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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 6 : कविता में अगन पड़ी है





संयोग है कि मेरा संवाद अक्सर युवाओं के साथ होता है. प्रश्न से भरे युवा. ऐसे ही कुछ युवाओं के आग्रह पर आज का यह कॉलम शब्द, अर्थ व आनंद के बुनियादी सवाल को छुएगा. कला की दुनिया के कुछ आधारभूत प्रश्न कभी नहीं बदलते. हज़ार साल पुराने कवि के सामने जो बुनियादी प्रश्न थे, वही सौ साल पुराने कवि के सामने भी थे और लगभग वही प्रश्न आज के कवि के सामने भी हैं. प्रश्न भले पुराने हों, लेकिन उनसे उपजी बेचैनियाँ मौलिक व अद्वितीय होती हैं. हर कवि को क्रमिक विकास की अवस्थाओं (इवॉल्यूशन) को पार करना होता है. जीवन और विज्ञान में एक गारंटी होती है कि बनमानुस एक बार मानुस बन गया, तो उसकी आने वाली तमाम पीढ़ियाँ हमेशा मानुस ही बनती रहेंगी. कला में ऐसा नहीं हो पाता. कलाकार को हर जीवन में बनमानुस से मानुस बनने की यात्रा करनी होती है. अपने साथ जुड़े इस बनको खुरचकर निकालना एक बड़ा संघर्ष है. मानुस बन जाने के बाद भी बनकी स्मृति को संजोकर रखना होता है, क्योंकि कला में इस स्मृति का महत्तम प्रयोग होता है. इसीलिए कलाकार आधारभूत प्रश्नों से आरंभ करता है. पाँच पीढ़ी पहले का कवि जिन मुद्दों से जूझते हुए अपनी यात्रा शुरू करता था, हमारे समय के कवि को भी अपनी यात्रा वहीं से शुरू करनी होती है. अगली पीढ़ी के कवियों को भी हीं से आरंभ करना होगा. अपने प्रश्नों के उत्तर ख़ुद खोजने पड़ते हैं. दूसरों के दीपक हमें एक सीमा तक ही रोशनी दे पाते हैं. अपना दीपक ख़ुद बनना पड़ता है. हम सब पुरानी पीढ़ियों के अनुभवों को पढ़ते हैं, उनसे राब्ता बनाते हैं और वे हमारे निजी अनुभवों को गढ़ने में थोड़े-बहुत मददगार भी साबित होते हैं, लेकिन अंतत: आग से अपनी उंगली ख़ुद ही जलानी पड़ती है. स्वर्ग कैसा भी हो, उसे देखने के लिए ब्रह्मा की मँझली बेटी मृत्यु के आगे हाथ जोड़ना ही पड़ता है. हर तरह की मृत्यु. आंशिक व अर्धमृत्यु भी. क्षण का स्वर्ग देखना है, तो क्षण की मृत्यु पानी होगी.

ऐसा ही एक सवाल बार-बार सामने आता है कि क्या कविता सीखी जा सकती है? क्या वह सिखाई जा सकती है? भाषा, शब्द व अर्थ के साथ व्यवहार की एक बुनियादी प्रतिभा तो होनी ही चाहिए. मैंने अपने पहले कॉलम में इस पर बात की है. इस बुनियादी प्रतिभा का कोई सबूत नहीं होता. बस, महसूस हो जाती है. पढ़ने वाले को भी. लिखने वाले को भी. अपना एंटीना खुला रखना होता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कविता कभी सिखाई-समझाई नहीं जा सकती. उनका हृदय समंदर जैसा दिखता है. आप उस पर कंकड़ फेंकते हैं कि छप् की ध्वनि के साथ यह डूब जाएगा. लेकिन जैसे ही कंकड़ वहाँ गिरता है, छप् की जगह टन् की आवाज़ आती है. उनके हृदय का समंदर पारदर्शी काँच से ढँका हुआ होता है. जब तक काँच टूटेगा नहीं, कंकड़ अंदर डूबेगा नहीं. वह रहनीय हृदय नहीं होता, महज़ एक दर्शनीय हृदय होता है.

इतिहास में इसके लिए प्लेटो से बड़ा कोई उदाहरण नहीं दिखता. वह चिंतक थे. दार्शनिक थे. राजनीतिज्ञ थे. उनका लिखा पढ़िए, लगेगा, एक अनमोल साहित्य पढ़ रहे हैं, लेकिन कविता उनके पल्ले नहीं पड़ती थी. कविता का सहज सौंदर्य भी उन्हें छू नहीं पाता था. इस क़दर बैर से भरे रहते थे कि उन्होंने कई बार कवियों व कविता के ख़िलाफ़ लिखा। कहते थे, कवियों को शहर से निकाल देना चाहिए. उन्हें कविता से इतनी चिढ़ क्यों थी, यह साहित्य के इतिहास की सबसे बड़ी अबूझ पहेलियों में से है.

