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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 8 : बिल्लियाँ





मेरा बचपन बिल्लियों के बीच बीता। सत्रह साल तक उनकी कई पीढ़ियाँ हमारे घर में रहीं। हमने उन्हें नहीं चुना, उन्होंने हमें चुना था। वे अपनी मर्ज़ी से हमारे यहाँ आईं, हमारे सुख-दुख की उदासीन साक्षी रहीं, हमें बहुत सारी मुस्कानें दीं, कई बार हमें रुलाया, और एक दिन चली गईं।

तब मैं सात साल का था। एक रोज़ हमारे पड़ोस से बिल्ली की आवाज़ें आने लगीं। साधारण-सी म्याऊँ-म्याऊँ थोड़ी देर बाद बेचैन, मोटी म्याऊँ में बदलने लगी। हमारे आँगनों के बीच पाँच फीट ऊँची दीवार थी। बड़े लोग थोड़ा-सा उचककर एक-दूसरे के आँगनों में पूरी तरह झाँक लिया करते थे। हम बच्चों को आँगन के पार झाँकने के लिए स्टूल लगाना पड़ता था। बिल्ली की भाँति-भाँति की आवाज़ों से आकर्षित होकर हमने दीवार के पास स्टूल लगाया और झाँककर उस पार देखने लगे। पड़ोस के आँगन में, किनारे एक सुंदर-सी, बड़े मटमैले बालों वाली बिल्ली बैठी थी। उसके गले में कॉलर था, वह लोहे की पतली ज़ंजीर से बँधी हुई थी। पास ही एक कटोरी में पानी, दूसरी में दूध रखा हुआ था। दीवार के पार से झाँकते हमारे चेहरों को देख बिल्ली की बेचैन आवाज़ें बढ़ गईं। वह बिना रुके चिल्ला रही थी। हम दिन में कई बार झाँककर देखते, जबकि वह हमेशा चिल्लाती रहती। तीन दिन बीत गए। उसकी आवाज़ ज़्यादा कर्कश होती गई।

एक रोज़ मेरी दादी स्टूल पर खड़ी हुईं, बिल्ली को देखा और क्रोधित हो गईं। उतरकर सिंधी में बुदबुदाने लगीं, “इन लोगों ने बिल्ली तो पाल ली है, लेकिन रखा उसे कुत्ते जैसा है। भला कोई बिल्ली ज़ंजीर में बँधकर रह सकती है?”

बड़बड़ करती हुईं वह पड़ोस के मकान में गईं और उस घर की बहूरानी को डाँट लगाई। अपने हाथों से बिल्ली की ज़ंजीर खोली और उसे उनके मकान के अंदर रख आईं। बहूरानी ने कुछ ना-नुकुर ज़रूर की होगी, पर मेरी छरहरी दादी जब बोलती थीं, तो बाक़ी लोग सिर्फ़ सुनते थे। मेरी दादी के पास बिल्लियों का ख़ासा अनुभव था। जब वह पाकिस्तान रहती थीं, उनके पास एक बिल्ली हुआ करती थी। विभाजन के समय जिन बहुत सारी चीज़ों को वह अपने साथ नहीं ला पाई थीं, उनमें वह बिल्ली भी शामिल थी। और इसका उन्हें बहुत अफ़सोस था। वह बिल्लियों से प्यार तो करती थीं, लेकिन उन्हें अपशकुन भी मानती थीं। अक्सर एक क़िस्सा सुनातीं – “ठंड के दिन थे। पैग़ंबर साहब सोए हुए थे। उनके लबादे पर आकर एक बिल्ली सो गई। पैग़ंबर साहब अगर उसे उठाते, तो बिल्ली की नींद में ख़लल पड़ता, सो उन्होंने अपने लबादे का उतना हिस्सा काट दिया और बिल्ली को उठाकर किनारे रख दिया।” ऐसी कई कहानियाँ सुनाकर वह बतातीं, “अल्लाह बिल्लियों की बड़ी क़द्र करता है।” उनकी हर कहानी में कहीं न कहीं से बिल्ली आ जाती। वह यह कहना कभी न भूलतीं, “जिनके घर बिल्लियाँ होती हैं, उन्हें बहुत दर्द मिलता है।” कभी कहतीं, “बिल्लियाँ बेवफ़ा होती हैं। कभी साथ नहीं देतीं। कुत्ते पालना चाहिए, बिल्लियाँ तो गला भी पकड़ लेती हैं।”  तो कभी यह जुमला कि, “अगर तुम संत हो, तो कभी न कभी किसी बिल्ली की मोहब्बत में पड़ जाओगे।”

