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Showing posts from January, 2012

मृत्यु ओर : काफ़्का

[ काफ़्का ने ये वाक्य मृत्यु ओर जाते हुए लिखे थे. बोलने की मनाहट के बीच. उन छोटे-छोटे स्लिप्स पर जो उनके और बाकी दुनिया के बीच एक पुल का काम करते थे. उन पुलों से होकर कोई मित्र आवाज़, स्पर्श या भूली-बिसरी बात भले उन तक आती रही, जीवन दूर भागता रहा. अपनी यातना और मरण में काफ़्का का अकेलापन, अवसाद और भय इन वाक्यों से झांकता है. उनके अभिन्न मैक्स ब्रॉड ने ऐसे अनेक स्याह-स्लिप्स को काफ़्का की डेथ-बेड से बटोर-नबेर कर उनकी मृत्यु के बाद इन्हें उनकी तमाम रचनाओं जितना महत्वपूर्ण मानकर ही छपवाया था. 'लेटर्स टू फ्रेंड्स, फैमिली एंड एडिटर्स' के अंतिम हिस्से में दिए गए इस चयन से क्रम-भंग कर कुछ वाक्य यहां अनूदित किए गए हैं. साथ में दी गई तस्वीर गूगल से.]
एक लम्हा अपना हाथ ही मेरे माथे पर रख दो
एक चिड़िया कमरे में आई.

क्या तकलीफ़ से कुछ वक्फे के लिए निजात मिल सकती है, मेरा मतलब है कुछ लम्बे वक़्त के लिए ?

कितना कष्टकर हूँ मैं आपके लिए... मेरी तकलीफ़ इससे और बढ़ जाती है कि मेरी वजह से परेशान होने के बावजूद आप सब मेरे प्रति कितने सदय हैं ! इन मायनों में हॉस्पिटल कितनी अच्छी जगह है.
आप कितने…

तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं / जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा

[ हालांकि अपने पहले संग्रह 'आलाप में गिरह' की कविताओं में भी, लेकिन उसके बाद की अनेक कविताओं में गीत चतुर्वेदी ने प्रेम को बतौर थीम बरतने के साथ-साथ उसके भीतर ऐसी जिरहें और जगहें तलाश की हैं, जिनका हिंदी में निर्वाह मुख्यतः कथा-रूपों में हुआ है. यों भी हमारा 'सेंटीमेंटल एजुकेशन' प्रेम को सात्विक, समर्पण का पर्याय और किसी भी किस्म की जिरह के बाहर रखने की सीख देता रहा है और ज़्यादातर कवि ऐसी शिक्षा के कायल भी रहे हैं. इसीलिए उनकी कविताओं में 'बिट्रेयल' को हीनतर अनुषंग या बहुत हुआ तो एक करुण-प्रसंग के तौर पर याद किया गया है. 'प्रेम की राजनीति' ( प्रेम और राजनीति !!!) जैसे विषय-संबंध कवियों ने समाज-वैज्ञानिकों के लिए रख छोड़े हैं. गीत ने कविता मेंख़ुश्‍की की बहुत परवाह किए बगैर इनप्रोज़ेक विषय-संबंधों को कविता की मुख्य-भूमि पर खड़ा कर दिया है. और देखिए ऐसा करते हुए वे कितना सजग, भिन्न और अभिनव हो चले हैं. जैसे जीवन, वैसे ही प्रेम और उसके मायने भी बदले हैं. आनंदघन का बतलाया गया 'सनेह-मारग'अब कहीं नहीं है. गीत की कविताएं इस 'पहली-सी मुहब्बत'…

लेखक काम पर : हेनरी मिलर

लेखन को तवज्जो दो,
............... ...........................................................पेंटिंग, संगीत, मित्र-मिलन, सिनेमा इसके बाद हैं
एक वक़्त में किसी एक ही मजमून पर काम करो.

काम के बीच कोई नई किताब का मंसूबा मत बांधो.

लिखते हुए घबराओ नहीं. जो काम हाथ में उठा रखा है, उस पर शांत और खुश मन से जुटो. इसकी बहुत परवाह न करो कि वह कैसा बनेगा.

तय वक़्त तक लिखो, उसके बाद नहीं. लेकिन इन वक्तों में अपनी योजना को अपने मिज़ाज के असर में आने से बचाओ.

ध्यान रहे, जिन वक्तों में तुम कुछ रच नहीं सकते, उन वक्तों में भी तुम काम तो कर ही सकते हो.

हर रोज़ लिखे हुए को और पुख्ता करो लेकिन इसके लिए ज़रूरी नहीं कि उसमें नई चीजें ही जोड़ी जाएँ.

लोगों से छिटको नहीं, उनके पास जाओ. जगहों में रमो. पीने की इच्छा हो तो पियो.

खूब खटने वाला घोड़ा न बनो, लेखन का लुत्फ़ लो.

एक दिए गए दिन में तुम्हें अपनी योजना में रद्दोबदल करना ठीक लगे, तो करो. लेकिन अगली सुबह उन बदलावों से गुजरो. उन्हें ध्यान से नबेरो. अलगाओ.

भूल जाओ कि तुम कौन-कौन सी किताबें लिखना चाहते हो. सिर्फ़ उस अकेले मजमून के बारे में सोचो जिस पर तुम …