Friday, June 08, 2012

प्रेमियों के हिस्से खुशियाँ नहीं बदी हैं

[ सीज़र पावेसी इतालवी भाषा के बड़े कवि-लेखकों में शुमार किए जाते हैं. पावेसी का निजी जीवन बहुत खुशहाल नहीं था. जैसा कि नेरुदा ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है : एक कवि की ज़िन्दगी में चुम्बन और थप्पड़, दुलार और ठोकर एक साथ आते हैं, पावेसी के हिस्से भी यह सब आया और उन्हें एक बिंदु पर बहुत हताश कर गया. अपनी डायरी ''बिजनेस ऑफ़ लिविंग'' में उन्होंने इस हताशा को बहुत निर्ममता से दर्ज़ किया है. पावेसी की प्रेम और कम्युनिस्ट पार्टी पर गहरी आस्था थी और दोनों से ही निराश होकर उन्होंने ४१ साल की कम उम्र में आत्हत्या कर ली. आगे दिए जा रहे प्रेम पर केन्द्रित वाक्य पावेसी की डायरी से लिये गये हैं. पावेसी ने डायरी में एक जगह लिखा है कि हर आदमी अपनी योग्यता के अनुरूप ही अपना दर्शन निर्मित करता है. इन पंक्तियों से उभरने वाला दर्शन पावेसी का है : निजी, मर्मभेदी, कटु-तिक्त !
पावेसी की तस्वीर गूगल से है जबकि आगे दी गई तस्वीर  फिल्ममेकर किम की-दुक की फ़िल्म  ''टाइम'' से है. ]    
यह साफ़ है, है कि नहीं, कि बगैर उसके, तुम्हें जीना अकारथ लगेगा ? और यह भी, कि वह अब कभी तुम्हारे पास लौट कर आने से रही. गर आ भी गई तो तुम दोनों ने एक-दूसरे का जी इतना दुखाया है कि साथ रह न सकोगे. तब क्यों... ? 

तुम इस सच्चाई का सामना क्यों नहीं कर पा रहे कि एक दिन, शायद कल ही, वह उसके साथ ट्रेन पकड़ चली जायेगी और तुम उसे फिर कभी सुन नहीं पाओगे ? कभी भी नहीं. मानो तुम मृत होओ.

अगर  मैं जीवित न रहूँ तो भी वह जीती रहेगी, हंसेगी, औरों से दिलजोई करने से नहीं चूकेगी. लेकिन उसने मुझे अभी से परे कर दिया है, तिस पर यह सब कर भी रही है. लिहाजा मैं मृत हूँ. 

किसी प्रेमिका को खो देने पर अपने आप को कलपाते रहना बेवकूफी है : तुम उससे कभी मिले ही नहीं, इसलिए उसके बिना रह सकते हो.  

ऐसा मुमकिन है कि औरतों के बारे में सोचा ही न जाए. वैसे ही जैसे कोई अपनी मौत के बारे में नहीं सोचता. 

औरतें : १. वे जो पुरुषों का शोषण करती हैं.
२. वे जो पुरुषों को शोषण करने देती हैं.
पुरुष : १. वे जो पहली किस्म की औरतों से प्यार करते हैं.
२. वे जो दूसरी किस्म की औरतों से प्यार करते हैं. 

महान प्रेमियों के हिस्से खुशियाँ नहीं बदी हैं, क्योंकि उनके लिए प्रेम ही सबकुछ है. उससे अहम कुछ नहीं. 

दुखी
रहना एक कमज़ोरी है. 

एक दुखी आदमी के दुःख को नकार कर तुम उसका सबसे भद्दे ढंग से अपमान कर सकते हो. 

'' मैं दिल से अब भी तुम्हारे साथ हूँ '', यह नीचा दिखाने वाला एक  ऐसा पदबंध है, जो एक बेहतर एक बदतर से कहता है.

'' मैं तुम्हें कभी भूल नहीं सकती '', किसी से यह कहने का मतलब उसे छोड़ देना है.   

