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प्रेमकथा में फिर से लौटती है रोशनी


संजय कुंदन की ४ नई कविताएं ]

 Fumihiro Ooga


स्थगन के बाद

अचानक जमा होने लगते हैं रंगीन बादल
दिखाई पड़ते हैं कुछ प्रवासी पक्षी पंख फैलाए

एक नया मौसम उतरता है 
जिंदगी के एक ऐसे मोड़ पर 
जब उकताहट और खीझ से लथपथ 
आदमी नाक की सीध में चल रहा होता है 
खुद को घसीटते हुए 

एक अधूरी प्रेमकथा में 
फिर से लौटती है रोशनी 
कुछ पुराने पन्ने लहलहा उठते हैं  

फिर वहीं से सबकुछ शुरू होता है 
जहां कुछ कहते-कहते काँप गए थे होंठ 
और बढ़ते-बढ़ते रह गए थे हाथ 
हवा अपने पैरों में बांधने ही वाली थी घुंघरू
जमीन को छूने ही वाली थीं कुछ बूंदें 

खत्म कुछ भी नहीं होता
स्थगन के बाद 
न जाने कितनी बार जीवन लौटता है 
इसी तरह अपनी कौंध के साथ।
***

Vladimir Karnachev


विनम्रता खतरनाक फंदा बुन सकती थी

उसकी मां उसे जीवन भर नादान देखना चाहती थी
पर शहर ने उसे समझदार बना दिया

सबसे पहले उसने अपनी हंसी की लहरों को बांधा
उसकी हंसी ही उसकी दुश्मन बन सकती थी
यह उसने जान लिया था
उसने सीख लिया कि कहां कितना वजन रखना है अपनी हंसी का 
थोड़ी भी अतिरिक्त हंसी उसे गिरा सकती थी किसी गहरी खाई में

वह पहचानने लगी थी भाषा के भीतर की खाइयों को 
यहां सहानुभूति का अर्थ कारोबार भी था
और दोस्ती का अर्थ आखेट हो सकता था
इसलिए वह सबसे ज्यादा सावधान रहती थी
मोरपंख जैसे शब्दों से
गुलदस्ते जैसे शब्दों से
उसे पता चल गया था कि 
विनम्रता कितना खतरनाक फंदा बुन सकती थी

वह बहुरुपियों को उन्हीं के हथियार से
चुनौती दे सकती थी पर उसे उन हथियारों से कोई लगाव न था
उसे किसी को हराने और जीतने का शौक न था
वह तो किसी तरह बच-बचाकर निकल जाना चाहती थी
अपने सपने की ओर।
***

Mansoureh Hosseini


सुखी लोग

सुखी लोगों ने तय किया था कि अब केवल सुख पर बात होगी
सुख के नाना रूपों-प्रकारों पर बात करना 
एक फैशन बन गया था यहां

सरकार भी हमेशा सुख की ही बात करती थी
उसका कहना था कि वह सबको सुखी तो बना ही चुकी है
अब और सुखी बनाना चाहती है
उसके प्रवक्ता रोज सुख के नए आंकड़े प्रस्तुत करते थे
सरकार के हर फैसले को सुख कायम करने की दिशा में
उठाया गया कदम बताया जाता था
लाठी और गोली चलाने का निर्णय भी इसमें शामिल था

 इस सब से दुख को बड़ा मजा आ रहा था
 वह पहले से भी ज्यादा उत्पाती हो गया था
 वह अट्टहास करता और कई बार नंगे नाचता

पहले की ही तरह वह कमजोर लोगों को ज्यादा निशाना बनाता
वह खेतों का पानी पी जाता, फसलें  चट कर जाता
छीन लेता किसी की छत और किसी की छेनी-हथौड़ी

 यह सब कुछ खुलेआम हो रहा था पर
अखबार और न्यूज चैनलों में केवल मुस्कराता चेहरा दिखाई पड़ता था
 हर समय कोई-न-कोई उत्सव चल रहा होता मनोरंजन चैनलों पर

वैसे सुखी लोगों को भी दुख बख्शता नहीं था
कई बार अचानक किसी के सामने आकर वह उस पर थूक देता था
सुखी व्यक्ति इसे अनदेखा करता 
फिर चुपके से रुमाल निकल कर थूक पोंछता
और चल देता किसी जलसे के लिए।
***

Denis Oktyabr

जादू

कौन-सी चीज कब जादू कर दे
कहना मुश्किल है
किसी दिन चले गए चौलाई साग लाने
पांच किलोमीटर दूर पैदल प्रचंड धूप में
फिर स्वाद-स्वादकर खाया और दूसरों को भी बताया
कई दिनों तक चर्चा की 

कोई कह सकता है एक मामूली चीज के लिए
ऐसा पागलपन ...क्या मतलब है!
अब जादू तो जादू होता है
वह बड़ा या छोटा नहीं होता

एक दिन आया भीख मांगता कोई 
पता नहीं ऐसा क्या गाया कि भर्रा गया गला
मन न जाने कहां चला गया कितने बरस पीछे
कि लौटना मुश्किल हो गया

भटकते रहे एक पुराने शहर में
ताकते रहे खिडकियों पर
न जाने क्या खोजते रहे।
***

[ सबद पर संजय कुंदन की अन्य कवितायेँ यहाँ. ]

Comments

Daisy Varun said…
बहुत सुन्दर.. सहज.. कटु भी..

कवि को बहुत बहुत साधुवाद!
sarita sharma said…
संजय कुंदन की ये कवितायेँ अंतर्जगत की हलचल को दर्शाती हैं. शहर सपनों को किस तरह ख़त्म करके चालाकी का पाठ पढाता है और बीते क्षण जादू की तरह कैसे लौट कर आते रहते हैं, यह इन कविताओं में सहज प्रवाह में व्यक्त किया गया है.
Neeraj Shukla said…
सुखी लोग लाजवाब कविता बन पड़ी है। इन कविताओं के लिए सबद का धन्यवाद
neera said…
सुंदर, सहज, संवेदनशील कवितायें ....
कवि को बधाई और सबद का शुक्रिया ...
ना जाने कितनी बार जीवन लौटता है.......बेहतरीन कविताएं.
FARHAN KHAN said…
beaoutiphul >>> :)
Kamal Choudhary said…
Shaandaar, jaandaar aur imaandar kavitai. Sukhi log behad pasand aayi.
Badhai . Abhaar. -Kamal Jeet Choudhary.
'खत्म कुछ भी नहीं होता
स्थगन के बाद
न जाने कितनी बार जीवन लौटता है
इसी तरह अपनी कौंध के साथ।'

सहजता से व्यक्त होता सत्य!

सुन्दर कवितायेँ!

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