Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2010

अपने लेखक होने का सबसे कम मुज़ाहिरा

भालचंद्र नेमाड़े से पहले मनुष्य की तरह मिलना होता है. मराठी हैं, यह उनकी हिंदी सुनकर लगता है. किसान होंगे, यह उनकी काया देख कर लग सकता है. लेकिन 'कोसला' और 'बिढार' के लेखक भी हैं, यह बताने पर ही ज़ाहिर होता है. दरअसल, ऐसे लोग अपने लेखक होने का सबसे कम पता देते हैं. इसीलिए पहले उन्हें मनुष्य की तरह मिलना/पाना होता है. हालाँकि मनुष्य की तरह मिलना सबसे आत्मीय ढंग से मिलना है, फिर भी उसमें ''पहली दफ़ा मिल रहे हैं'' का अहसास तो रहता ही है, लेकिन यहाँ तो यह अहसास भी नहीं. गीत को तो उन्होंने पढ़ा था और इसी नाते जानते थे, मुझ ना-कुछ के साथ तो यह भी नहीं था. पर वो मिल रहे हैं. और वो जारी हैं, हमें शामिल करके. पूछ रहे हैं, सुन रहे हैं...बातचीत चल पड़ी है... आप न कुछ में भी भरपूर रूचि ले रहे हैं...अभी होटल के कमरे में हैं, अभी आपके लिए एक कप चाय निकालेंगे. चाव से पियेंगें और इसकी परवाह नहीं करेंगे कि उनकी पकी हुई बड़ी मूंछें चाय का रंग पकड़ रही है. साहित्य का प्रसंग आएगा तो अपनी बात रखेंगे और ऐसे मानो बड़ी बातों को सहजता से कहने की आदत उनमें ७२ की उम्र ने नहीं डाल…

कवि कह गया है : ६ : शिरीष कुमार मौर्य

{ कवि कह गया है शीर्षक इस स्तंभ में हिंदी के महत्वपूर्ण युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य का लिखना अपरिहार्य था, और हमारे आग्रहों पर उन्होंने अपनी कविता के जिन स्रोतों की ओर यहां इशारा किया है, वे उनकी कविता की हमारी समझ को और बेहतर बनाने में मददगार सिद्ध होंगे, इसमें दो राय नहीं. }

शर्मिन्दा होना भी कवि होना है

अपनी कविता के तीन निर्णायक और बुनियादी तत्वों के बारे में कुछ बातें रखूँगा...

स्मृति
कविता से परिचय पुराना है और नया भी। 12-13 बरस का था। पहाड़ में बहुत ऊंचाई पर बसे अपने गांव नौगांवखाल से चीज़ें ज़्यादातर सुन्दर ही दिखती थीं। आसपास बिखरा जीवन स्वाभाविक रूप से संसाधनहीन था पर उसे हम अपना मानते थे और ख़ुश रहते थे। स्कूल के अलावा छुट्टियों में गाय चराने जाना, दाय रिंगाना यानी गेंहू की बालियों पर मुंह बंधे हुए बैल घुमाना, सीढ़ीदार खेतों में हल चलाने की कोशिश करना और अपने विशालकाय 70 किलो वज़नी कुत्ते के साथ चीड़ की गिरी हुई पत्तियों पर फिसलना जैसे कई शगल थे। स्तब्ध रातों में जंगलों से निकल कर कुत्ते और गायों को शिकार बनाने वाला तेन्दुआ जिसे हम बाघ कहते, हमारे दिलों में छुपा एकमात्र भय था। ब…

सम्‍मुख - 1 : गीत चतुर्वेदी

साक्षात्कारों की यह सीरीज हिंदी के प्रखर युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी के साथ शुरू हो रही है और 'सम्मुख' नामक यह स्तंभ उन जैसे रचनाकारों के साथ संवाद को ही समर्पित रहेगा. सबद विस्तार से की गई ऐसी बातचीत के ज़रिये 'नए' को लेकर फैलने वाली अफवाहें और भ्रम की स्थिति दूर करने की भी न्यूनतम आकांक्षा रखता है. गीत के साथ यह बातचीत अनेक चरणों में संपन्न की गई और इसमें सम्मुख के अलावा दूरदर्शन के लिए रिकॉर्ड किये गए साक्षात्कार अंश और उन तमाम फ़ोन काल्स, ई-मेल्स और चैट को भी शामिल किया गया है जिनमें उठे प्रश्नों और जिज्ञासाओं का शमन उन्होंने मुझे सम्मुख मानकर ही किया.
इस इंटरव्‍यू को ई-बुक (पीडीएफ़ में) डाउनलोड करें
लिखना दरअसल कविता लिखना है

बातचीत की शुरुआत आपकी कहानियों से करते हैं. आप लंबी कहानियां लिखते हैं. लेकिन उसे लोग ज़रूरत से ज्यादा लंबी बता कर पढ़ते/छोड़ते रहे हैं...आपको फर्क पड़ता है?

नहीं.मैं ऐसे लोगों से मिला हूं, जिन्‍हें कहानी से ज़्यादा उसकी पृष्‍ठ संख्‍या में दिलचस्‍पी होती है, वे उसी आंकड़े से उसे रेफ़र करते हैं या उसकी निंदा करते हैं. मुझे हंसी आ जाती है, उनके…