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Showing posts from July, 2011

पंकज चतुर्वेदी की नई कविताएं

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[ आगे दी जा रही पंकज चतुर्वेदीकी नई कविताओं और उस पर व्योमेश शुक्ल की क्षिप्र टिपण्णी उस महत्वपूर्ण प्रकाशन का हिस्सा है जिसके तहत कवियों ने सबद की पहल पर अपने साथ और इन अर्थों में समकालीन कवियों की कविताओं का चयन कर उस पर अपनी टिपण्णी लिखना स्वीकार किया था. हम पंकज चतुर्वेदी के आभारी हैं, उन्होंने अपनी कविताएं इस श्रृंखला के लिए उपलब्ध कराई . साथ ही व्योमेश शुक्ल के भी जिन्होंने उनकी कविताओं पर अपने मूल्यवान विचार रखे. हमारा धेय्य सीन को किसी तरह इंगेज रखना न कभी था, न है. हम ऐसे और अन्यान्य भी, इस विनम्र कोशिश में लगे हैं कि अच्छी कविता पर रोशनी और कविओं पर ध्यान बराबर जाए. इससे पूर्व आप इस श्रृंखला में नीलेश रघुवंशी, शिरीष कुमार मौर्यतथा सुशोभित सक्तावतकी कविताएं पढ़ चुके हैं. ]
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कविताएं


धारा 144

पूरे प्रान्त के विभिन्न शहरों में
तमाम केन्द्रों पर आयोजित थी
डॉक्टरी की बेहद संवेदनशील प्रवेश-परीक्षा

सरकार के हुक्म से
सख़्त इंतिज़ाम थे
कि कोई जालसाज़ी न हो सके

एक जगह पर अनेक लोगों का
जमाव न हो
आवाजाही नियन्त्रित हो
संदिग्ध तत्त्व न देखे जायँ
परीक्षा-केन्द्रों के आसपास

एक शहर में प्रशासन ने
तैयारी बै…

बही-खाता : १३ : अर्नस्ट हेमिंग्वे

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 तुमने पहले भी लिखा है, तुम फिर लिखोगे...
लिखते हुए ऐन उस वक़्त रुकना चाहिए जब तुम रौ में होओ और तुम्हे यह पता  हो कि आगे क्या लिखना है...इसके बारे में अगले दिन लिखने से पहले सोचना या चिंता करना छोड़ दो. ऐसा करने से तुम्हारा अवचेतन अपने आप इस पर काम करता रहेगा कि क्या लिखना है. लेकिन अगर तुम सचेत होकर इस बारे में सोचने लगोगे तो निश्चय ही उसे नष्ट कर दोगे जो कागज़ पर उतरने के लिए तुम्हारे भीतर घुमड़ रहा है और तुम्हारा दिमाग ऐसा करते हुए इस कदर थक जायेगा कि तुम अगले दिन लिखना शुरू नहीं कर पाओगे...विराम की घडी में जब भी तुम्हारा मन उस ओर जाये, उसे रोको, कहीं और लगाओ. यह तुम्हे रोज़ जतन से सीखना होगा...हो सके तो वर्जिश करो, इससे शरीर थकेगा, और क्या ही अच्छा हो कि तुम जिससे प्रेम करते हो, उसके संसर्ग में जाओ. लेखन के अन्तराल में इससे बेहतर तुम कुछ नहीं कर सकते...वह कुआँ जो मेरे लेखन का जल-स्रोत है, उसे मैंने इसी तरह कभी सूखने नहीं दिया...

तुमने जो शुरू किया उसे ख़त्म करो, तब बिलकुल न रुको जब लिखते हुए अपने को तुच्छ या विषयवस्तु के सामने निरुपाय महसूस करो...याद रहे, ''यह अच्छा बना या …