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Showing posts from December, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 6 : कविता में अगन पड़ी है

संयोग है कि मेरा संवाद अक्सर युवाओं के साथ होता है. प्रश्न से भरे युवा. ऐसे ही कुछ युवाओं के आग्रह पर आज का यह कॉलम शब्द, अर्थ व आनंद के बुनियादी सवाल को छुएगा. कला की दुनिया के कुछ आधारभूत प्रश्न कभी नहीं बदलते. हज़ार साल पुराने कवि के सामने जो बुनियादी प्रश्न थे, वही सौ साल पुराने कवि के सामने भी थे और लगभग वही प्रश्न आज के कवि के सामने भी हैं. प्रश्न भले पुराने हों, लेकिन उनसे उपजी बेचैनियाँ मौलिक व अद्वितीय होती हैं. हर कवि को क्रमिक विकास की अवस्थाओं (इवॉल्यूशन) को पार करना होता है. जीवन और विज्ञान में एक गारंटी होती है कि बनमानुस एक बार मानुस बन गया, तो उसकी आने वाली तमाम पीढ़ियाँ हमेशा मानुस ही बनती रहेंगी. कला में ऐसा नहीं हो पाता. कलाकार को हर जीवन में बनमानुस से मानुस बनने की यात्रा करनी होती है. अपने साथ जुड़े इस ‘बन’ को खुरचकर निकालना एक बड़ा संघर्ष है. मानुस बन जाने के बाद भी ‘बन’ की स्मृति को संजोकर रखना होता है, क्योंकि कला में इस स्मृति का महत्तम प्रयोग होता है. इसीलिए कलाकार आधारभूत प्रश्नों से आरंभ करता है. पाँच पीढ़ी पहले का कवि जिन मुद्दों से जूझते हुए अपनी यात्रा …

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 5 : सारे रास्ते बीच में होते हैं

पिछले दिनों कुछ ऐसे संयोग बने कि दो कवियों पर बार-बार लिखना-बोलना पड़ा। मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष हाल ही में गुज़रा है। जिस तरह के राजनीतिक-सामाजिक हालात बनते जा रहे हैं, मुक्तिबोध लगातार और प्रासंगिक होते जा रहे हैं। इसलिए लिखत-बोलत में मुक्तिबोध के प्रसंग आना स्वाभाविक भी है, ख़ासकर इसलिए भी कि वह मेरे प्रिय कवि हैं और मैं उन लोगों में शामिल हूं, जो उन्हें हिंदी का सबसे बड़ा कवि मानते हैं। दूसरे, कुँवर नारायण, हमारी भाषा के एक और महान कवि, जिनका अभी तीन सप्ताह पहले 90 साल की उम्र में निधन हुआ। दोनों बार-बार अपनी ओर बुलाने वाले, और प्रविष्ट हो जाने के बाद बार-बार चुनौतियाँ देने वाले कवि हैं। मुक्तिबोध के बारे में, रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘युवा-2’ के तहत, बोलने का अवसर मिला था। मैं मुक्तिबोध को हिंदी कविता पर पड़ने वाली एक विशाल स्पॉटलाइट की तरह देखता हूं। उनसे पहले न उन-सा कोई कवि हुआ, न उनके बाद। एक ऐसा अद्भुत कवि, जिसके पूर्वजों का सही-सही पता हम नहीं बता पाते, जिसके वंशजों का कहीं कोई निशान नहीं खोज पाते। हम भले मुक्तिबोध को एक परंपरा में शामिल करें, उनकी एक परंपरा भी बना दें, ज…