सबद विशेष : १० : रॉबर्तो बोलान्यो


(सबद विशेष की इस १०वीं कड़ी में चिली के कवि-कथाकार रॉबर्तो बोलान्यो की रचनाओं से एक चयन और अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. हिंदी में इस तरह बोलान्यो पर किया गया यह पहला काम है. आज बोलान्यो की पुण्यातिथि भी है. अब तक लैटिन अमेरिकी देशों से साहित्य की जो समझ हम बोर्हेस, पाज़, मारकेज़ और योस्सा से बनाकर चल रहे हैं, बोलान्यो उसमें एक विचलन पैदा करने वाली उपस्थिति हैं. कुल पचास की आयु में बोलान्यो ने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना और विपुल मात्रा में डायरी लिखा, जिसका बहुलांश अभी स्पैनिश तक में नहीं छपा है, वह धीरे-धीरे अब सामने आ रहा है और ''द सैवेज डिटेक्टिव'' से हासिल लोकप्रियता और प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर इजाफा हो रहा है. विचित्र किन्तु सत्य यह है कि कविता में नेरुदा और पाज़ की काव्याभिरुचि के खिलाफ जानेवाले बोलान्‍यो ने बोर्हेस का देय तो स्वीकार किया किन्तु फिक्शन में ''बूम'' की सबसे बड़ी उपलब्धि मैजिक रियलिज्म और मारकेज़ के टूल्स को नाकाफी बताकर स्वयं इन्फ्रारियलिज्म की बुनियाद डाली. सबद बोलान्यो को हिंदी में गृहस्थ करने के लिए बोलान्यो के समानधर्मा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी और युवा अनुवादक श्रीकांत का आभारी है. इससे पहले सुधि पाठक मिक्लोश राद्नोती, यानिस रित्‍सोस  तथा एर्नेस्तो कार्देनाल को क्रमशः विष्णु खरे तथा मंगलेश डबराल के अनुवाद में पढ़ चुके हैं...)



 आत्‍मा का पिंजरा

- गीत चतुर्वेदी

रॉबर्तो बोलान्‍यो किसी एक भाषा के लिए ही नहीं, सारी दुनिया के लिए ही पिछले दस बरसों की एक खोज हैं. कौन-सी बातें उन्‍हें अपने समय के तमाम लेखकों से अलग बनाती हैं, यह किन्‍हीं सूत्रों से समझने के बजाय उन्‍हें पढ़कर ही बेहतर जाना जा सकता है. और कोई रास्‍ता नहीं. फिर भी, रास्‍ता न होना भी अंतत: एक रास्‍ता ही होता है, उसी तर्ज़ पर बार-बार यह कहा जाता है कि उन्‍होंने लातिन अमेरिकी और स्‍पैनिश फिक्‍शन के तौर-तरीक़ों को बदलकर रख दिया. उनके लेखन के घोषणा-पत्र की बानगी देखिए:

‘‘गति का अभ्‍यास बेचैनी से हो. सांस और तपिश. गरदन-तोड़ अनुभव हों. ऐसे ढांचे जो बढ़ें और ख़ुद को ही खा जाएं. बनैले विरोधाभास हों.’

सिर्फ़ 23 साल की उम्र में उन्‍होंने अपने भविष्‍य के लिए जो रास्‍ता निर्धारित किया था, उस ऐतिहासिक ‘इन्‍फ्रारियलिस्‍ट का घोषणा-पत्र’ का एक छोटा-सा अंश है यह. और बरसों लगातार लेखन में इसका अभ्‍यास करने के बाद दुनिया के सामने इसका विस्‍फोट तब हुआ, जब 2007 में उनका उपन्‍यास ‘द सैवेज डिटेक्टिव’ (स्‍पैनिश में 1998 में) का अंग्रेज़ी अनुवाद आया. यह उपन्‍यास 1976 से 96 के बीच दो आकांक्षी कवियों की भटकन का आख्‍यान है. इस पूरे दौर में बदल गए लातिन अमेरिकी आकांक्षाओं और यथार्थ का ऐसा चित्रण है कि लातिन अमेरिका अपनी भौगोलिक सीमाओं को निरस्‍त करते हुए इज़राइल तक फैल जाता है और अंत में अपने भूगोल को ही ख़ारिज करते हुए एक वैश्विक मनोदशा में तब्‍दील हो जाता है. असीमित विस्‍तार पाती हुई मनोदशा, स्‍टेट ऑफ माइंड या मानसिक भूगोल बोलान्‍यो के काम की कुंजी है.

28 अप्रैल 1953 को चिली के सांतीयागो में जन्‍मे बोलान्‍यो के पिता एक ट्रक चालक थे. शुरुआती साल चिली में गुज़ारने के बाद उनका परिवार मेक्सिको चला गया, जहां उनकी पढ़ाई शुरू हुई, फिर छूट गई और फिर वह वामपंथ से जुड़ गए. मेक्सिको में ही उनके लेखन की शुरुआत हुई और उन्‍होंने अपने कुछ मित्रों के साथ इन्‍फ्रारियलिस्‍ट कवियों का एक समूह बनाया, जो कि बहुत कम समय के लिए सक्रिय रह पाया. यह समूह मेक्सिको और लातिन अमेरिका के प्रोटोटाइप होते जा रहे साहित्‍य को ‘धराशायी’ करने का आक्रामक विचार रखता था और व्‍यक्तित्‍व की सादगी और मितभाषिता के बावजूद बोलान्‍यो की उद्धत-तीखी वाणी ने सत्‍तर के दशक के मेक्सिकन साहित्यिक हलक़े में उन्‍हें ‘एक आतंकवादी प्रतिभा’ के रूप में (कु)ख्‍यात कर दिया, हालांकि तब तक उनके पास कुछ कविताओं के अलावा कोई लेखकीय पूंजी नहीं थी.

बरसों भटकने, ड्रग्‍स की चपेट में आने, कम उम्र में ही अपने कई दांत गंवा देने, कविता-आलोचना लिखते हुए पुराने दिग्‍गजों की शैलियों को ख़ारिज करने, शिक्षक, रातपाली का चौकीदार, होटल का बैरा-डिशवॉशर के रूप में कई सारे काम करने के बाद अंतत: वह स्‍पेन में स्‍थायी होते हैं और कचरा जमा करने वाले की दिन-भर की नौकरी के बाद रात को अपने कमरे की फ़र्श पर बैठकर कविताएं लिखा करते. शादी के बाद जब दो बच्‍चे हो गए, तो उन्‍हें अहसास हुआ कि नौकरी और कविताओं की कमाई पर्याप्‍त नहीं, उन्‍होंने चालीस की उम्र के बाद उपन्‍यास लिखना शुरू किया.