जब-जब मैं प्लेटो के बारे में सोचता हूँ, मुझे संस्कृत साहित्य से एक उदाहरण याद आता है. दसवीं-ग्यारहवीं सदी में राजा भोज हुए थे. मध्यप्रदेश के धार में उनकी राजधानी थी. हाल के बरसों में जिन इलाक़ों में मैं घूमता-फिरता रहा हूँ, वह उन्हीं के राज्य की सीमा में आता था. कहते हैं कि इस शहर भोपाल का नामकरण उन्हीं के नाम पर हुआ था. पहले भोजपाल था. फिर भोपाल हो गया. इसके पुख़्ता प्रमाण नहीं मिलते, बस मान्यता है. राजा भोज ख़ुद भी माने हुए कवि थे. उनकी सरस्वतीकंठाभरणआज भी संस्कृत साहित्य के अध्येताओं को आकर्षित करती है. उन्होंने एक बार राजकीय आदेश पारित किया था कि जिन लोगों को कविता समझ में नहीं आती, उन्हें मेरे राज्य में रहने का अधिकार नहीं है,  वे मेरी सीमा से बाहर निकल जाएँ. उनके राजकवि बल्लाल ने उनके जीवन पर एक किताब लिखी थी- ‘भोजप्रबंध’. ऐसे वर्णन उस किताब में मिलते हैं.

जीवन व कविता को लेकर ये दोनों भयंकर अतिवादी रवैये हैं. एक बेहद शक्तिशाली दार्शनिक है, जो चाहता है कि कवियों को राज्य से निकाल दिया जाए. दूसरी ओर, एक बेहद शक्तिशाली राजा है, जो कहता है कि केवल कवि व कविमना ही मेरे राज्य में रह सकते हैं, बाक़ी कोई नहीं रह सकता. प्लेटो के रिपब्लिक में रहना है तो कविता बंद कर दो. भोज के राज्य में रहना है, तो कविता सीख-समझ लो. इतिहास अजब पहेली है. सनकी इंडीविजुअल्स ने उसकी दिशा कई बार बदली है.

सल्वादोर देश के स्पैनिश भाषी कवि रोके दाल्तोन की एक काव्य-पंक्ति है-  रोटी की तरह कविता भी सबके लिए होनी चाहिए.’ रोटी, भोजन का पर्याय है, लेकिन इस पंक्ति में कविता का क्या अर्थ है? वह कौन-सी कविता है, जो सबके लिए हो सकती है? क्या सभी लोगों में कविता को समझने की अर्हता होती है? रोटी या भोजन तो सब करते हैं, लेकिन कविता क्या सब पढ़ते हैं? क्या कविता सबके काम आती है? क्या कविता सब तक पहुँचती है? यदि वह सब तक नहीं पहुँचती, तो इसमें कविता का दोष है? या पहुँचकर भी  जिसकी पकड़-समझ में नहीं आ रही, उसका कोई दोष है? रोटी की एक स्पष्ट उपयोगिता है, क्या कविता को भी उपयोगितवादी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए? विश्वयुद्ध की विभीषिकाओं से बेहद निराश होकर पोलिश महाकवि मीवोश ने 1945 में एक कविता में पूछा था- “वह कविता किस काम की, जो लोगों व देशों को बचा न सके.” मनुष्य स्वभाव से ही उपयोगितावादी है. हर चीज़ की उपयोगिता खोजता है. संभव है कि यहाँ से बातचीत बिल्कुल अलग दिशा में मुड़ जाए, पर मैं उस तरफ़ नहीं जाऊँगा.

कविता समझ में आए, आनंदित करे, इसके लिए समझने वाले के भीतर भी एक योग्यता होनी चाहिए. सबके लिए लिखी गई कविता भी सबको समझ में नहीं आती. आ भी जाए, तो सबको पसंद नहीं आती. कविता को कैसे पढ़ा जाए, कैसे उसमें प्रविष्ट हुआ जाए, यह बहुत ‘ट्रिकी’ सवाल है. मैं पहले भी परिहास में कहता रहा हूँ, अब भी कहूँगा, कि जिस तरह कुछ जगहों पर फिल्म अप्रीसिएशन कोर्स चलाया जाता है ताकि फिल्मों की समझ विकसित की जा सके, उसी तरह कुछ जगहों पर पोएट्री अप्रीसिएशन कोर्स भी चलाया जाना चाहिए, जो यह समझा सके कि किसी कविता को किस तरह समझा जाए, कविता की सराहना आख़िर किस तरह की जाए. लेकिन कोर्स होने से ही समझ में आ जाए, यह भी गारंटी कहाँ है? फिल्म अप्रीसिएशन कोर्स में कम ही लोग जाते हैं, फिल्म की समझ सभी अपने-अपने तरीक़े से विकसित करते हैं. उसी तरह कविता की सराहना के तरीक़े भी सबके अलग-अलग हो सकते हैं.

