओंठ ले जा कर पूछती है:
जी थारे कंइ वेदना है बता तो सइ ?
जी अपने पोपले मुँह से
बड़ी मुश्किल से फुसफुसाती है:
कंइ कोनि !
जब उससे उसकी अन्तिम इच्छा पूछी जाती है
वह अपने पोपले मुँह से
बड़ी मुश्किल से फुसफुसाती है:
कंइ कोनि !

9
जी के कमरे के बिल्कुल पास बने मन्दिर में
आज सुबह जब शान्तिनाथ की आरती गायी गयी
बेहोशी की देहरी पर खड़ी
वह उसे दोहराने लगी;
विश्वसेन अचलाजी के नन्दा
शान्तिनाथ मुख पूनमचन् .....

10
आणन्द देइ सा कह कर
सीढ़ियों पर प्रतीक्षा कर रहे
गाँव के ब्राह्मण की ओर
सुबह-सुबह अँजुरि भर जुवार ले जी
दौड़ते हुए आँगन पार करती है
भोजन से पहले
गाय और कुत्ते को रोटी देने
वह गली तक जाती है
अपने भोजन से एक कवा बचा कर
उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट कर
वह चींटियों के बिल पर रख आती है
पक्षियों को चावल डालने
दोपहर में मुँडेर तक जाती है
संजा-समय घर लौट रही अपनी प्रिय गायों को
वह रोटियाँ खिलाती है
दिन भर में जी की ये पाँच बलियाँ थीं
कम से कम तेरह दिन तक इन्हें
कोई और देता रहेगा।

11
दूर तक फैला शाम का उजास
सीमान्त पर अकेले खड़े जवा कुसुम पर मँडराती
भँवरों की टोली
कीचड़ भरी डगर से लौटता
पीठ पर भुट्टे लादे प्रसन्नमुख किसान

हर शाम लगभग वैसे ही बीतती है
तुम्हारे बीत जाने के बाद भी ‘जी !‘

लेकिन तुम्हारे गुलाब पर
अब फूल आने
अचानक कम क्यूँ हो गये !
***

(सबद पर संगीता का इससे पहले प्रकाशन यहां)

Sunday, March 04, 2018

वन नाइट स्टैंड के बाबत चंद जनाना फ़लसफ़े : बाबुषा कोहली की नई कविताएँ





बीयर

गए जुमेरात 
उसने ऊब को तह कर दराज में रखा और
शेल्फ़ से गिलास निकालते हुए कहा;

"बीयर पीने का मतलब शराबी होना नहीं होता. 
चलो ! एक पेग न सही, दो सिप ही ले लो ? "

"सच्चे शराबी बीयर नहीं पीते, लड़के !"

तटस्थता से मैंने कहा.
*

एच आई वी

"त्वचा पर चुभने वाली कोई भी नुकीली चीज़ 
हर बार नयी इस्तेमाल करने से
कम रहती है आशंका कुछेक लाइलाज रोगों की"

नयी सिरींज निकालते हुए बोली डॉ दोस्त 
हिदायती अंदाज़ में.

"त्वचा पर चुभने वाली कोई नुकीली चीज़
हर बार नयी होने पर
बढ़ सकती है आशंका कुछेक लाइलाज रोगों की."

विरक्त भाव से मैंने कहा.
* 

टाइटैनिक

औरतों के दिल में एक गुपचुप चूहेदानी होती है.

किसी अजनबी या मर्द दोस्त के कमरे में जाने के पहले
एक बार उस चूहेदानी में झाँक लेना ठीक होता है.

जो दुबके रहें चूहे 
तो ठीक
मची हो खलबली चूहेदानी में तो 
नहीं खटखटाना चाहिए कमरे का दरवाज़ा

जानती हो,
टाइटैनिक जब निकला था अपने पहले ( और आख़िरी)  सफ़र में;
उसके कप्तान को लगता था
कई बार वो लेकर गुज़रेगा ये जहाज़
समन्दर की बर्फ़ काटते हुए
इन इलाक़ों से

चूहे जबकि
दे रहे थे सब इशारे.
*

गुलज़ाफ़री

रात की काली चादर पर
मुरझा जातीं
गुलज़ाफ़री की मुलायम पंखुड़ियाँ

इतनी ही उम्र है इस दोशीज़: फूल की  

महकती सलवटों को
झटक देती 
भोर की पहली किरन
*
____________________________________(बाबुषा हिंदी की चर्चित युवा कवयित्री हैं।)