लगातार कई देशों में भटकने के बाद उनकी मन:स्थिति ऐसी बन गई कि वह किसी देश को अपना देश नहीं मान पाते थे. और यह उनके फिक्‍शन में भी साफ़ महसूस होता है. अपने आखि़री इंटरव्‍यू में उन्‍होंने इस बात का जवाब इस तरह दिया था, मेरा महाद्वीप मेरी भाषा है और मेरे बच्‍चे मेरा देश हैं. मैं ऐसा लिखकर जाना चाहता हूं, जिससे मेरे बच्‍चों के सामने कोई आर्थिक समस्‍या न आए. (यह एक अलग चिंता थी उनकी.)

यह इसलिए भी कि चालीस की दहाई में जब उन्‍होंने उपन्‍यास लिखना शुरू किया, तब तक डॉक्‍टरों ने उन्‍हें बता दिया था कि उनका लीवर ख़राब हो चुका है. उनका सारा फि़क्‍शन मृत्‍यु की अब आती कि अब आती धमकी और दबाव के बीच लिखा गया. इसी कारण उनकी कविताओं में भी मृत्‍यु के प्रति एक सम्‍मोहक, आक्रांता, विनाशक आकर्षण को देखा जा सकता है, जहां वह अपनी ‘निजी’ मृत्‍यु के साथ-साथ पूरे महाद्वीप को मृत्‍यु के गालों से गाल सटाए संघर्ष करता देखते हैं.

1996 में ‘नाज़ी लिटरेचर इन अमेरिकास’ लिखकर वह स्‍पैनिश फिक्‍शन में एक धमाका करते हैं. बोर्हेसियन अंदाज़ में काल्‍पनिक नाज़ी लेखकों का एक पूरा विश्‍वकोश तैयार करते हैं और वामपंथी-दक्षिणपंथी राजनीति के संघर्षों का बारीक चित्रण करते हैं. ‘द सैवेज डिटेक्टिव’ से वह अपने फिक्‍शन की स्‍थापना करते हैं, जिसके बारे में स्‍पैनिश अख़बार ‘एल पैस’ का कहना है कि अगर बोर्हेस ने कभी उपन्‍यास लिखा होता, तो यक़ीनन वह इसी तरह का होता. (अपने सबसे प्रिय लेखक जिसे और, बार-बार और, पढ़ने की सलाह वह अपने सभी परिचितों को देते हैं, को इससे बेहतर एल्‍यूड शायद ही किया जा सकता हो.) लेकिन सबसे ज़्यादा समय लगाते हैं अपने अत्‍यंत महत्‍वाकांक्षी उपन्‍यास ‘2666’ पर, जो उनकी मृत्‍यु के बाद ही प्रकाशित हो पाता है. लगभग हज़ार पेज का यह उपन्‍यास गल्‍प और तफ़सीलों का अन्‍यतम विस्‍तार करता हुआ उसकी पुरातन सीमाओं का अन्‍वेषण करता है. इस पर काम करते हुए उनकी तबीयत और ख़राब होने लगती है और वह इसे किसी भी तरह जल्‍द से जल्‍द पूरा कर लेना चाहते हैं. पांच खंडों में विभाजित इस उपन्‍यास की पांडुलिपि लगभग पूरी कर लेने के बाद 15 जुलाई 2003 में लीवर फेल हो जाने के कारण उनकी मृत्‍यु हो जाती है. वह चाहते थे कि ये पांचों खंड अलग-अलग समय पर अलग-अलग जिल्‍दों में प्रकाशित हो, ताकि उनके परिजनों को पांचों से अलग-अलग रॉयल्‍टी मिल सके, लेकिन उनके जाने के बाद जब परिजन और मित्र संपादक उस उपन्‍यास को पढ़ते हैं, तो उनसे किया वादा तोड़कर उसे एक साथ एक ही जिल्‍द में प्रकाशित करते हैं.

बोलान्‍यो अपने से पहले की पीढ़ी के साहित्‍य को क्‍यों अयोग्‍य पाते थे? इसके कारणों में यह भी है कि उनके पहले की पीढ़ी, जो या तो बूम वाली मैजिक रियलिस्‍ट पीढ़ी थी या साफ़-साफ़ उसकी नक़ल करने वाली मि‍डीयॉकर लेखकों की जमात, वह लगातार एक ही कि़स्‍म का रूमानी, तानाशाहों की सनक से भरा हुआ, प्रेम के ऐंद्रिक वर्णनों से भरा हुआ, भूत-प्रेतों की सहायता से मनुष्‍य का सपनीला अंतर्लोक सिरजता हुआ, पितृ-पुरुषों की दबंगई और मातृकाओं की चतुराइयों को दिखाता एक प्राचीन संयुक्‍त परिवारीय कथा-वाचन कर रहा था. यह प्रोटोटाइप इतना सार्वभौमिक था कि पूरे महाद्वीप का प्रतिनिधित्‍व कर रहा था, साथ ही इतना अधिक लोकल भी था कि हर देश का लेखक अपनी देशीयता के साथ उसमें उपलब्‍ध था, अपनी अद्वितीयताओं के साथ. जिन चीज़ों को लातिन अमेरिका के बाहर उसके साहित्‍य का प्रमुख गुण माना जा रहा था, बोलान्‍यो ने उन्‍हीं चीज़ों को उस फिक्‍शन का सबसे बड़ा अवगुण माना. बोलान्‍यो जिस लातिन अमेरिका में पैदा हुए थे, पले-बढ़े थे, वहां से तानाशाहों का अंत हो चुका था, विदेशी पूंजी अपनी तमाम साजि़शों, घृणाओं, चालाकि‍यों, अवसरवादिताओं के साथ पहुंच चुकी थी, कुछ ही बरसों में सुंदर-सजीले-पारिवारिक गल्‍पाख्‍यानों वाला देश अपने परिवारों की संयुक्‍तता खो चुका था, वह नशे का एक बड़ा बाज़ार बन चुका था, उसके साथ सौग़ात में मिली मूल्‍य-विहीनताएं अपना नंगा नाच दिखा रही थीं; कुल मिलाकर एक महाद्वीप डब्‍ल्‍यूएमएफ़ के एक भयानक दु:स्‍वप्न्‍ में बदल चुका था. ऐसे परिवेश में जादुई यथार्थवादी लेखन को जारी रखने की वकालत या कोशिश करने वालों को बोलान्‍यो ने फ़र्जी़ घोषित किया और नए यथार्थ के सारे संकटों, परतों आदि को पकड़ने के लिए एक एंटी-फिक्‍शन, एंटी-लिटरेरी फॉर्म की तलाश का आवाह्न किया. उनका अल्‍पजीवी  इन्‍फ्रारियलिस्‍ट आंदोलन इन्‍हीं बातों पर था, जिसे बाद में उन्‍होंने द सैवेज डिटेक्टिव में बख़ूबी दिखाया है.

