गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त


Portrait by Rafique Shah

कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?

इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?

हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्टी पर उगते हैं।

हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठहाके, उनकी बेचैनी- हमारे दिल में इन सबकी ममी रहती है।

अपना ध्यान भटकाने के लिए, आधी रात, मैं अपने कमरे से निकल छत पर चला जाता हूँ। मैंने सिर्फ़ एक टी-शर्ट पहनी है। ठंडी हवा मेरी पसलियों को नोंच रही है। अपनी उँगलियों में एक काल्पनिक सिगरेट थामता हूँ। दूर चमकने वाले सितारे को इस तरह देखता हूँ, मानो वह मेरी सिगरेट का सुलगता हुआ सिरा हो। एक ज़ोर का क़श लूँगा और यह सितारा मेरे मुँह के और क़रीब आ जाएगा। कहते हैं, मृत्यु के समय एक सितारा बहुत क़रीब दिखने लगता है। मौत सितारे का रूप धरकर आती है।

कई किताबें पूरी होने से पहले ही ख़त्म हो जाती हैं।

किर्केगार्द कहता था, हमारा पूरा जीवन दरअसल मृत्यु का पूर्वाभास है। मृत्यु को लेकर हम जितने अधिक बेचैन होते हैं, हमारी चेतना का उतना अधिक विकास होता है। मुझे अपने तीन दोस्तों की याद आती है, जो अपनी मृत्यु से पहले मुझसे कुछ कहना चाहते थे। वे क्या कहना चाहते थे, यह मैं अब कभी नहीं जान पाऊँगा। शायद वे अपने पूर्वाभास के बारे में मुझसे कुछ कहना चाहते थे। आज एक दोस्त के बारे में लिखूँगा। बाक़ी दो दोस्तों के बारे में किसी और रोज़।

भुजंग मेश्राम मराठी आदिवासी कविता का बड़ा कवि था। मैं अठारह का था, वह मुझसे दोगुने से भी ज़्यादा। उसके साथ हुई पहली मुलाक़ात में रहस्य का धुंध था। मैं और मेरा कवि-दोस्त संजय भिसे, 1995 की एक रात नौ बजे उसके घर गए। हमें अपने किसी साहित्यिक कार्यक्रम में उसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाना था। हमने पता किया था कि वह रात में इसी समय मिलता है, क्योंकि इसी के थोड़ा पहले वह दफ़्तर से लौटता था। हमें घर के ड्राइंग-रूम में बिठाया गया। वहाँ मद्धम रोशनी थी। शायद एक नाइटबल्ब जितनी। वह हल्की रोशनी अपने आप में रहस्यलोक बना रही थी। अच्छे-बड़े सोफ़े, भरा-पूरा शोकेस, दीवार पर टँगी अद्भुत चित्रकृतियाँ, एक तरफ़ को रखी कई सारी किताबें- ये सब उस रहस्य-भरी रोशनी में भी साफ़ दिख रहे थे। अंदर संगीत बज रहा था। जगजीत और चित्रा सिंह, ग़ालिब गा रहे थे।

कुछ देर इंतज़ार करने के बाद अंदर से भुजंग मेश्राम आया। पहाड़ जैसा बदन, बड़ा-सा चेहरा, घनी मूँछें, गहरा रंग, ढीली टी-शर्ट और बड़ा-सा चड्‌ढा पहने। बातचीत की शुरुआत मराठी में हुई, जो जल्द ही हिंदी में बदल गई। वह उर्दू के बड़े-बड़े शब्द मिलाकर बंबइया हिंदी में अपनी बात कहता था। ज़ाहिर है, ग़ालिब उसका प्रिय कवि था। हमारे प्रस्ताव पर हाँ कहने के तुरंत बाद वह ग़ालिब की ओर मुड़ गया। उठकर अंदर जाता, टेपरिकॉर्डर की आवाज़ थोड़ी बढ़ाकर आता, और ग़ालिब-ग़ालिब करने लगता। जैसे आबिदा परवीन सिर हिलाते हुए अल्ला-हू, अल्ला-हू करती है।

