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Showing posts from September, 2011

महेश वर्मा की नई कविताएं

पुराना दिन तुम वहाँ कैसे हो गुज़रे हुए दिन और साल?
यह पूछते हुए पुरानी एलबम के भुरभुरे पन्ने नहीं पलट रहा हूँतुम्हारी आवाज़ आज के नए घर में गूंजती है
और हमारी आज की भाषा को बदल देती है एक समकालीन वाक्य उतना भी तो समकालीन नहीं है
वह पुरानी लय का विस्तार हैऔर इतिहास की शिराओं का हमारी ओर खुलता घाव
वह तुम्हारे विचारों का निष्कर्ष है हमारी आज की मौलिकता
पुराने आंसुओं का नमक आज की हंसी का सौंदर्य मरा नहीं है वह कोई भी पुराना दिन
राख, धूल और कुहासे के नीचे वह प्रतीक्षा की धडकन है
गवाही के दिन वह उठ खड़ा होगा
और खिलाफ गवाही के दस्तावेज के नीचे दस्तखत करेगा.
****बाहर...फिर क्या होता है कि तुम प्रतीक्षा के भ्रामक विचार से धीरे धीरे दूर होते जाते हो . यह दूर जाना इतने धीमे तुम्हारे अवचेतन में घटित होता है कि दांतों के क्षरण और त्वचा के ह्रास की तरह इसका पता ही नहीं चलता. किसी एक रोज थोड़ा दूर हटकर तुम संदेह करते हो कि वाकई तुम्हें प्रतीक्षा थी भी या नहीं . फिर होता यह है कि तुम प्रेम की घटना और अंततःप्रेम के विचार से ही एक उपहासात्मक दूरी बनाना चाहते हो अपने वीतराग में इस तरह कि कोई प्रेम नहीं था, प्र…

सबद विशेष : १२ : उम्बेर्तो ईको

उम्बेर्तो ईको यानी कल्पना का विज्ञान

इतालवी लेखक उम्बेर्तो ईको ने जब पहला उपन्यास लिखा, तो उस समय उनकी उम्र लगभग पचास साल थी। वह चिंतक और दार्शनिक के तौर पर उससे पहले ही दुनिया-भर में कीर्ति पा चुके थे। उनका पहला उपन्यास 'द नेम ऑफ द रोज़’, जिसे शुरुआत में आलोचकों ने निशाने पर लिया था, बहुत जल्द ही पूरी दुनिया में मक़बूल हुआ और अब वह मॉडर्न क्लासिक्स में गिना जाता है। ईको जटिल और भीषण बुद्धिवादी हैं। तर्क उनके पैरों का महावर है, जो चलते समय फ़र्श पर अपनी छाप ज़रूर छोड़ता है। जब अधिकांश लेखक भाव को रचना की शेष-शय्या बताते हैं, ईको तर्क को भाव का सहोदर बना देते हैं और उसे आगे खड़ा करते हैं। वह बोर्हेस की मेटाफिक्शन और मेटानैरेटिव परंपरा को कृष्णकाय ऊंचाई तक पहुंचा देते हैं। बोर्हेस को पढ़ते हुए हमेशा यह ध्यान आता है कि हमारी कल्पना का दायरा उतना ही बड़ा होता है, जितना यथार्थ के बारे में हमारे ज्ञान का। हमारा अज्ञान कभी भी हमारी कल्पना का हिस्सा नहीं बन पाता। यानी यथार्थबोध और कल्पना का आकार एक जितना होता है। ईको का फिक्शन, जिसे वह हमेशा अपनी कल्पना ही कहते हैं, एक अविश्व…

बही-खाता : १४ : निर्मल वर्मा

कथ्य की खोज


१ क्या 'खोज' अपने में ही तो ग़लत शुरुआत नहीं है ? जो है, सामने दिखाई देता है, चारों ओर से घेरे है, जन्म की पहली विस्मयकारी नज़र से लेकर मृत्यु की अंतिम बुझती लौ तक, भला उसकी खोज कैसी ? वही तो सारी कहानी है...सारी पर क्या असली भी ?
असली क्या है, यह भी तो एक खोज हो सकती है, जो है, उसके भीतर से 'जो नहीं है', ( पर जो हर बन्द खिड़की से बाहर झाँकता है ) उसकी खोज ? कथ्य के कितने आवरण हैं, कितने परदे, कितनी खिड़कियाँ. लिखते हुए हम एक-एक के पास से गुजरते हुए छिपे को थोड़ा उघाड़ पाते हैं...पढ़ते हैं तो हँसी सुनाई देती है ; कहाँ, किस जगह, किसके साथ पहली बार सुनी थी ?
वह बार-बार समुद्र की लहरों की तरह हमसे टकराती है, मुड़ जाती है, फिर आती है, खाली, तट पर अपनी फेनिल झाग छोड़ जाती है, कुछ अपने साथ बहा ले जाती है, कुछ छोड़ पाती है.
बचे हुए अवशेष, जो हैं, उस पर जो बीत गया, उसके खुदे हुए 'हियरोक्लिफ'.. क्या हम उन्हें पढ़ सकते हैं ? कथ्य अनुवाद है, जो अबूझा है, उसे बूझे हुए में अनूदित करता हुआ. वह लिखे हुए को पढ़कर पढ़े हुए को लिखने का खेल है.
२ पाँचों इन्द्रियां आखेट करती हैं --…

कथा : ८ : सिद्धान्त मोहन तिवारी की कहानियाँ

चकती

हम एक देश के बारे में बात करेंगे. एक लड़का था, नाम नहीं था या मालूम नहीं. ये जानना कितना विराट अनुभव है कि हर देश एक आदत है, और हर आदत पैसा है और पैसा समय नहीं है....लड़का एक लड़की का पर्याय भी है – लड़की धर्म भी है.

लड़का जब पैदा हुआ, तो उसके पैदा होने के एक घंटे बाद ही उसके घरवालों नें उसकी दोनों आँखों की पुतलियों के निचले आधे हिस्से में अर्ध-चंद्राकार काली अपारदर्शी चकती लगा दी. चकती किसी फाइबरनुमा चीज़ से बनी हुई थी, तो वह अपनी संरचना में काफ़ी कठोर थी.

चकती लगाते समय लड़का एकदम नहीं रोया, उसे पेट में ही इस बात का अंदाज़ लग गया था कि या तो चकती लगेगी, और अगर सफलता नहीं मिली, तब आँखों में गरम तेल उड़ेला जाएगा.

गर्भ में उसका शारीरिक विकास इस तरीके से हुआ कि चकती को वह अच्छे से जज़्ब कर सके. आँखों की पुतलियाँ और फैलीं, अपनी क्षमता से चार गुना ज़्यादा, आँखों के चमड़ीदार कोने अपनी हद से कुछ ज़्यादा फटे, कि फ़ैली हुई पुतली को कोई दिक्कत न हो और वे उसका पर्याय बन सकें.

कहते हैं कि लड़का हिंदू नहीं था, अब किसी के ‘हिंदू न होने’ का मानी मुसलमान ही हो सकता है. शायद यही दो कौमें ऐसी हैं, जो एक-दूसरे से ही ड…