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Showing posts from August, 2009

अनकहा कुछ : ४ : गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़

( प्रभात रंजन अपने स्तम्भ ''अनकहा कुछ'' में इस दफा मशहूर लैटिन अमेरिकी लेखक गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़के बारे में लिख रहे हैं। आधार मारकेज़ की उस हालिया लिखी जीवनी को बनाया है जिसकी बड़ी चर्चा हो रही है। )

मिथक मारकेज़ के चारों ओर

प्रभात रंजन

जीवन वह नहीं होता जो कोई जीता है, बल्कि वह होता है जिसे कोई याद रखता है और दोबारा याद करते हुए जिस क्रम से उसे वह याद करता है -ये पंक्तियां बेहद लोकप्रिय और चर्चित लेखक गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ ने अपनी आत्मकथा लिविंग टु टेल द टेल के आरंभ में लिखी हैं। शायद एक जीवनीकार यही काम करता है। जिसका जीवन उसके जिम्मे होता है, वह उसे शब्दों से इस तरह गढ़ता है कि वह यादगार बन जाए। गेराल्ड मार्टिन द्वारा लिखित मारकेज़ की आधिकारिक बताई जा रही जीवनी गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ : ए लाईफ को पढ़ते हुए भी यह बात कही जा सकती है। 642 पृष्ठों की इस किताब में मार्टिन ने लगभग मिथक में बदल चुके लेखक मारकेज़ की जीवन-कथा उन्हीं सूत्रों के सहारे गढ़ने की कोशिश की है जिसके संकेत मारकेज़ के साहित्य, भेंटवार्ताओं इत्यादि मिलते रहे हैं।

मारकेज़
न केवल ऊँचे दर्जे के लेखक हैं बल्कि …

यह जो हरा है

तुषार धवलकी कविता कई मायनों में ''शद्ध कविता'' है। इन कविताओं में कवि की अन्तः प्रेरणा दूषित प्रभावों की तुलना में प्रबलतर हैं, जो इसे ''कनट्राइव्ड पोएट्री'' होने से बचाती हैं। इसका सामना जिन अधिकतर कविताओं से है उसमें कवि का श्रम और युक्ति दिखती है। इसलिए तुषार को पढ़ते हुए कई दफा यह भ्रम होता है कि उनके यहाँ चीजें कच्ची तो नहीं रह गईं। पर एकाधिक जगहों को छोड़ कर आपको उसका कच्चा या हरा होना ही मोहता है। एक नए कवि में अक्सर 'यह जो हरा है', उसका न होना सबसे ज़्यादा खटकता है। और अगर कवि-कर्म आपने महज सायानी जमात में हिस्सेदारी की गरज से इस हरे से शुरू न करके ठूंठ से शुरू की होती है तो वृक्ष की संभावनाएं भी आप ख़ुद ही निःशेष करते जाते हैं। अनेक नए कवि इसी तरह काल-कलवित हो गए और हो रहे हैं। तुषार के यहाँ यह हरा एक वृक्ष का आश्वाशन है। अस्तु। तुषार ने ( प्रभात रंजन ने ठीक मार्क किया है ) ऐसी कवितायें लिखी हैं जिनमें अवचेतन का अविरल प्रवाह आद्योपांत कायम रहता है। हालाँकि तुषार सिर्फ़ इसी से कविता नहीं संभव कर लेते। विमल मन जब वह कहते हैं कि ''ज…

