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Showing posts from February, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त

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कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?
इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?
हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्‌टी पर उगते हैं।
हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठह…

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 9 : पढ़ना भी एक कला है

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अपने जीवन में पहला उपन्यास जो मैंने पूरा पढ़ा था, वह था- शिवप्रसाद सिंह का ‘गली आगे मुड़ती है।’ तब मैं सत्रह साल का था। पढ़ते ही मुझे शिवप्रसाद सिंह, रामानंद तिवारी (उपन्यास का नायक) और बनारस से प्यार हो गया। तब तक मुझे शिवप्रसाद सिंह की कीर्ति व अन्य बातों का कोई अंदाज़ा नहीं था, न ही कोई चिंता थी। मैंने तो बस एक किताब पढ़ी थी और उसके प्रेम में पड़ गया था। उस साधारण पाठक की तरह, जिसे किताब के शब्दों के अलावा लेखक के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। मुझे लगता था, रामानंद तिवारी ही शिवप्रसाद सिंह है। किताब में वह संघर्ष करता है, ट्यूशन पढ़ाता है, धर्मभीरु रिश्तेदारों से बहस करता है, बनारस के भूगोल में भटकता है, मणिकर्णिका व दशाश्वमेध पर चिरायंध गंध को महसूस करता है, गंगा को नए-नए रंगों में देखता है, एक लड़की से प्रेम करता है, उसके विरह में दूसरी को दिल दे बैठता है, फिर उलझ जाता है कि किसको छोड़े, किसको पाये। उलझन की गली कभी सीधी नहीं चलती, आगे जाकर मुड़ जाती है।
मैं शिवप्रसाद सिंह की किताबें खोजने लगा। तग़ादे कर-करके मुंबई के एक पुस्तक-विक्रेता की जान खा ली। उनकी संपूर्ण कहानियों के दोनो…

देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके

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मनोज कुमार झा की पाँच नई कविताएँ

टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं

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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके हैं
अब वहां हांफता पूर्णविराम है
और थकाने वाली उदासी

मनुष्यों के किस्सों का तो आरम्भ है
आओ सँपेरों, चरवाहों, मछुआरों
पहाड़ तोड़ने वालों
अब तुम्हें टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं।
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दुःख
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मैं दुःख कहता था
तो मां जली हुई रोटी समझती थी
मैं बार बार दुःख कहता था
दुःख का अनुवाद बार बार अधूरा रह जाता था

एक बार एक चुप्पा चरवाहे ने कहा
जिसे कुछ लोग पागल भी कहते हैं
कि चिड़ियों का दुःख पंख है
जिसके कारण पृथ्वी उन्हें आसमान में धकेल देती है
मुझे आश्चर्य हुआ
कि क्या मेरा दुःख मन है
जिस कारण राजा का चेहरा गिद्ध के चेहरे की तरह दिखता है।
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सारा जीवन
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बारिश होती थी तो कागज की नाव बनाता था
नाव थोड़ी दूर चलती और गल जाती थी
गलना तब सहज क्रिया थी
दूसरी नाव बनाने की पूर्व-कथा।

तब पता नहीं था कि बाद में
नदियों को पार करने का समय आएगा तो भी
कागज की नाव ही मिलेगी
एक नष्ट हो रहे जीवन की उत्तर-कथा।
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ट्रोलिंग
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गालियां यहां सही होने का फल है
उन गालियों को भूल जाओ
जो स…