बिल्लियों से अपने प्रेम के कारण या उन्हें अपशगुन मानने के कारण या उसकी कर्कश आवाज़ से परेशान होकर--- जाने किस कारण, दादी ने उस बिल्ली को ज़ंजीर से आज़ाद करवाया। आँगन में चिल्लाने वाली बिल्ली जब अंदर कमरे में चली गई, तो एकदम ख़ामोश हो गई। उस रोज़ हमें पता चला कि बिल्लियों को बंधन पसंद नहीं। बाँधोगे, तो उनका भाग जाना तय है। इसीलिए जब अगली सुबह हमने पाया कि वह हमारे आँगन में आकर सोई हुई है, तो हमें कुछ अचरज न हुआ। कुछ देर उसके साथ खेलने के बाद हमने उसे पड़ोसियों को दे दिया, क्योंकि दादी को बिल्ली मंज़ूर नहीं थी। थोड़ी देर बाद बिल्ली फिर हमारे यहाँ आ गई। इस बार पड़ोस के बच्चे उसे उठा ले गए। शाम को फिर हमारे यहाँ आ गई। हमने फिर बिल्ली को लौटा दिया। उसे जब मौक़ा मिलता, दीवार फाँदकर हमारे यहाँ चली आती। शुरुआती दिनों के बाद, हमने उसे लौटाना बंद कर दिया। कुछ दिनों तक पड़ोस की बहूरानी या उसके बच्चे बिल्ली को खोजते हुए आते, फिर उन्होंने खोजना बंद कर दिया। थककर एक दिन बहूरानी ने दादी से कहा, “आप ही रख लो इसे।” हमने दादी को आख़िरकार मना लिया कि हम संत हैं और अब हमें बिल्लियों से मोहब्बत हो गई है।

इस तरह हमारे यहाँ बिल्ली आई। जिन चीज़ों को सुख-सुविधा से जुड़ा माना जाता है, वे हमारे यहाँ न थीं। दो सुख थे, दोनों पड़ोस से आए। टीवी हमारे यहाँ बहुत देर से आया, लेकिन संगीत का शौक़ बचपन से था। हमारे पड़ोसी अपना टेपरिकॉर्डर बहुत ज़ोर से बजाते थे। इस तरह संगीत का हमारा शौक़ पूरा होता था। मुझे ‘जांबाज़’ फिल्म के गाने अच्छे लगते थे। कभी-कभी स्टूल पर चढ़कर मैं बहूरानी से वह कैसेट चलाने को कहता। मुकेश के कई गाने मुझे अब भी शब्दश: याद हैं, क्योंकि सुबह सात बजे जब मैं स्कूल के लिए तैयार होता, बहूरानी के दूल्हे राजा, मुकेश के दर्द-भरे नग़मे चला देते थे। आज मैं उस आदमी की मन:स्थिति के बारे में सोचने की कोशिश करता हूँ, जो सुबह-सुबह मुकेश के दर्दीले गीत सुनता हो।

और दूसरा सुख था- बिल्लियाँ। उसकी पहली कड़ी भी हमारे यहाँ पड़ोस से ही आई। हमने उसका नाम रखा- जूली। क़ायदे से उसे हम चार भाई-बहनों के लिए खिलौना होना था, लेकिन जूली हाथ नहीं आती थी। पाँच-दस मिनट नज़रों के सामने रहने के बाद वह ग़ायब हो जाती। हम उसे पलंग के नीचे, कपबोर्ड के ऊपर, किचन के अंदर, हर जगह खोजते, पर शायद उसके पास अदृश्य होने का मंत्र था। कर्कश आवाज़ में चिल्लाने वाली उस बिल्ली की अब साधारण म्याऊँ भी सुनाई पड़ जाए, तो हम ख़ुशी से भर जाते, उसके दिख जाने का इंतज़ार करने लगते। इस तरह बहुत दिन बीत गए और बिल्ली का होना-न होना एक बराबर हो गया। जूली से कोई लगाव बन ही न पाया।