कवि कह गया है : ५ : तुषार धवल

( तुषार धवल हिन्दी के नए कवियों में अपने रचना-स्वभाव की वजह से अलग से पहचाने जाते हैं। उनकी कविता में समकालीन यथार्थ के साथ-साथ एक आध्यात्मिक प्रेक्षा भी जुड़ी है। बहुधा ऐसी प्रेक्षाओं को ग़लत पढ़ लिया जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उस कोहेतूर की भी सैर कर आयें जहाँ कविता में इन प्रेक्षाओं का नियोजन होता है। तुषार ने हमारे आग्रह पर यह तलघर खोला है। उनके शब्दों के आलोक में हम यहाँ विचर सकते हैं। 'कवि कह गया है' स्तम्भ में इस बार तुषार की अन्तः-क्रिया। हाल ही में कवि का पहला कविता-संग्रह, 'पहर यह बेपहर का'नाम से छपकर आया है। सबद कवि को उनके पहले संग्रह और भविष्य की शुभकामनायें देता है। तुषार कविता करने के साथ-साथ बहुत उम्दा चित्र भी बनाते हैं। ऊपर उन्हीं की चित्र-कृति ,''शेष '' दी गई है। )

एक तत्त्व है कविता

तुषार धवलमन ... मन के पार एक कोमल अँधेरा पसरा रहता है। नहीं, अँधेरा भी नहीं, इसे एक कोमल उजास कहना चाहिए। या उजास भी नहीं, यह एक शून्य है। ....शून्य है ? नहीं वह भी नहीं। तो फिर क्या है ? पता नहीं, लेकिन कुछ तो है। कोई तो एक ज़मीन है। अवकाश या न जाने क्…

बही - खाता : ८ : पॉल ऑस्टर

किताब पाठक लिखता है

मेरी
यह कोशिश रहती है कि अपने गद्य में इतनी जगहें छोड़ता चलूँ जिसमें पाठक का वास हो। क्योंकि मेरी यह दृढ मान्यता है कि यह पाठक है जिसने किताब लिखी होती है, लेखक ने नहीं।

जब मैं लिखता हूँ, मेरे दिमाग में कहानी सर्वोपरि रहती है, और मुझे लगता है इस पर किसी और को वरीयता नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए सबकुछ तज देना चाहिए : अत्यन्त मनोरम और उत्सुकता से भर देनेवाले उन तमाम हिस्सों को भी, अगर वे, जो मैं कहना चाहता हूँ उसके साथ एक प्रासंगिक जुड़ाव नहीं रखते।

इतनी निर्ममता ज़रूरी है। तब जब आप एक कहानी कह रहे हों और उम्मीद करते हों कि लोग आपको सुनें। इसमें छटांक भर विचलन भी लोगों के मन में भारी बोरियत पैदा कर सकता है। अंततः आप वही किताब नहीं लिखते जिसे लिखने की ज़रूरत आपने महसूस की थी, आप वह किताब भी लिखना चाहेंगे जिसे आप ख़ुद पढ़ना पसंद करें।

मैं जब यह सोचता हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ, तो मुझे अचरज होता है। लिखते हुए न तो मैं कोई सुंदर वस्तु बना रहा होता हूँ और न मनोरंजक कहानियाँ गढ़ने की ही मेरी मंशा होती है। फिर ? मुझे दरअसल यह शिद्दत से महसूस होता है कि लेखन जीवित रहने के लिए क…

पोथी पढ़ि पढ़ि : ३ : इतलो कल्विनो

क्लैसिक्स के बारे में
१. क्लैसिक किताबों के बारे में लोग अक्सर यह कहते पाए जाते हैं कि वे इन्हें 'फिर से पढ़ रहे हैं'। वे यह कभी नहीं कहते कि इन्हें ( दरअसल पहली दफा ही) 'पढ़ रहे हैं'! ऐसा उनके मुंह से तो और सुनने को मिलता है जो अपने-आप को खासा पढ़ाकू मानते-समझते हैं।

२. 'क्लैसिक्स' शब्द का इस्तेमाल हम उन किताबों के लिए करते हैं जिन्हें उनके पढ़ने और प्यार करनेवालों ने अमूल्य निधि की भांति सहेजा होता है। पर ये किताबें उन लोगों द्वारा भी कम सहेजी हुई नहीं मानी जाती, जिन्हें यह सौभाग्य मिला कि वे ऐसी किताबों को तब पढ़ सकें, जब स्थितियां पढ़े-गुनने के लिए सर्वाधिक अनुकूल रहीं।

