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Showing posts from May, 2013

कथा गंगुबाई की

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{ किराना घराने की सुप्रसिद्ध ख़याल गायिका गंगुबाई हंगल की आत्मकथा के चुनिन्दा अंश सबद की पांचवीं वर्षगाँठ पर आपके सम्मुख हैं । यह आत्मकथा गंगुबाई ने एन. के. कुलकर्णी को बोल कर लिखाई थी। कुलकर्णी जी ने इसे अंग्रेजी में लिपिबद्ध किया। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद युवा कवि-लेखकमृत्युंजय ने किया है। सबद के लिए इससे पूर्व मृत्युंजय ने ख़याल गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर पर एकाग्र गद्य का भी अनुवाद किया था। सबद पर इसके अलावा बिस्मिल्लाह खान और भीमसेन जोशी सरीखे संगीतकारों पर भी आलेख प्रकाशित किये गए हैं.  }





तखल्लुस हंगल

१९१३  में ०५  मार्च के रोज धारवाड़ के शुक्रवारपेट इलाके में मेरी पैदाइश हुई। वहीं हमारा घर था। इसी जगह पालने में उलटते-पलटते मैंने माँ से लोरियाँ सुनीं। माँ कर्नाटक शैली की जानी-मानी गायिका थीं। तब के जमाने में शुक्रवारपेट ब्राह्मणों का इलाका था। आज भी है। मेरी माँ घर-बार बेहद ध्यान से चमका कर रखती थीं। एक तरह से कहिये तो इससे उनके मन की पवित्रता की झलक मिलती थी। पीतल और तांबे के बर्तनों को राख और इमली से वे तब तक घिसतीं, जब तक वे शीशे की तरह झिलमिलाने नहीं लग जाते।

          एक ब…

प्रेमकथा में फिर से लौटती है रोशनी

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[ संजय कुंदन की ४ नई कविताएं ]

स्थगन के बाद
अचानक जमा होने लगते हैं रंगीन बादल दिखाई पड़ते हैं कुछ प्रवासी पक्षी पंख फैलाए
एक नया मौसम उतरता है  जिंदगी के एक ऐसे मोड़ पर  जब उकताहट और खीझ से लथपथ  आदमी नाक की सीध में चल रहा होता है  खुद को घसीटते हुए 
एक अधूरी प्रेमकथा में  फिर से लौटती है रोशनी  कुछ पुराने पन्ने लहलहा उठते हैं  
फिर वहीं से सबकुछ शुरू होता है  जहां कुछ कहते-कहते काँप गए थे होंठ  और बढ़ते-बढ़ते रह गए थे हाथ  हवा अपने पैरों में बांधने ही वाली थी घुंघरू जमीन को छूने ही वाली थीं कुछ बूंदें 
खत्म कुछ भी नहीं होता स्थगन के बाद  न जाने कितनी बार जीवन लौटता है  इसी तरह अपनी कौंध के साथ।
***


विनम्रता खतरनाक फंदा बुन सकती थी
उसकी मां उसे जीवन भर नादान देखना चाहती थी पर शहर ने उसे समझदार बना दिया
सबसे पहले उसने अपनी हंसी की लहरों को बांधा उसकी हंसी ही उसकी दुश्मन बन सकती थी यह उसने जान लिया था उसने सीख लिया कि कहां कितना वजन रखना है अपनी हंसी का  थोड़ी भी अतिरिक्त हंसी उसे गिरा सकती थी किसी गहरी खाई में
वह पहचानने लगी थी भाषा के भीतर की खाइयों को  यहां सहानुभूति का अर्थ कारोबार भी …