ऐसी दया, जो इसलिए प्रकट की जाती हो क्योंकि हम दुखों से हारे हुए हैं, उन दुखों से ज़्यादा खराब है. 

यह जानते हुए भी कि प्रेम स्नेह/सराहना के भाव से पैदा होता है, किसी ऐसे को पाना, जो तुम पर तरस खाकर तुमसे प्रेम करने लगे, सचमुच त्रासद है. 

कोई किसी स्त्री के प्रेम की खातिर आत्महत्या नहीं करता. हम ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि प्रेम - किसी भी किस्म का प्रेम -   हमें हमारी नंगई में, हमारी विपदा में,  हमारे लिजलिजेपन में, हमारे खोखलेपन में उजागर करने  लगता है.    

जब तुम प्रेम में न होओ तो तुम्हारे लिए अच्छा बने रहना कहीं आसान है. 
**** 
                                                                                                                       अनुवाद :  अनुराग वत्स

36 comments:

Arvind Kumar Awasthi said...

sundr panktiyan

sarita sharma said...

व्यक्तित्व के दो पहलुओं के माध्यम से प्रेम की निर्मम चीर-फाड की गयी है.प्रेम हमारी सब कमजोरियों को उजागर कर देता है और प्रेमिका द्वारा नकार दिए जाना सबसे बड़ी विफलता लगती है.हम अपना मूल्यांकन औरों की नजर से करवाते हैं जो हमेशा ठीक नहीं होता.

आवेश said...

क्या बात है ,गजब

anita shrivastava said...

jab tum prem mein na ho to jina sabke liye asan ho jata hai

सिद्धान्त said...

प्रेम का जो सबसे कठिन पक्ष है, उसे ही यहाँ पावेसी बताते हैं. उनका ऐसी बातें करना इस बात को समझाना है कि मेरे हिस्से प्रेम की खुशियाँ नहीं है. सारी बातें तो गाहे-बगाहे प्रेम में सामने आ ही जाती हैं, लेकिन इस बात से इस गद्य को कितना बल मिलता है कि :'' मैं दिल से अब भी तुम्हारे साथ हूँ '', यह नीचा दिखाने वाला एक ऐसा पदबंध है, जो एक बेहतर एक बदतर से कहता है.
सुन्दर भई....बहुत सुन्दर.

Puja Upadhyay said...

शुक्रिया अनुराग...सीजर पावेसी से परिचय के लिए. सबद पर जब भी किसी नए लेखक, कवि, अनुवादक, सर्जक, रचनाकार से मिलती हूँ अनुवाद को लेकर मेरे पूर्वाग्रह सिमटने लगते हैं. यहाँ अनुवाद की अपनी आत्मा होती है, अपने शब्द होते हैं, वो बैसाखियों पर चलती नहीं दिखती.

मुझे लगता है तुम अनुवाद के लिए अंश भी उतने ही निर्मम होकर चुनते हो जैसी निर्ममता से पावेसी ने प्रेम के इस आखिरी पक्ष को शब्दों में रखा है. बेहद अच्छी और संजोये रखने लायक पोस्ट.
मुझे ये पंक्ति सबसे अच्छी लगी...

'महान प्रेमियों के हिस्से खुशियाँ नहीं बदी हैं, क्योंकि उनके लिए प्रेम ही सबकुछ है. उससे अहम कुछ नहीं.'

प्रवीण पाण्डेय said...

एक एक वाक्य चिन्तन करने योग्य।

neera said...

आह! मर्मभेदी, कटु-तिक्त ! प्रेम पीड़ा से लबालब !

पारुल "पुखराज" said...

bahut badhiya post,anuvaad...sundar ansh..

अनुपमा पाठक said...

बेहद सुन्दर अनुवाद.
आभार!

Priyankar said...

