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Showing posts from June, 2015

सुधांशु फ़िरदौस की कविताएं

रतजगाई
रात चांद के हंसुए से आकाश में घूम-घूम काट रही थी तारों की फ़सल खिड़की से नूर की बूंदें टपक रही थीं   हमारे स्वेद से भीगे नंगे बदन पर रतिमिश्रित प्रेम के सुवास से ईर्ष्यादग्ध रात की रानी अपने फूलों को अनवरत गिराए जा रही थी  भोर होने वाली थी और नींद से कोसों दूर हम दोनों एक दूसरे के आकाश में आवारा बादलों की तरह तितर रहे थे ***
अमृतपान
शरद की पूर्णिमा  कतिका धान की दुधाई गमक ओस से भीगी दूब पर ज़ामिद दो नंगे पैर
चांद को छू लेने की चाह में गड़हे से बाहर उछल छटपटा रही हैं मछलियां  ***
गुलज़ारिश 

तुम्हारे गालों और ठोढ़ी के बीच ये जो तीन तिल हैं ना काव्यशास्त्र में वर्णित कवियों के तीन गुण हैं
तुम्हारी आंखों में देखते हुए भूल सकता हूं  सबसे भयानक तानाशाह की सबसे डरावनी हंसी 
मेरे हाथों को अपने हाथों में लिए तुम्हारा यूं दिल्ली की सड़कों पर बेलौस चलना सत्ता के दमन के खिलाफ़ किसी जुलूस में चलना है
तालाब के पानी में पैरों को डाले बतखों के झुंड से अठखेलियां करते हुए तुम्हारा नेरुदा की कविता 'चीड़ के पेड़ों का गीत' सुनाने का अनुरोध करना कविता और स्त्री में मेरी अक़ीदत को कितना मज़बूत करता है
बस अड्डे के इंतज़ारी कमरे में मुझे अ…