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Showing posts from March, 2010

कवि की संगत कविता के साथ : ६ : विजय शंकर चतुर्वेदी

आत्मकथ्य

इससे
पहले इस तरह से कभी सोचा नहीं था. अब भी बड़ा अटपटा लग रहा है. अब सोच रहा हूँ तो सबसे पहले यही प्रश्न मन में उभर रहा है कि मैं कविता क्यों लिखता हूँ. अहसास होता है कि मैं 'स्वान्तः सुखाय' तो नहीं ही लिखता. चाहता हूँ कि मेरी बात, मेरे विचार परिष्कृत रूप में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें, मेरी कविता जनजीवन में व्याप्त उदासी-निराशा-हताशा और राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्षरण से जूझने का एक नुस्खा बन सके, कविता की जीवनी शक्ति और सामाजिक चेतना द्वारा समाज के अंतःकरण तक पहुँच सकूं आदि-आदि. तुलसी बाबा ने भी 'स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा' कोई खुशी-खुशी नहीं लिखा था, बल्कि वह अपने विरुद्ध चतुर सुजानों के बनाए गए माहौल की एक साहित्यिक काट थी. लेकिन आजकल चंद लोग कविता लिखने को स्वान्तः सुखाय कहकर गुणी जनों का और अपना मनोरंजन किया करते हैं और 'बचे' रहते हैं.

आगे पाता हूँ कि मेरे आस-पास कविता का रेगिस्तान जैसा वायुमंडल है. कंपनी की जिस बस में घर से दफ्तर जाता हूँ, जिन सरकारी बसों में लोगों से मिलने-मिलाने निकलता हूँ, जिन ट्रेनों से लम्बी दूरी की जरूरी यात…

स्वगत : ४ : व्योमेश शुक्ल

{ इस निबन्ध में पर्याप्त अराजकता है और ज्यादातर प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की गई हैं और प्रतिक्रियाएँ निष्कर्ष नहीं होतीं। ‘विषय’ के साथ भी एक मनमानापन यहाँ है। यह निबन्ध भूमण्डलीकरण के प्रभाव की व्याख्या करने की बजाय भूमण्डलीकरण के परिप्रेक्ष्य में कविता, और उसमें भी हिन्दी कविता और उसमें भी समसामयिक हिन्दी कविता की कुछेक उलझनों से मुखातिब है। ये सीमाएँ हैं। कहीं-कहीं कुछ भर्त्सना और टोकाटोकी का भाव भी है। इन्हें आत्मभर्त्सना या आत्महनन के ही एक प्रकार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। } - लेखक

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कविता लिखने की वजहें क्या होती हैं ? क्या वे संख्या में कविता न लिखने की वजहों से ज्यादा होती हैं ? या कम! क्या वजहों के बीच कोई मुकाबला कहीं चलता रहता है ? अगर चलता रहता है तो कहाँ ? भीतर कि बाहर! और ये मुकाबला जीत लेने वाला क्या करता है ? कविता लिखने लगता है या कलम तोड़कर कविता लिखना बंद कर देता है।

2
क्या कविता हमेशा कविता न लिखने की वजहों के खिलाफ लिखी जाती है ? क्या कविता न लिखने की वजहें कविता का अनिवार्य प्रतिपक्ष हैं ? क्या कविता हरेक अवसर पर एक ‘निश्चित’, ‘स्थिर’ और ‘ज्ञात’ पक्ष है -…

विष्णु खरे की कविता का संशोधित प्रारूप

( आगे दी जा रही कविता पिछली पोस्ट में छपी विष्णु खरे की कविता का ही संशोधित और अंतिम प्रारूप है। कवि ने इसे भेजते हुए यह स्पष्ट किया है कि संशोधन का कविता पर हुई पिछली बहसों से कतई संबंध नहीं है। इसे नई पोस्ट में देने के पीछे इन बदलावों को ही लक्षित करना है। जिन बंधुओं ने बहस में शिरकत की उनमें से अधिकांश ने कविता पर मूल्यवान विचार व्यक्त किये। उनका आभार। बेनामी बंधुओं ने कविता के अलावा भी बहुत से मुद्दों पर बहस की। हालाँकि ऐसा करते हुए उनके तर्क बहुधा व्यक्तिगत आक्षेपों तक पहुँच गए। यह शोभनीय नहीं। )

कल्पांत
(तुभ्यमेव भगवंतं कृष्णद्वैपायनं)

दिवस और रात्रि में कोई अंतर नहीं कर पाता मैं      दोनों समय ऐसे दीखते हैं जैसे सूर्य चन्द्र नक्षत्रों से ज्वालाएं उठती हों

दोनों संधिवेलाओं में देखता हूँ एक मृत शरीर दिवाकर को घेरे हुए जिसके सिर भुजा जंघाएं नहीं हैं       धधकती हैं दोनों संध्याओं की दिशाएं

अंतरिक्ष में टकराते हैं धूमकेतु उल्काएं ग्रह उपग्रह तारागण       क्या गरजता है यह       मेघों के बिना कौन-सी विद्युत् कौंधती है रात में बरसते हैं रक्‍त मांस-मज्जा

नदियों के जल में लहू पीब भ्रू…