उसके बाद हम नियमित मिलने लगे। हमारे बीच किताबों के अलावा कोई मुद्दा न होता। उसे विश्व-साहित्य में बहुत दिलचस्पी थी। इस कारण हम एक-दूसरे की तरफ़ तेज़ी से आकर्षित हुए। उन दिनों मैं किर्केगार्द पढ़ रहा था। एक दिन बातों-बातों में मैंने उसे बताया, किर्केगार्द ने अपने लेखन को ‘अबूझ के समक्ष प्रार्थना’ कहा है। उसे यह वाक्य बहुत पसंद आया और अगले दिनों में उसे जब भी यह कहना होता कि उसने बीती रात एक कविता लिखी है, वह कहता, कल रात मैंने हाबुज के सामने एक और प्रार्थना की है। उसकी विशिष्ट ख़राशदार आवाज़ और अद्वितीय उच्चारण-शैली में अबूझ, हाबुज हो जाता था।

भुजंग दलित-आदिवासी था और अपनी अस्मिता के प्रति बेहद सचेत। मराठी में दलित साहित्य ने अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया था। तथाकथित मुख्यधारा के मराठी साहित्य को उसने प्रश्नांकित कर दिया था। तब तक, मराठी दलित साहित्य का सबसे ताक़तवर संकलन ‘पॉइज़न्ड ब्रेड’ छपकर पूरी दुनिया में चर्चा पा चुका था। उस संकलन में भुजंग की कविता ‘हवा’ शामिल थी। मराठी आती थी, लेकिन भुजंग की वह कविता समझने के लिए अंग्रेज़ी अनुवाद पढ़ना पड़ा। उसकी भाषा बहुत टेढ़ी थी। वह साधारण शहराती मराठी नहीं थी, जिसके हम आदी थे, बल्कि वह आदिवासी अंचलों की मराठी थी, जिसमें गोंडी जैसी बोलियों के शब्द भरे हुए थे। भुजंग अपनी तरह से उनका रचनात्मक इस्तेमाल करता था। उसके कविता संग्रहों ‘ऊलगुलान’ व ‘अभुजमाड’ में ऐसी कई कविताएँ हैं। उस पर नामदेव ढसाळ की कविताओं का गहरा असर था, लेकिन वह ढसाळ से भी ज़्यादा जटिल था।

वह बहसासुर था। हर बाल की खाल उतारने को आतुर। गालियाँ उसके होंठों पर रहती थीं। और वे भी बड़ी रचनात्मक क़िस्म की। एक बार सुन लो, तो कई दिनों तक उन गालियों की रचनात्मकता पर हँसी आती रहे। उसके ठहाके गगनभेदी थे। उसके मुक्के बहुत ताक़तवर। उसे कविता सुनाना बहुत ख़तरनाक काम था। जो पंक्तियाँ, शब्द या बिंब उसे अच्छे लगते, उन पर वह वाह-वाह नहीं करता था, सुनानेवाले को खींचकर एक मुक्का मारता था। चाहे जहाँ पड़ जाए। टाँग पर। जाँघ पर। पीठ पर। मैंने और संजय ने उसके कई मुक्के खाए हैं। जिस जगह उसका मुक्का पड़ता, उतना हिस्सा छनछना जाता।

