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सबद विशेष : 17 : नोबेल भाषण - पैट्रिक मोदियानो

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अनुवाद : गीत चतुर्वेदी


सबसे पहले तो मैं यह साफ़-साफ़ कहूंगा कि आप सबके सामने यहां आकर मैं बेहद प्रसन्न हूं और इस बात ने मुझे गहरे छुआ है कि आप लोगों ने मुझे साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना।
यह पहला मौक़ा है, जब मैं श्रोताओं की इतनी बड़ी संख्या के सामने बोलने खड़ा हूं, और इसी नाते मैं बेहद सशंकित भी हूं। यह कल्पना करना आसान है कि लेखक ऐसी स्थितियों का सामना आसानी से कर लेते हैं, लेकिन लेखक- ख़ासकर उपन्यासकार- का वाणी या वक्तत्व के साथ बेहद असहज रिश्ता होता है। मुझे याद पड़ता है कि स्कूलों में दो कि़स्म की परीक्षाएं होती हैं, लिखित और मौखिक; उपन्यासकार के भीतर लिखित परीक्षा के लिए ज़्यादा लियाक़त होती है बजाय मौखिक अभ्यासों के। वह चुप रहने का आदी होता है, और जब उसे वातावरण को आत्मसात करने की आवश्यकता होती है, तब उसे भीड़ के भीतर घुल जाना चाहिए। वह बिना प्रकट हुए वार्तालापों को सुनता है, और अगर वह उन वार्तालापों में शामिल होता है, तो महज़ इसलिए कि वह अपने विशेष प्रश्नों से अपने आसपास मौजूद स्त्री-पुरुषों के बारे में अपनी समझ को सुधार सके। उसकी वाणी सकुचाई हुई होती है क्योंकि उसे अपने…