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Showing posts from June, 2011

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं

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जन्म लेता है एक शब्द
हौले-हौले जन्म लेता है एक शब्द जैसे जुड़ी हो उसके साथ भरे-पूरे किरदारों वाली कोई कथा आप कहेंगे ज़मीन तो मौजूद हो सकती है वहां बख़्तरबंद सिपाहियों की पूरी कतार भूमि पर चढ़ाई करती यूंहि नहीं कह सकते आप किसी फल को आम अपनी जिव्हा पर टपक आए रस का आस्वादन किए बगैर दर्द से बिलबिला उठेंगे आप ततैया के दंश से पर कुछ भी नहीं होगा वह भिरड़ के लड़ने के दर्द के मुक़ाबले बैंगलोर्ड हो  जाएगा अमरीका में कोई डूब जाएगी आर्नल्ड श्वाज़ेनेगर की छवि प्लूटो के ग्रहत्व की तरह। हौले-हौले जन्म लेता है एक शब्द उसे गढ़ता है तीन साल का एक बच्चा भूल जाता है, फिर करता है याद तीन बरस के अपने बच्चे से खेलता हुआ। नदी सा बन जाता है कभी कोई शब्द जैसमीन के फूल की सफ़ेदी में जुड़ जाता है क्रांति का रंग हौले-हौले यूं बना कोई शब्द

शताब्दी स्मरण : मल्लिकार्जुन मंसूर

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( भारतीय शास्त्रीय संगीत में अविस्मणीय योगदान करने वाले 'ख़याल' गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर का जन्म शताब्दी वर्ष गए दिसंबर में संपन्न हुआ है. हम मंसूर जी की  शख्सियत और गायकी की विशिष्टताओं पर एकाग्र उन्हीं के पुत्र पंडित राजशेखर मंसूर के संस्मरण यहाँ दे रहे हैं. दो खण्डों में दी जा रही यह सामग्री पंडित जी की आत्मकथा 'रसयात्रा' से ली गई है, जिसका बहुत सुन्दर अनुवाद संगीत-प्रेमी युवा लेखक मृत्युंजय ने किया है. हम उनके अत्यंत आभारी हैं . सबद में इससे पहले हिंदी के मूर्धन्य कवि-लेखकों के जन्म-शताब्दी वर्ष पर महत्वपूर्ण लेख दिए गए हैं. यह उसी सिलसिले की एक कड़ी है. सबद पर इसके अलावा बिस्मिल्लाह खान और भीमसेन जोशी सरीखे संगीतकारों पर भी आलेख प्रकाशित किये गए हैं. )


रसयात्रा का अंत
1981 में पिताजी ने अपनी 'रसयात्रा' समाप्त की. 12 सितम्बर 1992 को अपनी अंतिम सांस के पहले के ग्यारह सालों में वे संगीत में रमे रहे. 1983में उनकी आँखों के सामने, रसयात्रा के हर दुःख-सुख में दृढ़ता और बिना किसी शिकवे-शिकायत के उनका साथ निभाने वाली, पत्नी गंगम्मा मृत्यु की विश्रांति में च…