और बोलान्‍यो यह बात बहुत अच्‍छी तरह समझ रहे थे कि जिस तरह का नया वर्ल्‍ड ऑर्डर बन रहा है, कोल्‍ड वार समाप्‍त हो रहा है, दुनिया एक-ध्रुव पर बैठ गई है, यह स्थिति केवल लातिन अमेरिका की ही नहीं है, बल्कि उस एक ध्रुव को छोड़ शेष सारे विश्‍व की है, इसीलिए वह अपनी मन:स्थिति में, अपने लेखन में, अपनी अवधारणाओं-विचारों में, किसी एक देश की नागरिकता का परित्‍याग कर देते हैं और एक भाषा को अपना महाद्वीप कहते हैं. वह नई पीढ़ी को अपना एकमात्र देश घोषित करते हैं, इसीलिए वह एक नया अंतरराष्‍ट्रीय, उत्‍तर-राष्‍ट्रवादी गल्‍प की संरचना करते हैं, जिसे वह लातिन अमेरिकी आंखों से देखते हुए भी पूरे विश्‍व के लिए ख़ुर्दबीन बना देते हैं. इसीलिए जब वह 11 सितंबर को देखते हैं तो उनका फिक्‍शन उसका अनुवाद 1973 के अयेंदे के तख्‍तापलट में कर देता है.
वह खुद अपने आप में एक महाद्वीप हैं, एक पूरा महाद्वीप उनमें अंगड़ाई लेता है, नशे से जूझता र्है, अपराध में लिप्‍त होता है, आतंक, मनमर्जी़, तानाशाही और अराजकता की जन्‍मघुट्टी पीता है और अपनी पहचान के संकट के साथ संघर्ष करता है, एक अचित्‍ते अकेलेपन की ओर बढ़ता है, जिसका अनुवाद सॉलीट्यूड नहीं हो पाता, टपोरियों-सड़कछापों की भाषा में क़द्दावर विमर्श करता है और लेखन व काव्‍यचिंतन को एक नया आभामंडल प्रदान कर देता है.

एक ऐसा लेखक, जिसने अपना सब कुछ निचोड़ कर रख दिया हो, लेकिन उसके बाद भी वह अनंत संभावनाओं से भरा हुआ हो, ऐसे तो बादल हुआ करते हैं, अगर बोलान्‍यो के लिए ‘मेघर्षि’ जैसा कोई शब्‍द बनाया जाए, तो वह भावुकता नहीं ही होगी.

बोलान्‍यो के गद्य में हमेशा एक रूखा-सूखापन लक्ष्‍य रहा, वह सादी और वैभव से विरत भाषा में जटिल अनुभवों का समुच्‍चय बनाते हैं. चूंकि वह पहले से मान्‍य काव्‍य-तत्‍वों की नज़ाकत आदि का मुखर विरोध करते रहे, उनके फिक्‍शन और डिक्‍शन में यह बातें सिरे से नदारद मिलती हैं, एक योजनाबद्ध अन्‍यमनस्‍कता के साथ. ‘फ्रैक्‍चर्ड फ्लुएंसी’ को उनके लेखन का सिंगार कहा जा सकता है. यानी ऐसी भाषा, जो रौ के बीच फ्रैक्‍चर्ड के आभास-सा दचका दे देती हो और बावजूद उसके, उसकी रवनागी पर कोई असर न पड़ता हो. ये दोनों विलोम हैं. बोलान्‍यो इसे बख़ूबी साधते हैं. नीचे दी गई कविताओं और कहानी में भी इसके दर्शन होते हैं. जैसे सराहना शीर्षक कविता, जो कि प्रेम की अनुभूति, पुलिस का दमन-चक्र, फ़र्जी़ एनकाउंटर का बहुत ही सांकेतिक बयान करती है, वहां एक ही पंक्ति में वह तीनों स्थितियों को छू लेने, छुआ देने का जोखिम उठाते हैं और उसके बाद महज़ संवेदनाओं की कंदराओं में भटकते लेखक के दुचित्‍तेपन, फ़र्जी़वाड़े को भी उघाड़ देते हैं— मुंह तो खुला पर लेखक कोई बात नहीं सुन पाया. उसने सन्‍नाटे में विचार किया और बाद में सोचा, ‘‘यह सब तो हुआ ही नहीं था’ — उनका सारा फिक्‍शन पारंपरिक-परिभाषित-बहुधा चिराकांक्षित गीतात्‍मकता का निषेध करते हुए इसी ‘फ्रैक्‍चर्ड फ्लुएंसी’ को एक औज़ार की तरह प्रतिष्ठित करता है, उन्‍हें सबसे अलग करता है और अभिव्‍यक्ति के नए स्‍तरों पर पहुंचाने में मददगार भी होता है.  

लातिन अमेरिकी साहित्‍य में इस बहुस्‍तरीय यथार्थ को पकड़ने की कोशिश भी 1990 के दशक में शुरू होती है, जब बोलान्‍यो और उनके इन्‍फ्रारियलिज़्म से प्रेरणा लेकर मेक्सिको में कुछ युवा लेखकों का एक समूह बूम के खि़लाफ़ क्रैक की घोषणा करता है, तब तक बोलान्‍यो का कोई बड़ा फिक्‍शन बाहर नहीं आया था, लेकिन उसकी अवधारणाएं वह बरसों से घोषित करते रहे थे, उन युवाओं में खोर्खे वोल्‍पी (‘इन सर्च ऑफ क्लिंगसर’ (1999) और ‘सीजन ऑफ ऐश’ (2009)) और इग्‍नासियो पादीया (‘शैडो विदाउट अ नेम’ (2003) और ‘एंटीपोड्स’ (2005)) लिखते हैं, वे अपने कथ्‍य और परिवेश की तलाश में अपने महाद्वीप से बाहर जाकर अपने महाद्वीप की पुनर्रचना करते हैं. इस तरह बोलान्‍यो एक पूरे कथा-आंदोलन की प्रेरणा बन जाते हैं, बल्कि नए लोगों में अपने विश्‍वास से विस्‍तार भी पाते हैं. वोल्‍पी ने अपने एक उपन्‍यास, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद अभी नहीं हुआ है, में बोलान्‍यो को ही एक किरदार बनाकर प्रस्‍तुत किया था. ठीक ऐसा ही स्‍पेन के लोकप्रिय लेखक जेवियर सेरकास ने किया था, जिसके कारण स्‍पेन के बाहर लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि रॉबर्तो बोलान्‍यो कोई असली इंसान नहीं, बल्कि एक उपन्‍यास का एक पात्र-भर है. कहने का आशय यह कि अपनी प्रखर उपस्थिति से, जिसे तब तक साहित्यिक आकाओं ने पूरी तरह मान्‍यता भी नहीं दी थी, बोलान्‍यो ने अपनी भाषा में ऐसा विलक्षण प्रभाव पैदा कर दिया था.

