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Showing posts from September, 2009

ज़बां उर्दू : ५ : इस्मत चुगताई

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मैं...एक बच्चे को प्यार कर रही थी

वालिद काफ़ीरौशनख़याल थे. बहुत-से हिंदू खानदानों से मेलजोल था, यानी एक ख़ास तबके के हिंदू-मुसलमान निहायत सलीके से घुले-मिले रहते थे. एक-दूसरे के जज़्बात का ख़याल रखते. हम काफ़ी छोटे थे जब ही एहसास होने लगा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ मुख्तलिफ़ ज़रूर हैं. ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह की एहतियात का एहसास होता था.

अगर कोई हिंदू आए तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए, साथ बैठकर मेज़ पर खाते वक्त भी ख्याल रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाए. सारा खाना दूसरे नौकर लगायें, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाये. बर्तन भी वहीं से माँगा दिए जायें. अजब घुटन सी तारी हो जाती थी. बेहद ऊंची-ऊंची रौशनख़याली की बातें हो रही हैं. एक दूसरे की मुहब्बत और जाँनिसारी के किस्से दुहराए जा रहे हैं. अंग्रेजों को मुजरिम ठहराया जा रहा है. साथ-साथ सब बुजुर्ग लरज़ रहे हैं कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि धरम भ्रष्ट हो जाए.

'' क्या हिंदू आ रहे हैं ?'' पाबंदियां लगते देखकर हमलोग बोर होकर पूछते.
''ख़बरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं. …

विपिन कुमार शर्मा की चार कवितायें

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{ कविता मेरे लिए न शौक की चीज़ है, न सामर्थ्य की, यह मेरे अन्दर छुपे एक क्षुब्ध व्यक्ति का प्रतिरोध है. मैं प्रायः तभी लिखता हूँ जब देश या समाज के समानांतर मेरे मस्तिष्क में बन रही स्थितियां बर्दाश्त के बहार हो जाती हैं. मैं महज अपनी मुक्ति के लिए नहीं लिखता, जो लोग मेरे सोच के दायरे में हैं, उन सबकी मुक्ति-आकांक्षा को अपनी मुक्ति से जोड़कर लिखता हूँ. यही वजह है की लिखने के बाद भी मेरे अन्दर की छटपटाहट कभी समाप्त नही होती. कविता मेरे लिए वाग्जाल नहीं, बल्कि हर तरह के जाल को काटनेवाला खंजर है. अपनी कविता में मैं बातों को उलझाना नहीं, बल्कि सुलझाना चाहता हूँ. इसीलिए सहजता को चुनौती की तरह लेता हूँ- कवि. }

कवि

श्लथ क़दमों से
लौटता है घर
कवि
धीरे-धीरे
भरके निकला था सुबह
कविताओं की टोकरी
बिकीं एक भी नहीं
वापिस लौटा है
लेकर,
भूख-प्यास
कुंठा-त्रास
और वही रोज़ की चिख-चिख
नंगे-अधनंगे बच्चे
हर सम्भव जगह
पिता पर झूल जाते हैं
उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए
परम संतोषी हैं
लेकिन कवि कुछ चाहता है
अपने बच्चों से
उन्हीं की भांति उमगती -विहंसती कवितायें
और गदबदे भी
( उनकी तरह कुपोषित नहीं)
पर बच्चों के पास कवितायें कहाँ !
न ही मालूम…

गिरिराज किराड़ू की सात कवितायें

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( शिव कुमार गाँधी की चित्र-कृति A Woman with a Scenario . प्रतिलिपि से साभार )

{ हमेशा से तो नहीं पर पिछले कुछ समय से मेरी कविताओं में कई दूसरे लेखक, कलाकार (ज्यादातर लेखक ही) और उनका काम मौजूद रहने लगा है. लेकिन ये सात कवितायेँ तो दूसरो के काम के बिना संभव ही नहीं थीं - 'डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड' बोर्खेज़ की इसी शीर्षक वाली एक कहानी से निकलती है. 'संगतराश' के. आसिफ/अमान/कमाल अमरोही की मुगल-ए-आज़म से और 'बादशाह मैकबेथ' ज़ाहिर ही शेक्सपीयर के मैकबैथ से. उसी तरह दो अन्य फ्लाबेयर और रेणु के प्रसिद्ध फिक्शन से. 'दो अर्थ का भय' लिखते हुए रघुवीर सहाय की इसी शीर्षक से लिखी कविता दिमाग में थी. 'अभिव्यक्त' शायद विनोद कुमार शुक्ल की कई कविताओं में से या उनकी सब कविता की किसी अनुपस्थिति में से – कवि. }

संगतराश

शायद एक वही सब कुछ पहले से जानता था सब कुछ पहले से तराश रखा था उसने
वह हमेशा वीराने में रहता था और एक दिन अचानक उसके वीराने में जो बहार चली आयेगी
उसकी आँखें ग़ज़ब की होंगी जब दूसरे ख्वाब देख रहे होंगे वह बस अपनी आँखें देखेगी

वो हकीकत ही क्या …

सबद पुस्तिका : १ : विष्णु खरे

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(आगे दिए जा रहे लेख को विष्णुजी ने हमारे आग्रह पर यहाँ पुस्तिका स्वरुप छापने की अनुमति दी है. हम उनके आभारी हैं. यह लेख यों भूमिकास्वरुप कुछ संशोधनों के साथ राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार पर केंद्रित पुस्‍तक ‘उर्वर प्रदेश’ में छपा है. इस नाते लेख के अविकल छापने का आग्रह ज़ाहिर है दुतरफा रहा है. याद नहीं आता कि हिंदी में किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार के निर्णायक मंडल में रहते हुए उसके औचित्य, चयन-प्रक्रिया, निर्णायक और प्राप्तकर्ता के बारे में इससे पहले किसी ने इतना निर्भीक, तार्किक और ज़रूरी मूल्यांकन का यत्न किया है. इसमें दूसरों पर लिखते हुए खुद के निर्णयों को बख्शने की सलाहियत नहीं है और न ही यह एक लोकप्रिय विवाद को जन्म देकर उसमें केन्द्रीयता हासिल कर लेने की अपरिपक्व सोच की ही उपज है. इन मायनों में सत्तर के करीब विष्णु सौभाग्यवश अपने उन समकालीन और बुजुर्गवार लेखकों से भिन्न हैं जो कुछ ठोस लिखने की बजाए धौलधप्पा खेल हमें इंगेज रखने की लज्जाजनक कोशिश कर रहे हैं। साथ में दी गई पेंटिंग गोया की 'मेन रीडिंग' सीरीज से। )


एक पुरस्‍कार के तीन दशक :एक अं…

शहरनामा : १ : लखनऊ

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( बहुत तकलीफ के साथ आलोकधन्वा ने अपनी कविता सफ़ेद रात में यह दर्ज किया था : लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ/इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद/ कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़/अब इन्हीं शहरों में/कई तरह की हिंसा कई तरह के बाज़ार/कई तरह के सौदाई/इनके भीतर इनके आसपास/इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर/और श्रीनगर तक/हिंसा/और हिंसा की तैयारी...यह हानि-बोध हमारे शहरी जीवन के अनुभव के अत्यन्त निकट है। कुछ ठहरकर सोचने पर लगता है कि इन तमाम शहरों का अपना अतीत और वैभव उनसे छूट रहा है। यह आदमी की तरफ से शहर के ख़िलाफ़ की गई सबसे क्रूरतम कार्रवाई की वजह से हुआ है। इसलिए कुंवर नारायण जब यह कहते हैं कि अब आदमी ही नहीं शहर की तरफ से भी सोचना होगा, तो वह शहर को उसकी गरिमा और वैभव सौंपने जैसी बात लगती है। शहर को यह गरिमा कवि-लेखक ही सौंप सकते हैं। सबद पर शहरनामा नामक इस स्तम्भ को शुरू करने के पीछे की मंशा यही है। हम शहरों को उनके अतीत और आज में याद और ज़ज्ब करके उनके प्रति कुछ हद तक सहिष्णु बन सके, तो हमारे आदमीनामे में भी इससे कुछ गरिमा ज़रूर लौट आएगी। शहरनामा की पहली पेशकश में हम कुंवरजी की ही उनके अपन…