बहुत कठिन है डगर पनघट की :

'जब तुम प्रेम में न होओ तो तुम्हारे लिए अच्छा बने रहना कहीं आसान है'

'महान प्रेमियों के हिस्से खुशियाँ नहीं बदी हैं, क्योंकि उनके लिए प्रेम ही सबकुछ है. उससे अहम कुछ नहीं.'

सच्चे,ईमानदार और प्रेम में आकण्ठ डूबे कवि की उदात्त वैचारिक सिहरनें और प्रेम के मन-शरीर की ऐसी विकट शल्यचिकित्सा. सचमुच मर्मभेदी . आभार ! अनुराग .

leena malhotra said...

antim pankti se meri asahmati hai..mujhe lagta hai ki jab ham prem me hote hain to bahut achhe hote hain.. aur kisi kunthha ya avsaad me nhi padte.. chidchidapan to koi ajnabi feeling hoti hai.. bina pryaas ham behtar hote jaate hain har roz.. yaad rahega.. 'महान प्रेमियों के हिस्से खुशियाँ नहीं बदी हैं, क्योंकि उनके लिए प्रेम ही सबकुछ है. उससे अहम कुछ नहीं.'

Geet Chaturvedi said...

अच्‍छे अनुवाद हैं. पंक्तियों का चयन भी सुंदर है.

उन्‍होंने अपनी कविता, रचना प्रक्रिया, बिंबों के प्रयोग में नव्‍यता के प्रस्‍ताव पर अपने दृष्टिकोण आदि पर कई सुंदर बातें लिखी हैं, इस किताब में.

धीरे-धीरे उनका चयन भी अनुवाद कीजिए.

A Makin said...

अनुराग, आपका अनुवाद लाजवाब है ; कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ, जितनी थोड़ी बहुत मुझे समझ है ।

प्यार किसी परिभाषा का मोहताज नहीं, कही पड़ा था । यह हर रंग का प्रतीक और सब रंगों का समागम है। आपको इसमें दुःख , सुख , वैराग्य, परमानन्द, प्रबोधन..सब कुछ मिलेगा ।

ये आपके ऊपर निर्भर करता है की आप इसका कौन सा रंग अपनाएंगे । गर आप खुद एक possessive और jealous इंसान है, तो प्यार आपको दुःख के सिवा कुछ नहीं दे सकता ।

अगर आप insecure है और अपने प्रेमी पर बेतहाशा निर्भर करते है, या cling करते है, तो प्रेमी आपका साथ ज्यादा दिन नहीं निभा पायेगा ।

अगर आप अपने प्रेमी की इछाओं और महत्वांक्षाओं का ख्याल रखते है , अपनी ज़िन्दगी के मायने प्रेमी के पैमानों पर नहीं नापते , उसके अस्तित्व को सराहते है और पनपने देते है , उसको अपनी इच्छाओं का ग़ुलाम बना कर नहीं रखना चाहते , तो यक़ीनन आपको प्रेम सुख देगा , फिर चाहे आप कवि हो , उपन्यासकार हो, या अमरीका के प्रधान मंत्री !

हमें सबसे पहले अपने आप से प्रेम करके , खुद को इस लायक करना चाहिए की कोई दूसरा हमें प्रेम कर सके। हम पहले खुद को पूरा करे , किसी और की प्रतीक्षा न करके । इसी पूर्णता में प्रेम है । दो आधे लोग कभी पूरे नहीं हो सकते । पर दो पूरे लोग जब मिलते हैं , ज़रूर पूर्णता की परिभाषा को उज्जवल करते हैं ।

ViDishA said...

brilliant translation!!

Manohar said...

Na jane kyun padhte hue Neruda yaad aaye .."love is short, forgetting is long"..ek premi ki kawayad us smriti ko mitane ki, us smriti se ladne ki jahan kahin uska prem basta ho...jisme use naye naye roop dekar wah use kahin bhoola bhee dena chahta hai, kaheen apne andar kaid bhee kar lena chahta hai....ye diary kewal prem k dwanda ko hi nahi darshate jo premi k andar hota hai par wah bhee jo prem me hota hai aur wah bhee jab prem aur kavita aur kavi kahin ek doosare se jhoojh rahe hote hai....

