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Showing posts from December, 2008

तीन श्रद्धांजलियाँ

पहले कवि-नाटककार हैरॉल्ड पिंटर, फ़िर चिंतक सैमुएल हंटिंगटन और अब चित्रकार मंजीत बावा के निधन की ख़बर आई है। रचना, विचार और कला की दुनिया को इन तीनों ने अलग-अलग ढंग से आलोकित किया। पिंटर ने कवि-नाटककार से आगे जाकर एक सार्वजनिक बौद्धिक की भूमिका का भी निर्वाह किया। मौजूदा वक्त में पिंटर सरीखे लेखक और जन बौद्धिक की प्रजाति लुप्तप्राय है। पिंटर का हमारे बीच से जाना इस सन्दर्भ में और भी दुखद है।
हंटिंगटन को विचार-विमर्श की दुनिया में उनकी पुस्तक , '' The clash of civilizations and the remaking of world order'' की अत्यन्त मौलिक और विचारोत्तेजक स्थापनाओं के लिए याद किया जाता है। हंटिंगटन ने यह पुस्तक उस दौर में लिखी जब यह प्रश्न जिज्ञासा और आशंका के मिले-जुले स्वर में पुछा जा रहा था कि क्या आने वाले समय में सभ्यताओं का संघर्ष वैश्विक राजनीति के केन्द्र में होगा ? अपनी पुस्तक के ज़रिये उन्होंने इस सवाल का जवाब देने के अलावा सभ्यताओं के संघर्ष के बीच वैश्विक शान्ति और सहअस्तित्व कायम रखने के रास्ते भी बताए। कहना न होगा कि हंटिंगटन द्वारा शुरू किए गए विमर्श का दायरा आज कितना बड़ा …

कुंवर नारायण पर असद ज़ैदी

'ईमान का खाता' : कुंवर नारायण और उनकी कविता

असद ज़ैदी

धीरे धीरे टूटता जाता मेरी ही हँसी से मेरा नाता
कुंवर नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा है जिसने बहुत ज़माना देखा है। वह अपने तजरुबे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते हैं और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहते हैं। काव्यशास्त्रीय नज़र से देखेंतो कह सकते हैं उनके लहजे ही में सब कुछ है। उनको पढ़ते हुए लगता है किउनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता है--यही उनकी तर्ज़ है। बुफ़ों के शब्दों में : 'द स्टाइल इज़ द मैन'।
पर यह कहना असंगत न होगा कि स्टाइलिस्टों से कुलबुलाते काव्य-परिदृश्य में वह एक महत्वपूर्ण स्टाइलिस्ट-भर नहीं हैं। वह मूलतः नैतिक और सामजिकरूप से अत्यन्त सावधान और प्रतिबद्ध कवि हैं। हिन्दी के अव्वलीन नागरिक-कवि का कार्यभार और अधिकार अब उन्हीं के पास है। एक ज़माना पहले, 1960 के दशक के आरंभिक वर्षों में, मुक्तिबोध ने उन्हें अपने समीक्षात्माक लेख में 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' का कवि कहा था। कुंवर नारायण ने हरदम मुक्तिबोध की…

सिगरेट छोड़ने के बहाने : ओरहन पामुक

लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं
ओरहन पामुक

मुझे सिगरेट छोड़े हुए २७२ दिन हो गए। अब आदत हो गई है। मेरा तनाव कम हो गया है और मुझे अब ऐसा नहीं लगता कि मेरे शरीर का कोई हिस्सा टूट रहा है। पर ऐसा असल में है नहीं । सचाई यह है कि एक अभाव की भावना से मैं अब तक नहीं छूटा हूँ। मैं इस सोच की ज़द में रहा कि मुझे मेरे स्व से अलग कर दिया गया है। और ज्यादा सही यह कहना होगा कि अब मुझे ऐसे जीने की आदत हो गई है। निष्ठुर सत्य को मैंने स्वीकार कर लिया है।अब मैं फिर कभी सिगरेट पीऊंगा। कभी नहीं।ऐसा कहते हुए भी मैं दिवास्वप्न देखता हूँ कि मैं सिगरेट पी रहा हूँ। अगर मैं कहूँ कि ये दिवास्वप्न इतने भयानक और गोपनीय हैं कि उन्हें हम अपने आपसे भी छिपाते हैं... समझते हैं ? वैसे भी, यह बात ऐसे ही एक दिवास्वप्न के दौरान होगी और उस क्षण जो भी खिचड़ी मैं पका रहा होऊँगा, जैसे-जैसे मैं इस फिल्म यानी कि अपने सपने को शिखर तक जाता देखता हूँ, मुझे उतनी ही खुशी मिलती है जितनी कि पीने के लिए एक सिगरेट जलाने से मिलती है।तो सुख-दुख, आकांक्षा और हार, उदासी और उल्लास, वर्त्तमान-भविष्य के अनुभव को…

