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Showing posts from October, 2009

ज़बां उर्दू : ६ : अहमद फ़राज़

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( अहमद फ़राज़ की यह ग़ज़ल जितनी मकबूल हुई शायर के शब्दों में उतनी ही उसके बदनामी का सबब भी बनी। लेकिन फ़राज़ की मकबूलियत के सामने बदनामी जाती रही और पीढियों को इसका लुत्फ़ मिलता रहा। ज़बां उर्दू में इस दफा अहमद फ़राज़। हालाँकि इससे पहले भी उनकी एक ग़ज़ल की आमद सबद पर हुई थी, जब पिछले बरस वो इंतकाल फरमा गए थे। बहरहाल। यह ग़ज़ल। तस्वीर मधुमिता दस के कैमरे से।)

सुना है ...
सुना है लोग उसे आँख भरके देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आपको बर्बाद करके देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चशमे नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-व-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
यह बात है तो चलो बात करके देखते हैं
सितारे बामे फ़लक से उतरकर देखते हैं

सुना है दिन में उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात में जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है हश्न है उसकी गिज़ाल सी आँखें
सुना है उसको हिरण दश्त भरके देखते हैं

सुना है रात से बढ़कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र…

आखिरी वाक्य

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वह बस में है। दफ्तर के शुरूआती दिनों से ही उसने इसे रीडिंग रूम बना लिया है। उसे जगह मिल जाए, वह भी खिड़कीवाली, इसके लिए वह दो स्टॉप पीछे चढ़ता है। हालाँकि एक यही वजह नहीं थी पीछे चढ़ने की।...जाम हर रोज़ लगता है और वक्त उससे काटे नहीं कटता। उसके हाथ में कामू के नोटबुक्स हैं। थैले में थोड़ा कोएटजी और क्लीमा। ...बस अभी गर्ल्स हॉस्टल के स्टॉप पर रुकी है। यहाँ वह बस नहीं, ऑटो लेने आती थी। वह लड़के की तरह कभी बस में नहीं चली। लड़का ख़ुद भी जब उसके साथ उन दिनों जाता था, तो ऑटो लेता था...अब ऑटो पर चढ़ने के पहले वह कई दफा सोचता है।...

बस में भीड़ और शोर बढ़ रहा है। आश्रम से एक चूरन बेचनेवाला चढ़ा है और अपनी बेलौस आवाज़ में चूरन बेच रहा है। उसका यह कार्यक्रम कोई दस मिनट चलेगा।...उसके लिए ध्यान लगाना दूभर हो रहा है। उसने टिकट को बुक-मार्क बना कर किताब बंद कर दी है। उसके मन में कामू की कुछ पंक्तियाँ वन-लाइनर की तरह आज फ़िर खुब गई हैं, जिसे वह ज़ज्ब करने की कोशिश कर रहा है :There is always a part of man that refuses love. It is the part that wants to die. It is the part that needs to be forgiven..…

विष्णु खरे का लेख

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( महान जर्मन कवि-लेखक गोएठे के सुप्रसिद्ध काव्य-नाटक 'फाउस्ट'का विष्णु खरे कृत अनुवाद हाल ही में प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली से छप कर आया है. यहाँ दिया जा रहा लेख अनूदित पुस्तक की भूमिका है, जिसके स्वतंत्र-पाठ का भी अपना मह्त्व है. इसे छापने की स्वीकृति देने के लिए हम लेखक के आभारी हैं. )

हम फाउस्ट क्यों पढ़ें ?

नाटक, टेलिविज़न, फ़िल्म तथा गल्प-साहित्य तक के क्षेत्रों में आजकल कथानकों का पेशेवर एक-पंक्तीय सार-संक्षेप ( वन लाइनर ) मांगने या देने का नियम-सरीखा है। 'फाउस्ट' का ऐसा खुलासा कुछ इस प्रकार होगा : ''मानवता के शत्रु के प्रलोभनों में फंसकर एक संशयग्रस्त बुद्धिजीवी किस तरह अपनी आत्मा तथा

अपनी निरीह प्रेमिका को घनघोर नैतिक और भौतिक संकट में दल देता है।''

'शैतान' और 'शैतानी' शब्द दक्षिण एशिया में इस्लामी सभ्यता की उपस्थिति के कारण ही प्रचलित हुए क्योंकि शैतान की अवधारणा सामी ( सेमिटिक - यहूदी, ईसाई, इस्लामी ) आस्थात्रयी की आदिमिथकों से उपजती है। 'याहवेह', 'येहोवा', 'गॉड' या 'अल्लाह' सृष्टि के आरम्भ में फरिश्तो…

पहली कहानी : नीरज पाण्डेय

( नीरज पाण्डेय की ख्याति वेंसडे फिल्म से है. वे अपनी फिल्मों के लिए खुद लिखते हैं. यह फिल्म से बहार उनकी पहली कहानी है. इसे नीरज और उनके मित्र प्रभात रंजन ने मिलकर अनूदित किया है. हम दोनों के आभारी हैं.)

प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात

उसने तीसरी घंटी पर दरवाजा खोला।
मैं बाथरुम में थी!
और तुम वहां क्या कर रही थी?

पुरुष ने मुस्कुराकर उसे चूम लिया। वह शरमा गई। उसने उसके नितंबों को दबाया। स्त्री ने उसके सीने को थपथपाया। पुरुष ने अपना बैग नीचे रखा और मेल देखने लगा।

वह रसोई में गई और चाय बनाने लगी।
पुरुष हाॅल में बैठा क्रेडिट कार्ड का स्टेटमेंट देखने मशरूफ है।
कुछ बर्तन खड़खड़ाए और...

पुरुष

पता नहीं साली बिना आवाज किए चाय बनाना कब सीखेगी? मेरा मतलब है, आप ही बताइए, चाय बनाने में तो कोई आवाज नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसी कुतिया है कि पूछिए नहीं... ये कभी नहीं सीखने वाली है।

अब आएगी मर्तबान की आवाज, अब कैबिनेट खोलने की - अब बंद करने की आवाज और गुनगुनाने की आवाज कहां गई? हां... वह रही!

सात साल... चुतियापे से भरे सात साल हो गए लेकिन उसमें रत्ती भर बदलाव नहीं आया। हमेशा  बाथरुम में घुसी रहती है। अभी…

विष्णु खरे के लेख पर एक बढ़त : रविभूषण

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( हमने कुछ हफ्ते पहले विष्णु खरे का भारत भूषण पुरस्कार के तीस वर्षों की अवधि पर लिखा एक लेख छापा था. तब से विभिन्न हलकों में वह लेख विवाद और चर्चा के केंद्र में रहा और अब भी है. दिलचस्प यह है कि उस लेख का जिन लोगों ने विरोध किया है, उसका आधार लेख के भीतर की स्थापनाएं नहीं हैं. उससे उलझने की ईमानदार कोशिश नहीं दिखी है, जो एक तरह से चिंता का विषय है. यह इस बात का सूचक है कि हमारे बीच असहमत होने के लिए जो ज़रूरी अध्यवसाय लोगों को करना चाहिए, उसके बिना बात बनाने का चलन बढ़ रहा है. अपवादस्वरूप प्रभात खबर दैनिक में दिल्ली से दूर बैठे वरिष्ठ लेखक रविभूषणने पुस्तक ''उर्वर प्रदेश'' की नोटिस लेने के साथ-साथ विष्णुजी के लेख का अपने ढंग से पाठ भी किया है. हम इसे साभार यहाँ दे रहे हैं. इस बीच दो पुष्ट-अपुष्ट बातें भी सामने आई हैं. पुष्ट यह कि विष्णु खरे ने तीस वर्षों तक भारतभूषण स्मृति पुरस्कार समिति में रहने के बाद उससे इस्तीफा दे दिया है और अपुष्ट किन्तु अपने आप में अत्यंत अलोकतांत्रिक और दुखद यह कि उर्वर प्रदेश का वह संस्करण जिसमें विष्णु खरे का विवादस्पद लेख छापा गया है, प्रकाशक…