३. क्लैसिक वे किताबें हैं, जो आपके मनोजगत पर गहरा असर छोड़ती हैं। खासकर तब, जब वे आपके दिलोदिमाग से जाने से मना करती हैं, और तब भी जब खुद को स्मृति में नियोजित करती हुई वे आपके सामूहिक या व्यक्तिगत अवचेतन में छुप बैठती हैं।

४. क्लैसिक का पुनर्पाठ भी उसके पहले पठन की तरह ही एक खोजी यात्रा सरीखा रोमांच से भर देता हैं।

५ + ६. क्लैसिक का हर पठन असल में पुनर्पाठ ही है। मायने ये कि एक क्लैसिक किताब कभी…

ज़बां उर्दू : ४ : मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा'

आखिरी सफे...

मिर्ज़ारुस्वा साहब, जब आपने मेरी ज़िन्दगी के हालात लिखके मसविदा मुझे पढ़ने के लिए दिया, तो मुझे ऐसा गुस्सा आया कि जी चाहता था टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दूँ। बार-बार ख़याल आया कि ज़िन्दगी में क्या कम काला मुंह हुआ था, जो उसकी कहानी मरने के बाद भी बाकी रहे और लोग पढ़ें और मेरी लानत-मलामत करें ? मगर कुछ आपका लिहाज़ करके हाथ रुक गया।
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मुझे नेक औरतों का खयाल आता है। उन्हें अपने ऊपर जितना घमंड न हो, थोड़ा है। हम-जैसी बज़ारियों का उनसे क्या मुकाबला! मगर मैंने सोचा कि इसमें वक्त ही का हाथ है, जो मैं बाज़ार में आई और अपनी किस्मत का लिखा पूरा किया। वक्त न होता, तो क्या दिलावर खां मुझे उठाके लाता और लाके खानम के हाथ बेचता और मैं वह बुरे काम करती, जिनको अब मैं बुरा समझती हूँ ? उस ज़माने में मैं उन चीज़ों को नहीं समझती थी और न मुझे बताया गया था कि मैं उन कामों से बचूं।
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जवान होने के बाद ऐशो-आराम में पड़ गई। उस ज़माने में गा-बजाके मर्दों को रिझाना मेरा पेशा था। इसमें औरों के मुकाबले मुझे जितनी कामयाबी मिलती थी, उतनी ही मैं खुश होती थी। जहाँ कामयाबी नहीं होती थी, रंज होता था। मेरी सूरत दूसरों की …

लव इन द टाइम ऑफ़ स्‍वाइन फ्लू...

क्या यह ज़रूरी है ? ... नहीं। ...फिर ? तुमने बात क्यों बंद की ? ...सोच रहा था, देखें, बगैर बात किए लोग कैसे रहते हैं। ...अच्छा !, बकवास। तुमने खामख्वाह परेशान किया मुझे। ऐसा क्यों करते हो ? XXX खैर, अभी कहाँ हो, ऑनलाइन नही दिखते। ...बस में हूँ। ...जगह मिली ? ...हाँ, निजामुद्दीन आते-आते।...तुम ? ...मैं घर पर हूँ। बात बंद कर दी थी तुमने इसलिए बिना मिले चली आई। ...ओह!
XXX बाहर बारिश गिर रही है। जाम लगा है और अदंर लोग नकाबपोश हैं ? ...क्यों ? ...तुम अख़बार नहीं पढ़ती क्या ? स्वाइन फ्लू। ...तुम मेरे मन का अख़बार ही नहीं बनाते, क्या पढूं! ...तुम भी! ...अच्छा तुमने मास्क पहन रखी है ? ...नहीं। ...क्यों तुम्हारे लिए फ्लू नहीं है? ...है, पर मैं उससे बड़ी फ्लू की चपेट में हूँ। ...बनो मत। कम से कम रुमाल ही बाँध लेते। ...तुम जानती हो न... ...हाँ-हाँ कि आप रुमाल भूल जाते हैं। पर ऐन नाक पर बंधी रहेगी तब भी भूलोगे ? ...नहीं। ...ऐसा करो रुमाल बांधनेवाली बीवी घर ले आओ। ...वह गले में पट्टा बाँध देगी! ...हाहाहा ...हमं, सच कह रहा हूँ। XXX
...क्या करते रहे इन चार गुमसुम दिनों में। अभी जैसे ऊँगली पटपट चल रही है, चार दि…