जब हम उसे भूल चुके थे, एक सुबह दीदी ने हमें झकझोरकर जगाया और कहा, “उठो-उठो, देखो-देखो, जूली ने बच्चे दिए हैं।” आँखें मलते हुए हम दीदी के पीछे दौड़े। भीतर स्टोर रूम में लोहे के दो बड़े बक्से अगल-बग़ल रखे हुए थे, जो दादी अपने साथ पाकिस्तान से लाई थीं। उनके बीच की जगह में जूट की बोरियों को तह करके रखा जाता था। उस ज़माने में बोरियाँ बड़े काम की चीज़ होती थीं। हर घर में उनके गट्‌ठर मिल जाते थे। उन्हीं बोरियों के ऊपर जूली लेटी हुई थी और तीन बिलौटे, जिनकी आँखें पूरी तरह नहीं खुली थीं, उसका दूध पी रहे थे। दादी बीच-बीच में जूली को सहला रही थीं, लेकिन जब हम उसे सहलाने या उसके बच्चों को छूने के लिए हाथ बढ़ाते, जूली गुर्राने लगती थी। कुछ दिनों बाद हमने उन बच्चों का बँटवारा कर लिया। काले छींटों के साथ जो सफ़ेद रंग का बिल्ला था, उस पर मेरे भाई ने दावा कर दिया। उसका नाम रखा गया- नूरू। भूरी-सुनहरी बिल्ली पर मेरी छोटी बहन का दावा हुआ। उसका नाम नूरी पड़ा। तीसरा मटमैले रंग का था, न काला, न सफ़ेद। उस पर दूसरे रंग की कोई धारी तक न थी। वह मेरे हिस्से आया। वह सबसे मरघिल्ला था। उसे चलना भी नहीं आता था, दो क़दम बाद ही गिर जाता। हम उसे अपनी हथेली पर रखते, तब भी वह काँपता रहता। उसके चेहरे के अनुपात में उसकी आँखें बड़ी थीं। पहली नज़र में ही वह एक भद्दा बिल्ला था। उसका कोई नाम नहीं रखा गया। वह सबसे छोटा था, सो अपने आप ही उसका नाम चिन्टू पड़ गया। दादी बहुत तरस खाकर उसकी ओर देखतीं और कहतीं, “यह मुआ नहीं बचेगा।”

बिल्लियों के साथ हमारा प्रेम यहाँ से शुरू हुआ। इस प्रेम की पताका नूरू के हाथ थी। वह तीनों में सबसे तगड़ा, सुंदर और शरारती था। नूरू और नूरी का आपसी खेल चैपिलन की किसी छोटी स्लैपस्टिक फिल्म से कम न होता। वे खड़े-खड़े उछल जाते, दौड़ते-दौड़ते टेबल से टकरा जाते, दूसरे को पंजा मारने की कोशिश में ख़ुद ही भहराकर गिर जाते और एक-दूसरे का पीछा तो ऐसे करते, जैसे पुलिस, बस्टर कीटन का पीछा कर रही हो। उनकी चपलता, उनकी फुर्ती, पीठ को ऊँट की तरह बनाकर पीछे हटना, पूँछ के बाल फुलाकर अजीबोगरीब आवाज़ें निकालना- उनका खेल एक तरह का युद्धाभ्यास होता। हम कितने भी दुखी हों, कितने भी निराश, बिल्लियों को खेलता देखना दुनिया का सबसे बड़ा सुख जान पड़ता। वे इतने मासूम और पवित्र दिखते कि लगता, ईश्वर जहाँ कहीं भी है, वह यक़ीनन एक उछलता हुआ बिलौटा है।

जब वे दोनों खेला करते, चिन्टू निरीह-सा एक किनारे बैठा रहता। उसका बहुत मन होता कि वह भी इस खेल में शामिल हो। वह कोशिश भी करता, एक-दो बार कूद लगाता, पूँछ के बाल खड़ा कर लेता, लेकिन कुछ पलों बाद ही वह कहीं गिर जाता, गिरकर वहीं पड़ा रहता, पड़े-पड़े शायद अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करता। पीछे कहीं से दादी की तरस-भरी आवाज़ आती, “देखो, कैसा मुर्दार है।”

