Skip to main content

स्मृति-शेष : ताद्यूश रूज़ेविच


[ पोलिश कवि ताद्यूश रूज़ेविच का 24 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। मूर्धन्य हिंदी कवि
कुंवर नारायण ने
रूज़ेविच की कई कविताओं का वक़्त-वक़्त पर हिंदी में अनुवाद किया है। हम श्रद्धांजलि स्वरूप उनमें से 4 काव्यानुवाद प्रकाशित कर रहे हैं।  ]



तमाम कामकाज के बीच

तमाम कामकाज के बीच
मैं तो भूल ही गया था
कि मरना भी है

लापरवाही
में उस कर्त्तव्य से कतराता रहा
या निबाहा भी
तो जैसे तैसे

अब कल से
रवैया बिल्कुल फ़र्क़ होगा

बहुत ही संभल-संभल कर मरना शुरू करूंगा
बुद्धिमत्ता से ख़ुशी-ख़ुशी
बिना समय बरबाद किये।
***

प्रूफ़


मौत नहीं ठीक करेगी
कविता की एक भी पंक्ति
वह प्रूफ़-रीडर नहीं है
न किसी संपादिका की तरह
हमदर्द

घटिया रूपक अमर हो जाता

एक रद्दी कवि मरणोपरान्त भी
मरा हुआ रद्दी कवि ही रहेगा

एक बोर मर कर भी बोर ही करता
एक मूर्ख क़ब्र के उस पार से भी
अपनी मूर्ख बकवास जारी रखता
***

सौभाग्य

कैसा सौभाग्य कि जंगलों में
रसभरियां चुन सकता हूं
मेरा ख़याल था कि
न अब जंगल हैं न रसभरियां

कैसा सौभाग्य कि पेड़ की छाया में
लेटा रह सकता हूं
मेरा ख़याल था कि पेड़
अब छाया नहीं देते।

कैसा सौभाग्य कि मैं तुम्हारे साथ हूं
और मेरा दिल इतना धड़क रहा है
मेरा ख़याल था कि आदमी
अब बेदिल हो गया है।
***

अब
एक समय था
कि प्रतीक्षा करता
कब मुझ पर कविता का हमला हो
एक अस्थिर बिंब के पीछे
भागते-भागते हांफ जाता

और अब मैं
कविताओं को अपने बिल्कुल पास से
निकल जाने देता
वे मुरझा कर मर कर
बेजान हो जातीं

और मैं उधर ध्यान भी नहीं देता
कुछ नहीं करता
***

Comments

Thnks fr sharing these poems
himani said…
Thnks fr sharing these poems
और मेरा दिल इतना धड़क रहा है
मेरा ख़याल था कि आदमी
अब बेदिल हो गया है।

बेहतरीन !
Anju Sharma said…
अद्भुत कवितायेँ ....ये दूसरी वाली हमेशा से मुझे प्रिय है। इन्हें साझा करने के लिए शक्रिया
vandana gupta said…
लाजवाब कवितायें अलग कलेवर की
अच्छी हैं सभी कविताएँ :)
और साथ ले जा रही हूँ यह पंक्तियाँ:

कैसा सौभाग्य कि मैं तुम्हारे साथ हूं
और मेरा दिल इतना धड़क रहा है
मेरा ख़याल था कि आदमी
अब बेदिल हो गया है।
anu said…
बहुत ही अच्छी कविताएँ हैं। मैंने आज से पहले रोज़ेविच को कभी नहीं पढ़ा। आज अहसास हुआ कि क्या miss कर दिया।
Avinash Kumar said…
उम्दा।
सबद का सदैव जिन्दा रहना जरुरी होता जा रहा है
बेहतरीन चयन.मैं समझता था कि चौथी कविता सिर्फ मुझे ही पसंद है :)

Popular posts from this blog

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 18 : प्रेम हमें स्वतंत्र करता है, समय हमारी हत्या