हिंदी की जो कविताएँ हमें प्रिय थीं, हम उसे पकड़-पकड़कर, बिठा-बिठाकर सुनाते थे। भले उसने वे कविताएँ पहले पढ़ रखी हों। कई बार वह ख़ुद हिंदी की कोई पसंदीदा कविता लाकर कहता था, चलो, अब तुम लोग यह पढ़कर सुनाओ। हमारे बीच विष्णु खरे की कविताएँ किसी सेलेब्रेशन की तरह पढ़ी जाती थीं। एक बार लोकल ट्रेन के इंतज़ार में हम रेलवे स्टेशन पर बैठे थे। संजय भिसे खड़ा होकर, विष्णु खरे की सिर पर मैला ढोने वाली कविता का सस्वर पाठ कर रहा था। पत्थर की बेंच पर मैं और भुजंग बैठे थे। संजय और मुझमें पहले ही तय हो गया था कि उसे मुक्का नहीं मारने देंगे। पाठ संजय की ज़िम्मेदारी थी और मेरी ज़िम्मेदारी थी कि भुजंग जैसे ही संजय को मुक्का मारने के लिए हाथ उठाएगा, मैं उसका हाथ पकड़ लूँगा। मैं दो बार कामयाब हुआ। संजय दोनों बार बच गया। कविता लंबी थी। उसमें कई ‘मुक्का-मोमेंट्स’ थे। भुजंग के मुक्के मिस हो रहे थे। वह बेचैन हो रहा था। अगली किसी पंक्ति पर उसने वाह बोलने के लिए मुक्का उठाया, मैंने फिर से पकड़ लिया, उसने दूसरे हाथ से मेरे हाथ पर ज़ोर का मुक्का मार दिया। फिर तो, उसने संजय को निशाना बनाना बंद कर दिया और हर वाह के लिए बग़ल बैठे मुझे मुक्का मारने लगा। पूरी होने से पहले ही हमने कविता फेंक दी और दूर जाकर खड़े हो गए- मैं अपना हाथ, बाँहें, जाँघें सहलाते हुए। चिंचियाते हुए कि भुजंग, तुम मारा मत करो यार! वह हमसे बीस साल बड़ा था, लेकिन अब तक हमारा रिश्ता ‘आप’ से उतरकर ‘तुम’ और कई बार ‘तू’ तक आ चुका था। हम इसी बात से प्रसन्न रहते थे कि भुजंग जैसा बड़ा कवि हमारा इतना क़रीबी दोस्त है। यह एक उपलब्धि की तरह था।

पर भुजंग कभी नहीं सुधरा। वाह की ध्वनि उसके मुक्के से निकलना जारी रही। मुझे लगता है, वह दिगनाग (या दिङनाग) का आधुनिक अवतार था। दिगनाग, महान बौद्ध दार्शनिक वसुबंधु के शिष्य थे। ख़ुद भी महान। उन्हें बौद्ध तर्कशास्त्र का जन्मदाता कहा जाता है। चौथी सदी में उनका जीवन था। वह बहुत शास्त्रार्थ करते थे। उनके बारे में यह प्रसिद्ध है कि शास्त्रार्थ के दौरान वह मौखिक तर्क छोड़कर अपने प्रतिद्वंद्वी पर मुक्के बरसाने लगते थे। प्रतिद्वंद्वी उन मुक्कों से घबराकर शास्त्रार्थ छोड़ भाग जाता था। इस तरह दिगनाग विजयी हो जाते थे। ऐसा ही मिलता-जुलता, लेकिन सांकेतिक वर्णन बाणभट्‌ट ने ‘हर्षचरित’ में किया है। दिगनाग के एक ग्रंथ का नाम ही है- ‘हस्तबलप्रकरण’ या ‘मुष्टिप्रकरण’। कालिदास ने ‘मेघदूत’ में विशाल पहाड़ को दिगनाग कहा है ज्यों वह हाथ उठाकर बादल को मुक्के मारा करता है और हे मेघ, तुम उससे बचकर रहना।

हमारा यह आधुनिक दिगनाग बहस जीतने के लिए नहीं, बल्कि सराहना के अपने भाव प्रदर्शित करने के लिए मुक्के मारा करता था। ऐसी हिंसक सराहना जीवन में दुबारा नहीं देखी। बावजूद, हमने उसे कविताएँ सुनानी बंद नहीं कीं। पर इतने सावधान अवश्य रहते थे कि कविता सुनाते समय उसके मुक्के की रेंज से बाहर रहें। फिर भी, दो-चार तो पड़ ही जाते थे।

