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Showing posts from April, 2012

कला का आलोक : ५ : प्रत्यक्षा

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[ फिल्म हमारे समय का एक विलक्षण कला-माध्यम है. फ़िल्में देखते हुए हम उस आत्मिक-बौद्धिक अंतर्क्रिया का अनुभव कर सकते हैं जिसकी गुंजाइश अन्य कला-माध्यमों या पुस्तकों में होती है. हिन्दी की चर्चित कहानीकार प्रत्यक्षा के जर्नल्स से ऐसी ही अंतर्क्रियाओं का एक कलन इस स्तम्भ में दिया जा रहा है. ]

बेला तार की ‘द ट्यूरीन हॉर्स’ में पहले दिन किसान और उसकी बेटी का गर्म भपाये आलूओं को छीलना और खाना।इतना गर्म कि हाथ फूँकना पड़े और इतनी भूख कि बावज़ूद मुँह में ऐसे हबड़-तबड़ डाला जाये। फिर निस्पृह खिड़की से बाहर देखना, जैसे इस भूख से वास्ता किसी और का था, कि उसके भीतर कोई और था जो भोगता-देखता था।  ***

शोएब मंसूर की पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' और बहमन घोबदी की 'टर्टल्स कैन फ्लाई' और 'अ टाईम फॉर ड्रंकेन हॉर्सेस'...तीन अलग फिल्में...तकलीफ और यंत्रणा का सर्रियल लैंडस्केप...आप भाग निकलना चाहते हैं फिर किसी अबूझ डोर से बँधे भी रहते हैं। इसके बरक्स कल देव साहब पर बात करते एक दोस्त ने कहा 'ही वाज़ द टिनटिन ऑफ आर हार्ट्स'...एक भोले समय की भोली मीठी याद...जैसे जीवन में एक से दूसरे और …

अम्बर रंजना पाण्डेय का गद्य

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[ कवि अम्बर रंजना पाण्डेयका कविता से बाहर, गद्य का यह पहला मजमून है. सबद पर ही सबसे पहलेअम्बर की कविताएं छपी थीं, यहीं से अब कविताओं पर एकाग्र उनके गद्य का भी सिलसिला शुरू हो रहा है. यह सहज लक्ष्य किया जा सकता है कि अम्बर कविता में, और उससे इतर भी, अपनी कहन में न सिर्फ अलग ढंग के हैं, बल्कि उनका यह अलग ढंग, उन मंझोले अलगावों से आगे विलक्षण है, जिसमें फ़िलहाल बात करने से लेकर लिख-पढ़ कर कवि-लेखक बन जाने का चलन है. ] 
(painting :  Butch Payawal)
कवि,कामकलाऔर शुकध्वज की कथा
दसवीं कक्षा में प्राचीनकाल में लिखे कामशास्त्र ( सेक्स मैनुअल ) पढ़ने का मुझे चस्का लग गया. थोड़ी-बहुत संस्कृत आती थी और कोक शास्त्र की संकृत बहुत कठिन भी नहीं होती. उस समय बनारस जाना हुआ और बिंदुमाधव के मंदिर के निकट हम लोग पिताजी के पुराने मित्र राधाबेनी त्रिपाठी के यहाँ ठहरे. बिंदुमाधव की हवेली से चौक कितना दूर है! चौक पर ही चौखम्भा प्रकाशन की पेढ़ी. तब इन्टरनेट न था इसलिए पोर्नोग्राफी के लिए मैंने देवभाषा चुनी. घुमते-घुमते मैं चौखम्भा वालों की पेढ़ी पहुँच गया. 
सांध्यकाल एक अधेड़ पुरुष महादेव जी की आरती कर …