प्राचीन युग की सब बातें अच्छी नहीं थीं, लेकिन कुछ बातें बहुत अच्छी थीं, जो कि आज नहीं हैं. जैसे, उस ज़माने में कविता की समझ विकसित करना बुनियादी शिक्षा का अंग था. हालांकि शिक्षा सबके लिए सुलभ नहीं थी, फिर भी विभिन्न क़िस्म की कलाओं की शिक्षा घर पर भी मिल जाती थी. कला के मायने प्राचीन भारतीय संदर्भों में अलग हैं. कला का जो अर्थ आज प्रचलित है, तब उससे कहीं ज़्यादा व्यापक था. हर वह काम जिसमें कौशल की दरकार होती थी, उसे कला के दायरे में शामिल कर लिया जाता था. इसीलिए विभिन्न लेखकों द्वारा गिनाई गईं कला की सूचियाँ (मसलन चौंसठ कलाएँ, चौहत्तर कलाएँ, चौरासी कलाएँ) अलग-अलग होती थीं. शब्द, छंद व अर्थ से जुड़ी कोई न कोई कला सभी सूचियों में कॉमन होती थीं. कवि-शिक्षा का एक अर्थ कवियों को मिलने वाली शिक्षा ही नहीं, बल्कि कविता समझने की शिक्षा से भी लिया जा सकता है. हमारे यहाँ स्कूलों में कविता पढ़ाई जाती है. यूँ कहें कि बच्चों की शिक्षा ही कविता से आरंभ होती है. उन्हें नर्सरी राइम्स रटाई जाती हैं, जो कि एक तरह की कविता ही हैं. उसके बाद भी उनमें से अधिकांश बच्चों में कविता के प्रति कम ही आकर्षण होता है. जब बड़ी कक्षाओं में जाते हैं, तब पढ़ी जाने वाली कविताओं का अर्थ याद कराया जाता है. परीक्षा में कविता का अर्थ पूछा जाता है. कविता पीछे छूट जाती है. अर्थ आगे-आगे चलने लगता है. फिर एक दिन अर्थ भी छूट जाता है. शिक्षक कविता का अर्थ बताते हैं, कविता का आनंद नहीं बता पाते. पढ़ाने का यह तरीक़ा ही बड़ा गड़बड़ है. अर्थ का दबाव आनंद को दबाता है. इस तरह कविता को भी दबा देता है. अर्थ भी ज़रूरी है, किंतु आनंद कहीं बड़ा हासिल है. आनंद आएगा, तो आप चार अर्थ बना लेंगे. लेकिन सिर्फ़ अर्थ पर ज़ोर देंगे, तो आनंद भी चला जाएगा.

साहित्य की भूमि तीन धाराओं से उपजाऊ बनती है. शब्द, अर्थ व आनंद. शब्द व अर्थ, गंगा व यमुना की धाराओं की तरह हैं. कोरी आँख से भी दिखते हैं. गंगा को समझ लो, तो यमुना को भी समझा जा सकता है. लेकिन आनंद की धारा तो सरस्वती की तरह है. दिखती नहीं है. बस महसूस होती है. कुछ लोगों को नहीं महसूस होती, तो वे उस धारा की उपस्थिति से ही इनकार कर देते हैं. जबकि वह है. और सबसे ज़रूरी धारा है. भारतीय संस्कृति में कई सरस्वतियाँ अनुपस्थित होकर भी उपस्थित बनी रहती हैं. दो तार्किक तत्वों के जल के बीच, भाव का जल छिपा हुआ ही रहता है. पुराने युगों में इसी आनंद को रस कहा जाता था. कविता की श्रेष्ठता को कई बार यही अदृश्य धारा परिभाषित करती है.

अंग्रेज़ी में तो ख़ैर अब भी बहुत सारी किताबें छपती हैं, जिनमें कविता लिखने के हुनर सिखाए जाते हैं, और एमएफए जैसे कोर्स भी होते हैं. कवि-शिक्षा से संबंधित सुंदर किताबें प्राचीन संस्कृत साहित्य में भी मिलती हैं. ऐसी ही एक किताब है अभिनवगुप्त के शिष्य और ग्यारहवीं सदी के महान कवि क्षेमेंद्र की कविकण्ठाभरण’. किन लोगों को कविता नहीं सिखाई-समझाई जा सकती, इसके बारे में यह किताब बहुत स्पष्ट शब्दों में कहती है। इन लोगों को नहीं सिखाई जा सकती

1- जिनका स्वभाव पत्थर जैसा कठोर है. रत्ती-भर स्निग्धता जिनमें नहीं है.

2- वह व्यक्ति जिसकी प्रतिभा व्याकरण की क्लिष्टता के कारण या किसी और कष्ट के कारण नष्ट हो गई हो.

3- जो बहुत ज़्यादा तार्किक हो, तर्कों की आग से झुलसा रहता हो, उनके धुएँ से धूमिल हो चुका हो.

4- जिसने अपने से पहले के अच्छे कवियों की कविताएँ न सुनी-पढ़ी हों.

इनके अलावा बाक़ी लोगों को कोशिश व अभ्यास के ज़रिए कविता के संस्कार दिए जा सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि उच्च-स्तरीय कविता, बल्कि कम से कम साधारण, निम्न-स्तरीय, लफ़्फ़ाज़ी की कविता. यह कविता इफ़रात में होती है. चारों तरफ़ इसका बोलबाला होता है. उच्च-स्तरीय कविता का रस ग्रहण करने के लिए जिस बौद्धिक वैभव की ज़रूरत होती है, वह अमूमन श्रोता-पाठक में नहीं होती. उसे द्वितीय श्रेणी की कविता में ही वांछित आनंद मिलने लगता है और वह भी मान्य हो जाती है. हर युग में कविता इस तरह श्रेणियों में बँटी होती है. इसलिए हर युग में इस बात पर बहस होती है कि कविता किसे माना जाए.

