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Showing posts from November, 2012

सबद पुस्तिका - 8 - ईमान मर्सल की कविताएं

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30 नवंबर 1966 को जन्मी ईमान मर्सल अरबी की सर्वश्रेष्ठ युवा कवियों में से एक मानी जाती हैं। अरबी में उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और चुनी हुई कविताओं का एक संग्रह, ख़ालेद मत्तावा के अनुवाद में, 'दीज़ आर नॉट ऑरेंजेस, माय लव' शीर्षक से 2008 में शीप मेडो प्रेस से अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ। अरबी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ईमान ने बरसों काहिरा में साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं का संपादन किया। 1998 में वह अमेरिका चली गईं और फिर कनाडा। अंग्रेज़ी के अलावा फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, हिब्रू, स्पैनिश और डच में उनकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है। उन्होंने दुनिया-भर में साहित्यिक समारोहों में शिरकत की है और कविता-पाठ किया है। वह एडमॉन्टन, कनाडा में रहती हैं और अलबर्टा यूनिवर्सिटी में अरबी साहित्य पढ़ाती हैं।

ईमान बर्लिन-प्रवास पर हैं और इन दिनों अपने नए संग्रह पर काम कर रही हैं, जो पहले अरबी, फिर अंग्रेज़ी में प्रकाशित होगा।

यह सबद-पुस्तिका आज उनके जन्मदिन पर प्रकाशित हो रही है। हिंदी व भारतीय भाषाओं में यह ईमान की पहली पुस्तकाकार प्रस्तुति है। अंग्रेज़ी में उपल…

दो नई कविताएं : कुंवर नारायण

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पवित्रता

कुछ शब्द हैं जो अपमानित होने पर
स्वयं ही जीवन और भाषा से
बाहर चले जाते हैं

'पवित्रता' ऐसा ही एक शब्द है
जो अब व्यवहार में नहीं,
उसकी जाति के शब्द
अब  ढूंढें नहीं मिलते
हवा, पानी, मिट्टी तक में

ऐसा कोई जीता जागता उदहारण
दिखाई नहीं देता आजकल
जो सिद्ध और प्रमाणित कर सके
उस शब्द की शत-प्रतिशत शुद्धता को !

ऐसा ही एक शब्द था 'शांति'.
अब विलिप्त हो चुका उसका वंश ;
कहीं नहीं दिखाई देती वह --
न आदमी के अन्दर न बाहर !
कहते हैं मृत्यु के बाद वह मिलती है
मुझे शक है --
हर ऐसी चीज़ पर
जो मृत्यु के बाद मिलती है...

शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में...

ज़िन्दगी से पलायन करते जा रहे हैं
ऐसे तमाम तिरस्कृत शब्द
जो कभी उसका गौरव थे.

वे कहाँ चले जाते हैं
हमारे जीवन को छोड़ने के बाद?

शायद वे एकांतवासी हो जाते हैं
और अपने को इतना अकेला कर लेते हैं
कि फिर उन तक कोई भाषा पहुँच नहीं पाती.
****


जंगली गुलाब

नहीं चाहिए मुझे
क़ीमती फूलदानों का जीवन

मुझे अपनी तरह
खिलने और मुरझाने दो
मुझे मेरे जंगल और वीराने दो

मत अलग करो मुझे
मेरे दरख़्त से

जो उसे पढ़ सके, वह कवि जन्मे

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कवि कह गया है : 8 : ओक्टावियो पाज़ 


एक कविता का अर्थ कवि क्या कहना चाहता था, उसमें नहीं, दरअसलकविताक्या कहती है, वहां मिलता है। 

रुदन और चुप्पी, अर्थ और निरर्थ के बीच कविता खड़ी होती है। शब्दों की यह दुबली धार क्या कहती है ? यह कहती है कि मैं कुछ भी ऐसा नहीं कह रही, जिसे पहले चुप्पी और हल्ले में नहीं कहा गया है। जब यह इतना कह देती है तो कोलाहल और ख़ामोशी ख़त्म हो जाती है। 
कविता अर्थ के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष में शामिल रहती है। इसके दो छोर हैं : पहला, जहाँ वह हर मुमकिन अर्थ को घेरे रहती है, दूसरा, जहाँ वह भाषा को कोई अर्थ देने से ही मना कर देती है। मलार्मे पहले छोर पर हैं, दादा दूसरे। 
कविता अवर्णनीय होती है, अबोधगम्य नहीं। 
कविता को पढ़ना, आँखों से सुनना है। इसे सुनना, कानों से देखना।
हर पाठक एक अन्य कवि है। हर कविता एक इतर कविता। 
कविता पढ़ने वाले को उकसाए। उसे खुद को सुनने के लिए बाध्य करे। 
एक लेखक की नैतिकता, वह जिस विषय को लेकर चलता है या जिन तर्कों के सहारे अपनी बात कहता है,  उसमें न होकर, भाषा के साथ उसके बर्ताव में निहित होती है। 
कोई कवि नहीं हो सकता, यदि उसमें दी गई भाषा को नष्ट करने…

महेश वर्मा की नई कविताएं

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प्रेमी ज़मीन से

प्रेमी ज़मीन से कुछ भी उठा सकते हैं, एक बटन,
कंघी का टुकड़ा या चमकीली पन्नी. अचेतन में
वे इन सबके गैर पारंपरिक उपयोगों के बारे में सोचते हों.

वे उठा सकते हैं एक टूटी हुई सीप का टुकड़ा और समुद्र
एक टुकड़ा उनकी उँगलियों के बीच आ जाता है उनकी उदास
आँखों में हैरत से देखता.

चूड़ी का एक टुकड़ा उठाते वे वास्तव में इन्द्रधनुष
का लाल रंग ज़मीन से उठा रहे थे कि आज
दोपहर भी सर्वांग सुन्दर दिखाई पड़े आकाश का इन्द्रधनुष .

एक रंगीन कागज उनकी उँगलियों के बीच कभी जानवर कभी
बन्दूक कभी नाव बनता, फिर कागज हो जाता किसी को मालूम नहीं
यह खेल ही बना रहा आकाश , जल और भविष्य इस संसार का .

इसी धूल से उन्हें बनाना है भविष्य के पर्वतों का शिल्प
धूल जो उड़ा कर देख रहे हैं हवा का रुख इतनी देर से.

धातु का एक अमूर्त टुकड़ा ज़मीन से उठाएंगे एक रोज
और किसी के हाथ देकर थमा देंगे सम्राट होने का अभिशाप .
***

हमारे कवि

क्या कर रहे हैं
क्या उन्होंने लिख लिया यह अँधेरा
जो हमारे भी बीच फैला है .

उन्होंने आँखें ढांप तो नहीं ली थीं हाथ से
जब आया था प्रकाश .

वे लिख पाए क्या धूप से भी सुन्दर हंसी
जो फ़ैली हुई थी आकाश पर. उस सम…