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तुम दरअसल कहीं नहीं थीं : मंगलेश डबराल


1
तुम्हें कहीं खोजना असंभव था
तुम्हारा कहीं मिलना असंभव था
तुम दरअसल कहीं नहीं थीं
न घर के अंधेरे में
न किसी रास्ते पर जाती हुईं
तुम न गीत में थीं
न उस आवाज़ में जो उसे गाती है
न उन आंखों में
जो सिर्फ़ किन्हीं दूसरी आंखों का प्रतिबिंब हैं
तुम उन देहों में नहीं थीं
जो कपड़ों से लदी होती हैं
और निर्वस्त्र होकर डरावनी दिखती हैं
तुम उस बारिश में भी नहीं थीं
जो खिड़की के बहार दिखाई देती है
निरंतर गिरती हुई।

2
मैंने देखे दो या तीन रंग
मैंने देखी हल्की-सी रोशनी
जो लगातार
पैदा होती थी
मैंने देखी एक आत्मा
जो कांपती सांस लेती थी
मैंने देखा तुम आती थीं
मेरे ही स्पर्शों में से निकलकर

इस तरह मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि दुःख से उबरने के लिए
प्रार्थनाएं न करनी पड़ें
मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि नींद के लिए
अँधेरे की कामना न करनी पड़े

मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि तुम्हें देखने के लिए
फिर से कल्पना न करनी पड़े।

3
रात में खुलता है पहाड़ का दरवाज़ा
रात में खुलती है पहाड़ की खिड़की
वहां से प्रवेश करता है प्रेम
दिखते हैं कुछ और दरवाज़े
दरवाज़ों के आगे
दिखती हैं कुछ और खिड़कियाँ
खिड़कियों के आगे।

4
तुम्हारे लिए आता हूँ मैं
मेरे रास्ते में हैं तुम्हारे खेत
मेरे खेत में उगी है तुम्हारी हरियाली
मेरी हरियाली पर उगे हैं तुम्हारे फूल
मेरे फूलों पर मंडराती हैं तुम्हारी आँखें
मेरी आँखों में ठहरी हुईं तुम।

5
तुम्हारे चेहरे पर
एक पेड़ की छाया है
तुम्हारे चेहरे पर
एक पहाड़ की छाया है
तुम्हारे चेहरे पर
एक चंद्रमा की छाया है
तुम्हारे चेहरे पर
छाया है एक आसमान की।

6
प्रेम होगा तो हम कहेंगे कुछ मत कहो
प्रेम होगा तो हम कुछ नहीं कहेंगे
प्रेम होगा तो चुप होंगे हम
प्रेम होगा तो हम शब्दों को छोड़ आएंगे
रास्ते में पेड़ के नीचे
नदी में बहा देंगे
पहाड़ पर रख आएंगे।

7
पत्थरों के भीतर
छोड़ दो हमारे सिहरते शरीर
आत्मा अपने आप जन्म लेगी
जैसे वह आग
जिसे हमने पैदा किया था
जब वहां दो पत्थर थे।

8
आंधी में लगातार आते हैं
तिनके
धीरे-धीरे एक घोंसला बनता है

तुम्हारी देह में उड़ती दो चिड़ियाँ
सो जाती हैं चुपचाप।

9
चुंबन एक दिन
तुम्हारे सामने काग़ज़ पर
एक कविता बनेंगे

कविता एक दिन
चुंबन बन जाएगी
काग़ज़ से उठकर।

10
कोहरे क्या तुम छंटोगे
ताकि मुझे दिख सके
तुमसे ढंका हुआ मेरा पहाड़

पहाड़ क्या तुम झुकोगे
ताकि मुझे दिख सके
तुम्हारी ओट में छिपा हुआ मेरा प्रेम।

11
रात रात रात
किसी किनारे से नदी के
बहने की आवाज़ आती है
अकेला मैं उठता हूँ
एक गिलास पानी पीकर सो जाता हूँ।

