Skip to main content

यह जो हरा है

तुषार धवल की कविता कई मायनों में ''शद्ध कविता'' है। इन कविताओं में कवि की अन्तः प्रेरणा दूषित प्रभावों की तुलना में प्रबलतर हैं, जो इसे ''कनट्राइव्ड पोएट्री'' होने से बचाती हैं। इसका सामना जिन अधिकतर कविताओं से है उसमें कवि का श्रम और युक्ति दिखती है। इसलिए तुषार को पढ़ते हुए कई दफा यह भ्रम होता है कि उनके यहाँ चीजें कच्ची तो नहीं रह गईं। पर एकाधिक जगहों को छोड़ कर आपको उसका कच्चा या हरा होना ही मोहता है। एक नए कवि में अक्सर 'यह जो हरा है', उसका न होना सबसे ज़्यादा खटकता है। और अगर कवि-कर्म आपने महज सायानी जमात में हिस्सेदारी की गरज से इस हरे से शुरू न करके ठूंठ से शुरू की होती है तो वृक्ष की संभावनाएं भी आप ख़ुद ही निःशेष करते जाते हैं। अनेक नए कवि इसी तरह काल-कलवित हो गए और हो रहे हैं। तुषार के यहाँ यह हरा एक वृक्ष का आश्वाशन है। अस्तु। तुषार ने ( प्रभात रंजन ने ठीक मार्क किया है ) ऐसी कवितायें लिखी हैं जिनमें अवचेतन का अविरल प्रवाह आद्योपांत कायम रहता है। हालाँकि तुषार सिर्फ़ इसी से कविता नहीं संभव कर लेते। विमल मन जब वह कहते हैं कि ''जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ'' तो उसका यह आशय कतई नहीं है कि अवचेतन को वे अपने हिसाब से गढ़ते या पुनर्सृजित नहीं करते। दरअसल, इसी पुनर्सृजन में उनकी वैचारिकी और आध्यात्मिक प्रेक्षाएं भी जगह पाती हैं। तुषार की कविताओं के लिए इसीलिए 'प्रेक्षा' शब्द का इस्तेमाल करना मुझे उपयुक्त जान पड़ता है। प्रेक्षा का अर्थ है देखना। पर उनकी प्रेक्षाएं भी कुछ फर्क हैं। मसलन वे दृश्य-पाठ तक अपने को सीमित नहीं रखतीं। वे अपने लिए एक ज़्यादा बड़ा संदर्भ ढूँढने-पाने की चेष्टाएँ हैं। अनायास ही तुषार की कविता में नैतिक-आध्यात्मिक आयाम नहीं जुड़ जाते। ज़ाहिर है वे इन्हें प्रार्थना के शिल्प में स्वायत्त नहीं करते, बल्कि अपने तीखे यथार्थ-बोध से समंजस करते हैं।
****
(''पहर यह बेपहर का'' नाम से प्रकाशित कवि के प्रथम संग्रह को पढने की एक कोशिश। ऊपर पुस्तक का आवरण चित्र , जो कवि की तुलिका से ही निकली है। नाम 'मिस्टिक क्वेस्ट'। )

Comments

Nirmla Kapila said…
बहुत अच्छा विशलेशण् किया है कोई कविता भी पढ्ने को मिलरी तो अच्छा था आभार्
सागर said…
मैं खुश हूँ कुछ ऐसे ब्लॉग भी हैं जहाँ इतनी गहरी विवेचना होती है... और मेरी साहित्यीक भूख मिटती है.. आप ऐसे ही लिखते रहिये और स्तर बनाये रखिये... मैं आपके साथ हूँ...
pankaj said…
तुषार धवल की painting "मिस्टिक क्वेस्ट " लाजवाब है . बार-बार देखने , महसूस करने की इच्छा होती है , जो एक अच्छी कला-कृति की निशानी है . उनके कविता-संग्रह पर आपकी "लिखत" ( कवि-मित्र गिरिराज किराडू का शब्द ) भी शानदार है . 'हरे का कच्चापन ' निश्चय ही एक अच्छे , नये कवि की कविताओं की genuine खुसूसियत के तौर पर वांछित होता है . अगर वह वहाँ है और नैतिक-आध्यात्मिक "प्रेक्षा" के साथ-साथ "तीखा यथार्थ-बोध" भी , तो फिर और क्या चाहिए ? बधाई , कवि- चित्रकार को और आलोचक को भी !
-----पंकज चतुर्वेदी
कानपुर
Ratnesh said…
tusharji ki kavitayen sabad k aapke bheje link se gujarkar hi padhta raha hun.aur ab yh arthpurn tipanni.kavitaon ki samajh me yh madadgar hogi.

Popular posts from this blog

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त

कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?
इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?
हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्‌टी पर उगते हैं।
हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठह…