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नई कवयित्री मोनिका कुमार की दो कविताएं




 जिन्होंने लाड़ से पुकारा
    
    उन्होंने मेरे नाम को छोटा किया
जिन्होंने लाड़ से पुकारा
अधिकार का पहला संकेत
मुझे मिलता है ऐसे ही एक घरु नाम से

पैंतीस की उम्र में
अपने नाम में घुले व्यंजनों और स्वरों के
मेरे पास कई युग्म है
जो मेरी माँ के लिए अकल्पनीय हैं
जिसने यह नाम सोचा
मेरे पैदा होने से पहले
अपनी एक विद्यार्थी के नाम पर
जो उसे कक्षा में सबसे प्यारी थी
पहनती थी सलीके से यूनिफार्म
और अंग्रेजी में होशियार थी

मैंने कभी नहीं देखा वह कौन लड़की है
वह खो गई दुनिया में
वह कोई भी हो सकती है
किसी भी शहर में
उन चेहरों में कोई भी
जिन्हें देखा और भूल गई 

माँ चौकन्नी हो जाती
जब किसी ने मेरा नया नाम रखा
उसे डर लगता
शायद मैं प्रेम में पड़ने वाली हूँ
या ऐसी दोस्ती में
जहाँ मेरे दिल को पीड़ा हो सकती है
वह सुबह मुझे जगाती
पूरे नाम के उच्चारण पर बल देते हुए
ऐसी चेतावनी को मैं हंस कर सुनती
और खनखनाते रहते दूसरे नाम

प्रेम के न रहने का
दोस्ती के छूट जाने का
पहला संकेत वही रहता
दिए  हुए छोटे नाम का बेदावा
और मुझे लौटना होता
नाम के ऐसे उच्चारण पर
जैसे कोई पढ़ रहा हो
टेलिविज़न पर
भूकम्प के उत्तरजीवियों की सूची
जिन्हें अब तक कोई लेने नहीं आया है
***

      कोई मतभेद नहीं

लंग पर बिछी है चादर
जिस पर ट्यूलिप छपे हुए हैं

असली आकार से विराट
छूने में फूल नहीं
और सुगंध जरा-जरा साबुन की
फिर भी ये ट्यूलिप हैं
दूसरी किस्म के ट्यूलिप
दो किस्मों का आपसी कोई मतभेद नहीं

पर्दों पर फूल हैं
गलीचे पर फूल
खाने की प्लेट पर फूल हैं
पहनती हूँ अक्सर वे कुर्ते
 
जिन पर बने रहते हैं कोई--कोई फूल 

क्या हमें फूलों की इतनी याद आती है ?
क्या हम फूलों की याद में रहते हैं ?
हमें चुभता है कुछ शायद
फूल जिसे सहलाते रहते हैं

मेरी दोस्त ने पहनी थी जो कमीज़
उस पर छपे थे अनाम फूल
मैंने पूछा जानती हो क्या नाम है इनका
उसे नहीं अच्छा लगा यह प्रश्न
कोई जरूरी नहीं है कि नाम हो फूलों का
और जरूरी नहीं कि हर पहनी हुई चीज़ का नाम मालूम हो
 
कुछ लोग मुझे बहुत आश्वस्त करते हैं
कि जिज्ञासा कोई विशेष गुण नहीं
इसीलिए मैंने रोक लिया खुद को
जब मैं पूछना चाहती थी दर्जी से
क्या वह ध्यान रखता है इस बात का
कि लड़कियों की कमीज़ की तुरपाई करते हुए 
फूलों की डंडियाँ ना कट जाएँ
उस दोस्त की मुझे अक्सर याद आती है
उसकी तरफ से बहुत बार खुद को डपट देती हूँ

जैसमीन के फूलों की चाय पीते हुए
रूमानी हो जाती हूँ
 
बालकनी से सड़क को झांकती हूँ
यह जो महक रहा है चाय के संग 
यह जरुर कुछ और होगा 

मेरे अधिकतर कवि मित्र
प्लास्टिक के फूल पसंद नहीं करते
मेरी एक फोटो के पीछे
घर में पड़े गुलदान में सजे
प्लास्टिक के ट्यूलिप भी नजर आ रहे थे
कवि मित्र को बुरा लगा
कि यूँ हमारे घर में प्लास्टिक के फूल सजाए जाते हैं
मैंने मन-ही-मन जवाब दिया उन्हें
ये भी ट्यूलिप हैं
 
तीसरी किस्म के ट्यूलिप 
और तीनों का आपसी कोई मतभेद नहीं
*** 

[ मोनिका कुमार हिंदी की युवा कवयित्री हैं। इनकी कविताएं अभी बिलकुल अभी नुमाया हो रही हैं। इस आरम्भ की एक बानगी सबद पर दो नई कविताओं के ज़रिये। कवयित्री की तस्वीर उनके सौजन्य से। कविता के साथ दी गई तस्वीर गूगल से। ]

Comments

दोनों कविताएँ पसंद आयीं। मोनिका हमेशा प्रभावित करती रही हैं .सबद का आभार .
गुड वर्क मोनिका.