प्लेटो यक़ीनन तीसरी क़िस्म का व्यक्ति था. बहुत अधिक तार्किक था. न्यूटन भी यही था. वह भी कविता का बहुत विरोध करता था. तर्क कविता से दूर ले जाता है. कविता से दूर होने लगें, तो तर्क से मिली झुलसन भी दिखने लग जाती है. यही समस्या वर्तमान युग के साथ भी है. पाठक ही नहीं, कवि भी तर्कों की आँच से झुलसे हुए हैं. सहृदय होने का अर्थ यह नहीं है कि आप हमेशा प्रकृति-प्रेम या सुकुमारिता में ही लगे रहें, बल्कि एक अर्थ यह भी है कि आप निहुरकर बिंबों की नई संभावनाओं का संधान करें, कोमलताओं को बचाते हुए कठोरताओं का भी आलिंगन करें. सहृदय एक बहुत सुंदर शब्द है, न केवल शब्द है, बल्कि एक पूरी दृष्टि दे सकता है. इस शब्द के गहरे अर्थों तक पहुँचा जाए. कविता के संदर्भों में अनुभूतियों व तर्कों दोनों को मान दिया जाए. पलड़ा अनुभूति की ओर झुका हुआ हो. तर्क कम से कम हों. बौद्धिक दिखने वाली कविता भी बुद्धि का छलावरण धारण कर अनुभूति की ओर ही बढ़ती है. मुक्तिबोध क्या कम तार्किक थे? फिर भी उनके यहाँ चाँद का मुँह टेढ़ा है. अब अगर तर्कशील सोसायटी का कोई सदस्य खड़ा होकर कहे कि चाँद का तो मुँह ही नहीं होता, टेढ़ा होने का सवाल कहाँ से आ गया? तो यक़ीनन, उसे क्षेमेंद्र द्वारा बताई गई तीसरी श्रेणी में एडमिशन देना होगा. तब तो संस्कृत की वही उक्ति कहनी होगी : अरसिकेषु कवित्व निवेदनम शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख. इस सुभाषित में कवि, ब्रह्मा से प्रार्थना कर रहा कि हे चतुरानन, मेरे भाग्य में चाहे जो लिखो, मैं सह लूँगा, पर किसी अरसिक के सामने कविता पढ़नी पड़े, हे देवता, मेरे माथे पर यह ना लिख ना लिख ना लिख.

हम सभी जानते हैं कि कवि की यह प्रार्थना ब्रह्मा अब तक नहीं मान पाए हैं.

ज़ाहिर है, कविता के लिए तथ्यानुयायी नहीं, हृदयानुयायी होना ज़रूरी है. इक्कीसवीं सदी के इस युग में हमें यह बार-बार याद करना चाहिए कि कविता हृदय की प्रजा है. श्रेष्ठ काव्य के लिए बुद्धि चाहिए होती है, लेकिन हृदय की अनुपस्थिति श्रेष्ठता में कोई मदद नहीं कर पाएगी. कविता के लिए जिस दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह बुद्धि व हृदय के संगम से बनती है. दृष्टि का बर्तन दर्शन की राख से माँजा जाता है. चिंतन के पानी से धोया जाता है. यह सब न हो, तो कविता में एक अदृश्य अगन पड़ जाती है. भावनात्मक व चिंतनात्मक अगन, जो कविता को नष्ट करती है. शाब्दिक अगन तो दिखाई पड़ जाती है, अर्थ की अगन भी शब्दों को बार-बार देखने से पता पड़ जाती है, लेकिन यह जो दृष्टि की अगन है, भावनात्मक-चिंतनात्मक, वह जल्दी दिखती नहीं. जिस तरह कविता भाषा में लिखी जाती है, लेकिन भाषा में पूरी तरह पकड़ी नहीं जाती, उसी तरह कविता की समस्याएँ भी पूरी तरह भाषा की पकड़ में नहीं आ पातीं, उनका अहसास ज़रूर हो जाता है. कवि-शिक्षा या कवि का अभ्यास, इसी अहसास को पकड़ पाने का अभ्यास भी होता है. तर्क का बेपरवाह उपयोग कविता को क्षतिग्रस्त करता है. कई बार कुछ अतार्किक पंक्तियाँ जोड़ देने से कविता खड़ी हो जाती है, तो कई बार तर्कों का प्रयोग करने से कविता भहरा भी जाती है.

अगन क्या है? कविता में अगन पड़ना, मध्य-युगीन काव्य का एक मुहावरा है. शास्त्रीय कम है, लोक में अधिक प्रचलित रहा. यह अगन, अग्नि ही है. ऐसा कह लें कि आग से लगी हुई गाँठ. ऐसी लपट, जिससे आसपास की पंक्तियाँ या पूरी कविता ही झुलस जाती है और जीवन में भी उसका उल्टा परिणाम दिखने लगता है. शब्दों के लापरवाह युग्म से दो अर्थों का प्रजनन होता है, एक अर्थ तो वह जो कवि चाहता है, दूसरा अर्थ वह जिसके बारे में कवि ने सोचा भी न हो, ग़लती से वह पैदा हो गया और जो कि पूरी तरह नकारात्मक हो. कविता की अगर कोई देवी होती है, तो कविता में पड़ने वाली अगन के नकारात्मक या नुक़सानदायी अर्थ को वह पहले ग्रहण करती है. यक़ीनन, यह उस देवी का निजी विट या ह्यूमर होगा. मध्य-युगीन काव्य में कविता में अगन पड़ने के ढेरों उदाहरण-लतीफ़े-क़िस्से-लोकश्रुतियाँ भरी पड़ी हैं. मैं यहाँ एकाध की चर्चा करूंगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आख़िर यह अगन है क्या बला?