लेकिन नूरू सुपरस्टार था। जैसे-जैसे बड़ा हुआ, उसकी सुंदरता बढ़ती गई। हमने उतना सुंदर बिल्ला फिर कभी नहीं देखा। झक सफ़ेद रंग, उस पर तबीयत से बने हुए काले छींटे। गरदन के पास काली धारी, जैसे कोई माला पहन रखी हो। माथे पर काला तिलक, जैसे अभी पूजा से उठकर आया हो। चारों पंजों पर काले निशान, जैसे काले मोज़े पहन रखे हों। और पूँछ का आख़िरी सिरा काला, जैसे किसी पेंटर ने अपना ब्रश काले रंग में डुबोया हो। हमारी बातों के ज़रिए हमारे दोस्तों में वह इतना मशहूर हो गया कि वे उसे देखने हमारे घर आते थे। वह भी पक्का परफॉर्मर था, किसी को निराश न करता, ऐसी अदाएँ दिखाता, ऐसे खेल करता, कि देखने वाले वाह-वाह करने लगते। हम उसे जितना अटैंशन देते, उसका आनंद उतना बढ़ जाता था। यहाँ-वहाँ दौड़ लगाता, टेबल टेनिस की गेंद से फुटबॉल खेलने लगता, हम रस्सी हिलाते, वह उछलकर उसे पकड़ लेता, हमारे पैर पकड़कर खड़ा हो जाता, उछलकर टेबल पर चढ़ जाता, वहाँ से सीधे हमारी गोद में छलाँग लगाता। उस समय हम उसे अपनी गोद में कैच करते थे। अगर हम कैच मिस करते, तो उसके नाख़ून हमारी छाती, भुजाओं या गोद में लग जाते। हम दर्द से कराह उठते, पर नूरू को इन सबसे कोई फ़र्क़ न पड़ता। बिल्ली अगर तुमसे प्यार करेगी, तो तोहफ़े में खरोंचें देगी। उसकी शिकायत ग़ैर-वाजिब है।

एक दिन जाने कैसे नूरू ने एक नया एक्ट सीख लिया। टेबल के निचले हिस्से में, उसके पायों को जोड़ने वाली पटिया होती है, जिस पर हम अपने पैर रखा करते, वह उस पतली-सी पटिया पर चारों पैरों से उल्टा लटककर बाएँ से दाएँ और दाएँ से बाएँ चलता, जैसे ट्रेनिंग लेने वाले सिपाही रस्सी पर उल्टा लटककर चलते हैं, पैरों को क्रॉस करके, हाथों से आगे की ओर खिसकते। यह नूरू का सुपरहिट एक्ट था। दादी कहतीं, “यह बिल्ला नहीं, बान्दर है बान्दर।” अब भी जब कोई बंदर को बान्दर कहता है, मेरी आँखों के आगे नूरू की धुँधली-सी आकृति बन जाती है। मेरे निजी शब्दकोश में बान्दर का अर्थ बिल्ला है, वह भी कोई साधारण नहीं, हमारा नूरू बिल्ला।

जब हम होमवर्क कर रहे होते, वह सामने बैठ जाता। काग़ज़ पर चल रही हमारी क़लम को पंजा मार-मारकर गिराता। और जिन दिनों वह ऐसा न करता, हम उसे बुला-बुलाकर ऐसा करने के लिए कहते। पर वह हमारी कभी सुनता न था। उसे जो करना होता, अपनी मर्ज़ी से करता, हमारे बोलने-न बोलने का उस पर असर न होता था। दादी कहतीं, “बिल्लियाँ औरतों जैसी होती हैं, किसी की नहीं सुनतीं।”

हम कोई भी नई चीज़ पाते, उसे अपनी बिल्लियों के साथ शेयर करते। स्कूल से लौटते, तो पाते, कई बार हमारी बिल्लियाँ दार्शनिकों की तरह दरवाज़े पर बैठी रहतीं। अपनी बिल्लियों के साथ हम अलग और अकेला समय गुज़ारते, उनसे बात करते, अपने दिल के कई राज़ उन बिल्लियों को बताते। जब मैं चौथी कक्षा में था, मुझे पहली बार किसी लड़की ने होंठों पर चूमा था। आधी छुट्‌टी के दौरान उसने मुझे क्लासरूम से बाहर बुलाया, गलियारे में एक पिलर के पीछे खड़ी होकर बात करती रही, चौकन्नी निगाहों से आसपास देखा, भरपूर एकांत जान उसने मुझे चूम लिया और भग गई। मैं शर्म के मारे लाल हुआ, वहीं खड़ा रहा। बरसों तक यह रहस्य मेरे और उस लड़की के अलावा सिर्फ़ मेरी बिल्लियों को ही पता था। आज भी मैं मानता हूँ कि बिल्लियों से बेहतर राज़दार इस दुनिया में कोई नहीं।

