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Showing posts from May, 2010

गोष्ठी : १ : स्मृति

( हम कविता क्या है या साहित्य क्या है सरीखे सवालों से तो दो-चार होते रहे हैं, पर कविता/साहित्य जिन अनिवार्य तत्वों की निर्मिति है, उसकी पहचान और परख करने में दिलचस्पी कम लेते हैं. स्मृति रचना का ऐसा ही एक अनिवार्य तत्व है. अपने तईं उसकी व्याप्ति और असर को कुछ रचनाकारों ने सबद के अनुरोध पर यहाँ कलमबद्ध किया है. उम्मीद है विचार-विनिमय की यह प्रक्रिया इसी तरह की कुछ और बुनियादी जिज्ञासाओं की ओर हमे ले जाएगी. सबद गई  १८ मई को दो साल पूरे कर गया. उसका काम और जिम्मेदारी इस दरम्यान बढे हैं, इसका उसे संतोष और अहसास बराबर रहा है. गोष्ठी नामक यह स्तंभ भी उसी अहसास की उपज है. )


किसी स्थगित अर्थ की तरह

गीत चतुर्वेदी

यह ऐसा बुनियादी विषय-संबंध है, जिस पर एक दौर में लगभग हर रचनाकार सोचता है, और आश्‍चर्यजनक तौर पर जो चीज़ें ऊपर-ऊपर अद्वितीय जान पड़ती हैं, वे दरअसल एक साझी क्रीड़ा ही होती हैं. इस पर सोचते हुए मुझे जॉयस, प्रूस्‍त और निर्मल वर्मा एक साथ याद आते हैं.

और महाभारत का वह दृश्‍य याद आता है, जब श्रीकृष्‍ण पराजित हो चुके हैं, उनकी सोलह हज़ार पत्नियां भीलों के साथ भाग चुकी हैं, उनकी मदद को आया अर…

ज़बां उर्दू : ७ : ग़ालिब : दिल की बात

आइन: देख अपना सा मुँह लेके रह गए साहब को, दिल न देने प' कितना ग़ुरूर था
दिल उसको, पहले ही नाज़-ओ-अदा से दे बैठे हमें दिमाग़ कहाँ, हुस्न के तक़ाज़ा का
मैं, और इक आफ़त का टुकड़ा, वो दिल-ए-वहशी कि है आफ़ियत का दुश्मन और आइन: तेरा आशना
सौ बार बन्द-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए पर क्या कारें, कि दिल ही अदू है फ़राग का
सबके दिल में है जगह तेरी, जो तू राज़ी हुआ मुझ प' गोया, इक ज़माना मेहरबाँ हो जाएगा
है एक तीर जिसमें दोनों छिदे पड़े हैं वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था
लाज़िम था कि देखो मिरा रश्ता कोई दिन और तन्हा गए क्यूँ ? अब रहो तन्हा कोई दिन और
मैं बुलाता तो हूँ उसको, मगर ऐ जज़्ब-ए-दिल ! उस प' बन जाए, कुछ ऐसी, कि बिन आए न बने
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था दिल भी या रब ! कई दिए होते
पीनस में गुजरते हैं जो कुचे से वो मेरे कन्धा भी कहारों को बदलने नहीं देते
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए धोए गए हम ऐसे, कि बस पाक हो गए
जिस ज़ख्म की हो सकती हो तदबीर, रफ़ू की लिख दिजिए, यारब ! उसे क़िस्मत में अदू की
यार से छेड़, चली जाए, 'असद' गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही ****
( कुछ शब्दार्थ …

डायरी : आशुतोष भारद्वाज

बाइस दिसंबर दो हजार तीन। दिल्ली

कांच की बोतल में पानी सिहरा, दीवार पर टंगा बल्ब झिलमिला गया।
बोर्हेसः हम आधुनिक यूरोपीय साहित्य के धर्मभंजक हैं।

तेइस दिसंबर दो हजार तीन। सुबह साढ़े ग्यारह। दिल्ली।

लेखक पाठक को ही नहीं खुद अपने को भी छलता है। अपने जाने अनजाने ही। निर्मल की क्षमता इस छल व छलावे को छुपा ले जाने में निहित है। क्या मैं कभी उनसे पूछ पाउंगा कि जब वे मेरी कहानी पर कहते हैं:‘‘अंग्रेज पिता का अपनी संतान से वह संबंध थोड़े हो पाता है जो भारतीय पिता का होता है।‘‘ तो एक दिन का मेहमान, जिसे साहित्य में शायद उनके सबसे करीबी मित्रों ने आत्मकथात्मक कहा है और उन्होंने सहमति भी दी है, में इस वाक्य के क्या मायने हैं-- वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे जिसने सिर्फ मां के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कन्दरा से उमड़ता बाहर आता है।

