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Showing posts from September, 2012

सबद विशेष : १४ : उपन्‍यास अंश : गीत चतुर्वेदी

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[ कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का उपन्‍यास 'रानीखेत एक्‍सप्रेस' जल्‍द ही प्रकाशित होने वाला है.
यहां प्रस्‍तुत है उस उपन्‍यास का एक अंश.]



 समय का कंठ नीला है

हमारी आत्मा का रंग नीला होता है। सारी आत्माएं शिव के नीले कंठ में निवास करती हैं, अपना रंग वहीं से लेती हैं।
मेरे इस प्रेम का रंग नीला है। मैं इसे अपने कंठ में धारण करती हूं। आधी रात जब पास में कोई नहीं होता, कमरे की पीली बत्तियां अपनी चमक से थक चुकी होती हैं, यह नीला प्रेम आंखों के भीतर करवट लेता है। गले के भीतर इसकी हरकत महसूस होती है।
प्रेम में डूबी लड़कियों के गले पर स्पर्श करोगे, तो पाओगे, अंदर कांटे भरे हैं। गुलाब के डंठल की तरह।
यह रुलाहट को रोकने की कोशिश में उगने वाले कांटे होते हैं।
मुझे हेनरी मातीस का वह कथन याद आता है, 'नीला रंग आपकी आत्मा को चीरकर भीतर समा जाता है।'
वह ऐसा ही प्रेम था।
वह मेरे बचपन का दोस्त था। उस बचपन का, जिसकी स्मृतियां भी हमारे भीतर नहीं बचतीं। उस समय उसका परिवार हमारे ठीक पड़ोस में रहता था। दस-बारह की उम्र तक हम साथ खेले, साथ दौड़े। हम साथ-साथ पॉटी भी करते थे, जब तक कि इसके लिए हमारे घरवा…

विचारार्थ : ३ : विष्णु खरे का लेख

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[ यह एक अनिवार्य हस्तक्षेप है और यहाँ से समसामयिक हिन्दी साहित्य का इतिहास नई करवट ले रहा है. पक्ष बन रहे हैं, पक्ष बिगड़ रहे हैं. दृश्य में अफ़रातफ़री, री-पोजीशनिंग और व्यक्तिपरकता है लेकिन हम सबकुछ को वैचारिक समर का हिस्सा मानते हैं और ज़रूरी मुद्दों पर बहस करना चाहते हैं. यह लेख हमारा ऐसा ही प्रयत्न है. यह सिर्फ़ एक साहित्यिक सवाल नहीं है. साम्प्रदायिकता और विचारहीनता सबसे बड़े नागरिक संकट हैं, इन्हें बेनामी प्रहार, चतुराई, विषयान्तर या हमारी ही भर्त्सना से टाला नहीं जा सकता. हम संकट के बीच खड़े होकर बात कर रहे हैं और सबसे ऎसी ही उम्मीद करते हैं.
- व्योमेश शुक्ल. ]
  कान्हा ने कई गोप-गोपियों की मटकियाँ फोड़ीं
विष्णु खरे

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा नियंत्रित सांस्कृतिक केंद्र भारत भवन के कार्यक्रमों में प्रगतिकामी तथा धर्मनिरपेक्ष लेखक जाएँ या न जाएँ इसे लेकर चिंतित भोपाल के तीन सुपरिचित कवियों द्वारा  पिछले दिनों दो सार्वजनिक वक्तव्य जारी किए गए हैं जिनमें से पहले के अपने उत्तर में मैंने यह भी लिखा था :आज कस्बों,बड़े शहरों और महानगरों में कुकुरमुत्तों जैसी बहुत सारी छोटी-बड़ी निजी…