भुजंग दिन-भर सरकारी दफ़्तर में नौकरी करता था। और रात-भर फोन पर लगा रहता था। पता नहीं, सोता कब था। उसका फोन रात को कभी भी आ जाता। अक्सर तीन बजे। एक बजे फोन आया, तो कम से कम तीन बजे तक चालू रहेगा। वह शराब की एक-एक चुस्की लेता और बातें करता। मारकेस से लेकर निर्मल वर्मा तक। दोस्तोएव्स्की से लेकर काफ़्का तक। नामदेव ढसाळ से लेकर वाहरू सोनवणे तक। चिनुआ अचेबे से लेकर डेरेक वाल्कॉट तक। अश्वेत साहित्य में उसकी ख़ास दिलचस्पी थी। इस समय, जब मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, सामने, मेरी बुकशेल्फ़ में डडले रैंडल द्वारा संपादित ‘द ब्लैक पोएट्स’ साफ़ दिख रही है। यह किताब मैंने भुजंग से उधार ली थी और फिर, कभी नहीं लौटाई। उसे कोई चिंता नहीं थी, क्योंकि मेरी कई किताबें उसके पास पड़ी थीं, जिन्हें उसने कभी वापस नहीं किया। न्गुगी वा थियोंगो से मेरा परिचय भुजंग ने ही कराया था और ‘डीकोलोनाइज़िंग द माइंड’ किसी होमवर्क की तरह पढ़वाई थी। हर रात दो बजे फोन करके वह रिपोर्ट लेता कि मैंने कितनी पढ़ी। औपनिवेशिक प्रभाव एक लेखक के तौर पर हमें किस क़दर प्रभावित करते हैं, इस किताब के आधार पर उसने मुझे घंटों लेक्चर सुनाया, जिनमें से कुछ बातें मेरे ज़हन में अब भी जमा हैं।

रात दो बजे फोन करके वह कहता, अभी चंद्रकांत पाटील सर या दिलीप चित्रे सर से बहुत लंबी बात हुई। उनको मैंने नींद से जगा दिया। कभी कहता, आज ज्ञानरंजन सर को जगाकर बात की। इस तरह वह कई बड़े नामों का ज़िक्र करता, जिन्हें वह जगा-जगाकर बातें करता था। सभी वरिष्ठों के नाम के साथ सर लगाता। उसकी ऐसी बातों से मैं घबरा जाता और पूछता, “तुम्हें डर नहीं लगता? संकोच भी नहीं होता, किसी को इतनी रात फोन करते हुए?” वह ज़ोर-से हँसता, “यह दुनिया इसीलिए सुखी है कि एक कवि रात-रात भर जागकर उसकी चिंता किया करता है।” कभी कहता, “कवि को रात-भर कबीर की तरह रोना चाहिए।”

रात में दो-तीन घंटे फोन पर बतियाने के बाद अचानक सुबह नौ बजे वह घर भी आ जाता था। दफ़्तर जाने से पहले। मुझे झकझोरकर नींद से उठाता। और उसी अवतार में मुझे बाहर ले जाता। हम चौराहे पर चाय की दुकान पर खड़े होकर फिर रात वाली बहस को आगे बढ़ाते। मैं चिंता में उससे कहता, कभी सो भी लिया करो। जवाब में बड़े गर्व से वह कहता, पूरे तीन घंटे सोया हूँ आज। मैं उसे किर्केगार्द के पिता का क़िस्सा सुनाता कि वह कैसी दारुण मृत्यु मरा था। किर्केगार्द के पिता मानते थे, “मैंने ईश्वर को शाप दिया था। पलटकर ईश्वर ने भी मुझे शाप दे दिया। इसी कारण मेरा जीवन इतना संघर्षपूर्ण है।”

वह चिंतित होने का स्वांग करते हुए कहता, “आईला... तब तो मेरी नक्कीच वाट लगेगी। मैंने तो ईश्वर को कई बार शाप दे रखा है।”

उसमें बहुत ग़ुस्सा था। पूरे इतिहास को लेकर ग़ुस्सा। अपने दलित-आदिवासी इतिहास पर ग़ुस्सा। इस देश की सवर्ण आदतों पर ग़ुस्सा। उसका मैनरिज़म अलग था। उसकी कविताएँ भी प्रचलित काव्यशास्त्र से अलग। ग़ुस्सैल कविताएँ। कविता कभी रुक-रुककर, साँस लेकर नहीं पढ़ता था। कहता, यह कविता पढ़ने की ब्राह्मणी सामंती शैली है। आदिवासी कवि, एक साँस में कविता पढ़ता है, जैसे आदिवासी ऋषि एक घूँट में समंदर पीता था, जैसे आदिवासी देवता एक फूँक से तूफ़ान लाता था, जैसे आदिवासी बिरसा मुंडा एक हुँकार से इंक़लाब लाया। उसके पास ग्राम-देवताओं की असंख्य कहानियाँ होतीं। उनमें ऐसी कई करामातों का ज़िक्र होता।

हमारे संग-साथ के कई क़िस्से हैं। मराठी के अप्रतिम कथाकार बाबूराव बागुल से भुजंग ने ही हमें मिलवाया था। वह हमें साथ लेकर नासिक गया था। फिर तो कई बार जाना हुआ। उसके साथ भी। उसके बिना भी। ऑटो में बिठाकर उसने नासिक घुमाया था। नागपुर के पास किसी गाँव में आदिवासी साहित्य सम्मेलन था। वहाँ हमें भी लेता गया। मराठी साहित्य का एक नया ही रंग वहाँ दिखा- प्रतिरोध का धारदार साहित्य। वहाँ गाँव के एक घर में हमें ठहराया गया, चटाई पर चादर डालकर सुलाया गया। हमने उन हिस्सों को बहुत क़रीब से देखा, जहाँ भुजंग के बिना पहुँच पाना मुश्किल था। उसकी एक कविता याद आती है, जिसमें एक पंक्ति है – क्या बिना धक्का मारे बंद दरवाज़ों को खोला जा सकता है? भुजंग मेश्राम हमारे लिए एक धक्के की तरह था। हमने उसकी मदद से ज्ञान व कविता के कई बंद दरवाज़े अपने लिए खोले।

2001 में मुंबई मुझसे छूट गई। रोज़गार और जीवन के संघर्षों की कहानियाँ पढ़ने से ज़्यादा मुझे ख़ुद अपने जीवन की उन कहानियों का हिस्सा बनना था। मुंबई छूटने के साथ उस शहर के कई दोस्त भी छूट गए। भुजंग के जीवन में भी ऐसे परिवर्तन आए कि वह अंतर्मुखी हो गया था। उसके बारे में सूचनाएँ भी कम ही मिलती थीं। 2007 में, जब मैं पंजाब रहता था, एक दोपहर अनजान नंबर से उसका फोन आया, “मी भुजंग बोलतोय!”

सात साल बाद उससे बात हो रही थी। हमने गर्मजोशी से एक-दूसरे का हाल पूछा। उसने कहा, “कुछ ज़रूरी बात करनी है। तू फ्री है क्या?”

मैंने कहा, “बिल्कुल फ्री नहीं हूँ। दो-चार मिनट बाद ही मुझे एक मीटिंग में बैठना है। मैं अपने दफ़्तर के कॉन्फ्रेंस रूम के दरवाज़े पर खड़ा हूँ। कुछ घंटों में फ्री होकर मैं तुम्हें फोन करूँगा। तब हम इत्मीनान से बातें करेंगे।” उसने फोन रखने से पहले तीन-चार बार मुझसे वादा लिया।

उस रोज़ दफ़्तर में घनघोर मीटिंग हुई। दस तरह के नये काम सिर पर आ गिरे। और उन तनावों में मैं पूरी तरह भूल गया कि मुझे भुजंग को फोन करना है। अगले कुछ रोज़ भी भूला रहा। एक दिन ख़बर मिली कि भुजंग मेश्राम का निधन हो गया है। कैसे, कब, यह सब नहीं पता चला। संजय ने बताया, कभी-कभी वह कहीं दिख जाता था। शेर जैसा दिखने वाला ऊंचा-तगड़ा भुजंग सूखकर काँटा हो गया था। जाने कौन-सा रोग था।

आख़िरी बरसों में वह कुछ दफ़्तरी-राजनीतिक विवादों में फँस गया था। शायद उन्हीं के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ा और अचानक उसकी मौत हो गई। उसके बारे में कई कहानियाँ प्रचलित हैं। उन पर विश्वास करना मुश्किल है, क्योंकि जिस भुजंग मेश्राम को मैं जानता था, वह पत्थर की पिंडी जैसे आकारहीन ग्रामदेवता की तरह था, जिसके पास शौर्य की अनेक गाथाएँ थीं, अवमान की नहीं।

भुजंग मेश्राम मेरे शरीर की सबसे दुखने वाली तीन रगों में से एक रग का नाम है। वह किताब है, जो पूरी होने से पहले ही ख़त्म हो गई। अभी उसमें कई चरित्र आने थे, कई संवाद लिखे जाने थे। विरह के बाद मिलन का अध्याय लिखा जाना अभी बाक़ी था। मुझे अचरज है कि मैं कामकाज में इतना व्यस्त हो गया था कि मेरे पास इतना समय न रहा कि मैं वादा निभाकर उसे एक फोन कर लूँ? वह कौन-सी बात मुझसे करना चाहता था? क्या थी वह ज़रूरी बात? क्या उसने उछलकर ईश्वर को एक मुक्का मार दिया था? क्या किर्केगार्द के पिता की तरह उसने भी, सच में, ईश्वर को कोई शाप दे दिया था? क्या ईश्वर ने भी पलटकर उसे शाप दिया था? क्या उस रोज़ वह ईश्वर के साथ हुए अपने शाप-युद्ध की सूचना देने वाला था? या महज़ इतना कहना चाहता था, कि मुझे तेरी याद आती है! मुझे नहीं पता। अब यह कभी पता नहीं चलेगा।

इन बरसों में मैंने उससे कई बार कहना चाहा है – मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है, भुजंग मेश्राम! देखो, मैंने अपनी पीठ और मज़बूत कर ली है। अपनी देह पर और गोश्त जमा कर लिया है मैंने। तुम्हारे मुक्के अब बेहतर तरह से सहन करूँगा। मेरे पास दुनिया की कई सुंदर कविताएँ हैं, मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ और अपनी पीठ पर तुम्हारे बेरहम मुक्के खाना चाहता हूँ। बख़ुदा, तुम्हारी इस वाह पर अब मेरी आह ना निकलेगी। मेरे भुलक्कड़पने को क्षमा करो और अपना फोन ऑन करो, भुजंग मेश्राम! वरना ईश्वर के टेलीफ़ोन एक्सचेंज में मेरी घंटी अनंतकाल तक बजती रहेगी। आधी-आधी रात। दो बजे। तीन बजे। फोन उठाकर भले इतना ही कह दो- रॉन्ग नंबर!



Comments

मराठी में भी मैने भुजंग मेश्राम के बारे में इतना गहरा नही पढा।
गीत चतुर्वेदी जी ने खूब लिखा है। आज मराठी राजभाषा दिन के अवसर पर यह लेख महत्वपूर्ण है।

उलगुलान आणि अभूजमाड हे भुजंग मेश्राम यांचे दोन कवितासंग्रह मी वाचले आहेत. मोठा कवी!

Anurag जी, सबद पढने मिला इसलिए आप का धन्यवाद!
Anita Manda said…
हृदय एक भरी पूरी बस्ती है, अधूरी कहानियों की।
Nandan Bisht said…
कमाल कमाल 👌👌
Seema Gupta said…
बहुत सच...... यही तो लेखनी है जो दिल दिमाग पर किसी बात को अंकित कर देती है....... शब्दों से परे है आपकी तारीफ करना गीत.....

गीत आपका कॉलम जब से पढ़ा है तब से आपके प्रिय मित्र के मुक्के आपकी पीठ पर जमते हुए देख रही हूँ..... कितना सजीव चित्रण है.... वो कद्दावर देह मेरी आंखों के सामने खड़ी हो गई है...... ऐसा लग रहा है कि मैं उनसे मिलकर आई हूं..... आपके भीतर की तड़प के मौन ने बहुत शोर किया है वो उन तक अवश्य पहुंचा होगा........ अद्भुत लेखन
कमाल का लेखन
Sanjay Bhise said…
गीत Geet Chaturvedi,तूने मेरी भी दुखती रग छेड़ दी है।पुराने दिनों में लौटना,ख़ुद की बेदाग़ शक्ल से मिलने जैसा होता है।मुझे याद है भुजंग से हम शायद पहली बार चांदीबाई कॉलेज के एक कार्यक्रम में मिले थे, जहां वह मुख्य अतिथि था।गीत,मैं 2001 के बाद के भुजंग को जानता हूं।वह कई बार पीबीएच में मिलता था और मजाल थी कि उसके गिरफ़्त से छूट पायें।वह बग़ल के शराबखाने में ले जाता और गा़लिब को याद करके मराठी का फ्रेज़ 'चांगभल' कहते हुए गिलास होंठों से लगाता।मेरे शराब न पीने को कोसता और अपनी कविताएं सुनाता या जो नया पढ़ा हो उस पर बहस करने लगता।वेटर को कहता एक क्वार्टर 'दलित, शोषित, पीड़ित,ब्लैक' ले के आओ।वेटर मुंह देखता खड़ा रहता तो फिर हंसकर कहता 'DSP-BLACK' ले आ भाई!
मैं कहता रह जाता भुजंग,देख,लंच टाईम में यहां पत्रिकाएं, किताबें देखने आया था, देर हो रही है।उसके बाद भुजंग आगबबूला होकर दो गालियां दफ़्तर को देता और दो मुझे।किसी तरह उससे छूटकर दफ़्तर पहुंचता।उसे महंगे पेन का शौक था,एक से एक पेन!उसके अक्षर कितने सुंदर थे!
मैंने इतने सुंदर अक्षर सिर्फ़ तीन लोगों के देखे हैं, भुजंग के,ग़ज़लगो आलोक श्रीवास्तव Aalok Shrivastav के और गीत तेरे।
खैर,
गीत, कभी भुजंग, कवि अरुण काले के साथ मिलता।उसके बाद तो आपके तय कार्यक्रमों और दुनिया की ऐसी की तैसी होना तय था।दोनों को एक साथ सुरूर में देखना अपने हौसले को आजमाना था।जिसे मैंने कई बार आजमाया।क्या तो समां होता था!मुंबई की फुटपाथ पर बिकती किताबों से लेकर रात की आख़िरी छूटी हुई लोकल ट्रेन तक सब शामिल था।इसी अनुभव पर मराठी के कहानीकार-नाटककार जयंत पवार Jayant Pawar ने एक बेहतरीन कहानी लिखी है।
भुजंग को अपने अंतिम दिनों में देखना यातनादायक था।वह धड़कता हुआ ,फड़कता हुआ भुजंग, धीर-धीरे चुप्पी में बदलता जा रहा था।
और भी कई बातें हैं ...।
पर गीत, फिलहाल इतना ही...
संजय जी, क्या कहूँ ...
अब इन दोनों की याद यानी ज़ख़्मों का फिर से बहना है..

गीत, भुजंग के आख़िरी दिनों तक उसके संपर्क में था मैं
Gautam Yogendra said…
मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है, भुजंग मेश्राम! देखो, मैंने अपनी पीठ और मज़बूत कर ली है। अपनी देह पर और गोश्त जमा कर लिया है मैंने। तुम्हारे मुक्के अब बेहतर तरह से सहन करूँगा। मेरे पास दुनिया की कई सुंदर कविताएँ हैं, मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ और अपनी पीठ पर तुम्हारे बेरहम मुक्के खाना चाहता हूँ। बख़ुदा, तुम्हारी इस वाह पर अब मेरी आह ना निकलेगी। मेरे भुलक्कड़पने को क्षमा करो और अपना फोन ऑन करो, भुजंग मेश्राम! वरना ईश्वर के टेलीफ़ोन एक्सचेंज में मेरी घंटी अनंतकाल तक बजती रहेगी। आधी-आधी रात। दो बजे। तीन बजे। फोन उठाकर भले इतना ही कह दो- रॉन्ग नंबर!