किस तरह से लिखूं मैं / निवेदिता / कि लगे/ तुम / हो ?

( वक्त-वक्त पर सबद में नए कविओं को वरिष्ट कवि-लेखकों के समान ही महत्व देकर प्रकाशित किया जाता रहा है। उसी कड़ी में इस बार विपिन कुमार शर्मा की कविताएं दी जा रही हैं। विपिन की कविताएं यों पत्र-पत्रिकाओं में आती रही हैं और वे इतने भी अजाने और नए नहीं हैं कि उनकी कवि-पत्री बांची जाए। पर यह ज़रूर है कि जैसा उनकी कविताओं से किसी काव्य-मुद्रा के असर में न होकर लिखने का पता चलता है, उसी तरह व्यवहार में कवियशःप्रार्थी न होने की वजह से वे अलक्षित होते रहे हैं। ऐसे कई युवा और महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी किसी दरबार में हाजिरी नहीं है और वे अपनी कविताओं के बूते सुधि पाठकों की निगाह में बने हुए हैं। सबद इन कवि-लेखकों का सच्चा सखा बनने की आकांक्षा रखता है। विपिन ने अपनी जो कविताएं दी थीं उनमें से चार कहीं भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं, जबकि पांचवीं कविता पूर्व प्रकाशित है। )

नई कविताएं

सुकवि की मुश्किल

बहुत तड़पकर हाथ मलता है कवि
जब उसे पता चलता है
कल रात
साड़ी दुनिया का प्रेम ओढ़कर
जब वह लिख रहा था प्रेम कविता
ठीक उसी वक्त
पड़ोस की एक लड़की
उसको मदद के लिए पुकार रही थी
किया जा रहा था उसका बलात्कार
लगभग उसी समय
च…

कवि कह गया है : १ : संजय कुंदन

कविता के बारे में कुछ बेतरतीब बातें

हिंदी कविता के बारे में दो परस्पर विरोधी बातें कही जा रही हैं। एक तो यह कि अब काव्य परिदृश्य में ऐसा कुछ खास नजर नहीं आ रहा जो ध्यान खींचता हो, युवा कवियों ने ऐसा कुछ नया नहीं जोड़ा जिसे रेखांकित किया जा सके। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग बेहद आश्वस्त होकर यहां तक कहते हैं कि यह कविता का स्वर्ण युग है। इतने सारे कवि लिख रहे हैं, यही क्या कम है। एक कवि इन दो तरह के वक्तव्यों को किस रूप में ले ? या उसे इन पर ध्यान देने की कोई जरूरत है भी कि नहीं ?

एक बार एक वरिष्ठ कवि ने मुझसे कहा था कि हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हमारे पाठक हैं या नहीं। तब मुझे यह सवाल बहुत दिनों तक परेशान करता रहा था कि क्या कवि अपनी एक स्वायत्त दुनिया में बंद होकर चुपचाप कविता लिखता रहे, किसी गुह्य या रहस्यमय साधना की तरह ? क्या हमें उनकी अपेक्षाओं और शंकाओं से मुंह फेर कर बैठ जाना चाहिए, जिनके लिए हम लिखने का दावा करते हैं ? क्या हमें उनसे यह कहना चाहिए कि मैं जो लिख रहा हूं लिखता रहूंगा तुम्हें समझना है तो समझो वरना भाड़ में जाओ। हमें तुम्हारी परवाह नहीं।

क्या कवि इस बात की चि…