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सात 
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बहुत ख़ामोशी से सबद सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।
इस अवसर पर युवा कविता के एकदम अलग स्वर अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविता आपके सम्मुख है। अंबर की कविताएं सबद पर यहां भी पढ़ी जा सकती हैं।


चित्र-कृति : एम एफ हुसेन 

इन्दौर के एक बोहरी की सलिलक्वॉय

डबलरोटी के आटे जैसी बाँहें। ऐसी नाज़ुक जैसे बाँहें न
होकर फकत बाँहों का ख़याल हो। जरा पकड़ लो तो उंगिलयां बन जाती। बगलों पे दो-एक सुनहरे रेशे और उसमें पिरोये हुए पसीने के चंद नमकीन मोती। बगल से एक हरी नस चल कर या यूँ कहूँ कि चढ़कर सीने तक गई थी। गुजराती में कोई बेपनाह गन्दी बात फुसफुसा देता उसके कान में तो वह हरी नस बगल के किनारे ऐसे फड़कती जैसे हलाल होने से पहले खानसामे की हथेलियों में कबूतर फड़फड़ाता है।


नानखटाई में जैसे गुलाबकतरी आ जाती है एकाएक, कभी भी वैसे ही कुछ उसके उरोज थे। एक छाती के थोड़ा ऊपर दूसरा नीचे। एक फ़ाख्ते के खून की तरह गुलाबी और दूसरा मेरे दांत के निशान की वज़ह से हमेशा नीला।और उस पर नाखूनों की इबारत-- अब्बामियां खामख्वाह गुस्सा करते रहे कि मेरी उर्दू अच्छी नहीं हुई तो नहीं हुई। ताज़महल पे भी इतनी हसीं नस्ता'लीक न थी जितनी मेरे नाखूनों की उंसके सीने पर।

पंडितों की तरह उसने एक तोता पाल लिया था : पोपट। शबोरोज़ 'इश्क़ एक ख्याल है। इश्क़ एक ख्याल है'करता रहता था। एक रोज़ जैसा क्लैसिकल शायरी में होता है- सुबह सुबह जब पूरा खानदान बड़े भाई लोग, उनकी बीवियां, उनके तमाम बच्चेछोटी बहन, अब्बामियां, माँहुज़ूर चाय में बिस्कुट डोब डोब कर खाते थे- उस बखत उन कमबख्त पोपट ने आवाज़ बना बना कर कहा, 'ऐ छोड़ो, छोड़ो मेरा पेटीकोट हुसेनभाई।' उस रोज़ से पोपट उसका दुश्मन हो गया। दूसरा दुश्मन मैं।

इश्क़ एक ख्याल नहीं है। इस फ़ना दुनिया में 
कुछ भी ख्याल नहीं है, सब मटेरियल है। इश्क़ आते-जाते अचक्के उसके पुठ्ठे पे काटी चिकोटी से कुछ कम नहीं है।

फालूदा खाने की उसकी अदा 
चाइनारोज के प्रिंटवाला गुलाबी बुरका पहनकर इन्दौर में तांगा किराये का लेकरजब वो मेरे साथ निकलती थी फालूदा खाने, बड़ी अदा से मुझसे कहती बात ही न करती फालूदावाले से।कहती, सतरंगी फालूदा चाहिए। फिरोज़ी, गुलाबी, धानी, नारंगी, जामुनी पीला और सुफेद। आहिस्ते आहिस्ते चूसती फालूदा, 'तो कुल्फी खा लेती। फालूदाक्यों लिया!' मैं कहता। वो बस तग़ाफ़ुल की निगाह किए रहती।निगाह जो निगाह से ज़रा कम थी।

अस्पताल। ज
चगी के बाद बिस्तर पर बैठी है। उम्र उन्नीस बरस। वज़न सैंतालीस किलो। बच्चे का वज़न- छह पौंड। उरोज अब भी एक ऊपर एक नीचे। दोनों का रंग अलग। दूध पिलाती वह इन्दौर की सबसे हसीं औरत लग रही है। हरीरे की रकाबी सिरहाने रखी है। उसका दिल बिस्कुट खाने का हो रहा है, कहती नहीं कुछ। चुपचाप है। 'बीमार हूँ' कहकर मुंह फेरकर सो जाती है। बच्चा दिन में बाईस-तेईस घंटे सोता है।

मैं दुकान चला आता हूँ
अब्बामियां को शाम की नमाज़ के लिए फारिग करने। घेवर और चाय पीते मिलते है सब।बाप बन गया अबअब तोह बड़ा हो जा।'

मैं क्या करूँ ! 
पूरे इन्दौर में कस्टर्ड जमाने काफॉर्मूला-ए-नायाब बस मैं और वो जाने है।


**** 

Comments

Shruti Gautam said…
इश्क खयाल से कम है, निगाह निगाह से कम है,
यहां पूरा यूं भी क्या है, सब पूरे से ज़रा सा कम है!
Mahesh Verma said…
वाह क्या बात है ! शानदार !
Chandan Pandey said…
उम्दा. पढ़ना बहुत अच्छा लगा.
क्या बात है अम्बर जी खूबसूरत नज़्म है भाई| पढ़ते ही स्मृति के अतल तल को घंघोलकर रख दिया गजब करते हो भइया|
Aviral Kalra said…
वाह वाह वाह

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