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Showing posts from 2013

प्रभात की तीन नई कविताएं

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जिसने हमेशा जाना चाहा, उसका इंतज़ार कैसा

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{ यह गद्य देवयानी भारद्वाज का है. देवयानी कविता लिखती रही हैं इसलिए इस गद्य का लबो-लहजा बहुत दूर तक काव्यात्मक है. इसे देवयानी ने अपनी डायरी के सफ़ों पर मुमकिन किया है. अमूमन ये सफ़े 'निज-बात' की जगह होते हैं. एक लेखिका से ज़्यादा एक स्त्री-मन यहाँ खुलता है. उस मन का उल्लास और उदासी दर्ज़ करती हुई देवयानी. लेखिका की तस्वीर पद्मजा गुनगुन के कैमरे से.}

मनोज कुमार झा की दो नई कविताएं

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सूखा

जीवन ऐसे उठा
जैसे उठता है झाग का पहाड़
पूरा समेटूं तो भी एक पेड़ हरियाली का सामान नहीं
जिन वृक्षों ने भोर दिया, साँझ दिया, दुपहरी को ओट दिया
उसे भी नहीं दे सकूँ चार टहनी जल
तो बेहतर है मिट जाना
मगर मिटना भी हवाओं की संधियों के हवाले
मैं एक सरकार चुन नहीं पाता
तुम मृत्यु चुनने की बात करते हो !
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बाँधना एक सुन्दर क्रिया थी

उठ के न जाए कहीं रात में माँ
मैं शर्ट के कोने को माँ के आचल से बाध लेता था
और जब वह उठती
तो जगाते थपथपाते  कहती कि मैं बन्धन खोल रही हूं
कई बार तो मुझे याद भी नहीं रहता था सुबह में
सोचता हूँ काँपता हूँ कि मझनींद में माँ बच्चे को उठा रही है
स्तुति करूँगा कि वह जानती थी भरोसे को खोलना
अभी सुबह के चार बजे दरभंगा स्टेशन पर भटकते सोचते संशय में हूँ
कि किसी गाड़ी पर बैठ हो जाऊँ अज्ञात
या इन्तजार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुंचा देगी।
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{ सबद पर मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं यहां पढ़ें। }

विचारार्थ : जल-जीवन

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जब जल उपजाता है दारुण भय

मनोज कुमार झा

जल के बारे में धार्मिक ग्रंथों से लेकर सामान्य जीवन में प्रशस्तियाँ भरी पड़ी है। ‘आपो ज्योति रसोमृतम्’ कहा गया है। यजुर्वेद का ऋषि कहता है कि ‘जैसे माँ अपनी सन्तान को दूध पिलाती है, वैसे ही हे जल, जो तुम्हारा कल्याणतम रस है, उसे हमें प्रदान करें (यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयेतह नः । उशतीरिव मातर।।) मगर जल विप्लव भी लाता है, जो कि प्रायः हर धर्म  के ग्रंथों में वर्णित है। यह जलप्रलय तो भविष्य में कैद है, किन्तु यहाँ तो रोजमर्रा की जिन्दगी में जल आँखे दिखाते आता है। जिन क्षत्रों में बाढ़ मुसलसल आती है, वहाँ समुद्र में शेषनाग की शैय्या पर सोए विष्णु को बाढ़ के पानी में बह रहा फूले पेट बाले भैंस का बिम्ब कब का अपदस्त कर चुका है।
जल जिसका स्पर्श मन की मिट्टी कोड़ देती है, उसी जल की ऑक्टोपसी भुजाएं हमारे जीवन का रस निचोड़ने के लिए भी बढ़ती है। उतर बिहार (मिथिलांचल) में बाढ़ लोकस्मृति का हिस्सा हो चुकी है। यहाँ कहा जाता है कि ‘जुनि वियाहू बेटी कोसिकनहा, होथि वर चाहे कान्हा (कृष्ण भी वर हों तो भी पुत्री को कोसी किनारे नहीं ब्याहिए।) एक सतत बेघरी का अह…

कला का आलोक : ७ : छायालोक

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