शाहजहाँ के दरबार में एक कवि थे सुंदरदास. बड़ा मान था. यमक और अनुप्रास की निराली छटाएँ. बादशाह ने आदेश दिया कि शृंगार पर कुछ लिखें, तोसुंदरशृंगारनामक काव्य की रचना की. इसमें उन्होंने एक छंद बनाया, जिसकी एक पंक्ति है-

सुंदर कोप नहीं सपने अरु जो भयो सो मन ही में विलानो.

आज की हिंदी में इसका अर्थ है- सुंदर को सपने में भी क्रोध (कोप) नहीं आता और अगर आ गया, तो वह क्रोध मन ही मन विलीन भी हो जाता है. कहते हैं कि इस पंक्ति वाला छंद लिखने के बाद सुंदर की हालत ख़राब हो गई. जब भी वह सोते, उन्हें सपना दिखता कि कोई उन्हें चप्पल मार-मारकर पीट रहा है. कई रातों तक यह सपना आता रहा, तो वह आतंकित हो गए. सोने से ही डरने लगे. लगातार जागते रहने से उनकी तबीयत बिगड़ गई. एक दिन कोई मित्र मिलने आया और उनकी हालत देखकर चिंता व्यक्त करने लगा. सुंदर कवि ने सारा हाल सुनाया. मित्र ने सुझाव दिया कि अपना कवित्त फिर से जाँचो, कहीं कोई अगन पड़ी है. अपना पूरा कवित्त जाँचने के क्रम में उनकी नज़र इस पंक्ति पर पड़ी और उन्होंने सिर पकड़ लिया. वह युग था, जब कविताएँ ज़ोर-ज़ोर से उच्चार कर पढ़ी जाती थीं. इस पंक्ति का उच्चारण किया जाए, तो एक अलग ही अर्थ बनता था क्योंकि उच्चारण में शब्द अधिक चिपकते हैं - सुंदर को पनहीं सपने.... इतने में रेड़ लग गई. पनही का अर्थ होता है चप्पल. तो अर्थ यह बना कि सुंदर को सपने में पनही पड़ती है. सुधारकर उन्होंने कोपकी जगह रोसलिखा और मुसीबत टली. कवि ने ज़रा-सी लापरवाही की, अर्थ बदला और कविता में अगन पड़ी. कविता में अगन पड़ेगी, तो छित्तर पड़ेंगे.  छित्तर, चप्पल का पंजाबी शब्द है. और जिस मज़ेदार तरीक़े से कवि पर पड़ी थी, उसके लिए छित्तर शब्द ही मौजूं लगता है.

एक कवि थे केशवदास. प्रेम पर क्या कमाल चीज़ें लिखीं. उनकी कल्पनाएँ बेलगाम होकर उड़ती हैं. इतनी गझिन कल्पनाएँ कि ओर-छोर पकड़ने में बहुत समय लग जाए. इसीलिए केशव को कठिन कवि माना जाता है. कल्पना, कवि की मित्र है, किंतु औचित्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. केशव ने नहीं रखा और कविता में अगन पड़ी. उनकी एक पंक्ति है-

मखतूल के तूल झुलावत केसव भानु मनो सनि अंक लिये.

इसका अर्थ बताने के लिए पूरे छंद का संदर्भ बताना होगा. दृश्य है कि नायक-नायिका एक उपवन में हैं, एक-दूसरे के प्रति सुंदर शब्दों का उच्चारण करते हुए विपरीत रति (वुमन ऑन टॉप) में संलग्न हैं. नायिका के गले में बड़ा-सा माणिक है और उसके ठीक बीच में नीलम जड़ा हुआ है. यानी लाल रंग का घेरा, उसमें काला या काले-जैसा-नीला छोटा घेरा. नायिका की प्रणय-गति से वह माणिक-नीलम युग्म लहरा रहा है. कैसे लहरा रहा? जैसा ऊपर की इस पंक्ति में कहा गया है- मखतूल यानी काले रेशम के धागे से एक झूला बना हुआ है और उसमें सूर्यदेव (यानी बड़ा माणिक) अपने पुत्र शनिदेव (यानी छोटा नीलम वाला घेरा) को गोद में लिए बैठे हुए हैं. पड़ गई अगन. अभिसार-दृश्य में पिता-पुत्र के झूला झूलने की उपमा या उत्प्रेक्षा कौन पंडित वैध बताएगा? मणियों के रंग को औचित्य देने की कोशिश में उपमा का औचित्य भंग हो गया. कहते हैं कि इसके बाद देवी केशवदास से रुष्ट हो गईं और बोलीं, ‘प्रेम-प्रसंग में ऐसी उल्टी बातें सिर्फ़ प्रेत सोचते हैं. तू प्रेतबुद्धि है. जब तू मरेगा, प्रेत बनेगा. तेरी मुक्ति सरल न होगी.’ प्रेम-धुनि से प्रेत-योनि तक की इस यात्रा के कारण समकालीन या परवर्ती पंडितों ने केशवदास को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा है. केशव जब प्रेत बने, तो उनकी मदद के लिए तुलसीदास को दौड़े आना पड़ा था. वह अलग कहानी है. किसी और प्रसंग के लिए बचाए रखते हैं.    

