Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2010

विष्‍णु खरे की नई कविता

{ मानव के नैतिक ह्रास के कारण अपरिहार्य, सृष्टि के अंत के लक्षणों और पूर्वसंकेतों का जैसा वर्णन और भविष्यवचन प्राचीन भारतीय परम्परा में है, वैसा शायद और कहीं नहीं है. बाइबिल के पूर्वार्ध 'ओल्ड टेस्टामेंट' में जेरेमियाह नामक एक संत-मसीहा हैं, जिन्होंने ऐसी ही दारुण भविष्यवाणियां की हैं और इस तरह उनके लिए 'जेरेमियाड' शब्द प्रदान किया है, लेकिन भारतीय चेतावनियों के लिए ऐसा कोई प्रत्यय संस्कृत में नहीं मिलता और मात्र 'अपशकुन' इनके लिए अपर्याप्त है. निस्संदेह ऐसी संकेतावलियों में हर युग और सभ्यता अपनी नैतिक अवनति और दुरावस्था का प्रतीकभास देखते आये हैं और भले ही मानव-जाति या सृष्टि का अंत अभी न हुआ हो, महर्षि वेदव्यास विरचित 'महाभारत' में वर्णित दुर्दांत अपशकुन, दु:स्वप्न और कुलक्षण इस इक्कीसवीं सदी में अधिक प्रासंगिक, आसन्न और अवश्यंभावी प्रतीत हो रहे हैं.
इस कविता को स्वीकृत, सुपरिचित अर्थों में पूर्णतः 'मौलिक' नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा अपने सुविख्यात मासिक 'कल्याण' के अगस्त १९४२ के विशेषांक के रूप में प्रकाशित म…

आवाज़ भी एक जगह है...

लड़के ने उसे चेखव की 'दि लेडी विद दि डॉग' पढ़कर नहीं सुनाया था जो उसे केट विंस्लेट की 'दि रीडर' देख उसकी याद आती। उसने निर्मल की 'लवर्स' पढ़ी थी। फ़ोन पर। बहुत से लफ़्ज़ों का अंग्रेजी तर्जुमा करके। वह, 'ओके...देन...आई सी...रियली...ओह...इट्स सो सैड!' कहते हुए कहानी में घुलती जाती। लड़के ने उससे वह सब पहले ही कह रखा था जो शेर, कविताओं या कहानियों के ज़रिये घुमा-फिराकर कहने का पुराना रिवाज़ था। इसलिए इस रीडिंग का कोई दूसरा मतलब था ही नहीं। १९७ के रिचार्ज पर हज़ार कॉल करने की सहूलियत ने उनके बीच बातचीत के लमहों को वसी कर दिया था। एक-दूसरे की आवाज़ को तब उन्होंने दोहराऊ-उबाऊ प्रेम-प्रलापों से ही नहीं, ऐसी कहानियों से भी भरा था। **** उनके लिए आवाज़ सचमुच एक जगह थी। वहां वे मिल सकते थे। वे मिलते थे। कभी-कभी वह लड़के के इसरार पर कुछ गुनगुनाती थी। वह उसे रिकॉर्ड कर लेता था। मुलाकात के दिनों में उसे सुनाता तो लड़की अपनी पेटेंट गाली से उसे नवाजती, 'यू बिच', फिर ' मैं कितना ख़राब गाती हूँ। डोंट इमबैरेस मी।' लड़का उसके कहे के बाहर मुस्कराता :-)
****
मोबाइल के रि…

व्योमेश शुक्ल की दो नई कविताएं

मैं हूँ और वे हैं

इस बीच कई बार बार धूप खिली. अचार के मर्तबान से गुप्ताजी के सिर तक तक फैलकर उसने मनमाने चित्र बनाये. बहुत दिनों बाद देखकर खुश हो जाऊं, ऐसे आई थी वह. समय के बीतने के साथ उसका कोई सम्बन्ध है ज़रूर. वह आती है और हर याद स्मृति हो जाती है.

वे बिलकुल अभी के स्पंदन, स्पर्श, उल्लास, क्रोध, विरोध और झटके थे. वे मैं थे. मैं वे था. और अब, अब ये धूप है और मैं हूँ और वे हैं.

वे स्पंदन वहीं हैं. उसी बिंदु पर स्थिर और गतिमान क्योंकि गति का यह मतलब नहीं है कि वह हर बार मुझ पर, मेरे वक़्त पर गुज़रे या 'अभी' में हो. वह अभी भी हो सकती है और कभी हो सकती है. जो हुई थीं, वे बातें भी अभी हो रही हैं. बस हम उनमें जा नहीं पा रहे. जो होने वाली हैं वे भी हो रही हैं. हम उनमें जा सकेंगे शायद.

एक साइकिल एक पतंग गालियां बकता हुआ एक बद्तमीज़ तोता, ऐसी ही चीज़ों से बना था संसार. समोसा भी था उसमें - छोटा और सनसनीखेज़ जीवन जीता हुआ, मौत के कुएं में बेतहाशा मोटरसाइकिल चलाता हुआ, नुकीला और अनिवार्य. ठीक है कि एक दुनियादार गड़प है उसकी नियति, लेकिन हिम्मत देखिये जनाब. कल फिर हाज़िर.

मन्ना डे इमरती ब…