हम बच्चे एक चौड़ी पलंग पर क़तार में सोते थे और तीनों बिल्लियाँ हमारे बिस्तर में घुसकर सोती थीं। सबकी अपनी बिल्लियाँ थीं, सो, क़ायदे से हमें अपनी-अपनी बिल्लियों के साथ सोना था। लेकिन वह बँटवारा तो हमारे लिए था, बिल्लियों की समझ में न आता। वे अपनी मर्ज़ी से उछलकर मनचाही जगह में घुस जातीं, हम उनके लिए लड़ते रहते। नूरू को अपने साथ सुलाने के लिए हममें होड़ लग जाती। आधी रात हमारे कमरे में हुल्लड़ होने लगता। नूरू नहीं, तो नूरी सही। चिन्टू पर हमारा ध्यान न जाता। वह चुपचाप हममें से किसी के पैरों के पास गोल होकर सो जाता। जब हम ज़ोर-से लड़ते, हमारा शोर सुनकर नूरू और नूरी भाग जाते, कहीं छिप जाते, उस समय भी चिन्टू बिस्तर के किसी कोने में पड़ा रहता। हम उसे थोड़ा सहला देते। हम उससे नफ़रत नहीं करते थे, पर वह इतना मुर्दार और निरीह था कि उससे प्यार करने की बात सोचते ही हमारे दिलों में एक अजब-सी हूक उठती, कुछ असहज-सा लगने लगता। उसकी आँखों में ऐसी बेबसी होती कि लगता, छू-भर देने से मर जाएगा। जाने क्या था, उसके प्रति हल्की-सी घृणा थी या उसके मरघिल्ले होने से पैदा हुआ भय या उसके पूरे बिल्लीत्व से निकलती निरीहता या नूरू के स्टारडम के आगे उसकी साधारणता, कुछ तो था जो हमें उससे दूर कर देता। उसे ठंड भी बहुत लगती थी। गर्मी पाने के लिए वह हमारी गोद में आना चाहता, पर हम उसे बहुत नज़ाकत से परे कर देते। तब वह दीदी की गोद में घुस जाता। दीदी उसे भी उतने ही दुलार से अपनातीं। बिल्लियों को जब ठंड लगती है, तब वे गोद में बैठकर घुर्र-घुर्र करती हैं। उनकी गर्दन या छाती पर हाथ रखने से उस ध्वनि को महसूस किया जा सकता है। हम इंतज़ार करते कि हमारी गोद में बैठी हुई बिल्ली कब घुर्र-घुर्र करना शुरू करेगी।

 तब हमारे घर में पायदान नहीं थे, उनकी जगह बोरियाँ बिछी होतीं। हर दरवाज़े के पास बोरियाँ। जब हम व्यस्त होते कि नूरू पर ध्यान न दे पाएँ, तब वह किसी पायदान वाली बोरी पर पसरकर सो जाता। मैं आठ का हो चुका था। एक रोज़ तेज़ बुख़ार में तप रहा था। कंबल ओढ़े लेटा हुआ था। माँ मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रख रही थीं। वह एक पट्‌टी रखतीं, फिर किचन में जाकर कोई काम निपटातीं, फिर आकर मेरी पट्‌टी बदलतीं। मेरे भाई-बहन दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रहे थे। जहाँ मैं लेटा था, वहाँ से मुझे अपने कमरे की दहलीज़ पर रखी बोरी दिख रही थी। उस पर नूरू सोया था। सामने से मेरे पिताजी आ रहे थे। वह चलते-चलते अख़बार पढ़ रहे थे। मुझे लगा, अख़बार पढ़ते हुए चल रहे मेरे पिता नीचे सोये नूरू को कुचल देंगे, उन्हें दिखाई भी न पड़ेगा। ऐसा सोचते ही मेरे पूरे शरीर में डर की एक लहर दौड़ गई। अख़बार में खोये मेरे पिताजी ने अगला क़दम बढ़ाया, वह नूरू पर ही गिरने वाला था, नूरू कुचलकर मारा जाने वाला था... बस, मैं पूरी ताक़त से चिल्लाया, “बा......बू......जी.....!” चिल्लाते हुए मेरी आँखें बंद हो गईं। मैं नूरू को कुचलता नहीं देख सकता था। चिल्लाते ही मैं उठकर बैठ गया और ज़ार-ज़ार रोने लगा, “आपने नूरू को मार डाला, उसे कुचल दिया...”

