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Showing posts from October, 2013

जिसने हमेशा जाना चाहा, उसका इंतज़ार कैसा

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{ यह गद्य देवयानी भारद्वाज का है. देवयानी कविता लिखती रही हैं इसलिए इस गद्य का लबो-लहजा बहुत दूर तक काव्यात्मक है. इसे देवयानी ने अपनी डायरी के सफ़ों पर मुमकिन किया है. अमूमन ये सफ़े 'निज-बात' की जगह होते हैं. एक लेखिका से ज़्यादा एक स्त्री-मन यहाँ खुलता है. उस मन का उल्लास और उदासी दर्ज़ करती हुई देवयानी. लेखिका की तस्वीर पद्मजा गुनगुन के कैमरे से.}

मनोज कुमार झा की दो नई कविताएं

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सूखा

जीवन ऐसे उठा
जैसे उठता है झाग का पहाड़
पूरा समेटूं तो भी एक पेड़ हरियाली का सामान नहीं
जिन वृक्षों ने भोर दिया, साँझ दिया, दुपहरी को ओट दिया
उसे भी नहीं दे सकूँ चार टहनी जल
तो बेहतर है मिट जाना
मगर मिटना भी हवाओं की संधियों के हवाले
मैं एक सरकार चुन नहीं पाता
तुम मृत्यु चुनने की बात करते हो !
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बाँधना एक सुन्दर क्रिया थी

उठ के न जाए कहीं रात में माँ
मैं शर्ट के कोने को माँ के आचल से बाध लेता था
और जब वह उठती
तो जगाते थपथपाते  कहती कि मैं बन्धन खोल रही हूं
कई बार तो मुझे याद भी नहीं रहता था सुबह में
सोचता हूँ काँपता हूँ कि मझनींद में माँ बच्चे को उठा रही है
स्तुति करूँगा कि वह जानती थी भरोसे को खोलना
अभी सुबह के चार बजे दरभंगा स्टेशन पर भटकते सोचते संशय में हूँ
कि किसी गाड़ी पर बैठ हो जाऊँ अज्ञात
या इन्तजार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुंचा देगी।
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{ सबद पर मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं यहां पढ़ें। }