लिखने के बारे में डायरी से कुछ टीपें





'लिखना
असंभव' जैसी स्थितियों को अगर लिखा जाए तो एक संभव सच में ज़रूरी कलात्मक झूठ/ कल्पना को फेंट कर वह कहने का जोखिम उठाया जा सकेगा जो कहा नहीं गया और कथा ठीक उस बिंदु से शुरू की जा सकेगी जहां से स्मृति ने भी उन स्थितियों को पोसने से इनकार कर दिया है.

जो स्मृति में है वह अनिवार्यतः कथा में भी होगा, यह ज़रूरी नहीं. यानी अब लिखना महज याद करना ही नहीं है. और हालांकि लिखना पहले की तरह ही चयन है, लेकिन उन तमाम असुविधाजनक या असंभव से लगने वाले प्रसंगों के चयन के फर्क के साथ जो बयान में आने से बराबर छूटते रहे हैं.

लिखते हुए किसी स्थिति-विशेष को 'एप्रोप्रियेट' कर लेना स्मृति ही नहीं, कल्पना की भी बर्बादी है. कम से कम लिखते हुए यादाश्त गुमा देने में कोई हर्ज़ नहीं.

ऐसे लिखा जाए मानो जी रहे हों. ऐसे जिया जाए मानो लिखे हुए की देह से निकलना हो रहा हो.

प्रेम जैसी संलग्नता से लिखना चाहिए, लेकिन अपने लिखे हुए के प्रेम में पड़ने से भरसक बचना चाहिए. इस लिहाज से हिंदी के वे तमाम पाकेट-बुक्स पढ़ने से भी अपने को बचा लेना चाहिए जिसमें लेखक ने ''मेरी प्रिय कहानियां या कविताएं'' छपाई हुई हैं.

जहां-जहां प्यार लिखा है वहां-वहां सड़क लिख डालने वाले रुमान से तो खुद को बचाना ही होगा. लेकिन ''रहने के प्रसंग में एक घर था'' सरीखे विन्यास से बचने के लिए अभी और हुनर की दरकार होगी.

लिखते हुए देखने की आदत बराबर डालनी चाहिए. इससे भाषा को अपने पर मुग्ध होने या सपनों में खोने से फुर्सत मिलती रहती है.

हर लेखक लिख कर अपनी भाषा का दातुन करता है. दातुन बिला नागा करना चाहिए.

कुछ है जो लिखने के बाद दुरुस्त हो जाता है. उस कुछ को जानने के लिए ख़ुद लिखना पड़ता है. उस लिखे हुए का मोल जानने के लिए और बहुत सी लिखत को अपनी पढ़त में शामिल करना पड़ता है.
****
( चित्र-कृति वांग कार वाई की फिल्म 2046 से )

Comments

Udan Tashtari said…
बहुत सही!!

पात्र को जिओ, अहसासो और डूब जाओ उसमें...तब कलम उठाओ!!
डायरी में इतनी काम की चीजें हैं !
इसे पब्लिक ही कर देवें ! मजार्थ में !
डायरी काम की है, झाँपने का मन है ।
लिखने पर लिख डाला, वाह । हम तो नहीं लिख पाने के कारणों पर पुस्तक लिख रहे हैं ।
pratibha said…
badhiya hai!
Farhan Khan said…
आप ने बहुत ही सुन्दर अंदाज़ मैं कहा कि हर लेखक लिख कर अपनी भाषा का दातुन करता है. दातुन बिला नागा करना चाहिए. ये लेखक के लिये बहुत ही ज़रूरी और महत्वपूर्ण.

मैं अंत मैं इतना कहना चाहूंगा कि आप का लिखने का अंदाज़ और भाषा दोनों ही मोहक और प्रभावशाली हैं.
Anonymous said…
प्रेम जैसी संलग्नता से लिखना चाहिए, लेकिन अपने लिखे हुए के प्रेम में पड़ने से भरसक बचना चाहिए. इस लिहाज से हिंदी के वे तमाम पाकेट-बुक्स पढ़ने से भी अपने को बचा लेना चाहिए जिसमें लेखक ने "मेरी प्रिय कहानियां या कविताएं" छपाई हुई हैं........

Badhiya....Aabhaar...shubhkaamnaayen
रहने के प्रसंग में एक घर था ...... जिसमे दीवार में एक खिड़की रहती थी ?
क्या बढ़िया टिप्स हैं भाई ।
हमने भी बहुत सारी जमा कर रखी हैं ।
Anonymous said…
बहुत खूब. कुछ नया सीखा, कुछ जो भीतर था वह हैरान हुआ. मनीषा कुलश्रेष्ठ

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