इस तरह के कई क़िस्से हैं. कोई छत्रपति शिवाजी के राजकवि भूषण से जुड़ा हुआ है, तो कोई उनके बड़े भाई मतिराम से, तो कोई उनके भी बड़े भाई कवि चिंतामणि से, जो औरंगज़ेब के दरबार में कवि थे. ये सारे क़िस्से बरसों से लोक में प्रचलित हैं. साहित्यिक लतीफ़ों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं. साहित्य की मेरी अधिकांश पढ़ाई अनौपचारिक किंतु शास्त्रीय तरीक़ों से हुई है, मैंने जो कुछ सीखा-जाना है, उसका अधिकांश विभिन्न भाषाओं में लिखे शास्त्रों व ग्रंथों से आता है, और उन्हीं से यह भी जाना है कि लोक में गहरा विश्वास रखो. जितना सम्मान शास्त्र का करते हो, उतना ही लोक का भी करो. इसीलिए मैं लोककथाओं, लोकोक्तियों, लोक में प्रचलित क़िस्सों-लतीफ़ों को मान देता हूँ, भले उन्हें ‘मक्षिका-स्थाने-मक्षिका’ जैसा शब्दश: न मान पाऊँ. इन उदाहरणों में भी मैं क़िस्सा-तत्व को पूरी तरह नहीं मान पाता, लेकिन उन क़िस्सों की आड़ में ये लतीफ़े, शब्द व अर्थ की गड़बड़ियों को लोक-सम्मत परिहास-बोध के साथ बताने में पूरी तरह समर्थ हैं, यह ज़रूर मानता हूँ.

कविता में अगन यह होती है. शास्त्रीय पदबंधों में इन्हें अलग तरह से व्यक्त किया जाता है. औचित्यचर्चा एक तरह से अगन की पहचान करना ही है. शब्द व अर्थ की अगन तो दिख जाती है, लेकिन वह जो तीसरी धारा है, आनंद की सरस्वती, जो कि अदृश्य है, उसकी अगन का क्या? जब धारा ही नहीं दिख रही, तो उसकी अगन कैसे दिखेगी? ज़ाहिर है, जिस तरह यह तीसरी धारा महज़ महसूस की जाती है, उसी तरह इसकी अगन भी सिर्फ़ महसूस की जा सकती है. यहाँ पर कवि का विवेक व अभ्यास काम आता है. विवेक व अभ्यास, दोनों सतत विकसनशील तत्व हैं. कवियों में एक आम मान्यता है कि कविता किसी तैयारी से नहीं लिखी जाती, बल्कि वह तो अपने आप आती है, स्पार्क की तरह आती है. अचानक कोई छवि कौंधती है, कोई बिंब, शब्द या स्मृति कौंधते हैं, प्रकाशित हो जाता है या कवि को प्रकाशित कर देता है, फिर कवि, कविता लिखता है, अपने शब्दों व पंक्तियों को माँजता है. आमतौर पर ऐसा या इससे मिलता-जुलता माना जाता है. 

1924 में नेरूदा ने बहुत सुंदर तरह से कहा था, तब वह महज़ बीस साल के थे— “मैंने अपने आत्म से प्रस्थान करने का निर्णय लिया है, यह एक तरह का महाभिनिष्क्रमण है. मेरे लिए सर्जना, शब्दों को प्रकाश से भर देने की इच्छा है.” यह बहुत बड़ी पंक्ति है. शब्दों को प्रकाश से वही भर सकता है, जो ख़ुद प्रकाशित हो. संबोधि की तलाश में बुद्ध द्वारा किए गए गृहत्याग को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है यानी ग्रेट डिपार्चर. लगभग वही बात नेरूदा कह रहे हैं. प्रकाश दोनों को चाहिए. प्रकाशित होना व प्रकाशित करना, दोनों का लक्ष्य है. आत्म से प्रस्थान किए बिना आत्म की तलाश संभव नहीं. इस बात को मुक्तिबोध किन्हीं दूसरे शब्दों में कह गए- साहित्य में रहना है, तो साहित्य से संन्यास ले लो.

सिर्फ़ यह मानकर बैठ जाना कि कविता एक स्पार्क की तरह आती है, जब आएगी, तब आएगी--- पूरी तरह सही नहीं कही जा सकती. प्रकाशित होने व प्रकाशित करने की इस इच्छा का कवि के भीतर होना बहुत ज़रूरी है. बारिश की प्रतीक्षा कर रहा किसान साथ-साथ अपने खेत व बीजों को तैयार कर रहा होता है. कविता भले स्पार्क से आए, बारिश की तरह आए, अपनी मर्ज़ी से आए या कोई बाहरी शक्ति उसे कवि पर नाज़िल कर दे- कुछ भी मान लीजिए, लेकिन इस बीच कवि को अपनी तैयारी करनी होती है, अभ्यास करना होता है. गायक व संगीतकार घंटों रियाज़ करते हैं. चित्रकार रियाज़ में अपनी स्केचबुक भर देते हैं, रंगों का विभिन्न तरह से प्रयोग करते हैं, क्रिकेटर नेट में बॉल को नॉक करता है, लेकिन कवि? वह किस तरह रियाज़ करता है? बिना भटके तो बुद्ध को भी ज्ञान नहीं मिला था, कवि कहाँ-कहाँ भटकता है? भटकाव भी एक रियाज़ है. गद्यकारों को पढ़ा होगा, वे हमेशा अपनी मेज़ पर बैठते हैं, भले कुछ लिख न पाएँ. मार्क ट्वेन ने अपने बारे में कहा था कि मैं दो घंटे सोचने के बाद दो कॉमा लगाता हूँ, फिर दो घंटे और सोचकर वे दोनों कॉमा हटा देता हूँ. गगन गिल ने अपने एक संस्मरण में कहा था- निर्मल जी लिखते कम, काटते ज़्यादा थे. यह एक तरह का अध्यवसाय है. इसे किन्हीं अर्थों में रियाज़ भी कह सकते हैं. संगीत में राग आदि पहले से तय होते हैं. संगीतकार को हर बार एक ही चीज़ करनी है और परफेक्ट बनना है. कवि को हर बार अलग-अलग चीज़ करनी है, फिर भी परफेक्ट बनना है. हर बार नया करने के लिए भी नयेपन का सतत अभ्यास चाहिए. यहाँ फिर नेरूदा याद आते हैं, जिन्होंने 1954 में एक साक्षात्कार में कहा था— “मैं किताब-दर-किताब ख़ुद को पीछे छोड़ रहा हूं. अपनी शैली व अर्थ को नई संरचना दे रहा हूँ. अगर नेरूदावाद नाम की कोई चीज़ है, तो मैं उसका सबसे बड़ा विरोधी हूँ.” यह नयापन अपने आप नहीं आता. कवि चाहे बीस साल का हो या सत्तर साल का, यह रियाज़ उसे हमेशा चाहिए.

