अपशब्द प्रेम पर पांच कविताएँ : अजंता देव



© Anurag Vats 2017


अपशब्द प्रेम - 1

प्रेम संगीत की तरह
मेरे दिमाग़ में था
तुम तो वाद्य थे


अपशब्द प्रेम - 2


पानी का स्वभाव है बहना
रोकना चट्टान का
बहने से रोकने पर भी
रिस जाता है दरारों से
ज़मीन सोख लेती है
भाप बन कर उड़ जाता है
रुका हुआ पानी
चट्टान थमा रहता है
दर्ज करता हुआ इतिहास ।



अपशब्द प्रेम - 3

अपनी तस्वीर भी
बाज दफ़ा और की लगती है
एक युवा स्त्री
जो कैसे इठला कर खड़ी है
महबूब से लगकर
सौतिया डाह से सुलग जाता है शरीर
मैं रख देती हूँ उसके ऊपर
एक बूढ़े जोड़े का चित्र
जो बिल्क़ुल हमारी तरह लगता है
सच में, हू ब हू ।



अपशब्द प्रेम - 4

मेरा प्रेम
कृष्ण वर्ण है
विवर की तरह
गहरा और डरावना
पतनशील इसमें गिरते रहते हैं लगातार
एक नष्ट नीड़ का पता मिलता रहता है बदहवास लिखावट में
मुझे याद ना करना नामुमकिन है
अपशब्दों में आती रहूँगी बार-बार
तुम्हारे स्वप्नों में
जिसे तुम सुनाते समय दु:स्वप्न कहोगे
और मिथ्या तुम्हारे चेहरे पर पुत जाएगी कालिमा कालिमा
प्रेम के अखंड पाठ में मेरा ज़िक्र आएगा
संपुट की तरह ।


अपशब्द प्रेम - 5

निष्ठा सिर्फ़ एक जगह पहुँचाती है हमेशा
उसकी गति लयबद्ध होकर सुला देती है लोरी की तरह
आश्वस्ति धूल की तरह जम जाती है
कभी के चमकीले शीशे पर
आदत के बाहर ही रहता है प्रेम
अटपटा और आतुर
जैसे नयी भाषा का पहला अक्षर ।












अजंता देव की अन्य कविताएँ यहाँ पढ़ें.

Comments

batkahi said…
शानदार कविताएँ - विशेष तौर पर 4
अजंता जी को बधाई
प्रेम के अखण्ड पाठ में मेरा ज़िक्र आएगा संपुट की तरह 👌 लाजवाब
Ram Pyare Rai said…
प्रेम सीधा सपाट सुगढ सुव्यवस्थित शायद नही होता हो।खूबसूरत कवितायें ।
अच्छी कविताएँ
अपशब्दों में आती रहूंगी बार बार

.....वाह क्या गहराई है।
शुभकामनाएं अंजता दीदी
Prabhat Ranjan said…
बहुत अच्छी कविताएं हैं
Ruchi Bhalla said…
बहुत अच्छी कविताएँ .....
Ajanta Deo जी की....
शुक्रिया #सबद का भी
Ashutosh Dubey said…
शानदार.
सदा की तरह शानदार !

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