कोई अनाम तारीख।

पिकासोःमैं चीजों के चित्र बनाता हूं जिस तरह मैं उन्हें सोचता हूं न कि जैसा वे मुझे दीखती हैं।

दो-तीन जुलाई दो हजार सात। दिल्ली-बैंगलोर राजधानी।

एक तीसेक की लड़की उपरी बर्थ पर है, मेरी निचली…

लिखने के बारे में डायरी से कुछ टीपें

'लिखना असंभव' जैसी स्थितियों को अगर लिखा जाए तो एक संभव सच में ज़रूरी कलात्मक झूठ/ कल्पना को फेंट कर वह कहने का जोखिम उठाया जा सकेगा जो कहा नहीं गया और कथा ठीक उस बिंदु से शुरू की जा सकेगी जहां से स्मृति ने भी उन स्थितियों को पोसने से इनकार कर दिया है.
जो स्मृति में है वह अनिवार्यतः कथा में भी होगा, यह ज़रूरी नहीं. यानी अब लिखना महज याद करना ही नहीं है. और हालांकि लिखना पहले की तरह ही चयन है, लेकिन उन तमाम असुविधाजनक या असंभव से लगने वाले प्रसंगों के चयन के फर्क के साथ जो बयान में आने से बराबर छूटते रहे हैं.
लिखते हुए किसी स्थिति-विशेष को 'एप्रोप्रियेट' कर लेना स्मृति ही नहीं, कल्पना की भी बर्बादी है. कम से कम लिखते हुए यादाश्त गुमा देने में कोई हर्ज़ नहीं.
ऐसे लिखा जाए मानो जी रहे हों. ऐसे जिया जाए मानो लिखे हुए की देह से निकलना हो रहा हो.
प्रेम जैसी संलग्नता से लिखना चाहिए, लेकिन अपने लिखे हुए के प्रेम में पड़ने से भरसक बचना चाहिए. इस लिहाज से हिंदी के वे तमाम पाकेट-बुक्स पढ़ने से भी अपने को बचा लेना चाहिए जिसमें लेखक ने ''मेरी प्रिय कहानियां या कविताएं''…

महबूब की गली

अपनी मिट्टी को छिपायें आसमानों में कहाँ उस गली में भी न जब अपना ठिकाना हो सका! शमशेर

यह महबूब की गली से वापसी थी.
उसे अंदाज़ा न था कि उसके शहर में अब भी ऐसी गलियां मौजूद हैं जो पहले हिन्दू या मुसलमान गली हैं, इंसान गली बाद में. महबूब की गली यों कहीं थी भी नहीं. महबूब की गली तो दरअसल उसने बनाई थी. अपने दोस्तों से ही नहीं खुद लड़की से भी वह उसके वहां होने का जिक्र नगर निगम के नक्शे में इंगित जगह और नाम से कतई नहीं करता था. वह पहली दफा सुन कर हंसने लगी थी. लेकिन उसके इसरार और रियाज़ से हासिल सहजता ने लड़की को अपनी ही गली को नए नाम से पुकारना सिखा दिया था.

वह
कभी-कभी कहती,''तुम्हारे जैसे आदमी को लखनऊ के खयालीगंज में पैदा होना चाहिए था.'' लड़के ने न खयालीगंज देखा न लखनऊ. महबूब की गली देखी थी. उसके कूचे, नुक्कड़, लोग-बाग, यहाँ तक कि पहली दफा वहीं खाई गई 'बड़े' की बिरयानी भी उसकी दिनचर्या में इन वर्षों में इस कदर शामिल रहे कि वही उसका खयालीगंज और वही लखनऊ बन गए. उस गली से कभी वापसी भी हो सकती है, उसे ऐसी बदगुमानी तक न हुई थी.

...
और वापसी हो रही थी!

प्राथमिक
विद्यालय में रो…

मंगलेश डबराल

गुंजायमान
यह कोई विधा नहीं है. स्मृति या राय की बर्बादी से बच निकलने की कोशिश है. ज़्यादातर ये अनुभव हैं जो अक्सर अपने मूल रूप में हैं और किसी संहिता की तरह जीवन-धड़कनों के साथ गूँजते रहते हैं. इसे आलोचना, संस्मरण, डायरी या नोट्स वगैरह समझना भूल है और सच्चाई से खिलवाड़ है. ये बातें निर्माता के प्रति मानसिक तथ्य हैं. यहाँ कुछ शुरू नहीं हो रहा है, कुछ ख़त्म नहीं हो रहा है, कोई दावा नहीं किया जा रहा है. इसलिए क्रमानुक्रम का ख़याल नहीं रखा गया है. -व्योमेश शुक्ल
2003