हर कवि का रियाज़ अलग तरह से होता है. इसका कोई प्रेस्क्रिप्शन नहीं होता. कोई बहुत किताबें पढ़ता है, तो कोई बहुत सारी चीज़ें लिखता है, कोई लोगों के बीच समय बिताता है, तो कोई अपने एकांत में चिंतन करता है. और देखा जाए, तो ये सभी चीज़ें ज़रूरी हैं. कवि का एक हिस्सा पेड़ की जड़ जैसा होना चाहिए. ज़मीन के नीचे रहने वाली जड़, पानी की तलाश में, अपनी क्षमतानुसार, दूर तलक जाती है. वह पानियों में भेदभाव नहीं करती. निर्मल जल से भी अपने लायक़ रस ले लेती है, तो मलिन जल से भी.

आधुनिक कविता बहुत विकसित हो गई है. आगे बढ़ चुकी है. प्राचीन भारतीय रस-सिद्धान्त सच में प्राचीन पड़ चुका है. उसे शब्दश: पूरी तरह नहीं माना जा सकता. इसलिए आज के युग में उसकी उसी तरह चर्चा करना या उसकी लकीर पीटना मुझे कहीं से संगत नहीं जान पड़ता, लेकिन उसमें कई ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें हम आज के नए कला-मूल्यों, काव्य-संदर्भों के अनुसार माँजकर अपने पक्ष में प्रयोग कर सकते हैं. यह भी किसी कवि का एक रियाज़ होगा.

अगर हिंदी की समकालीन कविता पढ़ी जाए, तो कई जगहों पर अगन पड़ी दिखाई दे सकती है. मैं बीसवीं सदी या समकालीन कविता से कोई उदाहरण नहीं देने वाला. मुझे ‘पंडितों’ के ‘कोप नहीं’ सहने. पहले ही बहुत सहता आया हूँ.  लेकिन अगर आप कविता को ग़ौर से पढ़ते रहे हों, या ख़ुद कविता लिखते रहे हों, तो आधुनिक संदर्भों में इस नज़रिये को भी ध्यान में रखा जा सकता है. साहित्य की तीसरी धारा, जो कि अदृश्य है, वह यक़ीनन मज़बूत ही होगी.


(गीत चतुर्वेदी के पिछले कॉलम यहां पढ़ें)

Comments

सुन्दर सारगर्भित आलेख!!
आपसे मिलने के बाद मैं भी थोड़ा थोड़ा मंज रहा हूँ।
कविता में इन सब बातों की जानकारी के लिए बहुत बहुत आभार गीत जी ।सधन्यवाद।

Rahul Tomar said…
बहुत सुंदर लेख है।
आज का दिन बन गया। :)

"साहित्य की भूमि तीन धाराओं से उपजाऊ बनती है. शब्द, अर्थ व आनंद. शब्द व अर्थ, गंगा व यमुना की धाराओं की तरह हैं. कोरी आँख से भी दिखते हैं. गंगा को समझ लो, तो यमुना को भी समझा जा सकता है. लेकिन आनंद की धारा तो सरस्वती की तरह है. दिखती नहीं है. बस महसूस होती है."
Sonali said…
An elegant write up. You are a master. Hats off to you Geet ji!
Anita Manda said…
लोक में प्रचलित मज़ेदार क़िस्सों-लतीफ़ों के साथ कविता में औचित्य-दृष्टि पर महत्वपूर्ण बात कहता हुआ आलेख पढ़, स्वयं को समृद्ध महसूस किया :)

# साहित्य की भूमि तीन धाराओं से उपजाऊ बनती है. शब्द, अर्थ व आनंद. शब्द व अर्थ, गंगा व यमुना की धाराओं की तरह हैं. कोरी आँख से भी दिखते हैं. गंगा को समझ लो, तो यमुना को भी समझा जा सकता है. लेकिन आनंद की धारा तो सरस्वती की तरह है. दिखती नहीं है. बस महसूस होती है.

# कविता के लिए जिस दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह बुद्धि व हृदय के संगम से बनती है. दृष्टि का बर्तन दर्शन की राख से माँजा जाता है. चिंतन के पानी से धोया जाता है. यह सब न हो, तो कविता में एक अदृश्य अगन पड़ जाती है.