कोठार से बीज : ८ : कारेल चापेक

नींद की दया असीम है

रात होते ही दूसरी ज़िन्दगी शुरू हो जाती है, पीड़ा और दुविधा से भरी हुई।

जो आदमी सो नहीं पाता, वह किसी भी चीज़ से छुटकारा नहीं पा सकता।

जब आदमी सो नहीं पाता, तो शुरू-शुरू में वह किसी के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहता। वह या तो गिनती गिनने लगता है, या प्रार्थना करने लगता है। फिर अचानक उसे बीच में ही खयाल आता है- हे ईश्वर, कल मैं अमुक काम करना भूल गया। और बाद में एक नया खयाल तंग करने लगता है कि कल सौदा खरीदते समय दुकानदार ने उसे ठग लिया था। फिर उसे सहसा याद आता है कि उस दिन उसकी पत्नी या मित्र ने कितने अजीब ढंग से उससे बातचीत की थी।

नींद सिर्फ एक शारीरिक विश्राम नहीं है, नींद एक तरह से बीते हुए दिन का प्रायश्चित और शुद्धिकरण है। वह क्षमादान है। अच्छी नींद के पहले कुछ मिनटों में हर व्यक्ति की आत्मा बच्चे की तरह निर्मल और पवित्र हो जाती है।

नींद एक गहरे, अंधेरे पानी की तरह है। उसमें वह सबकुछ बह जाता है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते और जिसके बारे में हमें कुछ नहीं जानना चाहिए। हमारे भीतर जो अजीब-सी कीचड़ जमा हो जाती है, नींद उसे बहाकर उस अचेतन में डुबो देती है, जो अपने मे…

फिर भी कुछ लोग

चालीसपार को युवा कहने की लापरवाह आदत डाले हम हिन्दी वालों के लिए करीब तीस के व्योमेश शुक्ल का जमा सत्तावन कविताओं का पहला कविता-संग्रह, 'फिर भी कुछ लोग'दिक्कत पैदा करनेवाला है। हम किन नामों से अभिहित करेंगे इस कवि को जिसकी संवेदना का धरातल इतना ठोस और मर्मग्राही है, जिसकी वैचारिक प्रौढ़ता के सामने उनके समवयस कवि किशोर और चालीस पार युवा युवतर सखा नज़र आते हैं ( अगर यह बड़बोलापन लगे तो संग्रह की तीसरी ही कविता पढ़ ली जानी चाहिए : अस्तु ), जो आरंभिक शिल्प-सजगता की बात तो जाने दीजिए, बेसंभाल शिल्प में लिखने का जोखिम अभी से उठा रहा है और जिसे मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, विनोद कुमार शुक्ल या विष्णु खरे जैसे कवियों की लिखी गई कविताओं के लील जाने वाले प्रभाव से बचने, सीखने और रचने का हुनर मालूम है। ऐसे कवि का पहला कविता-संग्रह उसे तुंरत किसी नामावली में खातियाने की हमारी आदत में खलल तो है ही। इससे इतर यह बहुत प्रमाणिक ढंग से इस बात को पुष्ट करने का भी दस्तावेज़ है कि कविता की अभी बिल्कुल अभी वाली पुरानी अवधारणा को कितनी कुशलता से व्योमेश सरीखे कुछ कवि चुपचाप बदल रहे हैं। विष्णु खरे का संग…