यह विडंबना भी बोलान्‍यो की अंतरराष्‍ट्रीय मान्‍यता को मज़बूत बनाती है कि चिली सहित कई देशों का साहित्यिक हलक़ा उन्‍हें उनके जीते अपने यहां मान्‍यता नहीं दे पाया. वह तमाम उम्र नक़ल, मिडियॉक्रिटी और चुप्पियों से जूझते रहे. वह लगभग असीमित, अपूर्ण और अब भी अन-एक्‍सप्‍लोर्ड गुणों से युक्‍त फिक्‍शन की रचना करते रहे, अपनी और आने वाली पूरी पीढ़ी के नाम उपन्‍यासों के रूप में प्रेमपत्र और शोकगीत की रचना करते रहे, एक खोई हुई मासूमियत का पाठ पढ़ते रहे, उन औज़ारों के सहारे, जिन्‍हें फिक्‍शन के क्षेत्र में अछूत माना जाता था, अपने वाक्‍यों, स्थितियों के ख़ास कि़स्‍म के दोहराव के साथ, जिन्‍हें दुर्गुण माना जाता रहा, तफ़सीलों की गहराई में उतरकर भी जिन्‍होंने प्रिसाइज़न को विरोधाभासी तरीक़े से बरक़रार रखा, जिनकी जिंदगी का रक्‍त कला में बदल गया और कला दरअसल रक्‍त बनकर उनकी नसों में बहती रही. लगातार भटकती, भटकती ही रहती, उनकी बेचैन अतृप्‍त रूह को उनकी किताबों में महसूस किया जा सकता है. बोलान्‍यो की मुक्ति संभव नहीं. उन्‍होंने उपन्‍यास नहीं लिखे, बल्कि आत्‍मा का पिंजरा बनाया है, जहां सबसे पहले उनकी आत्‍मा अटकती है, फिर उनके किरदारों की, फिर उनके पाठकों की; वह आत्‍मा जिसकी भेंट जब तक उनके दिल से नहीं हुई थी, तब तक वह जीवित थी.

 
 कविताएं 


मेक्सिको में गॉडजिला

ध्‍यान से सुनो मेरे बेटे: बम गिर रहे थे
मेक्सिको सिटी पर
पर किसी ने ध्‍यान ही नहीं दिया था.
हवा ज़हर लादे बह रही थी
गलियों और खुली खिड़कियों से
तुमने अभी-अभी ख़त्‍म किया था भोजन
और टीवी पर कार्टून देख रहे थे
तभी मुझे अहसास हुआ कि हम बस मरने ही वाले हैं.
मितली और चक्‍कर के बावजूद किसी तरह लड़खड़ाते
मैं पहुंचा रसोई में और तुम्‍हें फ़र्श पर पाया.
हम झट गले लग गए. तुमने पूछा आखि़र यह हो क्‍या रहा
और मैंने यह नहीं बताया कि हम मौत के कार्यक्रम में शामिल हैं
बल्कि कहा कि हम एक यात्रा पर निकलने वाले हैं.
एक और यात्रा, एक साथ, और तुम्‍हें घबराने की कोई ज़रूरत नहीं.
गुज़र जाने के बाद भी मौत ने हमारी आंखें बंद नहीं कीं.
हफ़्ते-भर बाद या एक साल बाद पूछा तुमने
हम क्‍या हैं?
संयोग के बड़े सड़ चुके सूप में
चींटियां, मक्खियां या ग़लत नंबर
हम लोग इंसान हैं, मेरे बेटे, लगभग चिडि़यों की तरह
लोक-नायकों की तरह और रहस्‍यों की तरह.

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सराहना

उसने कहा वह व्‍यस्‍त दिनों से प्‍यार करती है. मैंने आसमान की ओर देखा. ‘‘व्‍यस्‍त दिन’’, साथ-साथ बादल और बिल्लियां भी फिसल कर झाडि़यों के बीच जा छिपे. जिन फूलों को मैं पीछे खेतों में छोड़ आया, वे तुम्‍हारे प्रति मेरे प्रेम का सबूत हैं. बाद में मैं जाली लेकर तितलियों को खोजता हुआ लौटा. लड़की ने कहा ‘‘दुर्घटना’’, ‘‘घोड़े’’, ‘‘रॉकेट्स’’, और मेरी पीठ पर थपकियां दीं. उसकी पीठ बोल पड़ी. जैसे पुरानी कोठियों की दुपहरियों में बोला करते हैं झींगुर. मैंने अपनी आंखें बंद कीं, टूटन के बोल सुने और पुलिस बहुत तेज़ी से अपनी गाडि़यों से बाहर निकली. खिड़की के बाहर देखना बंद मत करना. बिना एक शब्‍द बोले उनमें से दो दरवाज़े तक पहुंचे और कहा ‘‘पुलिस’’, उसके आगे मैं सुन नहीं पाया. मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, वे लड़के समुद्र किनारे मारे गए. देह छेदों से भरी हुई. इसमें ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ है, हैवानियत-सी, उस नर्स ने तब कहा, जब कोई सुन नहीं रहा था. ‘‘व्‍यस्‍त दिन, मैंने आसमान की ओर देखा, बिल्लियां’’, यक़ीनन मैं खुली हवा में लौटकर नहीं जाऊंगा, न फूलों के साथ, न जाली के साथ, न ही अदद किसी किताब के साथ जिससे दुपहरी काट सकूं मैं अपनी. मुंह तो खुला पर लेखक कोई बात नहीं सुन पाया. उसने सन्‍नाटे में विचार किया और बाद में सोचा, ‘‘यह सब तो हुआ ही नहीं था’’, ‘‘घोड़े’’, ‘‘अगस्‍त में कलाएं बदलता चांद’’. अंधेरे में ढला हुआ. शून्‍य में से किसी ने सराहना में तालियां बजाईं. मेरा अंदाज़ा है वह खु़शी है.

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गंदली, चिथड़ों में

श्‍वान-पथ पर, मेरी आत्‍मा आ टकराई मेरे दिल से
छिन्‍न-भिन्‍न बिखरी, पर जीवित
गंदली, चिथड़ों में, और प्रेम में आकंठ डूबी
श्‍वान-पथ पर कोई जाना नहीं चाहता
ऐसा रास्‍ता जिस पर सिर्फ़ कवि चला करते हैं
जब उनके पास करने को कुछ नहीं बचता
लेकिन मेरे पास अभी भी करने को बहुत कुछ है
फिर भी मौजूद मैं इस रास्‍ते पर: ख़ुद को सज़ा-ए-मौत सुनाता हुआ
लाल चींटियों के ज़रिए और काली चींटियों के भी
जो घूमा करती हैं निर्जन गांवों में भटकती:
भय इतना बढ़ता जाता कि सितारों को छू जाता
चिली का बाशिंदा जो मेक्सिको में पढ़ा-पला हर चीज़ सह सकता है
मैं ऐसा सोचा करता, पर सत्‍य नहीं था यह
रात को रूदन करता था मेरा दिल
होने की नदी को उच्‍चारते थे कुछ बुख़ारशुदा होंठ
बाद में मैंने पाया कि मेरे अपने होंठ ही थे वे
होने की नदी, होने की नदी, ख़ुशी की ऐसी ऊंची तरंग थी
जो इन परित्‍यक्‍त गांवों के सीवानों पर मुड़ा करती थी
गणितज्ञ और ब्रह्मज्ञानी, पवित्र पुजारी और डाकू
वहां इस तरह उभर आए जैसे
जलचर यथार्थ उभरा करते हैं धात्विक यथार्थों के बीच.
सिर्फ़ बुख़ार और कविता ही उकसा सकते हैं दृष्टि को
सिर्फ़ प्रेम और स्‍मृति
ये रास्‍ते और ये मैदान नहीं
न ही यह भूलभुलैया
जब तक कि मेरे दिल से नहीं आ टकराई थी मेरी आत्‍मा
वह बीमार थी, सच है, पर वह जीवित थी.
****


