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Showing posts from September, 2010

अम्न का राग

{शमशेरकी यह कविता करीब साठ साल पुरानी है, लेकिन कतिपय आंकड़ों को छोड़ दें तो ह्रदय की सच्ची सुख-शांति का यह बहुत आदिम बहुत अभिनव राग है. इसे सुनना उन सब कार्रवाइयों का स्थगन है, जिससे इंसानी आत्मा लहूलुहान होती है. हम शमशेर का जन्म-शताब्दी वर्ष जीते हुए यह अनुभव कर रहे हैं कि हमारे लिए 'शांति की चाहना' पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, क्योंकि युद्ध सरदारों ने मोर्चे खोलने में कोई कसर नहीं उठा रखी है. ऐसे मौकों पर ''अम्न का राग'' गाना चाहे जितना अनुत्तेजक जान पड़े, ज़रूरी यही लगता रहा है.}


सच्चाइयाँ
जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं
हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चाँदी के उन्मुक्त नाचते
परों में झिलमिलाती रहती हैं
जो एक हज़ार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है
उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ
कि बसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं।ये पूरब-पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आँच की धूप-छाँव पर
बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूँ
सब संस्कृतियाँ मेरे संगम में विभोर हैं
क्य…

बही-खाता : ११ : मनीषा कुलश्रेष्ठ

एकल उड़ान

खुद को औरों से अधिक बुद्धिमान दिखाने की इच्छा, चर्चित होने और मरने के बाद याद रखे जाने की चाह जैसी बहुत - सी वजहें होती हैं लिखने के पीछे. शब्दों से ही समाज बदल डालने और लोगों की जिन्दगियों पर असर डालने जैसे कई - कई मुगालते होते हैं लिखने वालों को. मैं इन सारे मुगालतों से थोडा - थोडा ग्रस्त जरूर हूं पर मुझे पता है कि ये गंभीर वजहें नहीं हैं मेरे लिखने की.

अपनी अनवरत, अंतहीन यायावरी के दौरान, जगह – जगह से बटोरे गए सूखे तनों-जड़ों की ही तरह जो भी अनुभव भीतर- बाहर सहेजा, उसी की अस्तव्यस्त पोटली में से हर बार कुछ नया निकाल कर, उन पर ‘प्राईमर’/‘टचवुड’ लगा कर नई कलाकृति में ढालने की प्रवृत्ति ही प्रमुख रही है.

ज़्यादातर लोग अपने आप से बाहर नहीं निकल पाते, केवल अपनी कहानियां लिखना अकसर लोगों को मज़ा देता है. मुझे वह आसान लगता है. खुद को तरह - तरह के आकर्षक रंग पोत कर, निर्दोष बना कर कहानी में बिठा देना आसान कवायद है. वहाँ चुनौती नहीं, असली चुनौती है, दूसरों के भीतर बैठकर लिखना. खास तौर पर दूसरे जेण्डर या बिलकुल दूसरे तबके या दूसरे समाज के व्यक्ति के भीतर घुस कर लिखना.
गफूरिया, सुगना ढ…

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं

पिता का घर

सच ये है किअब भी मिल जाती हैमुझे इस घर मेंअप्रैल के बाद पूरी कोरीएकाध डायरीजिसमें बचे होते हैंभविष्य की कविताओं के लिएसैंकड़ों पृष्ठ
मां है तोइसी घर में हैबहन भी सांय-सांय चलती हैइन दीवारों के बीचकिसी घुमड़ते तूफ़ान सी

मैं ही बन गया हूं मंद बयार

चाहूं जितना भीचलता नहीं इस घर का कुछ भीमेरे साथफिर भी पूरा ही रहता है पास
तुनकता रहता हूं हरदमइस घर मेंकि गिनी जाएंमेरी लगाई ईंटें भी कुछभूकंपों और दीमकों के ख़िलाफ़
छोटा है लेकिनजितनी खर्च हुई हमारी ज़िंदगियांइसे बनाने मेंशायद ही बची होंकिसी और मकान के लिए।
मैं लौट आऊंगा यहां!