12
मैं सोचता रहा
और दूर चला आया
मैं दूर चला आया
और सोचता रहा

तुम सोचती रहीं और दूर चली गईं
तुम दूर चली गईं
और सोचती रहीं

इस तरह हमने तय की दूरियां।

13
जब बर्फ़ गिरेगी और सन्नाटा होगा
हम कहेंगे यह प्रेम है

जब बर्फ़ पिघलना शुरू होगी
जंगल में
हम कहेंगे इतनी ही थी उसकी उम्र।

14
चार बार हमें भूख लगेगी
पांचवीं बार
हम कुछ खा लेंगे

चार बार प्यास लगेगी
पांचवीं बार
हम पानी पी लेंगे

चार बार हम जागते रहेंगे
पांचवीं बार
आ जाएगी नींद।

15
आधा पहाड़ दौड़ता है
आधा दौड़ता है हमारा बोझ
आधा प्रेम दौड़ता है
आधा दौड़ता है सपना

दौड़ते हैं हम।

16
बाहर एक बांसुरी बजती है
एक और बांसुरी है
जो तुम्हारे भीतर बजती है
और सुनाई नहीं देती

एक दिन वह चुप हो जाती है
तब सुनाई देता है उसका विलाप
उसके छेदों से गिरती है राख।
****

( प्रेम पर लिखी गईं कुछ बहुत अच्छी कविताओं में से एक मंगलेश जी की पुनर्रचनाएं शीर्षक इस लम्बी कविता को हम उनकी अनुमति से यहाँ दे रहे हैं। यह उनके पुरस्कृत संग्रह ''हम जो देखते हैं'' में संकलित है। उनके शब्दों में इस कविता की प्रेरणा भूमि पहाड़ के दूर-दराज़ के क्षेत्रों के लोक गीत रहे हैं। प्रेम की जितनी सघन और करुण स्मृति इस कविता में दर्ज हुई है, वह हिंदी कविताओं में दुर्लभ है। चित्र वियतनामी फिल्म सेंट ऑफ़ ग्रीन पपाया से। )

Comments

Arvind Mishra said…
कविता तो एक है मगर अनुभूतियों के कई काल खंड इसमे समाये हुए से लगते हैं -सुंदर प्रस्तुति ! शुक्रिया !
अच्छी पोस्ट अनुराग! मेरे जीवन के शुरूआती 17 साल गढ़वाल के एक सुदूरवर्ती गांव में बीते हैं और उन लोकगीतों से मेरा गहरा परिचय और लगाव है, जिन पर ये कविताएं आधारित हैं। मंगलेश दा ने शानदार काम किया है। इन कविताओं को दुबारा पढ़वाने का शुक्रिया।
ravindra vyas said…
अनुरागजी,

मैं इन कविताअों पर कुछ पेंटिंग्स करना चाहूंगा।
mangalesh ji ki sambedana ki bunaavat kramashah baareek hoti hui sahmsher tak jaati hai.
kapildev
prem kavitayen apni gajhin aur baareek aatmparak sambedana ke bal par hi prabhaav chhodati hain.ye kavitaayen is arth me mulyavaan hain ki isme ek viral kism ki doob hai.mangales ki anubhooti ka javaab nahi.
kapildev
चुंबन एक दिन
तुम्हारे सामने काग़ज़ पर
एक कविता बनेंगे

कविता एक दिन
चुंबन बन जाएगी
काग़ज़ से उठकर।


क्या लेखनी है...धीरे-धीरे अनुभूति सघन होती रही ....! शुक्रिया..!
mark rai said…
एक दिन वह चुप हो जाती है
तब सुनाई देता है उसका विलाप
उसके छेदों से गिरती है राख।
सुंदर प्रस्तुति .....
स्तरीय खूबसूरत ब्लॉग .. आपके ब्लॉग से मैंने मंगलेश डबराल जी कि कविताओ की पोस्ट और लिंक आज चर्चामंच में रखा है .. आपका आभार .. http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/blog-post_07.html

नववर्ष पर शुभकामनाएं
कविता मे माध्यम से प्रेम और ज़िन्दगी के बहुत से आयामो को छुआ है……………एक उच्च कोटि की प्रस्तुति।
रात रात रात
किसी किनारे से नदी के
बहने की आवाज़ आती है
अकेला मैं उठता हूँ
एक गिलास पानी पीकर सो जाता हूँ।
............. बहुत सुन्दर कविताएँ

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