# मैंने जो कुछ सीखा-जाना है, उसका अधिकांश विभिन्न भाषाओं में लिखे शास्त्रों व ग्रंथों से आता है, और उन्हीं से यह भी जाना है कि लोक में गहरा विश्वास रखो. जितना सम्मान शास्त्र का करते हो, उतना ही लोक का भी करो.

# बारिश की प्रतीक्षा कर रहा किसान साथ-साथ अपने खेत व बीजों को तैयार कर रहा होता है. कविता भले स्पार्क से आए, बारिश की तरह आए, अपनी मर्ज़ी से आए या कोई बाहरी शक्ति उसे कवि पर नाज़िल कर दे- कुछ भी मान लीजिए, लेकिन इस बीच कवि को अपनी तैयारी करनी होती है, अभ्यास करना होता है. गायक व संगीतकार घंटों रियाज़ करते हैं. चित्रकार रियाज़ में अपनी स्केचबुक भर देते हैं, रंगों का विभिन्न तरह से प्रयोग करते हैं, क्रिकेटर नेट में बॉल को नॉक करता है, लेकिन कवि? वह किस तरह रियाज़ करता है? बिना भटके तो बुद्ध को भी ज्ञान नहीं मिला था, कवि कहाँ-कहाँ भटकता है? भटकाव भी एक रियाज़ है.
you defined process of creation beautifully sir
कवि का एक हिस्सा पेड़ की जड़ जैसा होना चाहिए. ज़मीन के नीचे रहने वाली जड़, पानी की तलाश में, अपनी क्षमतानुसार, दूर तलक जाती है. वह पानियों में भेदभाव नहीं करती. निर्मल जल से भी अपने लायक़ रस ले लेती है, तो मलिन जल से भी.
सत्य कथन �� संपूर्ण आलेख बार बार पठनीय है ..
pankaj agrawal said…
सुन्दर आलेख, धन्यवाद
Naveen Sharma said…
एकदम सटीक
Rahul Tomar said…
तो सर क्या यह कहा जा सकता है
कि
"जिस ह्रदय की मिट्टी गीली होगी
कविता का पौधा वहीं उगेगा"
Pankaj Agrawal said…
सुन्दर आलेख
हम कमसमझ लोगों के लिए कविता समझने बहुत सहायक
बहुत सुंदर आलेख
आपका रियाज गहनता और निरन्तरता लिए हुए है। नमन आपको।
आपका लेखन अभिभूत करता है , हार्दिक साधुवाद !
Gaurav Adeeb said…
Lekh bahut inclusive hai
Padhe likhe , padhne likhne wale , padhkar likhne wale, aur ko-panhi types ..sabke liye kuch hai ... Complete intellect meal ... hum bhi inhi mein fit ho gaye ... Ye nhi batayenge kahan .
Narendra Tiwari said…
आप सही मायने में चतुर्वेदी हैं

दंडवत स्वीकार करें प्रभो🙏
Kapil Bhardwaj said…
क्या बात है.....लाजवाब सर लाजवाब ।
Pramila Maheshwari said…
पढा, बहुत ही सुन्दर जानकारी के लिये, कोटि कोटि धन्यवाद। अगर कवि याने कि ऋषि नही होते तो वेद याने कि ज्ञान भी नही होता। ये पूरी धरती ईश्वर की कविता है, ईश्वर खुद एक कवि, इसकी कविता अगन से भरी पडी है, ऐसे मे वैदिक काल से ऋषि आ कर सुधार करते हैं, आपने सही जाना एक कवि को पिछे बहुत पिछे जाना होता हैं कविता को जन्म देने के लिये। आपके लिखे को समझने मे कभी भूल हो तो माफ करियेगा ।:)
श्रीकांत सिंह said…
आपके सबसे सुन्दर आलेखों में है यह। मेरे मन की कितनी शंकाएँ इससे साफ हो गई । बार-बार पढ़ूँगा ।

आपके लेखन में सरस्वती वाली तीसरी धारा (आनंद) स्पष्ट बहती है ।

मैं हर पन्द्रहिया प्रतीक्षा करता हूँ कि इस बार गीत भाई किस विषय पर लिखेंगे । हर बार आपके लिए नित नूतन सम्मान से भर जाता हूँ ।
Venus Singh said…
आपको पढ़ना,,, यकीनन उसी आनंद में डूबने जैसा है,,,,,,
Priyanka Singh said…
आप जो भी लिखते है, वो हृदय तक जाता है, बहुत ही सुन्दर लिखते हैं सर ।
Sundip Sharma said…
Bahot acche bhai

aapne koi kavi k liye sabkuch kah diya jo vo jindgi bhar apni kavita mai talash karta he
Kumar Ashok said…
भाई खूब लिखा है ।नामवरजी कहते है लिखो तो ऐसा लिखो कि विरोधी भी पढ़े तो कहे और चाहे जो हो कम्बख्त ने खूब लिखा है !!
Puneet Kusum said…
आप इतनी सहज भाषा में वो सब बातें बता देते हैं जिन्हें जानने के लिए, अन्यथा जाने कितने क्लिष्ट ग्रंथों से गुज़ारना पड़े। बहुत आभार!
Shipra K said…
बहुत सुन्दर। थोड़ी देर से पढ़ पाई लेकिन मेरे कई सवालों के जवाब मिल गए। कविता के संदर्भ में मुझ जैसे कईयों के प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान है यह लेख।
Having been both a student and teacher of literature have been through those corridors too often,loved this

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