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Showing posts from 2014

यादों में बाबा : रेवा नाग बोडस

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( हिंदी के चर्चित नाटककार और कहानीकार नाग बोडस पर उनकी बिटिया रेवा के स्मृतिरेख।)


1.

बाबा 
की लिखी पाण्डुलिपि पढ़ते हुए कभी भी मेरी आँखों के सामने उनके नाटक के पात्र नहीं आए। हर बार बाबा की छवि ही आई। शायद इसी वजह से मुझे उनका एक भी नाटक कभी समझ में नहीं आया। नाटक के दृश्य पढ़ते समय वह जगह दिखती रही, जहाँ वे दृश्य लिखे गए थे। पुराने नाटको में पुराना और नए नाटकों में नया घर दिखा। उनकी सोच कभी पकड़ नहीं पाई मैं। और हर बार ज्यादा और ज्यादा निराश  होती गई।
निराश क्योंकि मैं अपने पिता को समझ नहीं पा रही  थी! कई बार कोशिश की कि नाटकों को 'बाबा' की छवि से अलग करके पढ़ूं। पर नाकाम रही। फिर सोचा अगर मैं उनके दोनों अस्तित्वों को अलग समझूं-स्वीकारूं, तो शायद बात बने। 


तुम्हारे बाबा क्या करते हैं मुझे एक वाकया याद आता है। माँ, बाबा और मैं किसी ट्रेन में सफ़र कर रहे थे। सीनियर केजी में थी तब मैं। ट्रेन में किसी यात्री ने मुझसे बात करना शुरू की। नाम, माँ का नाम, पिता का नाम वगैरह बच्चों से पूछे जाने वाले सवालों के क्रम में उन्होंने जब पूछा कि तुम्हारे पापा क्या करते हैं,  तो मैं चुप रह गई। उन्होंने स…

सबद की नई फिल्म

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इस फिल्म को आप यहां देख सकते हैं :
मैं आऊंगा

फिल्म में इस्तेमाल किए गए हिस्से कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी के शीघ्र-प्रकाश्य उपन्यास 'रानीखेत एक्सप्रेस' से चुने गए हैं, जिसे लेखक ने फिल्म में स्वयं स्वरबद्ध किया है।
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{ फिल्म मोबाइल कैमरे (गूगल नेक्सस) से शूट की गई है। }

सबद विशेष : 16 : वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का का गद्य

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1996 के बाद वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का का परिचय जितनी बार भी लिखा जाता है, उन्हें दुनिया-भर में मशहूर कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता कहा जाता है। कोई ग़लत भी नहीं, क्योंकि दोनों ही तथ्य हैं। लेकिन 1996 से पहले ये दोनों बातें तथ्य नहीं थीं। नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले अंतर्राष्ट्रीय पटल पर शिम्बोर्स्‍का की प्रसिद्धि नाममात्र की ही थी। यह अल्पकीर्ति भी एक तथ्य ही है, अत: इसका उल्लेख भी कोई अनुचित बात नहीं। किंतु 2014 में इसका उल्लेख क्यों करना? इसलिए कि यह उल्लेख भी एक कि़स्म की प्रासंगिकता है। इस साल भी साहित्य का नोबेल पुरस्कार एक ऐसे लेखक (फ्रेंच भाषा के पैट्रिक मोदियानो) को दिया गया है, जिसके पास अल्पकीर्ति है। अल्पकीर्ति को कुछ लोग रोग या एक कि़स्म का डिसएडवांटेज/डिसमेरिट मान लेते हैं। कोई लेखक यदि अल्पकीर्त है, तो उसकी श्रेष्ठता को संदेह से देखा जाता है। यशाकांक्षी तो पहले से था, इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में हमारा साहित्यिक समाज पहले की अपेक्षा कहीं ज़्यादा यशाक्रांत भी हो गया है।

एक छोटा-सा कि़स्सा याद आता है। हैरल्ड पिंटर अपने जीते-जी महान मान लिए गए थे। नोबेल मिलने से बरसों प…

न नींद टूटती है न भरम : गीत चतुर्वेदी की नई कविताएं

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तुम इतनी दूर पहुंच चुकी हो स्मृति की दृष्टि से भी ओझल कि अब तुम्हारा चेहरा नहीं पहचान सकता
तुम्हें सिर्फ़ एक चेहरे से याद भी नहीं कर सकता
इस तरह बनता है अतीत से हमारा रिश्ता कि जिन चीज़ों को देख तुम्हारी याद आती है वे चीज़ें तुम्हारे चले जाने के बाद वजूद में आई थीं
बस एक रेखाचित्र है सर्द सुबह का एक आकृति है बिंदुओं से बनी हुई आज एक आंख है कल एक दृश्य दोनों के बीच धुंधला-सा एक ध है
कोहरे का नक़ाब तुम पर फबता है                                          * * * समाधि