Vipin Choudhary said...

दुखी रहना एक कमज़ोरी है.
shandaar anuwaad hamesha kee tarah

शायदा said...

very gud anurag.

हिमानी said...

एक एक लाइन जैसी जिंदगी की सूक्ति हैं...फीलिंग ग्रेट रीडिंग ऑल दिस

Mita Das said...

JAB YuM PREM ME NAHI HO......TAB........KYA BAT HaI....ANUVAD ACHhA HAI ........

अमित श्रीवास्तव said...

एक एक शब्द अर्थपूर्ण |

शशिभूषण said...

गाढ़ी प्रस्तुति। सुंदर अनुवाद। 'दिलजोई'एक भूला हुआ शब्द मिला।

विम्मी सदारंगानी said...

वाकई प्रेम में डूबे, बेहद हताश दिल की बात.. ४१ साल की उम्र में आत्महत्या.. पावेसी की डायरी से यह सब शेयर करने के लिए शुक्रिया अनुराग जी..

बाबुषा said...

SuperLike !

दर्पण साह said...

दोस्त सीज़र पावेसी तुमने प्रश्न तो किये पर तुम उत्तर नहीं ढूंढ पाए,
तुमने प्रेम समझने की कोशिश की पर...
पर तुम बाल बराबर चूक गए. मैं तुमसे प्रभावित होने के स्तर तक असहमत हूँ.

(और ये असहमति खोखली नहीं 'वैचारिक' नहीं अपितु अनुभव की असहमति है.)

अखिलेश चंद्र said...

Mujhe jo sabse achchhi panktiyan lagi wo hain-यह जानते हुए भी कि प्रेम स्नेह/सराहना के भाव से पैदा होता है, किसी ऐसे को पाना, जो तुम पर तरस खाकर तुमसे प्रेम करने लगे, सचमुच त्रासद है. Mazedar post.

Pratibha Katiyar said...

सुन्दर!

AMRITA BERA said...

इस पोस्ट को मैंने पहले भी पढ़ा था। बहुत उम्दा है "ऐसा मुमकिन है कि औरतों के बारे में सोचा ही न जाए. वैसे ही जैसे कोई अपनी मौत के बारे में नहीं सोचता"। शायद पावेसी तिक्त होकर ऐसा ही कुछ करने की कोशिश कर रहे थे,पर उल्टा ही हो गया, प्रेम से वंचित हो उन्होंने सहजता से मौत को चुन लिया। अनुवाद हमेशा कि तरह बहुत अच्छा है।

Sweety Pathak said...

nothing was lost in translation...loved each and every line...

श्रद्धा (SHRADDHA) said...

I think if u cant love to the people who have given u this life, then any other kind of love means nothing.

Jasmine Mehta said...

हर इक वाक्य गहन अउर अर्थपूर्ण, साथ ही गआह्रॅ छुनेवाला तीव्र। बेहद सुन्दर अनुवाद

Amar Singh Amar said...

हर पंक्ति दिल को छू गयी।

अमिताभ श्रीवास्तव said...

पावेसी को पढ़ा है और खुद ही खुद में उसके आनंद , उसके दुःख , उसके प्रेम को अनुभव करते हुए दिमाग के किसी कोने में रख लिया , किन्तु अनुवाद कर उसे सर्वजन के लिए उपलब्ध कराने जैसा विचार नहीं आया , जो आपने कर दिखाया। हालांकि ये सागर में बूँद जैसा है किन्तु ये बूँद भी प्यास बुझाने जैसी है। धन्यवाद अनुराग वत्स।

Ranjana Dubey said...

वाह बहुत सुंदर...💐💐

Anupama Sharma said...

ऐसी दया, जो इसलिए प्रकट की जाती हो क्योंकि हम दुखों से हारे हुए हैं, उन दुखों से ज़्यादा खराब है.

Monika Bhardwaj said...

I loved it!