बीस की उमर में सेल्‍फ पोर्ट्रेट

मैं निकल पड़ा, क़दमतालों के साथ हो चला और
कभी नहीं जान पाया कि कहां ले जाएंगे ये सब मुझे
भय से भरा मैं चला
मेरा पेट बह निकला, सिर भनभनाने लगा :
मुझे लगा यह सब मुर्दों की बर्फा़नी हवा के कारण है
मुझे नहीं पता. मैं निकल पड़ा, मैंने सोचा
इतनी जल्‍दी छोड़कर हट जाना शर्मिंदगी से भरा होगा
उसी समय मैंने रहस्‍यमयी और दृढ़ पुकार सुनी
उसे या तो आप सुन सकते हैं या बिल्‍कुल नहीं, तो मैंने सुना
और लगभग एक भयानक आवाज़ में विलापता मैं फट पड़ा,
आवाज़ जो हवा और समंदर में पैदा हुई. तलवार और ढाल पर.
और बावजूद मैं डरा हुआ था, मैं चल पड़ा. अपने गाल मैंने
मौत के गाल से सटा दिए. और असंभव था अपनी आंखें बंद कर लेना,
देखने से बच जाना इस नज़ारे को, जो धीमा और अजीब था
यद्यपि यह स्‍थापित था इतने तेज़ रफ़्तार यथार्थ में : कि
मुझ जैसे हज़ारों लोग, बच्‍चों जैसे मुंह वाले या दाढ़ी वाले
लेकिन सारे लातिन अमेरिकी हम सब ही
मौत से सहला रहे हैं अपने गाल.

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(कविताएं बोलान्‍यो के संग्रह 'द रोमांटिक डॉग्‍स' से. गीत चतुर्वेदी का किया हिंदी अनुवाद 
लॉरा हीली के अंग्रेज़ी अनुवादों पर आधारित है.


  कहानी

फोन काल्स

बी, एक्स का प्रेमी है। दुखी होकर भी, बेशक। जैसा कि हरेक प्यार करने वाला कहता और सोचता है, बी भी, अपने जीवन के एक खास दौर में, एक्स के लिए कुछ भी कर सकता था। एक्स उससे नाता तोड़ लेती है। एक्स यह काम फोन पर करती है। पहले तो, जाहिर तौर पर बी टूट सा जाता है, लेकिन बाद मे जैसा कि अकसर ही होता है, वह इससे उबरने में भी कामयाब रहता है।
 

एक रात जब बी के पास करने को और कुछ भी नहीं होता, दो बार रिंग कर लेने के बाद, वह एक्स से संपर्क कायम कर लेता है। दोनों में से कोई भी अब जवान नहीं है, और स्पेन के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच रही उनकी आवाजों में उनकी उम्र साफ साफ सुनाई देती है। दोस्ती फिर से दुरुस्त हो जाती है और वे कुछ ही दिनों में मिलने का भी फैसला कर लेते हैं। दोनों ही पक्ष तलाक, नई बीमारियों और कुंठाओं के दौर से होकर गुजर चुके हैं। बी जिस वक्त ट्रेन पकड़ता है और एक्स के शहर की ओर बढ़ने लगता है, तब तक वह प्यार के जज्बात से बचा रहता है। पहला दिन वे एक्स के घर में बंद से रहकर, बातें करते हुए बिताते हैं (बोलने का काम, असल में, सिर्फ एक्स करती है, बी उसे चुपचाप सुनता रहता है और कभी कभार कुछ पूछ लेता है) ; रात होने पर एक्स उसे अपने साथ सोने को आमंत्रित करती है। बी की ऐसी कोई इच्छा नहीं होती कि वह एक्स के साथ सोये, लेकिन फिर भी वह राजी हो जाता है। अगली सुबह, उठने पर, बी फिर से प्यार में है। पर यह प्यार एक्स से है या केवल प्यार करने के विचार से। रिश्ता काफी कठिन और जटिल हो जाता है ; एक्स हर दिन आत्महत्या के लिए तत्पर रहती है और उसकी मनोचिकित्सा चल रही होती है (टैबलेट्स, ढेर सारे टैबलेट्स, जो किसी भी तरीके से उसकी मदद नहीं करते), वह अकसर ही, बिना किसी वजह के रोने लगती है। बी, एक्स का देखभाल करने लगता है। एक्स की देखभाल को लेकर उसकी लगन और उसका स्नेह बहुत ज्यादा होता है, लेकिन यह थोड़ा अजीब भी लगता है। बी को जल्द ही ऐसा भान होता है कि उसका खयाल रखना किसी सच्चे प्रेमी के खयाल रखने की नकल जैसा है। वह एक्स को इस अवसाद से उबरने की राह दिखाता है, लेकिन बी का ऐसा कुछ भी करना एक्स को एक बंद गली में बढ़ते जाने देना होता है, या फिर एक्स ही इसे बंद गली में आगे का सफर समझती है। कभी कभी, जब वह खुद में खोया होता है, या फिर एक्स को सोते देखता है, तो उसे लगता है कि बंद गली की तरह यह भी एक अंत ही है। इन सब के प्रतिकार के तौर पर, वह अपने पुराने प्यार याद करता है, यूं खुद को समझाना चाहता है कि वह एक्स के बिना भी रह सकता है, अकेले रह कर भी जी सकता है। एक रात एक्स उससे चले जाने को कहती है, इसलिए वह एक ट्रेन पकड़ता है और शहर छोड़ देता है। एक्स स्टेशन तक उसे छोड़ने के लिए जाती है। काफी नाजुक से क्षणों वाली यह विदाई किसी भी नयी चीज़ की उम्मीद नहीं जगाती। बी एक स्लीपर दर्जे का टिकट ले रखा होता है लेकिन उसे काफी देर तक नींद नही आती। आखिरकार जब वह सोता है तो एक सपना देखता है, रेगिस्तान के बियाबान में टहल रहे एक उजले हिममानव का। वह हिममानव एक सीमांत पर चलता है और शायद किसी मुसीबत की ओर बढ़ रहा होता है। लेकिन फिर भी वह चला ही जाता है, अपने शातिर होने से आलंब लेता हुआ ; वह रात में चल रहा होता है, जब बर्फ की ही मानिंद उजले सितारे रेगिस्तान को धो रहे होते हैं। बी जिस वक्त जागता है (ट्रेन तब तक बार्सेलोना के सांत्स शहर में पहुंच चुकी रहती है।)  उसे लगता है कि उसे रात में देखे सपने का अर्थ (अगर सचमुच कोई अर्थ है, तो) पता है और इस बात से थोड़ी सांत्वना मिलने पर घर को चला जाता है। उस रात वह एक्स को फोन करता है और सपने की बात बताता है। एक्स कुछ भी नहीं कहती। अगले दिन वह एक्स को फिर से रिंग करता है। और उसके भी अगले दिन। एक्स का रवैया दिन ब दिन ठंडा पड़ता जाता है, मानो बी हर फोन काल के साथ फिर से उनके अतीत में घुसता चला जा रहा हो। बी को लगता है कि वह गायब होता जा रहा है। कि एक्स को पता है कि वह क्या और क्यों कर रही है, और वह बी को खतम करती जा रही है। एक रात बी उसे ट्रेन पकड़कर अगली ही सुबह उसके घर पहुंच जाने की धमकी दे डालता है। एक्स कहती है कि कभी ऐसा सोचना भी मत। बी कहता है कि वह आ रहा है, और अब वह इन फोन काल्स के भरोसे नहीं रह सकता, और एक्स से बातें करते हुए, वह उसका चेहरा अपने ठीक सामने पाना चाहता है। एक्स कहती है कि वह दरवाजा नहीं खोलेगी, और फोन काट देती है। बी कुछ समझ नहीं पाता। लंबे समय तक वह यही सोचता रहता है कि भावनाएं और इच्छाएं इस तरह एक चरम से दूसरे चरम तक कैसे पहुंच सकती हैं। फिर वह पीना शुरू करता है, और खुद को किताबों में खो देने की कोशिश करने लगता है। दिन बीतने लगते हैं।