मेरी चीख़ सुनकर सब उस कमरे में दौड़े आए। किसी तरह मुझे चुप कराया गया। मैंने अपने चिल्लाने का कारण बताया। पिताजी बोले, “मेरे पैर रखने से पहले ही नूरू हट गया था।” मुझे यक़ीन न हुआ, तो नूरू को लाकर मेरी गोद में बिठा दिया गया। वह सही-सलामत था। मैंने उसे बहुत प्यार किया।

लेकिन उस चीख़ के बाद मेरे माथे की नस फटने लगी थी। दर्द के मारे जान जा रही थी। थोड़ी देर बाद डॉक्टर को बुलाया गया। उसने मुझे पेनकिलर का इंजेक्शन दिया। मैं जाने कितनी देर सोया रहा। यह माइग्रेन की मेरी पहली स्मृति है। उस रोज़ मेरे सिर में जो दर्द घुसा, आज तक बाहर नहीं निकला। अक्सर मेरे सिर में विस्फोट करता है। मैं बेचैन होकर तड़पता हूँ। कई बार यह दर्द हफ़्तों चलता है। जब माइग्रेन भड़कता है, मुझे नूरू की याद आती है। जब कभी मैं नूरू को याद करता हूँ, दर्द की वह स्मृति अपने आप चली आती है। हर दर्द का एक अतीत होता है। हर अतीत की तह में कोई न कोई दर्द छिपा रहता है।

हमारे घर में बिल्लियों के लिए अतिरिक्त दूध आता था लेकिन बिल्लियाँ सिर्फ़ दूध नहीं पीतीं, वे स्वभाव से ही शिकारी होती हैं। शिकार की अपनी चाहत पूरी करने के लिए वे तिलचट्‌टे भी मार देतीं। नूरू बहुत चपल था। वह घर के बाहर एक नाली के पास जा बैठता, वहाँ चूहों का शिकार करता। उन्हें पकड़कर घर के आँगन में लाता, उछाल-उछालकर उनसे खेलता, फिर खा जाता। एक दिन चूहा खाने के कुछ घंटों बाद वह बीमार पड़ गया। शायद चूहे ने कोई ज़हरीली गोली खाई थी। नूरू उल्टियाँ करने लगा। कुछ घंटों पहले तक पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाता नूरू अब निढाल, पस्त था। शाम हो चुकी थी। आँगन में पीले बल्ब की रोशनी में एक बोरी बिछा दी गई। पिताजी ने नूरू को उस पर लिटा दिया। वह बीच-बीच में हिचकियाँ लेता, खड़ा होता, चलने की कोशिश करता, उलटियाँ करने लगता, फिर गिर जाता। हम सब उसके चारों ओर घेरा बनाकर बैठे थे। मेरे भाई ने एक्सटेंशन बॉक्स से तार खींच-खींचकर वहाँ सिन्नी का छोटा काला टेबल फैन लगा दिया। नूरू को हवा लग रही थी। हम बार-बार उसे सहला रहे थे। जितने देवताओं के नाम याद थे, हम मन ही मन उनके आगे हाथ जोड़ते, नूरू के ठीक हो जाने की मनौतियाँ मान रहे थे। दादी ने कहा, “अब यह नहीं बचेगा।” सुनकर हमने रोना-धोना मचा दिया। हमारा रुदन सुन आस-पड़ोस के लोग हमें देख जाते। माँ को दादी की बात पर भरोसा हो गया। वह भीतर से गंगाजल ले आई। नूरू के मुँह में तुलसी-दल और गंगाजल डाला। तब तक उसकी साँसें चल रही थीं। एक बेहद सुंदर, चपल बिल्ला, जिसमें ज़िंदगी की तमाम उछल-कूद व उमंग भरी हुई थी, मृत्यु के निस्पंद सन्नाटे में पड़ा हुआ था। नूरू मर चुका था।

मैंने पहली बार किसी को मरता हुआ देखा था। वह इंसान नहीं था, लेकिन हम इंसान हैं। इंसान जब जानवर से प्यार करता है, तो उसे भी इंसान ही मानने लगता है। प्यार और मौत में बहुत अजीब रिश्ता है। जिससे प्यार हो, उसे मौत आ जाए, तो मौत का दर्द कई गुना बढ़ जाता है।