****पते

मैं जहां गयामां ने दर्ज किएमेरे पते
उसकी फटी जिल्द-वालीभूरी डायरी में देखा मैंनेB के बाद E वालाबैंगलूर के एक होटल का अपना पता

चला जाऊं कल मिस्सिसिप्पीतो मिलेगा वो भी

कवि की संगत कविता के साथ : ९ : अरुण देव

आत्मकथ्य

कवि अपनी सीमाओं के लिए नहीं जाने जाते हैं


कभी
-कभी एक शब्द की चोट से खुल जाता है कंठ. शब्द ही लौ है– बुझे दीए जल उठते हैं. कविता आलोक है ध्वनि का. अपने काव्य-सिद्धांत के ग्रन्थ का नाम 'ध्वन्यालोक', आचार्य आनंदवर्धन ने ठीक ही रखा है. मैथ्यु अर्नोल्ड कहा करते थे कि एक समय आएगा जब कविताएँ धर्म का स्थान ले लेंगी क्योकि सभी धार्मिक किताबें कविता की ही किताबें थीं.
आखिर
कविता में क्या है वह रहस्यमय? हमारी आत्मा की कौन सी पुकार वहां प्रतिध्वनित होती है? जीवन के किस लय से टकराता है उसका कौन सा तुक? काव्य के बिना शायद ही हमारे जीवन का कोई दिन गुजरता हो. वह किसी न किस रूप में हमारे साथ रहता ही है. चाहे वह पवित्र पोथिओं और फिर उनकी दुर्व्याख्याओं के रूप में ही हमारे साथ क्यों न हो. कविता का सोता अंदर से फूटता है इसलिए वहां अभी भी सबसे कम प्रदूषण हैं मनुष्य की मूल प्रवृतिओं का आदिम स्वाद अभी भी वहां शेष है. अक्षरों की लौ में अभी भी वहाँ मनुष्यता की कालिमा पहचान ली जाती है. पतन पर कविता रुदाली बन जाती है, मानवता का सामूहिक रुदन. पूरब से उठते उम्मीद की ओर कविता के अनुरक्त नेत्रों से ब…

सबद पुस्तिका : 4 : चन्दन पाण्डेय की नई कहानी

रिवॉल्वर
(दोस्ती का पर्दा है बेगानगी – ग़ालिब)


यह नीलू की किस्मत का और मेरा मिला जुला फैसला था कि उसकी दुहरी हत्या होनी चाहिये. नीलू की शारीरिक हत्या का दिन होने का नेक मौका मैने रविवार को दिया था पर उस रविवार की सुबह मेरी नींद ऐसे खुली जैसे किसी फांसी की सजा पाये मुजरिम की खुलती है. एकदम अचानक और डरे हुए इंसान की तरह. नीलू की हत्या का साहस ना तो बाकी जीवन जीने की उत्कट इच्छा से मिली और ना ही उस ईर्ष्या से जिसके बीज नीलू ने मेरे भीतर बड़े सलीके से रोपा था; उसे मारने का साहस मुझे नीलू के अटूट प्रेम से मिला. वैसे भी अब मैं वह इंसान नहीं रह गया था जो इस जले प्रेम को निभाने से पहले था.

अब जब प्रेम और जीवन नष्ट हो चुका है तब लगता है, नीलू नर्क की छत से फिसल कर मेरे जीवन में आ गिरी थी. नीलू, जिसने मेरा टूटना और टूटकर बिखरना नहीं देखा. फूल के बिखरने को लोग अक्सर कम देखते हैं पर नीलू ‘लोग’ नहीं थी. वही नीलू, जिसके मन मष्तिस्क में अब मैं, समय बीतने के साथ लगातार क्षरित होते हुए, याद और धुन्ध की तरह बचा था. नीलू का दर्जा इतना ऊंचा था कि मैं चाह कर भी उसकी हत्या कर नहीं पाता. जिस लड़की के रक्त के ब…