छः महीने बाद, एक रात, बी एक्स को फोन लगाता है। एक्स आवाज को पहचान जाती है। अरे, तुम! वह बोलती है। एक्स का ठंडा रवैया बात करते हुए जाता रहता है। बी को लगता है कि एक्स उससे कुछ कहना चाहती है। वह मुझे यूं सुनती जा रही है कि जैसे चुप्पी से भरा यह लंबा समय कभी बीता ही न हो, बी सोचता है, कि जैसे हम दोनों ने पिछली दफा कल ही बात किया हो। बी पूछता है, कैसी हो? कुछ अधटूटे जवाबों के बाद एक्स फोन काट देती है। हैरान सा बी, फिर से उसका नंबर मिलाता है। फोन उठा लिए जाने के बाद वह चुप ही रहने का फैसला करता है। उधर से एक्स की आवाज आती है, कौन? चुप्पी। एक्स कहती है कि वह सुन रही है और जवाब का इंतजार करती है। फोन लाइन से होकर वक्त गुजरता जाता है - वक्त जो बी और एक्स के बीच चला आया, और बी जिसे नहीं समझ पाया - खुद को सिकोड़ और फैलाकर, अपना एक सच बताते हुए। इस बात का एहसास किए बिना ही, बी रोने लगता है। उसे पता होता है कि एक्स जान रही है कि फोन किसने किया था। फिर, चुपचाप, वह फोन काट देता है।

यहां तक यह एक अदना सी कहानी है ; दुर्भाग्यवश, लेकिन बिलकुल ही साधारण। बी को इस बात का पूरा एहसास है कि उसे दुबारा एक्स को फोन नहीं करना चाहिए। एक दिन दरवाजे पर दस्तक होती है ; यह ए और जेड का आना है। दोनो पुलिस के आदमी हैं और बी से कुछ सवाल करना चाहते हैं। बी जानना चाहता है कि पूछताछ का वास्ता किस सिलसिले में? ए बताने को तैयार होता है लेकिन जेड, फूहड़पन के साथ इधर उधर की भूमिका बनाने लगता है, आखिरकार मुद्दे पर आता है, स्पेन के दूसरे छोर पर आज से तीन दिन पहले, किसी ने एक्स को मार डाला। पहले तो, बी स्तब्ध रह जाता है ; फिर एहसास करता है कि वह शक के दायरे में है और खुद पर खतरे का बोध उसे अपने बचाव की स्थिति में ला देता है। पुलिसवाले उससे खास दो दिनों की उसकी गतिविधि के बारे में पूछते हैं। बी को याद नहीं आता कि उसने उन दो दिनों में क्या किया और किसे देखा है। लेकिन, जाहिर तौर पर, उसे इतना पता है कि वह बार्सेलोना से बाहर नहीं गया है - सच कहे तो अपने पड़ोस में भी नहीं, यहां तक कि अपने फ्लैट से भी बाहर नहीं - लेकिन वह इसे साबित नहीं कर सकता। पुलिसवाले उसे अपने साथ लिए जाते हैं। वह पूरी रात पुलिस स्टेशन पर गुजारता है। पूछताछ के दौरान, एक खास समय में उसे लगता है कि वे उसे उस शहर में ले जाएंगे जहां एक्स रहती थी, और यह बात अजीब तरीके से उसके भीतर एक कुलूहल जगाती है, लेकिन आखिरकार, ऐसा नहीं होता। वे उसका फिंगरप्रिंट्स लेते हैं और पूछते हैं कि क्या वह ब्लड टेस्ट के लिए राजी है? वह राजी हो जाता है। अगली सुबह वे उसे वापस घर जाने देते हैं। आधिकारिक तौर पर बी हिरासत से बाहर हो जाता है ; वह सिर्फ एक हत्या के मामले की पूछताछ में पुलिस का मददगार है। वापस घर जाने पर, वह बिस्तर पर कटे पेड़ सा गिर जाता है और गहरी नींद में चला जाता है। वह  सपने में एक रेगिस्तान और एक्स का चेहरा देखता है। जागने से ठीक पहले उसे एहसास होता है कि वो दोनों एक जैसे ही हैं, या फिर एक ही हैं। इससे यह भांप लेना आसान हो जाता है कि वह रेगिस्तान में खोया हुआ है।