अगले कई दिन हमारे लिए वीरान रहे। हम उसे याद करते और फफक-फफककर रोते। पिताजी ने अपने हाथों गड्‌ढा खोदकर नूरू को दफ़न किया था। वह भरी आँखों से अपना हाथ देखते। नूरी और चिंटू को कैसा महसूस हुआ होगा, हम कभी नहीं जान सकते। उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया था। बच्चे पैदा करने और कुछ दिनों तक उन्हें पालने के बाद जूली वापस अदृश्य हो गई थी। बीच में कभी-कभार वह आ जाती, घर का जायज़ा लेती, एकाध दिन रहती, अपने किसी बच्चे के साथ झगड़ा भी करती, फिर चली जाती। दादी की फिलॉसफ़ी गहरी हो गई थी। वह कहतीं- “इसीलिए बोलती हूँ, बिल्लियाँ दर्द देती हैं। जब उनसे लगाव होता है, वे चली जाती हैं। जाने किस जोनि में जाती हैं, उन्हें तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, पर हम जब तक ज़िंदा रहते हैं, उन्हें याद करते रहते हैं।”

वह दोहराती रहतीं, बिल्लियाँ बेवफ़ा होती हैं। नूरू के न रहने का दुख इतना बड़ा था कि इस तरह की बातों के अर्थ समझ नहीं आते थे। हर बात एक तरह का मातम लगती थी। उनकी सुना-सुनी मैं अक्सर कह पड़ता, “हाँ दादी, नूरू बेवफ़ा निकला।” बेवफ़ाई शब्द के मानी भी नहीं पता थे। आज सोचता हूँ, तो लगता है, हर वफ़ा की मंज़िल दरअसल एक ख़ास क़िस्म की बेवफ़ाई है। प्यार में वह मोड़ ज़रूर आता है, जहाँ हम अलग हो जाते हैं। कभी मौत अलग कर देती है, तो कभी ज़िंदगी के हालात, पर अलगाव ज़रूर होता है। क्या है बेवफ़ाई? मर जाना बेवफ़ाई है या ज़िंदा बचे रहना बेवफ़ाई है? पता नहीं, हमारे खड़े रहने की जगहों के हिसाब से दिशाएँ और परिभाषाएँ बदल जाया करती हैं।

इतना जानता हूँ कि हमारा बचपन साधारण व तंगहाल था। वह कोई बचपन नहीं था। आज इतने बरसों बाद जब पलटकर देखता हूँ, तो उम्र के उस खेत में कई सारी मुस्कानें बिखरी हुई दिखती हैं। उनमें से अधिकांश मुस्कानें बिल्लियों के कारण आईं। जो आपके जीवन में इतनी मुस्कानें भर गया हो, उसे वफ़ा-बेवफ़ा के तराज़ू पर क्यों तौला जाए? लेकिन यह भी जानता हूँ कि दादी की बात कोई इलज़ाम नहीं थी, अपने दुख को कहने का एक तरीक़ा-भर था। अपने दिवंगत पति को भी वह इन्हीं शब्दों में याद करती थीं।

नूरू के मरने के कुछ ही हफ़्तों बाद नूरी भाग गई। कभी-कभी वह आसपास की छतों पर दिख जाती, लेकिन हमारे पुकारने पर कोई प्रतिक्रिया न देती। घर में सिर्फ़ चिन्टू बचा था, जो अब भी हमारे बिस्तर के किनारे गोल होकर सोता था। दादी उसे देख-देख हैरान होतीं, “ईश्वर का कैसा खेल है! मरना इस मुर्दार को था, मर गया वह तगड़ा।” हमने उम्मीद भी नहीं की थी कि मरघिल्ला चिन्टू आगे इतना लंबा जियेगा। भविष्य के गर्भ में उसके कई नए रूप छिपे थे, जिन पर हमें हैरान होना था। उन पर फिर कभी, किसी अगली क़िस्त में।

लेकिन बाद के उन सारे बरसों में भी नूरू जैसा कोई न हुआ। वह कोई अवतारी बिल्ला नहीं था जो उसकी ग़ज़ब की लीलाएँ हों। साधारण बिल्लों और उसमें यह अंतर था कि नूरू की हर हरकत में एक आनंद था। लेखक होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ कि आनंद अक्सर भाषा की पकड़ से बाहर रहता है। मेरे जीवन में नूरू एक दरवाज़े की तरह खुला था- इंसानों की दुनिया से पालतू जानवरों की दुनिया में ले जानेवाला दरवाज़ा। हमारे परिवार के लोग, बचपन के कुछ साथी आज भी जब इकट्‌ठा होते हैं, तो किसी न किसी बहाने नूरू का ज़िक्र ज़रूर आ जाता है।