' बाहर निकलने पर वे देखते हैं
फूल तोड़ लिये गए हैं
घास कुचली जा चुकी है.......''( पैदल बच्चे स्कूल )

वक़्त हमारे लिए ऐसा ही था. हम विपर्ययों को झेल रहे थे लेकिन उन्हें कहते नहीं थे. दरअसल हमसे कोई नहीं कहता था कि लिखो. अगर हमें लिखना आता भी होता तो भी हम उसे ज़रूरी न मान पाते. हमारे अनुभवों को कोई अनिवार्य नहीं मानता था इसलिए हम भी नहीं मानते थे.

011 - 22711805

तभी
एक दिन एक टेलीफ़ोन नम्बर चेतना में दाख़िल होता है. आप फ़ोन करते हैं और एक आवाज़ आपसे कहती है कि 'तुम्हें लिखना चाहिए', 'तुम्हें गंगा प्रदूषण के सवाल …

शिरीष कुमार मौर्य की नई कविता

{ कविता में कहानी सुनाना शिरीष की इस बीच की पहचान है लेकिन कहानी में कविता कहना उनकी सबसे बड़ी शक्ति, यानी जिस चीज़ को हम किसी किस्से की तरह सुनना चाहते हैं कवि उसे कविता की शर्तों पर हासिल करता है और हमसे, पाठकों से, भी ऐसी उम्मीद करता है; यों वह हमारे साहित्य-मिजाज़ को कुछ बदल देता है या कम से कम बदल देना चाहता है. यह कहानी की आवाज़ में कविता की ख़ामोशी की पेशकश है. ज़ाहिर है, ऐसा करने वाले शिरीष पहले कवि नहीं हैं, कवि पहला होना भी नहीं चाहता, लेकिन कविता निर्मित करने के अत्यन्त निजी साधनों के साथ यह कोशिश करते हुए वह हमेशा अनूठे और अनिवार्य लगा किये हैं. शिरीष की कविता में क्रीड़ा-भाव पर्याप्त है किन्तु उन्होंने ज़िन्दगी को ही कला के बुनियादी पदार्थ के रूप में स्वीकार किया है, उनकी कविता में जीवन के बढे-चढ़े अनुपात को उनके कर्त्तव्य की तरह पढ़कर उससे और प्यार किया जा सकता है. यह देखना कितना दिलचस्प है कि कवि अपनी लगातार कविताओं में इसी पदार्थ के मनमाने प्रयोग करता चला जा रहा है, अपनी पहाड़ी, पठारी और मैदानी नागरिकताओं के प्रयोग, स्मृतियों के प्रयोग, स्त्री के साथ विविधतर मानवीय सं…

कवि की संगत कविता के साथ : ७ : नीलेश रघुवंशी

{जब मैं नीलेश रघुवंशी की कविताएं पढ़ता हूं, तो मुझे ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फिल्‍मों की याद आ जाती है, जहां कई सारे रंगों से नहीं, बल्कि किसी अपरिमेय छांव को साधने की कोशिश की जाती है. रंगों की महत्‍वाकांक्षा चौंध में तब्‍दील होना नहीं होता होगा, वे सब एक अपूर्व छांव बन जाना चाहते हैं. जैसा कि यहां है. सॉफ़्ट लेंस के प्रयोग से कुछ पैंसिव छवियों का निर्माण होता है, पानी उस जगह फूटकर निकलता है, जहां का पता ख़ुद नमी के पास नहीं होता. आसपास, घर-परिवार, जीवन-समाज के बारीक अनुभव और सादगी का आभास कराता एक बेहद सजग शिल्‍प-शब्‍द-विधान तो हैं ही, विलक्षण यह भी है कि यहां स्‍मृति बिना किसी सिंगार के आती है. यह कभी नहीं कहा जा सकता कि कविता अबूझ स्‍मृतियों के आगे प्रार्थना होती है या उन्‍हीं का एक अनुषंग, पर यहां स्‍मृति अपने खंडों-टुकड़ों में भी नैसर्गिक है. स्‍मृति का सहज नैसर्गिक होना-दिखना साधना की अनिवार्य मांग करता है, क्‍योंकि दोनों अमूमन अलग ध्रुवों पर रहते हैं. नीलेश की कविताएं इस साधना से निकलती हैं, किसी योगी-सी मुद्रा में नहीं, बल्कि इस समूचे प्रदेश की अपनी नागरिकता को याद रखते हुए. और यही…