रात में वह एक बैग में कुछ कपड़े समेटता है, स्टेशन जाता है, और उस शहर के लिए ट्रेन पकड़ लेता है जहां कि एक्स रहा करती थी। स्पेन के एक से दूसरे छोर तक की उस यात्रा में पूरी रात लग जाती है। वह सो नहीं पाता और उन सभी चीजों के बारे में सोचता रहता है जो वह कर सकता था, लेकिन कर नहीं पाया ; हर उस चीज के बारे में भी, जो वह एक्स को दे सकता था, लेकिन दे नहीं पाया। वो यह भी सोचता है ; अगर मैं मरा होता तो एक्स इस तरह से, स्पेन के एक से दूसरे छोर तक, इसकी उल्टी दिशा में यात्रा नहीं कर रही होती। आगे उसे यह खयाल आता है ; कि ठीक यही वजह है कि मैं अब तक जिंदा हूं। नींद से खाली उस सफर में, यूं पहली बार उसे अपने लिए एक्स का सच्चा महत्व नजर आता है ; उसे एक्स पर फिर से प्यार आने लगता है, और आखिरी बार, आधे दिल से ही सही, वह खुद से नफरत करने लगता है। जब वह पहुंचता है, तड़के सुबह, वह सीधा एक्स के भाई के घर पहुंचता है। एक्स के भाई को आश्चर्य होता है, वह चकरा सा जाता है, लेकिन बी को अंदर बुलाकर एक काफी की पेशकश करता है। बी गौर करता है कि वह नहाया नहीं है। उसने सिर्फ अपना चेहरा धोया है और बालों को गीला कर लिया है। बी काफी की पेशकश कबूल कर लेता है, और कहता है कि उसने हाल ही में एक्स की हत्या के बारे में सुना, वह पुलिस द्वारा खुद से की गई पूछताछ के बारे में उसे तफसील देता है, और पूछता है कि आखिर हुआ क्या था? किचेन में काॅफी तैयार करते हुए एक्स का भाई जवाब देता है, सबकुछ बेहद दुखद रहा, लेकिन मेरे समझ में यह नहीं आता कि इन सब से तुम्हारा क्या लेना देना हो सकता है? बी बताता है कि पुलिस हत्यारे के रूप में उस पर शक कर रही है। एक्स का भाई हंसते हुए कहता है, तुम्हारी किस्मत हमेशा से ही खराब रही है? बी सोचता है, जब कि मैं फिर भी जिंदा ही हूं, तुम्हारा ऐसा कहना अजीब है। लेकिन बी एक्स के भाई के लिए भीतर ही भीतर कृतज्ञ भी होता है कि उसकी निर्दोष होने पर शक नहीं किया गया। एक्स का भाई, उसे घर में छोड़कर काम पर चला जाता है। थका हुआ बी जल्द ही गहरी नींद में खो जाता है। बिना किसी आश्चर्य के, एक्स फिर से उसके सपने में दिख जाती है।

जब वह उठता है, उसे लगता है कि वह कातिल के बारे में जान गया है। उसने उसका चेहरा देखा हुआ है। उस रात वह एक्स के भाई के साथ बाहर जाता है। वे कई सारे बार घूमते हैं, और इधर उधर की तमाम बातें करते हुए पीकर धुत हो जाना चाहते हैं, लेकिन हो नहीं पाते। सुनसान गलियों से होकर घर की ओर वापस आते हुए बी कहता है कि एक बार उसने एक्स को फोन किया था और फोन पर कुछ बोला नहीं था। आखिर क्यों, एक्स का भाई पूछता है। मैंने बस एक ही बार ऐसा किया था, बी जवाब देता है। पर मुझे लगता है कि एक्स के पास उस तरह के ढेर सारे फोन आए होंगे। और उसे लगा होगा कि वे सारे फोन मैंने किए थे, समझे? तो तुम्हारा मतलब है कि मारने वाला कोई अज्ञात शख्स है, जो फोन किया करता था? बिलकुल, बी जवाब देता है। और एक्स ने सोचा कि वह मैं था। एक्स का भाई त्यौरी चढ़ा लेता है। मुझे लगता है कि यह उसके पहले के प्रेमियों में से ही कोई था, जैसा कि तुम जानते ही हो, उसके कई सारे प्रेमी थे। बी कोई जवाब नहीं देता (मानो एक्स के भाई की समझ में कुछ आया ही न हो) और घर पहुंच जाने तक दोनों चुप ही रहते हैं।

लिफ्ट में ही, बी की इच्छा जोर से उल्टी करने की होती है। वह बोल पड़ता है य मैं उल्टी करने वाला हूं। रुको, एक्स का भाई बोलता है। वे झट से नीचे के गलियारे में उतरते हैं। एक्स का भाई दरवाजा खोलता है, बी बाथरूम की खोज में भागता है। लेकिन जैसे ही वह बाथरूम में में पहुंचता है, उसकी मितली शांत हो जाती है। वह पसीने पसीने हो जाता है और उसका पेट दुखने लगता है, लेकिन वह उल्टी नहीं कर पाता। उपर से ढक्कन लगा शौचालय उसे खुद की हालत पर हंसते हुए बिना दांतों वाले किसी मुंह की तरह लगता है। या फिर किसी और पर ही हंसता हुआ मुंह, जो कुछ भी हो। अपना मुंह धो लेने के बाद, वह आईने में अपना चेहरा देखता है ; उसका चेहरा कागज के पन्ने की तरह सफेद है। वह बची खुची रात को इधर उधर उंघते हुए और एक्स के भाई के खर्राटे सुनकर बिताता है। अगले दिन वे एक दूसरे को अलविदा कहते हैं और बी वापस बार्सेलोना चला आता है। बी सोचता है कि वह फिर से कभी उस शहर में वापस नहीं जाएगा, क्योंकि अब वहां एक्स नहीं रही।

एक सप्ताह बाद, एक्स भाई उसे यह बताने के लिए फोन करता है कि पुलिस ने हत्यारे को खोज लिया है। वह बताता है, हत्यारा एक्स को गुमनाम फोन काल्स करके प्रताड़ित करता था। बी कोई उत्तर नहीं देता। एक पुराना प्रेमी, एक्स का भाई बोलता है। अच्छा लगा जानकर, बी जवाब देता है। इत्तेला करने के लिए धन्यवाद। अंत में एक्स का भाई फोन रख देता है और बी अकेला रह जाता है।


(बोलान्‍यो के कहानी संग्रह 'लास्‍ट ईवनिंग ऑन अर्थ' से. अनुवाद : श्रीकांत) 

Comments

piyush said…
बोलान्यो के नाम से परिचित था, उनके काम से नहीं. कुछ सालों पहले किसी संकलन में शायद उनकी कुछ कविताएँ सरसरी तरह से पढ़ी थी. अब उन्हें पूरा पढ़ने का मन है. सबद व् मित्रों का एक अच्छा काम.
पीयूष दईया
संस्कृतियों के इन्द्रधनुष का उजला रंग।
चन्दन said…
रॉबर्टो बोलान्यो! सबद की यह प्रथम परिचयात्मक पोस्ट बहुत लाभप्रद होगी. बहुत पहले आलोचना के एक लेख मे गिरीश मिश्र के द्वारा एक चलताउ जिक्र जरूर देखा था बोलान्यो का पर लेखक को जानने समझने का यह गम्भीर प्रयास मौँजू और पहला है. मैं तो इन जीवट लेखकों की जीवन स्थिति देखकर ही डर जा रहा हूँ. हिन्दी अंग्रेजी स्पेनिश – हर जगह वही हाल. वही उपेक्षा! बदहाली!

