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Showing posts from April, 2011

कला का आलोक : २ : अखिलेश

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[ख्यातनाम चित्रकार अखिलेश के साथपीयूष दईयाकी बातचीत के असमाप्य सिलसिले की एक नवीनतम कड़ी को हमें सबद पर शाया करते हुए प्रसन्नता हो रही है. अखिलेश के साथ पीयूष की बातचीत का एक बड़ा हिस्सा पुस्तकाकार 'संवाद' नाम से राजकमल प्रकाशन से आया है. पुस्तक से आगे की यह बातचीत एक चित्रकार के मनोजगत और उनकी संगत करने वाली जागरूक मनीषा का भी हमें परिचय देती है. पीयूष की ऐसी कला-वार्ता हमने इससे पूर्व भी कला का आलोक स्तंभ के तहत प्रकाशित की थी. तब सम्मुख थे :हकु शाह. इस बातचीत में शामिल की गई चित्र-कृतियाँ स्वयं अखिलेश की हैं. उन्हें इस प्रस्तुति के साथ देने के लिए हम अखिलेश के आभारी हैं.]

दरअसल रूप, एक रंग अनुभव है {अखिलेश के साथ पीयूष दईया की बातचीत} 1. चित्र बनाना मेरे लिए लुकाछिपी का खेल है। लुकाछिपी में हमेशा खोजने और पाने का सिलसिला जारी रहता है। अक्सर मैं खो जाता हूं फिर खुद को मिल जाता हूं। अक्सर कोई एक रंग खो जाता है, कोई एक रूप खो जाता है। कोई एक रेखा खो जाती है। फिर अचानक मिल जाती है। मैं आनन्दित हो उस के साथ खेलना शुरू कर देता हूं। यह एक अन्तहीन प्रक्रिया की तरह चलने वाला खेल है। मैं …

मनोज कुमार झा की नई कविताएं

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सहमति

अब इस जर्जर काया पर मत खर्च करो धन
एक दिन जाना ही है तो जो बच जाए बचा लो
सड़क किनारे बिक रही खेत खरीद लो उसको
मुझे भी साथ ले चलना दो पैसा कम करवा दूँगा
अब मुझे जाने दो, जो बच रहा है बचा लो
    घर में एक-दो तो तुरत सहमत हुए
जो सहमे शुरू में वे भी सहमत हुए
पड़ोसी भी सहमत हुए

सब आए श्राद्ध में मुखिया, सरपंच, एमएलए का भी एक खास आदमी
जय जय हुआ, सब ने माना कि अभी ही खरीदी थी जमीन इतनी मँहगी
और अभी ही ऐसा भव्य श्राद्ध !
                पराक्रम की बात है।
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बाहरी

वृक्ष ने कुछ नहीं कहा
पत्ते एक काँप भर असमंजस में नहीं थे मेरे वहां होने से
मोर ने भी कुछ नहीं कहा
    वो नाचा मेरे होने से स्वाधीन
चिड़िया को तो मैंने अंडे सेते देखा
रास्तों ने साथ दिया
    एक भी काँटा नहीं मेरे लिए अतिरिक्त
जल ने तो प्राण दिया उस ताप में
जो उठी वो अंगुलियाँ थीं
            मनुष्य की
मेरी माँ के से उदर में जिन्होंने पाया था आकार।
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पुनश्च


आग थी लहलह
और करीब, और करीब जाने का मन था
त्वचा मना कर रही थी
दसेक लोग थे - बीड़ी, तमाखू, हँसी, ठहाके और ठहरा हुआ दुःख
बातें चलती रही - नेता, चोर, उल्लू के पट्ठे, सरसों क…

शताब्दी स्मरण : नागार्जुन

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[हिंदी के श्रेष्ठ कवियों को उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में स्मरण करते हुए हम शमशेर और अज्ञेयके बाद नागार्जुनपर लेख प्रकाशित कर रहे हैं. इसे युवा आलोचक मृत्युंजय ने लिखा है. नागार्जुन के सुदीर्घ और विविध काव्य-संसार की एक लेख में समाई असंभव है, फिर भी मृत्युंजय ने अपने आकलन में नागार्जुन के कवि-छवि को रोशन करने की भरसक कोशिश की है. ]

नाग जी अर्जुन यही उवाच
मृत्युंजय 
'समरगाथा' (हारवर्ड फास्ट) में जन नेता के लिए एक शब्द है- 'मकाबी'. मकाबी वह जो जनता से पैदा होता है, उसी के लिए लड़ता है, और आखिरकार उसी में बिला जाता है. यह पदवी छीनी नहीं जा सकती, जुटाई नहीं जा सकती. प्रतिष्ठान और सत्ता इससे डरते हैं. यह सिर्फ जनता किसी को दे सकती है. नागार्जुन भारत की जनता के कवि-मकाबी हैं. यों 'जनकवि' के खिताब की कीमत बहुत ज्यादा होती है और कसौटियां काफी खरी. लगभग यह 'तरवार की धार पे धावनो' है.

आज़ादी के पहले से लेकर अपनी जिन्दगी की आख़िरी सांस तक जनता के साथ कंधा भिड़ाकर लड़ने-भिड़ने, उससे सीखने और उसे सिखाने की यह जिद नागार्जुन के कविता के क्रोड़ में है. सत्ता के खिलाफ ख…

नए कवि सुशोभित सक्‍तावत की कविताएं

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[सुशोभित की कविताएं एक आदिम भित्तिचित्र, एक शास्‍त्रीय कलाकृति और एक असंभव सिंफनी की मिश्रित आकांक्षा हैं. ये असंभव काग़ज़ों पर लिखी जाती होंगी- जैसे बारिश की बूंद पर शब्‍द लिख देने की कामना या बिना तारों वाले तानपूरे से आवाज़ पा लेने की उम्‍मीद. 'जो कुछ है' के भीतर रियाज़ करने की ग़ाफि़ल उम्‍मीदों के मुख़ालिफ़ ये अपने लिए 'जो नहीं हैं' की प्राप्ति को प्रस्‍थान करती हैं. पुरानियत इनका सिंगार है और नव्‍यता अभीष्‍ट. दो विरोधी तत्‍व मिलकर बहुधा रचनात्‍मक आगत का शगुन बनाते हैं. कम लिखने वाले, और उस लिखे को भी छुपा ले जाने की आदत वाले सुशोभित सक्‍तावत हिंदी में लोर्का के पत्रों का पुस्‍तकाकार अनुवाद कर चुके हैं. कविता के अलावा दुनिया के संगीत और सिनेमा में गहरी दिलचस्‍पी रखते हैं.] --गीत चतुर्वेदी 




एक असंभव समुद्र में नक्शों से लदी नाव की तरह

दोपहर के बाद दफ्तर अपनी दीवारें बदलता है
एक अधूरा पुल ढहता है और निशानदेही के साथ
काटे जाते हैं दिन के दरख्त
मैं एक गुलाबी रंग को गुलाबी रंग की तरह
पहचानने से इनकार करता हूं
आलपिनों से छिदे क्षितिज पर
टांगता हूं अपनी उतरी हुई परछाइयां