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं

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भाषा जब जब मैं इसका व्याकरण थोडा-बहुत सीख पाता हूँ, तुम किसी दूसरी भाषा का आविष्कार कर लेती हों. बिजली का बिल उस दिन आया और मैं पढ़ नहीं पाया. कविता लिखना बहुत दूर की बात हो गयी है. बीती रात जब चन्द्रमा निकल आया था अचानक जैसे कोई नेवला काट जाता है रास्ता भर दोपहर. मैं मस्तिष्क की सब शिराएँ खींच कर भी याद नहीं पाया कि चन्द्रमा को क्या कहते हैं. शब्दकोष में कैसे ढूंढता किन्तु ढूँढते ढूँढते पहुँच गया चन्द्रबिन्दु तक. मेरी भाषा तुमसे मिलने के बाद चन्द्रबिन्दु सी हो गयी है. यदि लिखूं कभी तुम्हें पत्र तो केवल चंद्रबिंदु ही चन्द्रबिन्दु बनाऊंगा. जान लेना तुम मेरी दशा केवल चन्द्रबिन्दु पढ़कर. इससे अधिक मैं नहीं लिख पाउँगा-- श.
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शरीर-१  
तुम्हारा शरीर बलिष्ट और सुन्दर है. जब प्रारंभ में स्त्री-देह से पहला परिचय हुआ था, नयी-नयी चेतना जागी थी तब सोचा नहीं था कभी कि मैं स्त्री-देह के लिए 'बलिष्ट' शब्द का प्रयोग करूँगा. तुम्हारे स्तन-कठोर, स्थितप्रज्ञ किसी abstract installation art जैसे धँस गए हैं मेरी दृष्टि में किन्तु तुम्हारी भंगिमाएं पक्षियों जैसी हैं जो मेरी आँख में पड़ते-पड़ते छूट…

संजय कुंदन की नई कविताएं

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ज्ञानी 

वह जो ज्ञानी है
जो अपने को तीसमार खां समझता है
एक अदृश्य घोड़े पर सवार रहता है
उसके पास एक अदृश्य मुकुट भी है
जो अक्सर वह सिर पर डाले रहता है

वैसे उसके पास एक अदृश्य दुम भी है
जिसे वह खास मौके पर बाहर निकालता है
फिर दुम क्या करती होगी
यह तो समझा ही जा सकता है

कई बार अदृश्य घोड़े पर चढ़ते समय
उसका अदृश्य मुकुट हिलने लगता है
जिसे संभालने के चक्कर में
वह गिर जाता है

जमीन पर गिरा हुआ ज्ञानी
ज्ञानी नहीं लगता
तब वह गला दबाकर
शब्दों को चबा-चबाकर नहीं बोलता
एक मामूली आदमी की तरह
अनुरोध करता है-जरा उठा दो भाई!
***

तुम 

एक मुश्किल रास्ता तुमने नहीं चुना
मुश्किल रास्ते ने तुम्हें चुना
तुम किसी सांचे के लिए नहीं बने
बेडौल पत्थरों ने तुम्हें प्यार किया

वे परित्यक्ता नदियां अंत-अंत तक तुम्हारा नाम लेती रहीं
जिन्हें मन के भूगोल में तुमने बार-बार बसाया
तुम किसी की पीठ पर सवार होकर नहीं चले
तुमने अपनी नाव खुद बनाई

यह क्या कम है कि सब जी रहे उधार का जीवन
और तुम्हारे पास है अपना आकाश,

अपनी लालसा में लिथड़े लोगों की भीड़ में
 तुम अलग से दिख जाते हो
 जब तुम इनकार करते हो किसी ह…

आइनों को देह की भूख होती है

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{ महेश वर्मा की नई कविताएं }
[ महेश वर्मा की कविताओं में प्रेम, स्मृति, इच्छा, अवसाद, उम्मीद, प्रतीक्षा जैसे तत्वों को अलगाना कठिन नहीं है. और इन मायनों में वह कठिनाई के कवि हैं भी नहीं. ध्यान उस सादगी की तरफ जाता है, जिससे वह मनुष्य मन के इन आदिम अनुभवों को बिना किसी आचार्य-मुद्रा में गए व्यक्त कर पाते हैं. ऐसा प्रत्येक सम्भवन हमें उस कवि- श्रम की भी ठीक-ठीक सूचना नहीं देता जो अन्यथा कई कवियों की कवितायें पढ़ते हुए यों ही मिल जाती है.
सबद पर इससे पहले महेश वर्मा की कविताएं यहां.
चित्र-कृति : ज्यां डफे की. ]








पहले उसने...

...सब जानते हैं कि हवा ने परिंदों को जन्म दिया लेकिन
उससे पहले उसने उनकी आँखों में आकाश रख दिया था कि (वे) उड़ सकें . ऐसे ही अँधेरे ने अपने अनुराग से चाँद को गढा और ये सिफत दी कि वो दूसरों की आँखों में सपने रख सके .
इसमें कोई छिपी हुई बात नहीं है कि आइनों को देह की भूख होती है, लेकिन पहले ही हवा ने (सब) हिला दिया था मेरे भीतर बन रही तु- -म्हारी प्रतिच्छवि को: शाम थी तुम उदास थी शाम उदास थी तुम ...लेकिन इससे भी पहले तुम्हारे होने ने ही मुझे गढ़ना शुरू क…