यहाँ मैं ताकतवर और समृद्ध पीढ़ी बनाम नई और उत्साही पीढ़ी की बहस नहीं कर रहा हूँ पर एक बार हिन्दी में भी सरसरी तौर पर निगाह घुमाई जानी चाहिये कि कहीं कोई अनोखा और जरूरी लेखक उपेक्षा का शिकार तो नहीं हो रहा है. (हाँ पर अनोखा और जरूरी ही वरना हिन्दी में उपेक्षा एक राग की तरह गाई जाने लगी है. दरबारी से भी ज्यादा)

दूसरे, मेरी समझ के मुताबिक भी अपनी सारी खूबसूरती और शानदार डिक्शन के बावजूद जादुई यथार्थवाद हिन्दी समाज के लिये, बतौर टूल, सूटेबल नहीं है और साथ ही सराहनीय यह भी कि कुछेक सफल प्रयासों के अलावा हिन्दी के कथाकारों ने इसे अपने से दूर ही रखा है.

गीत, श्रीकांत और सबद को धन्यवाद. इतनी महती जानकारी और अनुवाद की खातिर.
Priyankar said…
उम्र का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा फक्कड़पने, बेतरतीबी और साहित्यिक खुराफातों में बिताने वाले इस प्रतिभाशाली लेखक के बारे में सुना ही था. छिटपुट कहीं पढ़ा हो तो और बात है . पर परवर्ती काल में इस कवि-उपन्यासकार की प्रतिभा का विस्फोट अथवा ठान कर किया गया सायास साहित्यिक श्रम अचरज में डालने वाला है .

बोलान्यो से बहुत आत्मीय ढंग से परिचित कराने के लिए और उनके साहित्य की बेहतरीन बानगी के लिये गीत,श्रीकांत,अनुराग और सबद यानी आप सबके प्रति आभार !
रोबेर्तो बोलान्यो का मैंने पहली बार ही कुछ पढ़ा है. वह भी हिंदी में. सबद को सलाम.
सागर said…
A salute to sabad. taking printout.
रॉबर्तो बोलान्‍यो से रचनाकर्म से पहली बार परिचय हुआ. गीत और श्रीकांत दोनों ने अनुवाद मन और श्रम से किये हैं. सबद को बधाई..
बहुत सुरुचिपूर्ण और सार्थक है यह सब.
ये बहुत बड़ा काम है जो आप लोगों ने किया। बधाई!
कृष्णमोहन झा said…
अनुराग,हिन्दी में बोलान्यो को उपलब्ध कराने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया!उनका नाम तो सुना था,लेकिन उनके काम से अपरिचित था। नॉर्थ-ईस्ट में हरियाली बहुत है,किताबें बहुत कम। खैर… गीत बहुत लगन से काफी सारा काम कर लेते हैं। एक बार फिर आपकी टीम को बधाई!
Anonymous said…
बोलान्यो के नाम और काम से आज पहली बार रू-ब-रू हुआ. इसके लिए अनुराग भाई का धन्यवाद. बोलान्यो का जीवन कभी-कभी चे के जीवन की भी हल्की याद दिला रहा है. गीत तो काफ़ी धुआँधार लिखते-पढ़ते हैं. बेहतरीन अनुवाद के लिए गीत और श्रीकांत जी को धन्यवाद. मैं चन्दन भाई की बात से भी सहमत हूँ कि एक बार हिन्दी में भी विश्लेषक (सरसरी नहीं) निगाह दौड़ानी होगी. क्षमा करें, लेकिन सच कहूं तो निज़ार क़ब्बानी से बाहर निकलने के लिए दिल गवाही नहीं दे रहा है.
sidheshwer said…
* बोलान्यो के नाम और उनके रचनाकर्म की झलक से परिचित होना सुखद है और आगे पढ़ने के लिए एक राह भी। इसे एक सिटिंग में पढ़ जाना मेरे लिए मुश्किल था।
*बोलान्यो , गीत, श्रीकांत और अनुराग सभी के प्रति आभारी हूँ इस उम्दा चीज को पढ़वाने के लिए।
* आप लोग कितना - कितना काम कर कर लेते हैं भाई!
iqbal abhimanyu said…
मैं जे एन यू में स्पैनिश भाषा और साहित्य का विद्यार्थी हूँ, पिछले सेमिस्टर में ही बोलान्यो के एक उपन्यास पर एक टर्म पेपर लिखा था.. कहना जरूरी नहीं कि उन जैसे उपन्यासकार बिरले ही हैं, नयी पीढी के साहित्य में.
यह जानकार खुशी हुई कि हिन्दी में उनपर लिखने -पढने का काम हो रहा है. मैं स्वयं भी इसमें योगदान करना चाहूँगा, हालाँकि मुझ जैसे नौसिखिये के लिए यह छोटा मुंह बड़ी बात है. उम्मीद है आप लोग आगे भी स्पैनिश के साहित्यकारों, विशेषकर वे जिन्हें भारतीय पाठक जानते नहीं हैं, पर सामग्री छापते रहेंगे..
साधुवाद एवं शुभकामनाएं स्वीकार करें..
इकबाल अभिमन्यु
एम ए (पूर्वार्ध) स्पैनिश
जेएनयू
girish pankaj said…
waah, aanand aa gayaa. anuvaad-sahity ko barhaava de rahe hain aap., badaa kaam hai yah. aapki rachanae. apni anuvad patrika ''sadbhavana darpan'' men bhi lenaa chahonnga...
sarita sharma said…
रॉबर्तो बोलान्‍यो का जीवन और लेखन प्रतिरोध से भरा रहा.जादुई यथार्थवाद से आगे जाकर उन्होंने एंटी-फिक्‍शन, एंटी-लिटरेरी फॉर्म अर्थात इन्‍फ्रारियलिजम की स्थापना की.वह बहुस्‍तरीय यथार्थ के जटिल अनुभवों को ‘फ्रैक्‍चर्ड फ्लुएंसी’का इस्तेमाल करके सादी भाषा में अभिव्‍यक्त करते है. मेरा महाद्वीप मेरी भाषा है की उद्घोषणा करने वाले और नई पीढ़ी को अपना एकमात्र देश मानने वाले बोलान्‍यो ने बहुत लंबे समय तक मौत को अपने इतने पास देखा कि वह अपनी मृत्‍यु के साथ-साथ पूरे महाद्वीप को मृत्‍यु के सामने खड़े हुए संघर्ष करते देखते हैं.उनकी कविताओं और कहानियों में यथार्थ एंटी रोमांटिक है जिनमें उनकी भटकती आत्मा श्‍वान-पथ पर चली जाती है और सब लातिन अमेरिकी मौत से अपने गाल सहला रहे हैं.फोन काल्स कहानी में लेखक पूछता है-भावनाएं और इच्छाएं इस तरह एक चरम से दूसरे चरम तक कैसे पहुंच सकती हैं.आपके अनुवाद और प्रस्तुति ने बोलान्यो को बहुत दिलचस्प अंदाज में परिचित कराया है.

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