एक बार में पढ़ने की हिम्मत नहीं थी.. मैं गन्दी आदत से अंतिम छोर पकड़ पढ़ना शुरू करता हूँ.. शुरू से पढ़ता तो पढ़ जाता पूरा.. शायद हम सबके अपने भुजंग मेश्राम हैं..
पूरा संस्मरण पढ़ते हुए बार-बार आपकी हिंसक सराहना करने का मन कर रहा था.. आप इसी के लायक हैं.. :)
Rahul Tomar said…
आप क़िस्मत वाले हैं
कि आपके चाहने वालों को मेश्राम जी की यह आदत नहीं लगी 😂😂

वैसे सर लेख बहुत प्यारा है 💐💐 :)
Ganesh Kanate said…
गीत भाई,
कभी बाबूराव बागुलजी पर भी लिखिए जरूर...
आजके इस संस्मरण में आपने दिल निकाल कर रख दिया!
Maya Kaul said…
गीत लिखते हो कि बोलते हो बोलते हो कि बातें करते हो बाते करते हो कि चित्र बनाते हो,,,सब गडमड है,,, तीनो ही काम एक साथ होते है,,,
Manas Bharadwaj said…
Aisa kuch to mere saath bhi hota...main acchi line pe gaali deta huun....
Kapil Bhardwaj said…
गीत जी होली की शुभकामनाएं । भुजंग बड़ा भयंकर श्रोता लगा ।
Usha Bhatia said…
Geet bete..kitni sachai se sajiv chitran...pathak ke avchetan ki andheri khaiyo ko aalokit ☀️karne wala
जब से न्यूनतम मैं संग्रह की कुछ कविताएं पढ़ी हैं तब से ही गीत सर के लेखन से प्रभावित हूँ। इस आलेख को पढ़ने के बाद निःशब्द हूँ। सबद का आभार।
Ar Vind said…
इस बार की यह किश्त कई अर्थों में अविस्मरणीय है। शुरू में खोलते ही गद्य चमककर कह उठा था।भुजंग-प्रसंग बड़ा ही ह्रदयस्पर्शी है।

कितने सारे दोस्तों को हम भूल जाते हैं! स्मृति में वह वाष्प बनने लगते हैं।जैसे जीवन से जीवन जाने लगता है और आंखों से रोशनी, वैसे ही स्मृति भी भापशील होती है।स्मृति से स्मृति छीजने लगती है।

बढिया गीत जी!
Geet Chaturvedi सर, मैं आपके इस कॉलम में आपके टीनेज इयर्स को भी एक डायरी या आत्मकथा के रूप में पढ़ना चाहूंगा। जहाँ जॉर्ज माइकल, गन्स n रोजेज से लेकर प्रूस्त और मुराकामी भी होंगे। हालाँकि इन सबका जिक्र आपके लिखे में पढ़ता ही आया हूँ, पर मुझे यकीन है कि उस पूरे दौर को ऐसे युवा की नजर से देखना जो इन सब से बहुत प्यार करता है ( एक मध्यवर्गीय युवा के अत्यल्प संसाधनों के बावजूद), और जिसके पास गहन साहित्यिक दृष्टि भी है, बहुत सुंदर होगा। आपके अलावा उस समय के बहुत से शहरी मध्यवर्गीय युवाओं के निजी समय को हिंदी में बेहद खूबसूरती से कोई नहीं लिख सकता। निजी समय इसलिये कहा कि एक कम संख्या का युवा वर्ग जरूर था जो किताबों के लिये लाइब्रेरी भी जाता था और घन्टों एम टीवी देख रॉक स्टार भी बनना चाहता था। :)
नाम याद रह जाएगा, भुजंग मेश्राम
Vandana Kedia said…
I can relate to the pain here. A writer die in pain almost always and we be it a writer himself or a reader like me are so unaware of the pain he went through even after reading his/her pain.
pankajkabeer@gmail.com said…
मर्मस्पर्शी आलेख
आपकी बातें रहस्यों के उद्घाटन में परत दर परत उतरती हैं पर जीवन की अतलता में ले जाकर उसे और गहरा बना देतीं हैं।