चीयर्स !
बहुत सुंदर कविताएं। बहुत आश्‍वस्‍त करने वाली कविताएं। मज़े की बात : पहली कविता में तीन नाम हैं, एक रूप है। दूसरी में तीन रूप हैं, एक नाम है। यह पहचान की पगथली को सहलाने की तरह है, अपनी भी, अन्‍यों की भी। एक चिंता यह है कि नाम की जो नम रेत है, उस पर किसकी अंगुलियों के निशान दर्ज होते हैं, कितनी अंगुलियों के निशान। दूसरी चिंता यह है कि फूल-सा एक कोमल ख्‍़याल, कांटों से क्‍लांत ख्‍़याल, कैसे कृत्रिमता का कवच सहर्ष धारण करता है। अपने को स्‍थगित करता है अपनी गंध तक को त्‍यागकर। इन दोनों चिंताओं का एक क्षितिज है, और वह कवयित्री मोनिका का क्षितिज है। नाम-रूप, फेन-फूल, बस यही।
हैं अनंत शुभकामना, नित बने नए आयाम |
सेवा करे साहित्य की, हो शुभ ही परिणाम ||

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (19-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
सूचनार्थ |
MUKESH MISHRA said…
मोनिका कुमार जी की यह कविताएँ कई बार डायरी के पन्नों की तरह पर्सनल सी लगती हैं । जीवन से जुड़े मतलब के और कभी बे-मतलब के-से प्रसंगों के प्रति गहरी आत्मीयता और बेचैनियों से बना जो ताप यहाँ महसूस होता है वह बने-बनाये साँचों, बार-बार दोहराये जाने वाले टोटकों या उधार की सैद्धान्तिकीयों से नहीं बना है । वह पर्सनल के भीतर से उसके सामाजिक राजनीतिक आशय तक की यात्रा तय करता है । वह संयत संवेदना के छोटे-छोटे क़दमों से चल कर ज्ञानात्मक इशारों तक पहुँचता और पहुँचाता है । एकरूपता के बरअक्स जीवन के अलक्षित रह जाने वाले प्रसंगों और भावों को पकड़ने की जो कोशिश इन कविताओं में है, उसे नज़रअंदाज़ कर पाना मुश्किल ही है |
इधर कुछ समय से मोनिका कुमार की कविताओं से साक्षात्कार रहा है। उन्की कविताओं पर तुरंत कुछ कहना मुश्किल होता है। अभी बस यही कह सकता हूँ कि मोनिका आज की हिन्दी कविता में अपने किस्म की अलग युवा स्वर् है हैं जो विचारों को भाषा के अंतरंग दायरे में ले जाती है।
kailash said…
प्रेम के न रहने का
दोस्ती के छूट जाने का
पहला संकेत वही रहता
दिए हुए छोटे नाम का बेदावा
और मुझे लौटना होता
नाम के ऐसे उच्चारण पर
जैसे कोई पढ़ रहा हो
टेलिविज़न पर
भूकम्प के उत्तरजीवियों की सूची
जिन्हें अब तक कोई लेने नहीं आया है
ramji said…
कवितायें पसंद आयीं ..बधाई आपको
Geet Chaturvedi said…
अच्‍छी कविताएं.
kavilok said…
बहुत अच्छी लगी मुझे मोनिका जी कि कविता ....उनको बधाई ..... और आपको " शुक्रिया " कहकर तो मै थक गया हू अनुराग भाई ........
प्रेम के न रहने का
दोस्ती के छूट जाने का
पहला संकेत वही रहता
दिए हुए छोटे नाम का बेदावा
और मुझे लौटना होता
नाम के ऐसे उच्चारण पर
जैसे कोई पढ़ रहा हो
टेलिविज़न पर
भूकम्प के उत्तरजीवियों की सूची
जिन्हें अब तक कोई लेने नहीं आया है
***
बिलकुल नए आस्वाद बिम्ब अर्थ और भाव की रचना ,सुन्दर मनोहर .

ram ram bhai
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बुधवार, 19 दिसम्बर 2012
खबरें ताज़ा सेहत की

http://veerubhai1947.blogspot.in/
बहुत सुन्दर कविताएं...मोनिका की अपनी पहचान के साथ। आश्चर्य हुआ यह जान कर कि मोनिका नई कवियित्री हैं।
प्यार के नामों और फूलों के छापों जैसी प्यारी और शरारती कवितायें . उत्तरजीवी शब्द अगर सर्वाइवर्स के लिए आया है तो पुनर्विचार का हक़दार है . आशय शायद जीवित बचे लोगों से है.
Kamal Choudhary said…
Monika jee aap bahut accha likhtee hai.badhai! Anuraag jee abhaar. - kamal jeet Choudhary ( j and k )

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