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Showing posts from 2012

सबद विशेष १५ - नोबेल व्‍याख्‍यान - मो यान

[ मो यान का यह नोबेल व्याख्यान कुछ बुनियादी बातों की ओर हमारा ध्यान खींचता है। मनुष्य जीवन, उसके विकट संघर्ष, उसकी गरिमा, ग्लानि और हानि-बोध के बीच लेखक होने का अचरज और कभी न बिसारा जानेवाला लेखकीय दायित्व इसके केंद्र में है। इसका अनुवाद कवि-लेखक गीत चतुर्वेदी ने किया है। ]



मुझे लगता है कि इंटरनेट और टीवी के इस युग में, यहां जितने भी लोग बैठे हैं, वे सभी सुदूर 'उत्तरपूर्व गाओमी क़स्बे’ से अच्छी तरह परिचित होंगे। आपने मेरे नब्बे साल के पिता को देखा होगा, मेरे भाइयों, बहनों, मेरी पत्नी और मेरी बेटी, और शायद मेरी पोती को भी देखा हो, जो अब एक साल चार महीने की है। लेकिन जो शख़्स इस समय मेरे दिलोदिमाग़ पर तारी है, उसे आप कभी नहीं देख पाएंगे। वह शख़्स है मेरी मां। इस पुरस्कार को जीतने के गौरव-भरे क्षण में कई-कई लोग शामिल हैं, सिवाय उसके।

मेरी मां का जन्म 1922 में हुआ था और 1994 में उसकी मृत्यु हो गई। गांव के पूर्वी छोर पर आड़ू के बाग़ान में हमने उसे दफ़नाया। पिछले साल सरकार ने हमें मजबूर कर दिया कि हम उसकी क़ब्र वहां से हटा लें और दूर ले जाएं, ताकि उस जगह रेल लाइन बिछ सके। जब हमने क़ब्र…

सबद पुस्तिका 9 - उदयन वाजपेयी

बाज़बहादुर की कविताएँ ( रानी रूपमती और बाज़बहादुर की प्रणयगाथा लोक में प्रसिद्ध है। रूपमती गायन और लेखन में प्रवीण थीं। बाज़बहादुर तालवाध वादन में निष्णात थे। उन्होंने कुछ लिखा हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। ये कविताएँ बाज़बहादुर की वे कविताएँ हैं जो वे लिख सकते थे ) 
- उदयन वाजपेयी हर चंद मैंने शौक को पिन्हा किया वले, एक आध हर्फ़ प्यार का मुँह से निकल गया।                                                         - मीर


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1.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
धड़कते मौन के स्पन्दन
सुन रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ वह
क्या बोलते हुए
क्या नहीं बोल रही !


2.

मुझे नहीं उतरना है
उसकी आवाज़ की कन्दरा में
मुझे नहीं आता
कैसे मौन की लपटों में
झुलसने से बचा जाता है

मुझे नहीं आता
मुझे नहीं उतरना


3.

उसकी आवाज़ की गहरायी में
सिहरते संकोच को
छू रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ वह
क्या बोलते हुए
क्या नहीं बोल रही !


4.

कहाँ बनाऊँ तोरण-द्वार
उसके आने के लिए
यह ज़िंदगी इतनी जगहों से
टूट-फूट गयी है, इतनी जगहों से
खुल गयी है कि खिड़कियों तक के लिये
जगह बाकी नहीं है

कहाँ बनाऊँ तोरण-द्वार
उसक…

नई कवयित्री मोनिका कुमार की दो कविताएं