अपनी सारी तकलीफ़ें हमसे छिपा ले जाने वाले पिता भीतर ही भीतर उसे कितना याद करते थे, यह हमें तब पता चला, जब उसके मरने के कुछ दिनों बाद, शहर के एक स्थानीय अख़बार के फीचर पेज पर नूरू पर लिखा उनका एक लेख छपा। उसमें नूरू की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर भी थी। उसे पढ़कर शहर में कई लोग रोये थे। उस रोज़ हम बच्चों ने एक-दूसरे से कहा, “नूरू सच में सुपरस्टार था, जीते-जी कई लोगों को हँसाया, मरकर कई लोगों को रुला गया।”


(गीत चतुर्वेदी के पिछले कॉलम यहाँ पढ़ें।)

Comments

Shipra K said…
वाह। चिन्टू वाले याद की प्रतीक्षा रहेगी।
Anita Manda said…
संवेदना से लबरेज़, लाजवाब, महादेवी वर्मा के संस्मरणों की स्मृतियाँ ताज़ा हो गई।
Winod said…
कितना सुन्दर लिखा है
Ruby Dani said…
जिससे प्यार हो उसे मौत आ जाये--- ये सोचना भी मुझे ख़ौफ़ज़दा कर जाता है
Kavita Malaiya said…
बिल्ली से प्यार करोगे तो बदले में खरोंचे पाओगे, बिल्ले से प्यार करोगे तो जीवन भर का दर्द।
Prachi Rathore said…
मुझे अपनी बिल्लियाँ याद आ रही हैं और इसे पढ़कर मैं रो रही हूँ।
Jassi Sangha said…
य पढ़कर मुझे बिल्लियों से डर लगना कम हुआ, और ये कितना ज़रूरी है बता नहीं सकती !

मुझे अब नुरू को देखना है ! फ़ोटो पोस्ट करिये न वो काली चिट्टी ही करदो चाहे !

और दूसरा आपको पढ़कर हमेशा महसूस होता है कि ज़िंदगी की बेहद महीन बातें या लम्हें बेहद ख़ूबसूरत होते हैं !

और उनको आप मोतियों की सुंदर माला की तरह पिरो देते हो ! ऐसी बहुत सारी मालाऐं आप साहित्य के खज़ाने में जोड़ते रहिए ! बहुत सुंदर हैं ये सुच्चे मोती !
Pankhuri Sinha said…
Bahut khoob, sundar likha, aur aapne wo gaana bhi suna hoga --she kissed me on the school bus and told me not to tell
Dharmvir Singh said…
बहुत खूब लिखा।
Sadaf Naaz said…
Bahut hi khoobsoorat likha aapne.
Usha Bhatia said…
They say that a cat has nine lives..no wonder a cat's presence is palpable even in your pain.

Bahut bahut sunder
Gautam Yogendra said…
बिल्लियों की वाकई अपनी दुनिया होती है सर.. वो आपकी दुनिया का हिस्सा हो सकती हैं, आप उनकी दुनिया के नहीं.. मेरी अपनी चार बिलौटों की स्मृति ताज़ा हो आई.. सुन्दर लेख! :)💐
Rahul Tomar said…
इसे पढ़कर मुझे मेरे पालतू कुत्ते शैडो की याद आ गयी।
बहुत ही इमोशनल था सर :)

सच कहा सर
जो आपको इतनी मुस्काने दे गया उसे वफ़ा और बेवफ़ाई के तराज़ू में क्या तौलना। 💐💐
Deepti Singh said…
Woooooooooooooooooow... ye kitna khoobsurat likha h...

ईश्वर जहां कहीं भी है वह यकीनन एक उछलता हुआ बिलौटा है..कमाल अद्भुत..
One can judge a person by the pet one keep or love.
Vishesh said…
"लेखक होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ कि आनंद अक्सर भाषा की पकड़ से बाहर रहता है।"

बावज़ूद इसके, इस लेख में उतना ही आनंद और दर्द था।
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Reminded me the first time I came to ur house.... And there were those cats all around.... But this post just brought all that memories back... And equally sad for nuru.....
Unknown said…
एकही सांस में पढ़ते चली गई ....जैसे अपने ही बचपन को पढ़ रही हूँ .....बहुत खूब

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गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 18 : प्रेम हमें स्वतंत्र करता है, समय हमारी हत्या