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गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त

कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?
इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?
हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्‌टी पर उगते हैं।
हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठह…