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Showing posts from March, 2014

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद की यह तीसरी पोइट्री फिल्‍म किताबों से हमारे लगाव के बारे में है. इसके किरदार इस लिहाज से हमारे पास-पड़ोस में आबाद वैसी जगहें भी हैं, जिनकी देहरी पर किताबों के दरस-परस की आकांक्षा लिए हम जाते हैं. वहां होने का अपना हर्ष और अवसाद है. यह फिल्‍म इन एहसासों को कविताओं के जरिए दर्ज करती है. जिन दो कवियों की कविताएं फल्मि में शामिल की गई हैं, वे हैं - हिंदी के वरिष्‍ठ कवि कुंवर नारायण और स्‍पैनिश कवि एदुआर्दो चिरिनोस.
फिल्‍म का लिंक यहां और कविताओं के पाठ आगे हैं.    


पहले भी आया हूं - कुंवर नारायण
जैसे इन जगहों में पहले भी आया हूं                       बीता हूं. जैसे इन महलों में कोई आने को था मन अपनी मनमानी ख़ुशियां पाने को था. लगता है इन बनती मिटती छायाओं में तड़पा हूं किया है इंतज़ार दी हैं सदियां गुज़ार बार-बार इन ख़ाली जगहों में भर-भर कर रीता हूं रह-रह पछताया हूं पहले भी आया हूं         बीता हूं. * * * *

वे हाथ भी नहीं - एदुआर्दो चिरिनोस
जब कोई भी आत्मा उनका उच्चारण नहीं करती