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कवि का अकेलापन

मंगलेश जी का गद्य आप जल्दी-जल्दी नहीं पढ़ सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो अपने लिए उस खतरे को भी सिरजते चलते हैं जिसकी ओट में इस विशिष्ट गद्य की अनेक अर्थ-छवियां छिपी रह जाती हैं। कहना न होगा कि उनका गद्य पठन का धीरज मांगता है। हालाँकि वह महज इसीलिए विशिष्ट गद्य नहीं है। इसलिए तो और भी नहीं कि वह कविता की खूबियां लिए एक कवि का गद्य है। एक संवेदनशील कवि के लिए कविता के बाहर इस नैसर्गिक गद्य-गुण को पाना कठिन नहीं है। कठिन है उसके भीतर सोच की उस विलंबित लय को बिलआखिर अटूट बनाए रखना जो अपने साथ आपको न सिर्फ़ सोचने पर बाध्य करती है, बल्कि आपके सोचे-जाने में कुछ इजाफा भी करती जाती है। पढ़नेवालों के मन में ऐसी खुशफैल जगह बहुत कम लेखक बना पाते हैं। उनकी नई गद्य पुस्तक कवि का अकेलापन में भी पिछली पुस्तकों ( एक बार आयोवा और लेखक की रोटी) की तरह ही उनका सुगठित और सोचता हुआ गद्य अपने समय, कविता और कला के बारे में कुछ भिन्न नुक्ते से कहने की दोहरी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करता है। समकालीन हिन्दी कविताओं और कविओं के बारे में एक वरिष्ठ कवि के इतने प्रसन्न, चौकन्ना और बहुलार्थी लेखन से गुजरते हुए कविता और कवि से विपन्न समय का रोना रोनेवाले धंधई आलोचकों की याद आना स्वाभाविक है। ऐसे लोगों के बौद्धिक आलस्य और अनर्गल प्रलाप से ही हिन्दी में गंभीर वैचारिक अंतर्क्रिया से अलग एक गप्पी माहौल बना है जिसमें सच्चे कवि को अनिवार्यतः अपने अकेलेपन की शरण लेनी पड़ती है। पर इस अकेलेपन में भी वह अपने रामझरोखे से हमारे समय के विद्रूप को कविता के बाहर-भीतर हिसाब में लेना नहीं भूलता। कवि के लिए ऐसा करना निराशा के कर्तव्यों में से प्राथमिक ठहरता है। पुस्तक में मंगलेश जी ने कविता और कलाओं के बारे में जितने लगाव से लिखा है, उतने ही क्षोभ से वैचारिक निबंधों और डायरियों के अंश में उन विडंबनापूर्ण स्थितियों पर भी लिखा है जिससे हिन्दी पट्टी में सत्ता-राजनीति फलती-फूलती है।
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Comments

Udan Tashtari said…
प्रयास रहेगा मंगलेश जी की पुस्तक कवि का अकेलापन पढ़ने का. आपका आभार इस जानकारी के लिए.
dhiresh saini said…
हाँ, ये आवाज़ एक जगह है जहाँ सुकून है, भरोसा है और जरूरी निराशा भी.

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