Posts

Showing posts from January, 2013

कथा : 10 : कुमार अम्बुज की नई कहानी

Image
घोंघों को तो कोई भी खा जायेगा
कुमार अम्बुज
(एक)
सबसे ज्यादा गुस्सा इन पैदल चलनेवालों पर आता है। साइड से चलेंगे नहीं। फुटपाथ होगा तब भी सड़क पर चलेंगे। सड़क पार करने में तो गजब ही कर देते हैं। दाएँ देखेंगे तो बाएँ नहीं देखेंगे। बाएँ देखेंगे तो दाएँ देखने का सवाल ही नहीं। फिर दो कदम आगे, एक कदम पीछे। अचानक दौड़ भी लगा सकते हैं।

मरना मुझे भी है। इसी ट्रैफिक में।

अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं और मेरे जैसे ज्यादातर लोग किसी दूसरी मारक बीमारी से नहीं मर सकते। एड्स जैसी बीमारियों के प्रति हम सावधान हैं, बाकी बीमारियों का इलाज कराने में सक्षम हैं। महामारियों का युग रहा नहीं। लेकिन इस ट्रैफिक का कुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन आप इस तरह डर डरकर जी भी नहीं सकते। यह जीवन ऐसा ही है। जैसा आपको मिला है, जैसा आपको दिख रहा है। इसे ऐसा ही स्वीकार करना होगा। इसका व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि आपको कोई टक्कर न मार पाए। लेकिन सड़क पर ड्राइव करते हुए, आप चाहें तब भी हर एक के जीवन के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते।

मैं शुरूआती वर्षों में यह करके देख चुका हूँ कि मेरी कार के नीचे कहीं चींटी भी न आ जाए। सड़क पर पड़े फूल, त…

दो नई कविताएं : कुंवर नारायण

Image
बाद की उदासी

कभी-कभी लगता
बेहद थक चुका है आकाश
अपनी बेहदी से

वह सीमित होना चाहता है
एक छोटी-सी गृहस्ती भर जगह में,
वह शामिल होना चाहता है एक पारिवारिक दिनचर्या में,
वह प्रेमी होना चाहता है एक स्त्री का,
वह पिता होना चाहता है एक पुत्र का,
वह होना चाहता है किसी के आँगन की धूप

वह अविचल मौन से विचलित हो
ध्वनित और प्रतिध्वनित होना चाहता है शब्दों में
फूल फल पत्ते होना चाहते हैं उसके चाँद और तारे
आँसू होना चाहती हैं ओस की बूँदें...

अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी !
***

कविता की मधुबनी में

सुबह से ढूंढ रहा हूँ
अपनी व्यस्त दिनचर्या में
सुकून का वह कोना
जहाँ बैठ कर तुम्हारे साथ
महसूस कर सकूं सिर्फ अपना होना

याद आती बहुत पहले की
एक बरसात,
सर से पाँव तक भीगी हुई
मेरी बांहों में कसमसाती एक मुलाक़ात

थक कर सो गया हूँ
एक व्यस्त दिन के बाद :
यादों में खोजे नहीं मिलती
वैसी कोई दूसरी रात।

बदल गए हैं मौसम,
बदल गए हैं मल्हार के प्रकार --
न उनमें अमराइयों की महक
न बौरायी कोयल की बहक

एक अजनबी की तरह भटकता कवि-मन
अपनी ही जीवनी में
खोजता एक अनुपस्थि…